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गंगा किनारे स्थित इस जेल में तैयार हो रही 10 रस्सियाँ, फाँसी के फंदे पर झूलेंगे निर्भया के गुनहगार?

कुछ दिन पहले ख़बर आई थी कि तिहाड़ जेल के पास निर्भया गैंगरेप के दोषियों को फाँसी देने के लिए लोग ही नहीं मौजूद हैं। अब इस मामले में तिहाड़ ने दूसरे जेलों से मदद माँगी है। इसके बाद बिहार का बक्सर जेल आगे आया है। बक्सर जेल में बंद कुछ अपराधी आजकल ओवरटाइम काम कर रहे हैं। दरअसल, उन्हें फाँसी के फंदे वाली रस्सी तैयार करने का जिम्मा दिया गया है। ऐसी कुल 10 रस्सियाँ तैयार की जा रही हैं। चर्चा है कि दिल्ली निर्भया गैंगरेप व हत्या के गुनहगारों को फाँसी के फंदे पर चढ़ाने के लिए इन्हीं रस्सियों का इस्तेमाल किया जाएगा।

बक्सर सेंट्रल जेल इस मामले में हमेशा से आगे बढ़ कर पहल करता रहा है। फ़रवरी 9, 2013 को जब आतंकी अफजल गुरू फाँसी के फंदे पर झूला था, तब तिहाड़ जेल ने बक्सर जेल से ही रस्सियाँ मँगाई थीं। अफजल गुरू 2001 में संसद भवन पर हुए हमलों में दोषी पाया गया था। गंगा नदी के किनारे स्थित बक्सर सेंट्रल जेल ऐसी रस्सियाँ तैयार करने के मामले में हमेशा अव्वल रहा है। पहले इन रस्सियों को ‘मनीला रोप’ भी कहा जाता था। बक्सर जेल सुपरिटेंडेंट वोइजे कुमार अरोड़ा ने इस बारे में बात करते हुए कहा:

“मुझे वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा निर्देश दिया गया है कि हमें 10 रस्सियाँ तैयार कर के रखनी हैं। मुझे तो ये भी नहीं पता कि इतनी बड़ी संख्या में फाँसी के फंदों वाली रस्सियों की माँग किस जेल ने की है? लेकिन हमलोग पूरी मेहनत से अपना काम करने में लगे हुए हैं।”

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से दरख्वास्त किया है कि निर्भया गैंगरेप व हत्या के एक दोषी की दया याचिका खारिज कर दी जाए। इसके बाद से ही इस मामले में सुगबुगाहट बढ़ गई है। जेल के एक अधिकारी ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को बताया कि गृह मंत्रालय के इस निवेदन के आलोक में यही प्रतीत होता है कि निर्भया गैंगरेप व हत्या के दोषियों को जल्द ही फाँसी मिलने वाली है।

बक्सर जेल में अभी भी कुछ ऐसे अपराधी हैं, जिन्होंने अफजल गुरू के फाँसी का फंदा तैयार किया था। उन्हें धागों का प्रयोग कर के मजबूत रस्सियाँ बनाने का पुराना तकनीकी अनुभव है। 7 लोग मिल कर लगातार 4 दिन पूरी लगन से काम करते हैं, तब जाकर ऐसी एक रस्सी तैयार होती है। अफजल गुरू को फाँसी पर लटकाने के लिए जिस रस्सी का प्रयोग किया गया था, उसे बनाने में 1725 रुपए ख़र्च आए थे। चूँकि अब धागों व इसमें प्रयोग होने वाली अन्य चीजों के दाम बढ़ गए हैं, इस बार ख़र्च ज्यादा आएगा।

इस रस्सी को बनाने में प्रयोग किए जाने वाले ‘Brass Bush’ की क़ीमत में भी उछाल आया है। फाँसी के फंदे वाली रस्सी की लम्बाई उस व्यक्ति से 1.6 गुना ज्यादा होनी चाहिए, जिसे उस पर झुलाया जाएगा। गया स्थित मानपुर के टेक्सटाइल व्यापारी अब तक इसके लिए धागों की सप्लाई करते आए हैं। इससे पहले इन्हें पंजाब के भटिंडा से ख़रीदा जाता था। अब तक सामान्यतः बक्सर जेल देश में अकेला ऐसा जेल था, जहाँ ये रस्सियाँ बनाई जा रही थीं। लेकिन, अब कई अन्य जेल भी इस मामले में आगे बढ़ कर काम कर रहे हैं।

1930 से ही ‘मनीला रोप’ तैयार कर रहे बक्सर जेल के अधिकारी गर्व से बताते हैं कि उनकी बनाई रस्सियाँ आज तक कभी भी विफल नहीं हुई हैं और अपराधी की मृत्यु ज़रूर हुई है। 1992 और 1995 में भागलपुर जेल में बंद कुछ अपराधियों को फाँसी पर लटकाया गया था, तब बक्सर जेल ने ही रस्सियाँ सप्लाई की थी। पश्चिम बंगाल में बलात्कारी धनंजय चटर्जी भी बक्सर जेल की बनी रस्सी से ही फाँसी पर झूला था। जेल के आईजी ने कहा कि फाँसी पर लटकने की प्रक्रिया में विलम्ब न हो, इसीलिए एडवांस में ही रस्सियाँ तैयार की जा रही हैं।

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‘हिन्दुओं’ को नहीं मिलने चाहिए वोटिंग राइट्स: नागरिकता विधेयक पर ‘सेक्युलर’ बनी शिवसेना

