त्रासदी में डूबा एक शहर। घरों में लबालब पानी। हर ओर हहाकार। चीत्कार के बीच एक लड़की बाहर निकलती है। पानी में डूब चुके सड़क पर फोटोशूट कराती है। तस्वीरें सोशल मीडिया में पोस्ट होती है। वायरल होकर मुसीबतों में घिरे एक शहर के वाशिंदों की जिंदादिली का प्रतीक बन जाती है।
यह तस्वीर पटना की है। नजर आ रही लड़की हैं, अदिति सिंह। निफ्ट पटना में पढ़ती हैं और मॉडलिंग भी करती हैं। यूॅं तो इस फोटोशूट में ऐसा कुछ नहीं है जो अनर्गल हो। अमूमन, त्रासदी में फँसे हर शहर से जिंदादिली की ऐसी तस्वीरें आ ही जाती हैं।
लेकिन दिल्ली में बैठे एक पत्रकार ने इस तस्वीर में कमीनापन देखा। बेशर्मी देखी। क्रिएटिविटी के नाम पर इतने आहत हुए कि फेसबुक पर लिखा, “अगर यह कला है तो इस कला को पटना की बारिश में सबसे पहले डूब जानी चाहिए और कला मुक्त समाज हो।”
कायदे से तो यह त्रासदी व्यवस्था का कमीनापन है। गड्ढे-तालाब भर कर कोठी बनाने की बेशर्मी है। शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर डूबोने की क्रिएटिविटी है। पानी की जमीन सोखने की कलाबाजी है। पहली बारिश में इन सबको डूबना चाहिए ताकि समाज त्रासदी मुक्त हो।
पर पत्रकारिता में गहराते ‘रवीश बुद्धि’ का नमूना ही है कि नवभारत टाइम्स के पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा को जिंदादिली में कमीनापन, बेशर्मी और प्रचार की भूख, सब एक साथ दिखे। रवीश बुद्धि पत्रकारिता के चोले में वही असर छोड़ते हैं, जैसा समाज में जड़ बुद्धि। यही कारण है कि ये खुद से असहमति रखने वाले पाठकों की नहीं सुनते। सोशल मीडिया के अपने उन दोस्तों की भी नहीं सुनते जो इनके पेशे (हर आवाज को सम्मान देना) के कारण इनसे जुड़े।
नरेंद्र नाथ मिश्रा के पोस्ट पर अभिजीत भारद्वाज कमेंट करते हैं, “यही अगर फोटो मुम्बई की बाढ़ की रहती तो आप की कलम कहती ‘Sprit of Mumbai’ और बिहार का है तो आप कटाक्ष कर रहे हैं।” अवनीश कुमार लिखते हैं, “क्यों मातम करें, यह बताइए? पटना को बर्बाद सबने किया है। अवैध अतिक्रमण, बिना व्यवस्थित तरीके से मकान बनाना, नाले पर कोचिंग की पार्किंग और नाले से भी नीचे सड़क।”
नरेंद्र नाथ मिश्रा वही पत्रकार हैं जिन्होंने इस साल जुलाई में एक फेक न्यूज को हवा दी थी। दावा किया था कि “मुस्लिम के कुत्ते” की अफ़वाह सुनकर हिन्दू बवाल काटने लगे और बाद में कुत्ते का मालिक हिन्दू निकलने पर शांत हो गए। पटना की इस घटना को लेकर अखबार की जिस खबर को उन्होंने अपने ट्वीट के साथ लिंक किया था, उसमें ऐसा कुछ नहीं था। दावा गलत साबित होने पर भी उन्होंने अपने एंगल के पक्ष में न कोई सबूत पेश किया और न ही अपनी गलती मानी।
वैसे, रवीश बुद्धि ग्रसितों से ऐसी उम्मीद की भी नहीं जा सकती, क्योंकि इससे उनका ‘सारी बातें सही, पर खूॅंटा यहीं गाड़ूँगा’ का दंभ टूटता है। लेकिन, मिश्रा जी बिहार से आते हैं, जहॉं बाढ़ स्थायी समस्या है। संभव है उन्होंने इस दुख को भोगा भी हो। सो, उम्मीद की जानी चाहिए कि अगली बार जब भी जिंदादिली की तस्वीर पर उनकी नजर पड़ेगी तो उन्हें एक लड़की की अदाओं में कमीनापन नहीं दिखेगा। उसके कपड़ों में झॉंक वे बेशर्मी नहीं तलाशेंगे। और न ही उसकी प्रचार की भूख से उनके पेट में मरोड़ उठेगा। वे कमीनेपन, बेशर्मी में डूबी उस व्यवस्था को देख पाएँगे, जो ऐसी हरेक त्रासदी को आमंत्रित कर फिर अगले के इंतजार में बैठ जाती है और बीच के वक्त में अपने आपदा प्रबंधन का प्रचार करती है।