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) पर शिवसेना पेंडुलम की तरह झूलती नज़र आ रही है। जहाँ एक तरफ़ कुछ नेता इसका विरोध कर रहे हैं, शिवसेना ने कहा था कि वो अपने सहयोगी दलों कॉन्ग्रेस व एनसीपी से अलग रुख अख्तियार करते हुए विधेयक का समर्थन करेगी। अब संजय राउत ने ‘बीच का रास्ता’ निकालने की कोशिश करते हुए यह दिखाने की कोशिश की है कि उनकी पार्टी अपनी विचारधारा को त्यागे बिना ‘सेक्युलर’ हो गई है। राउत ने कहा कि हिन्दुओं (पड़ोसी देशों के प्रताड़ित) को भले ही नागरिकता दे दी जाए, उन्हें मताधिकार नहीं देना चाहिए। ये शिवसेना के पुराने रुख के एकदम विपरीत है, जब वो हिन्दुओं को सभी अधिकार देने की बात करती थी।

संजय राउत ने कहा कि अवैध घुसपैठियों को निकाल बाहर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शरणार्थी हिन्दुओं को भारत की नागरिकता देने का उनकी पार्टी समर्थन करती है। लेकिन, साथ ही उन्होंने जोड़ा कि शरणार्थी हिन्दुओं को वोट देने का अधिकार न मिले। शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत ने ट्विटर पर लिखा:

“केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी, आरोप लग रहे हैं कि शरणार्थी हिन्दुओं को भारत की नागरिकता देकर भाजपा अपना वोट बैंक तैयार कर रही है। इन आरोपों को थामने का सबसे अच्छा उपाय ये है कि उन हिन्दुओं को वोटिंग राइट्स ही न दिए जाएँ। और हाँ, उन कश्मीरी पंडितों का क्या? क्या अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद वो अपने घर वापस जाने में कामयाब हुए हैं?”

उधर ‘सामना’ में ये आशंका जताई गई है कि भारत सरकार अपने इस क़दम के हिन्दुओं व दूसरे मजहब के बीच अदृश्य विभाजन को बढ़ावा देते हुए विभिन्न धर्मों के बीच युद्ध की स्थिति पैदा करना चाहती है। बता दें कि इस बिल के पास होने से शरणार्थी विदेशी हिन्दुओं को भारत की नागरिकता मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। शिवसेना ने ‘सामना’ के जरिये पूछा कि क्या भारत में पहले से समस्याओं की कमी थी जो CAB के रूप में एक नई समस्या खड़ी कर दी गई है? शिवसेना ने दावा किया कि उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा बिहार में भी इस विधेयक का विरोध हो रहा है, जहाँ भाजपा सत्ता में है।

शिवसेना ने कहा कि हिन्दू शरणार्थियों की संख्या की पुष्टि होनी चाहिए। पार्टी ने पूछा कि लाखों की संख्या में भारत में आए इन हिन्दू शरणार्थियों को देश में कहाँ बसाया जाएगा? पार्टी ने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों को इन शरणार्थी हिन्दुओं को बसाने के लिए पहल करनी पड़ेगी।

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पूर्व AAP विधायक और कॉन्ग्रेसी नेता अलका लांबा की कैट फिल्टर के साथ फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग

AAP की पूर्व विधायक और वर्तमान में कॉन्ग्रेस नेता अलका लांबा हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक धरना-प्रदर्शन में गईं। वहाँ जाने-अनजाने एक ऐसी हरक़त हो गई, जिस पर सोशल मीडिया के यूज़र्स जमकर हँसी के ठहाके लगा रहे हैं।

दरअसल, धरना-प्रदर्शन के दौरान जब वो हाथ में माइक लिए लोगों से बात कर रही थीं, तो जिस शख़्स को उन्होंने अपना फ़ोन फ़ेसबुस से लाइव स्ट्रीमिंग के लिए दिया था, वो फ़िल्टर्स हटाना भूल गया। इससे हुआ यह कि उस दौरान अलका लांबा जिस भी व्यक्ति से उनकी परेशानी पूछने जातीं, उस व्यक्ति के चेहरे पर कभी बिल्ली, पिल्ले और दाढ़ी-मूँछ वाला फ़िल्टर आ जाता। इससे वो व्यक्ति कभी बूढ़ा दिखने लगता, तो कभी उसके चेहरे पर अचानक मूँछें आ जातीं, कभी लंबी दाढ़ी दिखने लगती तो कभी बिल्ली जैसे कान वाली शक़्ल दिखने लगती।

ऐसा ही भद्दा मज़ाक हुआ एक दिव्यांग व्यक्ति के साथ। जब अलका लांबा उनके पास पहुँची तो दिव्यांग व्यक्ति के चेहरे पर कभी गॉगल्स का फ़िल्टर लग जाता है, तो कभी सिर पर हैट लग जाता है, कभी बैंगनी रंग की मूँछ लग जाती है। ऐसा तब तक होता रहा, जब तक अलका लांबा उस व्यक्ति से बात करती रहीं।

इसके बाद अलका लांबा जब एक महिला के पास पहुँची तो उनके चेहरे पपर लंबी दाढ़ी वाला फ़िल्टर लग गया, जिससे वो बूढ़ी नज़र आने लगीं। इसके बाद महिला के चेहरे पर गुगली आँखों वाला फ़िल्टर लग गया, जो बेदह हास्यास्पद लग रहा था।

बता दें कि यह धरना-प्रदर्शन रोज़गार के अवसरों को लेकर पिछले कई दिनों से दिल्ली के मंडी हाउस चौराहे पर हो रहा था। इस दौरान अलका लांबा ख़ुद भी कई फ़िल्टर्स के साथ दिखाई दीं। 

लांबा के इस फ़ेसबुक लाइव स्ट्रीमिंग पर कई लोगों ने मज़ेदार टिप्पणियाँ की हैं।

एक साहब SRK ने लांबा को सूचित किया कि वीडियो बनाने वाला व्यक्ति एक ‘साइको’ है। फ़िलहाल, अब इस वीडियो को फ़ेसबुक से हटा लिया गया है।

लांबा की राजनीतिक यात्रा

अलका लांबा हाल ही में आम आदमी पार्टी के साथ अपने सार्वजनिक सम्पर्क टूटने के बाद वापस कॉन्ग्रेस में चली गईं, जहाँ उन्होंने ट्विटर पर सबको बता दिया कि कैसे दिल्ली के सीएम और AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप से हटा दिया था। 20 वर्षों से विभिन्न क्षमताओं में कॉन्ग्रेस की सेवा करने के बाद, उन्होंने दिसंबर 2014 में AAP में शामिल होने के लिए पुरानी पार्टी छोड़ दी थी। हालाँकि, AAP में रहने के 5 साल के भीतर, लांबा का पार्टी नेतृत्व से मोहभंग हो गया था। उन्होंने एक साल से अधिक समय तक रूकने के बाद आख़िरकार सितंबर-2019 में पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था।

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‘भैया मैं साँस नहीं ले पा रहा, मेरे बच्चों का ख्याल रखना’ – मौत से पहले आखिरी कॉल का दर्दनाक Audio

दिल्ली के रानी झाँसी रोड स्थित चार मंजिला अनाज मंडी इमारत में रविवार (दिसंबर 8, 2019) को आग और धुएँ के बीच घिरे कई बदनसीबों को अपनी मौत का अंदाजा हो गया था। इनमें से कुछ ने अपने-अपने घरों पर परिजनों को फोन मिलाए। किसी ने अपने बूढ़े पिता से खुद को बचाने की गुहार लगाई, किसी ने अपने दोस्त को परिवार का ध्यान रखने के लिए कहा, तो किसी ने अपनी गर्भवती बीबी को आखिरी कॉल करके जिंदा न बचने की आशंका जाहिर की।

मौत सामने खड़ी देख मोहम्मद इमरान ने अपने पिता को फोन कर उसे बचाने की गुहार लगाई और कहा कि वह जिंदा बाहर नहीं आ पाएगा। इमरान ने अंतिम कॉल में अपने पिता से कहा, “अब्बा बहुत डर लग रहा है। फैक्ट्री में आग लग गई है। बचना मुश्किल लग रहा है। हमें बचा लो।” जवाब में पिता ने कहा, “चिंता मत करो, अल्लाह पर भरोसा रखो।” बेटे और पिता के बीच इतनी ही बात हो पाई थी कि फोन कट गया। पिता हेलो… हेलो… बोलते रहे, लेकिन उन्हें बेटे की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

बिहार के सहरसा के 18 वर्षीय मुस्तकिन ने अपने 24 वर्षीय बड़े भाई अफसद को इस त्रासदी में खो दिया। मुस्तकिन ने कहा, “अफसद इस बार अपने परिवार के साथ ईद नहीं मना पाया था। वह सोमवार सुबह घर जाने वाला था और शनिवार रात को किए गए आखिरी फोन में उसने मुझसे घर का कुछ सामान खरीदने को कहा था।”

इस आग ने 43 लोगों की जान ले ली। रविवार तड़के 5 बजे के आसपास जब पूरी दिल्ली नींद के आगोश में डूबी हुई थी, तब आग में फँसा मोहम्मद मुशर्रफ अपने दोस्त को फोन मिला रहा था। मोनू को कॉल करके मुशर्रफ न केवल रो रहा था, बल्कि अपने दोस्त से कह रहा था कि कुछ ही देर में वह मरने वाला है और वह उसके बाद उसके परिवार को ख्याल रखे।

मुशर्रफ अपने दोस्त को फोन कर कहता है, “मोनू, भैया मैं आज खत्म होने वाला हूँ… चारों ओर धुआँ ही धुआँ है, एक-एक साँस लेना मुश्किल हो रहा है और कुछ ही पलों में आग लगने वाली है यहाँ। मोनू तुम करोल बाग आ जाना गुलजार से नंबर ले लेना…”

मोनू: कहाँ, दिल्ली? 

मुशर्रफ: हाँ…

मोनू: किसी तरह तुम निकलो वहाँ से…

मुशर्रफ: अब कोई रास्ता नहीं बचा… बस मैं खत्म हूँ मैं भैया आज… मेरे बाद मेरे परिवार को ख्याल रखना… अब साँस भी नहीं आ रहा है।

मोनू: पुलिस, फायर ब्रिगेड किसी नंबर पर कॉल कर बचने का प्रयास करो।

तभी मुशर्रफ का दम घुटने लगता है… मौत का सामने खड़ा देख वह रोने लगता है… और अल्लाह को याद करता है। फिर अचानक से मुशर्रफ की आवाज आने बंद हो जाती है और उसका दोस्त मोनू हेलो… हेलो करता है…

इंडिया टुडे टीवी से बात करते हुए मोनू ने कहा, “मैंने एक भाई खो दिया है। मैं उसके परिवार की मदद करने की अपनी प्रतिबद्धता लेकर जिऊँगा लेकिन मैंने आज सब कुछ खो दिया है। मेरा सबसे अच्छा दोस्त हमेशा के लिए चला गया।”

बिहार के मधुबनी जिले से 32 वर्षीय जाकिर हुसैन ने कहा कि उसके छोटे भाई शाकिर हुसैन ने अंतिम कॉल अपनी प्रेगनेंट बीबी को की थी। वह चौथी मंजिल पर स्थित टोपी बनाने वाले कारखाने में काम करता था। जाकिर ने कहा, “मैं फँस गया हूँ। मैं जिंदा बाहर नहीं आ पाऊँगा।”