कहाँ से लोग इस तरह का कमीनापन और बेशमी लाते हैं। पटना में फोटोग्राफी के नाम पर जहां लोग मदद के नाम कराह रहे हैं,मौत से संघर्ष कर रहे हैं, क्रिएटिविटी के नाम पर मॉडल का फोटोशूट किया गया।पता है कि उनकी तस्वीर को ट्वीट करने से उन्हें लाभ ही होगा लेकिन उम्मीद करता हूँ यह आखिरी लाभ हो pic.twitter.com/gM4VaEMD1q
पता है मिश्रा जी इस लेख से आपका प्रचार होगा। लेकिन चाहता हूॅं कि आपको यह लाभ हो। आपकी तरह उम्मीद भी नहीं करता कि ‘यह आखिरी लाभ हो’, जैसा आपने अदिति के लिए ट्वीट करते हुए किया है।
आख़िरकार शिवसेना परिवार ने चुनाव में ख़ुद उतरने की घोषणा कर ही दी। कभी बाल ठाकरे ने ऐलान किया था वह व्यक्तिगत तौर पर जीवन में कभी भी किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे। बाल ठाकरे ने जीत के बाद अपनी पार्टी के मनोहर जोशी और फिर नारायण राणे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन ख़ुद न तो सांसद का चुनाव लड़े और न ही विधायक का। इसके बाद से ही यह अघोषित तौर पर माना जाता था कि ठाकरे परिवार का कोई भी सदस्य व्यक्तिगत रूप से चुनावों में हिस्सा नहीं लेगा बल्कि अपने उम्मीदवार उतारेगा।
उद्धव ठाकरे ने भी जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। अब ठाकरे परिवार ने इस क्रम को तोड़ते हुए आदित्य ठाकरे को वर्ली से प्रत्याशी के रूप में उतारा है। आदित्य ठाकरे काफ़ी दिनों से राजनीति में सक्रिय हैं और फिलहाल शिवसेना के युथ विंग ‘युवा सेना’ के अध्यक्ष हैं। वर्ली सीट अपने-आप में काफ़ी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ से शिवसेना के दिवंगत वरिष्ठ नेता दत्ताजी नलावड़े ने 4 बार जीत दर्ज की थी। मुंबई के मेयर से लेकर महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर तक का सफर तय करने वाले नलावड़े ने यह सीट 1990, 1995, 1999 और 2004 में जीती थी।
#BreakingNews : आदित्य ठाकरे को शिवसेना से टिकट मिला, शिवसेना ने वर्ली विधानसभा से टिकट दिया. ठाकरे परिवार से पहली बार कोई चुनाव लड़ रहा है. देखिए ये रिपोर्ट. pic.twitter.com/jSP4mm5xXa
वर्ली को शिवसेना के लिए सुरक्षित सीट इसीलिए भी माना जा रहा है क्योंकि अभी भी शिवसेना के सुशील शिंदे ही यहाँ से विधायक हैं। हाल ही में आदित्य ठाकरे को लेकर विवाद भी उपजा था, जब आजतक की पत्रकार अंजना ओम कश्यप ने उन्हें ‘शिवसेना का पप्पू’ बताते हुए उनकी तुलना राहुल गाँधी से कर दी थी। हालाँकि, बाद में उन्होंने अपने उस बयान के लिए माफ़ी माँग ली थी। अब देखना यह है कि कमज़ोर होती एनसीपी और जूझती कॉन्ग्रेस के बीच आदित्य ठाकरे को उतारने के पीछे शिवसेना की क्या रणनीति है?