दोनों भाइयों ने कल रात फोन पर बात की थी। उनके पिता भी दिल्ली में ही काम करते हैं और वे तीनों सोमवार को अपने गृहनगर जाने वाले थे। भाइयों ने रविवार को खरीददारी करने का मन बनाया था। जाकिर ने कहा, “शाकिर के तीन बच्चे हैं-दो बेटियाँ और एक बेटा। उसकी पत्नी गर्भवती है। वह एक और बच्चे का पिता बनने वाला था, लेकिन वो अपने बच्चों को अनाथ छोड़कर चला गया।”

उत्तर प्रदेश के शहजाद ने भी अपने सुबह 5 बजे अपने माता पिता को कॉल किया बचाने की गुहार लगाई। मगर कॉल बीच में ही कट हो गया और जल्द ही शहजाद के माता पिता को पता चला कि शहजाद मर चुका है। इसके अलावा राजू नाम के अन्य कर्मचारी ने भी अपने दोस्त फुरकान अहमद को कॉल किया। अहमद ने उस कॉल के बारे में बात करते हुए कहा, “उसकी आवाज़ अस्पष्ट थी लेकिन उसने मुझे बचाने के लिए विनती की। उसने कहा कि चारों तरफ आग और धुआँ था। मैंने पूछा कि क्या उन्होंने और अन्य लोगों ने पुलिस को मदद के लिए बुलाया, लेकिन मैं उनकी प्रतिक्रिया नहीं सुन सका। यह बातचीत केवल 30-40 सेकंड तक चली।”

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847 करोड़ रुपए के साथ 36 लाख+ महिलाओं की बदली जिंदगी: MP, महाराष्ट्र और ओडिशा सबसे आगे

कृषि मंत्रालय ने पिछले सप्ताह संसद को बताया कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकार की फ्लैगशिप योजना से 36 लाख से अधिक महिला लाभान्वित हुईं। महिलाओं को कृषि गतिविधियों में संलग्न करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 84 परियोजनाओं के लिए 847 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

ख़बर के अनुसार, एक सवाल – ‘क्या सरकार महिला किसानों के लिए कोई योजना चला रही है’ – के लिखित जवाब में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय महिलाओं की भागीदारी और उत्पादकता बढ़ाने के लिए व्यवस्थित निवेश करके महिला किसान सशक्तीकरण योजना (MKSP) को लागू किया गया है।

उन्होंने कहा,

“MKSP के तहत, देश में 24 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में 84 परियोजनाओं के माध्यम से 36.06 लाख महिला किसान लाभान्वित हुई हैं। इनमें से महाराष्ट्र में 1.81 लाख महिलाओं को लाभान्वित किया गया है। मंज़ूर परियोजनाओं के कार्यान्वयन की दिशा में केंद्र की ओर से कुल 847.5 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।”

MSKP वेबसाइट के अनुसार, मध्य प्रदेश की महिला किसान केंद्रीय योजना का लाभ उठाने में सबसे आगे हैं, उनका आँकड़ा 6.46 लाख है। सरकारी आँकड़ों से पता चला है कि दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र है, जहाँ यह आँकड़ा 5.18 लाख रहा और उसके बाद ओडिशा का नंबर है, जहाँ लाभ उठाने वाली महिला किसानों का आँकड़ा 4.61 लाख था।

MSKP राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का एक उप-घटक है, जिसका उद्देश्य कृषि में महिलाओं की स्थिति में सुधार करना है। अधिकतर मामलों में, किसानों ने सरकारी सहायता प्राप्त करने और व्यवस्थित खेती के लिए स्वयं सहायता समूह बनाकर लाभ उठाया है।

MKSP योजना के तहत सहायता प्रदान करने के अलावा, कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि सरकार कृषि-क्लिनिक और कृषि-व्यवसाय केंद्र, कृषि विपणन की एकीकृत योजनाएँ, कृषि यांत्रिकीकरण के उप-मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन जैसी योजनाओं के तहत महिला किसानों को अतिरिक्त सहयोग और सहायता दे रही है।

चालू वित्त वर्ष के दौरान, सरकार ने इन योजनाओं के लिए 3,756 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। मंत्री ने कहा, “इसके अलावा, महिला किसान पात्रता के अनुसार विभाग द्वारा कार्यान्वित सभी योजनाओं के तहत लाभ उठा सकती हैं।”

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दिल्ली की अनाज मंडी में रविवार (दिसंबर 8, 2019) को लगी आग से 43 लोग काल के गाल में समा गए। दिल्ली सरकार और एमसीडी की तू-तू मैं-मैं के बीच आग लगने के असली कारणों पर चर्चा करने के लिए नेताओं के पास समय ही नहीं बचा। जिस अवैध फैक्ट्री में ये आग लगी, उसके मालिक रेहान ख़ान को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ की। इसधर सोमवार को उसी इलाक़े में फिर से आग लग गई। 24 घंटे बाद भी आग का धुआँ ख़त्म नहीं हुआ है। पीड़ित इमारत से अब भी धुआँ निकल रहा है। पुलिस ने जाँच के लिए फक्ट्री सील कर रखी है।

दरअसल, सोमवार को सुबह हुआ यूँ कि ईमारत की तीसरी मंजिल पर आग की लपटें उठने लगी। स्थानीय लोगों ने जैसे ही फिर से तेज़ धुआँ निकलते देखा, उन्होंने पुलिस को सूचित किया। इसके बाद 4 अग्निशमन वाहन व कई दमकलकर्मी वहाँ पहुँचे। बिल्डिंग खाली करा लिए जाने के कारण जान-माल की क्षति नहीं हुई है। रविवार को हुई त्रासदी से अभी तक उबरने की कोशिश कर रहे लोग अभी भी सहमे हुए हैं।

घटनास्थल पर भारी पुलिस फोर्स की तैनाती की गई है। लोगों को बैरिकेडिंग से आगे नहीं जाने दिया जा रहा है। सोमवार को फिर से आग के जोर पकड़ने की ख़बर के साथ ही दमकल विभाग की 4 आग बुझाने वाली गाड़ियाँ वहाँ पर पहुँचीं। रानी झाँसी रोड में फिल्मिस्तान इलाक़े में हुई इस घटना में 20 से अधिक लोग अभी भी घायल हैं। विभिन्न अस्पतालों में उनका इलाज चल रहा है। रविवार की शाम लोग अपने परिजनों को ढूँढ़ते हुए भागदौड़ करते नज़र आए। परिजनों से शवों की पहचान कराई गई। कई लोग अभी भी ऐसे हैं, जिनके परिचितों का कोई अता-पता नहीं है।

ये हादसा बिहार संकरी गली में बानी 5 मंजिला ईमारत में हुई, जहाँ टोपी, बैग इत्यादि की फक्ट्री चलती थी। देर शाम तक 29 शवों की ही पहचान हो पाई थी। मरने वालों में अधिकतर मजदूर हैं। सोमवार को इस शवों का पोस्टमॉर्टम किया जाएगा। 30 दमकलों और 150 फायर-कर्मियों के पहुँचने के बाद आग पर काबू पाया जा सका था। मृतकों में अधिकतर यूपी-बिहार से हैं। वो सभी मजदूर वहीं पर काम करते थे और उनके रहने की व्यवस्था भी वहीं की गई थी। बिल्डिंग में न तो आग बुझाने के उपकरण थे और न ही फक्ट्री के पास दमकल विभाग की एनओसी थी।

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सुरक्षा परिषद में भारत का न होना हमें मंजूर नहीं, UN में बदलाव वक़्त की माँग: जर्मनी

भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्टर लिंडनर ने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में शामिल किए जाने की जोरदार वकालत की है। भारत और जर्मनी कई वैश्विक मुद्दों पर एक साथ काम कर रहे हैं। वाल्टर ने कहा कि आज की वैश्विक परिस्थितियों को देखे हुए ये दोनों ही देश यूएनएससी में शामिल किए जाने के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार हैं। पिछले ही महीने जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल भारत दौरे पर आई थीं। उस दौरान दोनों देशों के बीच 20 से भी अधिक करार (MOU) पर तेज़ी से आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया गया था। दोनों देश स्मार्ट सिटी, ग्रीन मोबिलिटी और क्लाइमेट चेंज पर साथ काम कर रहे हैं।

वहीं जम्मू कश्मीर की ताज़ा परिस्थितियों पर अपनी राय रखते हुए जर्मनी के एन्वॉय ने कहा कि वहाँ इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबन्ध स्थायी नहीं हैं और जर्मनी बाकी देशों की तरह चाहता है कि ये सभी प्रतिबन्ध जल्द से जल्द हटाए जाएँ। लिंडनर ने कहा कि अगर यूएन में जल्द ही बदलाव नहीं किया जाता है तो लोग उस पर भरोसा करना छोड़ देंगे। उन्होंने कहा कि अगर जल्द ही विश्व की सबसे बड़ी संस्था में रिफॉर्म नहीं किया जाता है तो लोग ये समझेंगे कि ये वास्तविकता से काफ़ी दूर हैं।

उन्होंने आश्चर्य जताया कि 140 करोड़ की जनसँख्या वाला भारत यूएनएससी का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि ये अस्वीकार्य है। लिंडनर ने कहा कि भारत, ब्राज़ील, जापान और जर्मनी सुरक्षा परिषद की सदस्यता को लेकर एक-दूसरे का समर्थन करते आए हैं। उन्होंने जोड़ा कि भारत को इस संस्था में ज़रूर होना चाहिए। उन्होंने माना कि यूएन कई मुद्दों पर विफल भी रहा है लेकिन यही एक वैश्विक संस्था है, जिसने दुनिया को बाँधे रखा है। उन्होंने कहा कि यूएन में रिफॉर्म का अर्थ होगा इसे और ज्यादा विश्वसनीय और स्वीकार्य बनाना।

जर्मन राजदूत ने कहा कि आज कई मुद्दों पर भारत और जर्मनी समान राय रखते हैं। दिल्ली में प्रदूषण के स्तर के बारे में लिंडनर ने बताया कि क्लाइमेट चेंज और ग्रीन मोबिलिटी के मामले में जर्मनी और भारत एक साथ मिल कर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली एयरपोर्ट के पास स्थित मेट्रो स्टेशन में जर्मनी सोलर पैनल लगवा रहा है। लिंडनर ने जम्मू कश्मीर को भारत का घरेलू मुद्दा बताया लेकिन साथ ही कहा कि पूरे यूरोप का यही रुख है कि प्रतिबन्ध जल्द से जल्द हटाए जाएँ।

ना कोई निष्कर्ष, ना ही रखा जाएगा कोई रिकॉर्ड… कश्मीर पर UNSC में होगी सिर्फ अनौपचारिक बैठक

चीन-Pak सहित 55 देशों का UNSC में भारत की अस्थायी सदस्यता को समर्थन

‘ज़रूर बनेगा भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य, इस दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है’

महाभारत में ‘बलात्कार’ की क्या सजा थी? इसे स्त्री की ‘इज्जत लुटने’ जैसी बेहूदी बात से किसने जोड़ा?