अगर थोड़ा और पीछे जाएँ तो इसी वर्ष मार्च में शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने ऐसी किसी भी सम्भावना से इनकार कर दिया था। उस समय भी कयास लगाए जा रहे थे कि आदित्य ख़ुद चुनावी राजनीति में उतर सकते हैं। अब जब वो समय आ गया है, उद्धव ठाकरे के कुछ दिन पहले के दिए गए बयान की भी चर्चा हो रही है। उद्धव ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने अपने पिता बाल ठाकरे के सामने यह प्रतिज्ञा ली थी कि वह एक शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाएँगे।
“मी स्वतः शिवसेनाप्रमुखांना हातात हात घेऊन वचन दिले आहे की एक न एक दिवस मी शिवसेनेचा मुख्यमंत्री बनवण्याचे स्वप्न पूर्ण करेन.” – शिवसेना पक्षप्रमुख मा. श्री. उद्धव साहेब ठाकरे pic.twitter.com/lhTDYJ6BMK
उद्धव ने कहा था कि शिवसेना का भगवा ध्वज महाराष्ट्र विधानसभा के ऊपर लहराना चाहिए। पार्टी ने आदित्य सहित 11 उम्मीदवारों की सूची फाइनल कर दी है और उन्हें नामांकन भरने के लिए अधिकृत कर दिया है। हालाँकि, उद्धव यह भी कहते रहे हैं कि वह कभी भी पीठ में चाकू मारने का काम नहीं करेंगे क्योंकि वो खुले तौर पर विरोध करने में विश्वास रखते हैं। सीट शेयरिंग में भाजपा को दबाव में लाने के लिए शिवसेना ऐसे पैंतरे पहले भी आजमाती रही है। हाल ही में ठाकरे परिवार के विश्वस्त संजय राउत ने एनसीपी के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार से भी मुलाक़ात की थी। आदित्य के चुनावी समर में उतरने से महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव कुछ ज्यादा ही दिलचस्प होने वाला है।
हाल ही में तुर्की ने जम्मू कश्मीर पर भारत विरोधी रुख अपनाया था। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान ने संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में जम्मू कश्मीर का मुद्दा उठाया था। भारत पहले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह कर चुका है कि जम्मू कश्मीर देश का आंतरिक मसला है और इस पर किसी भी प्रकार की मध्यस्तथा स्वीकार नहीं की जाएगी। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि अगर पाकिस्तान से बातचीत होगी भी तो सिर्फ़ पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर ही होगी।
ऐसे में तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा था कि दक्षिण भारत की स्थिरता और समृद्धि जम्मू कश्मीर समस्या से जुड़ी हुई है। उन्होंने दावा किया था कि यूएन रेजोल्यूशन के बावजूद राज्य में 80 लाख लोग ‘फँसे हुए हैं’। साथ ही उन्होंने इस मसले को संघर्ष के बजाय बातचीत से सुलझाने की सलाह दी थी। 72 वर्षीय रजब तैयब ने न्याय और निष्पक्षता का रोना रोते हुए जम्मू कश्मीर का मुद्दा उठाया था। पाक पीएम इमरान ख़ान ने भी तुर्की के राष्ट्रपति से मुलाक़ात के दौरान उन्हें अनुच्छेद 370 पर भारत के निर्णय के बारे में बताया था।
अब भारत ने तुर्की की पैंतरेबाजी को देखते हुए उसे सबक सिखाने के लिए साइप्रस का खुला समर्थन किया है। बता दें कि 1974 में तुर्की की सेना ने साइप्रस पर हमला किया था और द्वीपीय देश के 36% भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साइप्रस की स्वतन्त्रता, सम्प्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करते हुए तुर्की को दबाव में डाल दिया। तुर्की अभी भी साइप्रस के भू-भाग पर कब्ज़ा कर के बैठा हुआ है और इसीलिए दोनों ही देशों के बीच रिश्ते अच्छे नहीं हैं।
हाल ही में तुर्की ने धमकी दी थी कि वह साइप्रस के ‘एक्सक्लूसिव इकनोमिक जोन’ में घुस जाएगा। साइप्रस के राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में तुर्की की हरकतों का ब्यौरा देते हुए अंतरराष्ट्रीयता समुदाय को बताया कि तुर्की ने धमकी दी है कि अगर साइप्रस अपने एनर्जी प्रोजेक्ट को लेकर आगे बढ़ा तो उसे उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने कहा कि तुर्की पड़ोसी राज्यों और एनर्जी कंपनियों को धमका रहा है।
I don’t believe it! India backs Greek Cypriots against Turkey (to Greece’s pleasure) as @RTErdogan backs Pakistan.