महाभारत की द्रौपदी आम तौर पर असहाय सी “मान ली” जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग अपने समय और परिवेश के हिसाब से पूर्वग्रहों से ग्रस्त होकर ही व्याख्या करने बैठते हैं। हाल ही में एक बार जब विख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली से श्री राम के विषय में कोई प्रश्न पूछा जाने लगा तो उन्होंने बीच में ही टोककर कहा, ठहरो पहले ये बताओ कि किसके राम? वाल्मीकि के राम अलग है और तुलसी के राम अलग। द्रौपदी को असहाय मानने के पीछे एक बड़ी वजह “गुनाहों के देवता” को कहा जा सकता है। अपने एक नाटक में इस उपन्यास के लेखक ने द्रौपदी के पात्र से “अंधे का पुत्र अँधा” कहलवाया। उनका ये “अँधा युग” नाटक 1954 में भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था।

प्रयागराज (तब इलाहबाद) रेडियो स्टेशन से इसके प्रसारण के बाद इसे वाम मजहब के लोगों ने “युद्ध विरोधी” क्रन्तिकारी नाटक बताया और 1962 से तो सत्यदेव दूबे और इब्राहीम अल्काजी जैसे रंगमंच से जुड़े लोगों ने इसका मंचन भी शुरू कर दिया था। सन 1963 में खुद नेहरू इसका मंचन देखने पहुँचे। इस नाटक के मंचन के लिए फिरोजशाह कोटला और पुराना किला जैसी जगहें चुनी जाती थी। इतिहास से जोड़ देने के चलते इसने खूब धूम मचाई। इस नाटक से “अँधे का पुत्र अँधा” कहकर द्रौपदी द्वारा दुर्योधन को नीचा दिखाए जाने को महाभारत के युद्ध की वजह बताया गया।

जाहिर है जैसे अंगूठा चूसने वाले बच्चों ने इससे व्याख्या करने की कोशिश की थी उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। कुछ ऐसे भी थे जो धूर्त बुद्धि-पिशाच थे और उन्हें इसके जरिये समाज में स्त्रियों को कलह के कारण के तौर पर स्थापित करने में सुविधा हो रही थी। खुद इस नाटक के लेखक भी अपनी पहली पत्नी को पीटने के लिए जाने जाते थे, इसलिए उनकी निजी कुंठा भी ऐसे विचार का कारण रही होगी। सवाल ये है कि अगर द्रौपदी का ऐसा कहना युद्ध का कारण होता तो भला इससे काफी पहले बचपन में ही भीम को विष देकर नदी में फेंक देने जैसा कृत्य दुर्योधन ने क्यों किया होता? फिर ये भी कि लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मारने का षड्यंत्र भी तो द्रौपदी के विवाह से पहले ही किया गया था!

तो ये माना जा सकता है कि महाभारत की द्रौपदी वैसी नहीं थी जैसा उसे पूर्वग्रहों से ग्रस्त कुछ लोग दर्शाना चाहते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वो फैसले लेती नजर आती है? जवाब है हाँ। जैसे आज के भारत में राष्ट्रपति के पास मृत्युदंड को क्षमा करने के अधिकार होते हैं, लगभग वैसे ही द्रौपदी भी मृत्युदंड माफ़ करती नजर आती है। जब पांडव वनवास में थे तो वो ऋषि तृणबिंदु के आश्रम के क्षेत्र में रहते थे। एक दिन जब पांडव समिधा और द्रुवा इकट्ठी करने वन में रवाना हुए तो ऋषि के आश्रम से धात्रेयिका द्रौपदी के पास जा बैठी। थोड़ी देर में उधर से जयद्रथ गुजरा। इतनी सुन्दर स्त्री को आश्रम में देख के उसकी नियत डोली। पहले तो उसने मंत्री से पता करवाया कि स्त्री है कौन, फिर उस से मिलने पहुँचा।

जयद्रथ दुस्शला का पति था यानि कौरव पांडवों की इकलौती बहन का पति। बहनोई का यथासंभव सत्कार हुआ। लेकिन जब द्रौपदी को जयद्रथ के इरादों का पता चला तो वो भड़कीं। अब जो जयद्रथ था वो आज कल के लुच्चों से ज्यादा अलग नहीं सोचता था। जब पाँच पति हैं, तो मुझमें क्या कमी? वो द्रौपदी को उठा ले चला! धात्रेयिका भागी और जंगल में जा रहे पांडवों को सूचित कर दिया। नतीजा क्या हुआ होगा वो अंदाजा लगाना तो मुश्किल नहीं है। भीम और अर्जुन थोड़ी ही देर में जयद्रध के मंत्री-अंगरक्षकों को मार गिराते हैं। वो द्रौपदी को छुड़ाते हैं और जयद्रथ को बाँध कर, घसीटते हुए आश्रम ले आए।

अब द्रौपदी को बलात्कार के प्रयास करने वाले का दंड चुनना था। उस समय की स्थापित नीति के हिसाब से इस अपराध का दंड सीधा मृत्युदंड होता लेकिन द्रौपदी ने कहा इकलौता बहनोई है! मारोगे कैसे? इसका सर मूंड कर छोड़ दो, बेइज्जती मौत के बराबर ही है। कुल जमा पाँच पांडवों ने जयद्रथ की अच्छी खासी सेना ख़त्म करके उसका सर मूंड दिया था। इसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए जयद्रथ ने पांडवों को युद्ध में एक दिन रोक लेने का वरदान लिया था। ये वो वरदान था जिस से महाभारत के युद्ध में जयद्रथ ने पांडवों को चक्रव्यूह के बाहर रोका और अभिमन्यु मारा गया था। इस पीढ़ी में आपके दरियादिल होने का नतीजा अगली पीढ़ी में आपके बच्चे झेलेंगे। ऐसा हमेशा होता है, ये भी बिलकुल सीधा हिसाब है।