India finally has a smart, bold mind directing it’s foreign policy. @DrSJaishankar?
तुर्की ने साइप्रस के एक हिस्से पर कब्ज़ा कर के उसे ‘उत्तरी साइप्रस’ घोषित कर रखा है। हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय तुर्की की इस हरकत का समर्थन नहीं करता। कहा जाता है कि यूरोप में साइप्रस अंतिम देश है, जिसका विभाजन हुआ। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी तुर्की की हरकतों के लिए उसकी आलोचना कर चुका है। अब चूँकि तुर्की ने जम्मू कश्मीर पर टेढ़ा बयान दे दिया है, तो स्पष्ट है कि भारत भी उसे माइंड गेम से ही मारेगा। साइप्रस के समर्थन में और ज्यादा खुल कर आने और पीएम मोदी का वहाँ के राष्ट्रपति के साथ मुलाकात तुर्की को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झुकाने की भारतीय कूटनीति ही है। आने वाले दिनों में तुर्की को यह बात और भी अच्छे से समझ में आ जाएगी और तब वो शायद जम्मू-कश्मीर पर राग अलागना बंद कर देगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (सितम्बर 29, 2019) को मन की बात में दो लोगों का जिक्र किया। इनमें एक रिपुदमन बेल्वी और दूसरी सिस्टर मरियम थ्रेसिया हैं। बेल्वी ‘प्लॉगर’ हैं जबकि सिस्टर मरियम थ्रेसिया को अगले महीने वेटिकन संत घोषित करने जा रहा है। यह शब्द क्या है और इसके क्या मायने हैं, हम आपको आगे बताते हैं।
रिपुदमन बेल्वी देश के पहले प्लॉगर बताए जाते हैं। दरअसल, सुबह की सैर (जॉगिंग) के दौरान कूड़ा उठाने को ‘प्लॉगिंग’ कहते हैं। जहाँ तक इसके बारे में जानकारी उपलब्ध है, इसकी शुरुआत 2016 में स्वीडन से हुई थी। पीएम मोदी ने 2 अक्टूबर से महात्मा गाँधी के जन्मदिवस के अवसर पर प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करने को लेकर शुरू हो रहे अभियान का जिक्र करते हुए बेल्वी की तारीफ की। उन्होंने कहा,
“हमारे ही देश के एक नौजवान ने एक बड़ा ही अनोखा अभियान चलाया है। उनके इस काम पर मेरा ध्यान गया तो मैंने उनसे फ़ोन पर बात करके उनके इस नए प्रयोग को जानने समझने की कोशिश की। हो सकता है, उनकी ये बातें देश के और लोगों को भी काम आए। रिपुदमन बेल्वी एक अनोखा प्रयास कर रहें हैं। वे ‘Plogging’ करते हैं। जब पहली बार मैंने ‘प्लॉगिंग’ शब्द सुना तो मेरे लिए भी नया था। विदेशों में तो शायद ये शब्द कुछ मात्रा में उपयोग हुआ है। लेकिन, भारत में रिपुदमन बेल्वी जी ने इसको बहुत ही प्रचारित किया है।”
उन्होंने कहा कि ‘प्लॉगिंग’ का इस्तेमाल विदेशों में होता था, जबकि भारत में बेल्वी ने इसको काफी हद तक बढ़ावा दिया है। बेल्वी से फोन पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि खेल मंत्रालय भी 2 अक्टूबर को ‘फिट इंडिया प्लॉगिंग रन’ का आयोजन करेगा। इसके तहत दो किलोमीटर तक जॉगिंग के साथ कूड़ा उठाया जाएगा। सुनिए पीएम मोदी और बेल्वी की बातचीत:
During #MannKiBaat, I spoke to the phenomenal Ripudaman Ji, who is improving both fitness and cleanliness levels through his efforts. Have a look… pic.twitter.com/gyTmaJfRKZ
‘मन की बात’ के दौरान सिस्टर मरियम थ्रेसिया का भी पीएम ने जिक्र किया। पोप फ्रांसिस 13 अक्टूबर को वेटिकन सिटी में सिस्टर थ्रेसिया को संत घोषित करेंगे। मोदी ने इसे हर भारतीय के लिए गर्व का विषय बताया। पीएम मोदी ने उनके बारे में बात करते हुए कहा:
“एक महान विभूति को 13 अक्टूबर को वेटिकन सिटी में सम्मानित किया जा रहा है। यह हर भारतीय के लिए गर्व की बात है कि पोप फ्रांसिस आने वाले 13 अक्टूबर को मरियम थ्रेसिया को संत घोषित करेंगे। सिस्टर मरियम थ्रेसिया ने 50 साल के अपने छोटे से जीवनकाल में ही मानवता की भलाई के लिए जो कार्य किए, वो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र से उनका अद्भुत लगाव था। उन्होंने, कई स्कूल, हॉस्टल और अनाथालय बनवाए और जीवनपर्यन्त इस मिशन में लगी रहीं।”
पीएम मोदी ने कहा कि सिस्टर थ्रेसिया ने जो भी कार्य किया, उसे निष्ठा और लगन के साथ और पूरे समर्पण भाव से पूरा किया | सिस्टर थ्रेसिया ने ‘Congregation of the Sisters of the Holy Family’ की स्थापना की थी। पीएम मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ईसाईयों को भी बधाई दी।
‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने सिस्टर थ्रेसिया को किया याद (साभार: AIR)
सिस्टर थ्रेसिया ने समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए थे। उन्होंने कॉन्ग्रेगेशन ऑफ सिस्टर्स ऑफ द होली फैमिली की स्थापना की थी, जो आज भी उनके मिशन को आगे बढ़ा रहा है।
रवीश कुमार पत्रकारिता का एक जाना-माना नाम है। मैग्सेसे भी जीत चुके हैं। लेकिन अब वे इस प्रोफ़ेशन को छोड़ने का मन बना चुके हैं। कैसे, क्यों और काहे? क्योंकि रवीश कुमार ने जयपुर में आयोजित टॉक जर्नलिज़्म कार्यक्रम में कुछ ऐसी बातें कही, जो एक पत्रकार नहीं कह सकता, कभी नहीं कह सकता। इस कार्यक्रम में उन्होंने कई मुद्दों पर बातें की और नसीहतों का अंबार लगा दिया। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने इस कार्यक्रम के 6 मिनट का एक वीडियो अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया। इस वीडियो को देखने के बाद, एक नहीं बल्कि कई सवाल मन में घर कर जाते हैं, जिनके जवाब शायद ही कभी रवीश कुमार भी दे पाएँ।
नफरत फैला रहा है कोई, आपको पड़ोसी से लड़ा रहा है कोई, कमल पर मतदान की इतनी सजा, गोडसे को देशभक्त बता रहा है कोई..! pic.twitter.com/MjCQw2gmZ4
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पत्रकार रवीश कुमार ने वर्तमान सरकार को घेरते हुए आज की पत्रकारिता के संदर्भ में कहा कि आज का मीडिया आपको अपने पड़ोस के समुदाय विशेष को एक दुश्मन के तौर पर दिखा रहा है। रवीश कुमार, कथित अल्पसंख्यक समुदाय की जो दयनीय छवि गढ़ने की कोशिश करते दिखे उसकी असलियत जानने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें, और जानें कि क्या वाकई हिन्दुस्तान में ‘शांतिप्रिय’ डरे हुए हैं।
समुदाय विशेष के प्रति अपनी वफ़ादारी निभाते हुए उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दू समाज पर हमला किया और लड़कियों को नसीहत दी कि उन्हें किस तरह के लड़के से शादी नहीं करनी चाहिए। शायद एक पत्रकार की भूमिका से अब वो उक्ता गए हैं, इसीलिए उन्होंने लव-गुरू बनने का रुख़ किया है।
इस कार्यक्रम में उन्होंने लड़कियों को संबोधित करते हुए कहा कि जो लड़का किसी समाज से नफ़रत करता हो, वो न तो एक अच्छा पति बन सकता है, न अच्छा प्रेमी बन सकता है और न एक अच्छा भाई बन सकता है, ऐसे किसी ‘आईटी सेल’ वाले से शादी न कर लेना। पता चले कि शादी किसी ऐसे से हो जाए जो नफ़रत करता हो तो वो प्रेमी नहीं हो सकता! ये किस लाइन में आ गए आप रवीश भाई साब! पत्रकार से पंडित बन गए आप तो!
रवीश कुमार, लड़कियों को यह बताना भूल गए कि मदरसे में शिक्षा के नाम पर बच्चियों के साथ रेप करने वाले मौलवी कितने ख़तरनाक होते हैं, उनसे बचना चाहिए। उन्होंने यह नहीं बताया कि मदरसे में दवा देने के नाम पर हथियार सप्लाई किए जाते हैं।
अच्छे भाई का हवाला देने वाले रवीश कुमार को कौशांबी की उस घटना के बारे में बताना चाहिए था जिसमें एक 15 साल की बच्ची का गैंगरेप हो जाता है, और वो बच्ची अल्लाह का वास्ता देती दया की भीख़ माँगती है। वो बच्ची गिड़गिड़ाते हुए कहती है कि भैया आप तो मुझे जानते हैं, अल्लाह के लिए मुझे छोड़ दो। बता दूँ कि उस मासूम बच्ची को नाजिक और आदिल ने बहन तो नहीं माना, लेकिन हाँ उन्होंने अपने एक और दोस्त के साथ मिलकर न सिर्फ़ उस बच्ची का सामूहिक बलात्कार किया बल्कि उस दरिंदगी का वीडियो भी बनाया, उसे अपलोड कर वायरल भी किया।
रवीश कुमार, ऐसे भाईयों के बारे में क्या कहेंगे, क्योंकि उनका तो मानना है कि आज का मीडिया पड़ोस में रह रहे मजहब विशेष वाले को दुश्मन बता रहा है? जबकि सच्चाई यह है कि आज का मीडिया आपको सतर्क कर रहा है कि अपने पड़ोस में रहने वाले शख़्स को भाई कह देने भर से वो आपका भाई नहीं बन जाता बल्कि हो सकता है कि वो आपके ऊपर नज़रे गड़ाए हुए हो और मौक़े की तलाश में हो कि कब वो आपको हानि पहुँचा दे।
लड़कियों से एक अच्छे पति के बारे में रवीश कुमार ने ज़्यादा कुछ तो नहीं कहा, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि वो इस बात का ध्यान रखें कि कहीं वो ‘आईटी सेल’ का न हो। उनके शब्दों को मैं जितना समझ पाई हूँ उसके अनुसार, आईटी सेल से उनका सीधा मतलब दक्षिणपंथी और बीजेपी की विचारधारा को फॉलो करने वाले लड़कों से था।
मेरा सवाल यह है कि क्या ऐसे लड़के अच्छे पति इसलिए साबित नहीं हो सकते क्योंकि वो समाज में धर्म के नाम पर फैली बुराई को देख नहीं पाते और उसे दूर करना अपना धर्म समझते हैं? ऐसे लड़के अत्याचार पर चुप बैठना नहीं जानते और इस बुराई का बीज बोने वालों से सख़्त नफ़रत करते हैं, इसलिए वो अच्छे पति नहीं बन सकते? ऐसे लड़के जो देश को विकास की राह पर देखना चाहते हों और इसके आड़े आने वालों से नफ़रत करते हों, वो अच्छे पति बनने के लायक नहीं, इस पर मुझे यक़ीन नहीं।
शायद रवीश कुमार को पता भी नहीं कि महिलाओं को कितनी छोटी-छोटी बातों के लिए तलाक़ दे दिया जाता है। सब्ज़ी में नमक-मिर्च कम था, तो दे दिया तलाक़; रिक्शा ख़रीदने के लिए ससुराल से पैसा नहीं मिला तो दे दिया तलाक़; बेटी पैदा करने पर घर से निकाला और दे दिया तलाक़; गुल मंजन से दाँत साफ़ करने पर दे दिया तलाक़; शौहर को पतली गर्लफ्रेंड मिल गई तो दे दिया तलाक़; शौहर से सब्ज़ी लाने के लिए 30 रुपए माँगे तो दे दिया तलाक़… उदाहरण कम पड़ जाएँगे रवीश ‘पत्रकार’ बाबू! लेकिन आपको सुनने वाली लड़कियों को आप एक भी ऐसे उदाहरण नहीं गिनाएँगे, यह बात भी पक्की है। क्योंकि आप प से पत्रकार थे, प से पंडित बनने चले लेकिन रहेंगे आप प से प्रोपेगेंडाकार ही!