इसके विपरीत द्रौपदी किसी का मृत्युदंड जारी करती भी आसानी से नजर आ जाती है। ये महाभारत के विराटपर्व में तब दिखता है जब पांडव अज्ञातवास में थे। वहाँ राजा विराट के साले कीचक की नजर द्रौपदी पर होती है और उसके मना करने पर भी जब कीचक नहीं मानता तो द्रौपदी वल्लभ नाम रखकर रसोइया बने हुए भीम के पास जाती है। मल्लयुद्ध में कीचक को हराना उस दौर में नामुमकिन था। भीम के द्वारा कीचक का वध ही वो कारण था, जिसकी वजह से कौरवों को पांडवों के मत्स्य देश में होने का अंदाजा होता है और वो हमला करने वहां पहुँच जाते हैं। यानी जितनी बार भी महाभारत में देखिए, बलात्कार या इसकी कोशिश का नतीजा मृत्युदंड ही दिखेगा।

सिर्फ शब्द पर आएँ तो बलात्कार शब्द में एक और चीज़ भी नजर आती है। ये बलात्कार जहाँ अपराध को स्त्री की अस्मिता से नहीं जोड़ता, वहीँ आज के दौर का “इज्जत लूटना” इसे सीधे अस्मिता, या सम्मान से जोड़ता है। उर्दू जबान में भी इसके लिए “अस्मत-दारी” लफ्ज़ इस्तेमाल होता है। अरबी या फारसी में संभवतः इसे कोई अपराध नहीं माना जाता होगा, इसलिए इसके लिए सिर्फ “जिना” जो अनैतिक यौन संबंधों के लिए प्रयुक्त होता है, सिर्फ वही शब्द याद आता है। समय के साथ आये बदलावों में से एक है भाषा के बदलने से पीड़ित को ही बलात्कार जैसे अपराध में शर्मिंदगी महसूस करवाया जाना।

बाकी रहा सवाल बलात्कार में मृत्युदंड का तो वो उचित तो लगता है, लेकिन फांसी या बिजली के झटके जैसे आसान तरीके नहीं होने चाहिए। बलात्कारी को अंग-भंग के जरिये नपुंसक बनाया जाना चाहिए, उसे कुछ साल जेल में डाला जाए और बुढ़ापे में छोड़ा जाए, ताकि घिसटकर बुढ़ापे, गरीबी, भूख, बीमारी की वजह से मरे। मुकदमा चलाए बिना गोली मारना तो आसान मौत है, इससे तो सिर्फ न्यायिक व्यवस्था में अविश्वास का पता चला!

अहमद, सुल्तान, अली, नज़म और शफीक ने युवती के साथ रेप के बाद किया उसके शरीर पर पेशाब

एक महिला ने यूके की कोर्ट में ऐसा खुलासा किया, जिसे जान कर वहाँ उपस्थित सभी लोगों की रूह काँप गई। उस महिला ने अपना दर्द बयाँ किया, जिसमें उसने बताया कि उसे तभी बेच दिया गया था जब वह मात्र 12 साल की थी। उसके साथ इतना यौन दुर्व्यवहार हुआ था कि उसके बारे में स्कूल में भी बातें चलने लगी थी, जहाँ वह पढ़ती थीं। यहाँ तक कि स्कूल के शिक्षकों ने भी उसकी मदद नहीं की। महिला ने बताया कि 5 लोगों ने उसके साथ रेप किया। इस दौरान उससे कई तरह के ‘सेक्स एक्ट’ परफॉर्म कराए गए। इसके बाद एक आरोपित ने तो उसके ऊपर पेशाब तक कर दिया।

इस मामले में पाँचों आरोपितों के ख़िलाफ़ मामला जूरी सुन रही है। युवती ने बताया कि उसे ‘माँस के टुकड़े’ की तरह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास भेजा गया। महिला ने अपने उस पूरे वाकये की तुलना नरक से की और कहा कि कई बार तो उसे ऐसा लगा कि आत्महत्या कर लेनी चाहिए। उसने बताया कि उसके परिवार को इस सब चीजों के बारे में कुछ नहीं पता था लेकिन स्कूल में उसे लेकर अफवाहों का बाजार गर्म था। उसने बताया कि वो किसी और से ये चीजें शेयर नहीं करना चाहती थी।

आरोपितों में से एक का नाम अली सुल्तान है। अली सुल्तान ने दावा किया कि उक्त महिला जब रेप होने की बात कह रही है, तब वह पाकिस्तान में था। महिला ने कोर्ट में कहा कि अली ने क्या किया, ये वही जानती है। साथ ही पीड़िता ने न्याय की गुहार लगाई। पीड़िता ने बताया कि सबसे पहले उसे अहमद ने बेचा। जब उसकी ज़िंदगी में सब ठीक नहीं चल रहा था तो उसका फायदा उठा कर अहमद ने उसके साथ दोस्ती बढ़ाई और फिर बेच डाला। इसके बाद 33 वर्षीय अली सुल्तान ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर सेक्स स्लेव की तरह बेच दिया।

अली सुल्तान के बारे में कोर्ट को बताया गया है कि वो और भी युवतियों के साथ इस तरह की हरकत कर चुका है। एक अन्य आरोपित अमजद हुसैन ने पीड़िता को ‘ओरल सेक्स’ के लिए मजबूर किया और उसने 2 बार ऐसा किया। इसके बाद शफ़ीक़ यूनस ने उसके साथ बलात्कार किया। अंत में नज़म अख्तर ने रेप किया। उसने पीड़िता को विभिन्न मनपसंद ‘सेक्स एक्ट’ परफॉर्म करने को मजबूर किया। आरोपितों में से 2 ‘परफेक्ट पिज़्ज़ा’ में कार्यरत हैं।

न त्वहं कामये राज्यं: ‘गीता जयंती’ में नहीं पहुँचे BHU के कुलपति, परीक्षा का बहिष्कार करेंगे ‘धर्म संकाय’ के छात्र

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय में फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। विश्यविद्यालय प्रशासन ने भले ही मामले को ढकने के लिए तमाम प्रयास किए हों, छात्रों का विरोध-प्रदर्शन अनवरत जारी है। रविवार (दिसंबर 8, 2019) को संकाय के छात्रों ने इस उपलक्ष्य में गीता पाठ का आयोजन किया। छात्रों ने बताया कि बीएचयू के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय प्रत्येक रविवार को गीता का विशेष रूप से प्रवचन किया करते थे। इसकी परम्परा धर्म विज्ञान संकाय आज भी निभा रहा है। प्रत्येक रविवार को मालवीय भवन में गीता प्रवचन अभी भी अनवरत होता चला आ रहा है। संयोग से आज गीता जयंती के साथ रविवार भी है।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर रविवार को भी गीता जयंती के अवसर पर पूर्व निर्धारित गीता जयंती महोत्सव’ में नहीं पहुँचे। छात्रों का आरोप है कि हिन्दू धर्म से जुड़े कार्यक्रमों से दूरी बना कर रखने वाले कुलपति ने यह पहली बार नहीं किया है बल्कि अपनी नियुक्ति के समय से ही वह मालवीय भवन से दूरी बनाए हुए हैं। और ऐसे में उनसे मालवीय मूल्यों की रक्षा की उम्मीद रखना बेमानी है।

हालाँकि, अंतिम समय में गीता जयंती के कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के रेक्टर शामिल हुए और कुलपति पास के ही होलकर भवन में व्यस्त रहे। प्रशासन ने जिसकी सूचना आज ही ट्वीट के माध्यम से दी। छात्रों ने कहा गीता जयंती की अध्यक्षता कुलपति की जगह रेक्टर वी. के. शुक्ला ने की। जबकि मालवीय भवन जहाँ गीता जयंती समारोह मनाया जा रहा था वहाँ से चंद कदम की ही दूरी पर कुलपति जी नियुक्तियों के लिए साक्षात्कार लेने में व्यस्त रहे। दिल्ली में कार्यपरिषद की बैठक से आने के बाद रविवार होने पर भी साक्षात्कार कराना तो याद रहा पर 1 महीने से आंदोलन कर रहे छात्रों की माँगों पर कुछ बोलना भी उचित नहीं समझा, कार्यवाही तो दूर की बात रही।

वहीं अगर आज की बात करें तो संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में पिछले एक महीने से चल रहे आंदोलन में धर्म व मालवीय मूल्यों के रक्षार्थ गीता जयंती के अवसर पर भगवद्गीता का पाठ किया गया व साथ ही भजन कीर्तन भी किया गया। गीता पाठ कार्यक्रम में उपस्थित संकाय के पूर्व छात्र डॉ. मुनीश कुमार मिश्र ने बताया कि महामना जी को गीता का ग्रंथ सबसे प्रिय था। वह प्रतिदिन गीता का पाठ किया करते थे व रविवार को गीता पर स्वयं ही प्रवचन करते थे, जिसको सुनने के लिए विश्वविद्यालय ही नहीं दूर-दूर से विद्वतजनों का आगमन होता था। आज भी धर्म विज्ञान संकाय के द्वारा वह परंपरा मालवीय भवन में संचालित की जा रही है।

आंदोलनरत छात्रों ने बताया कि महामना को जैसे गीता प्रिय थी, उसी तरह धर्म विज्ञान संकाय भी प्रिय था। छात्रों ने आगे कहा कि उनके द्वारा धर्म की रक्षा के लिए जो आंदोलन किया जा रहा है, उसमें कहीं न कहीं महामना की ही प्रेरणा है। महामना गीता के इस श्लोक को बार-बार दोहराया करते थे:

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥

भावार्थ: हे प्रभु! मुझे राज्य की कामना नही, स्वर्ग-सुख की चाह नही तथा मुक्ति की भी इच्छा नही। एकमात्र इच्छा यही है कि दुख से संतप्त प्राणियों का कष्ट समाप्त हो जाये।

धर्म संकाय के छात्रों ने विश्वास जताया कि महामना ने अगर आंदोलन के लिए प्रेरित किया है तो उनकी ही प्रेरणा से इसका उचित समाधान अवश्य ही मिलेगा। प्रदर्शनकारी छात्र शुभम तिवारी ने कहा कि अगर सोमवार तक छात्रों की बात नहीं मानी जाती है तो 10 दिसम्बर से होने वाली सेमेस्टर परीक्षा का बहिष्कार किया जाएगा। आंदोलन के नेतृत्व कर रहे छात्र चक्रपाणि ओझा ने कहा:

“जल्द ही आंदोलन को बड़ा रूप दिया जाएगा। हम शांत हैं तो तो प्रशासन ये न समझे कि चुप हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन हमें हल्के में न ले। हमारी माँगें जल्द मानी जाए अन्यथा हम सभी छात्र बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।”

शुभम तिवारी ने कहा कि अगर सोमवार तक हमारी बात नहीं मानी जाती है तो छात्र 10 दिसम्बर से होने वाली सेमेस्टर परीक्षा का बहिष्कार करेंगे। धरनारत छात्रों में अभिषेक, धीरज मिश्र, शशिकांत मिश्र, प्रिंस, प्रशांत चतुर्वेदी, आनंद मोहन झा, कृष्ण कुमार सहित कई अन्य छात्र भी उपस्थित रहे।

इससे पहले छात्रों ने आरोप लगाया कि फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति के लिए उन्हें विशेषाधिकार के तहत हर जगह जबरदस्ती टॉप कराया गया। ऐसा यह सिद्ध करने के लिए किया गया कि वो 100% योग्य हैं। छात्रों का आरोप है कि इसी कारण उन्हें 10 में 10 नम्बर दिया गया था। बीएचयू प्रशासन की हठधर्मिता को उजागर करते हुए छात्रों ने कहा कि ग़लती सुधारने की बजाय यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि जो चयन समिति ने किया वहीं ठीक था।

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