तलाक देने वाले ऐसे शौहरों के लिए रवीश कुमार के पास है कोई जवाब? अपने कार्यक्रम में लड़कियों को आईटी सेल के लड़कों से बचने की सलाह देने वाले रवीश कुमार को यह भी बताना चाहिए था कि आपके पड़ोस में अगर ऐसा कोई सौदे विशेष का लड़का हो तो उससे भी बचकर रहना चाहिए। लेकिन उन्होंने नहीं बताया क्योंकि उन्हें तो केवल दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लड़कों से परहेज है।
अब बात प्रेमी की, जिसके बारे में रवीश जी अच्छी तरह से बता नहीं पाए। ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ प्यार के नाम पर लड़कियों का धर्म परिवर्तन करा पहले तो उनसे जबरन शादी की जाती है और फिर तलाक़ देकर उसे छोड़ दिया जाता है, दर-दर भटकने के लिए। अपने कार्यक्रम में रवीश जी ने ऐसे स्वार्थी प्रेमी से बचने की सलाह लड़कियों को नहीं दी, क्योंकि उन्होंने तो ये तय कर रखा है कि आईटी सेल के लड़कों को मोहब्बत करनी आती ही नहीं, जबकि सच्चाई से वो ख़ुद मुँह मोड़े हुए हैं। मैं तो यही कहूँगी की ऐसे सिरफ़िरे आशिक़/ प्रेमी से भी लड़कियों को बचकर रहना चाहिए जिनका मक़सद केवल आपकी मासूमियत को छलना भर रहता है।
आज के मीडिया को भर-भर कर गाली देने में जुटे रवीश कुमार शायद यह भूल बैठे हैं कि आज वो जो कुछ भी हैं वो इसी मीडिया के दम पर हैं। समाज में लोग उन्हें जानते हैं तो इसी मीडिया की वजह से। आज जिस मीडिया को वो कोसते नहीं थकते, कभी उसी मीडिया के वो भी मुरीद हुआ करते थे और लोगों को ज्ञान बघारने के लिए उसी माध्यम का सहारा लेते थे। अफसोस कि अब तक ले रहे हैं!
रवीश कुमार ने स्वामी चिन्मयानंद मामले का ज़िक्र किया और कहा कि सरकार इस मामले पर चुप है, जबकि सच्चाई यह है कि यह मुद्दा सभी जगह छाया हुआ है और इस पर जितनी तेज़ी के साथ कार्रवाई होनी चाहिए थी, वो हो रही है। लेकिन रवीश का असली दर्द आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ बकरी चोरी के आरोप को लेकर है। उन्हें कष्ट है तो इस बात का कि भूमाफ़िया, भैंस-बकरी चोर, किताबों की चोरी करने वाले, महिला वार्ड में जबरन घुसकर महिला के साथ दुर्व्यवहार करने वाले और सदन की अध्यक्षता करने वाली रमा देवी पर भद्दा कॉमेंट और जया प्रदा के अंतर्वस्त्रों पर अभद्र टिप्पणी करने वाले आज़म ख़ान के कारनामों पर घंटो बहस क्यों की जाती है?
ज़ाहिर सी बात है जब यह बातें सामने आती हैं तो उनके चहेते नेताओं की शर्मनाक़ हरक़ते भी सामने आती हैं, ऐसे में वो लोगों को अख़बार पढ़ने और टीवी न देखने की सलाह नहीं देंगे तो और क्या करेंगे। इस पर सवाल उठता है कि आख़िर, रवीश कुमार को आज़म ख़ान से ऐसा भी क्या लगाव है जो वो उनके कारनामों पर होने वाली बहसों से इतने नाराज़ हैं?
जयपुर में आयोजित टॉक जर्नलिज़्म कार्यक्रम में रवीश कुमार ने जिन भी मुद्दों पर चर्चा की उसका न तो कोई आधार था और न ही सच्चाई से उसका कोई लेना-देना था। चूँकि मीडिया की बदौलत पत्रकारिता जगत में वो एक नामी चेहरा हैं, इसलिए उन्हें सुनने और देखने के लिए लोग इकट्ठा हो जाते हैं। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि उनकी कही हर बात पर आँख मूँदकर भरोसा कर लेना चाहिए।
फ़िलहाल, वो वर्तमान सरकार से ख़ासे नाराज़ हैं इसलिए उनका यह दर्द अक्सर ऐसे मौक़ों पर छलक ही जाता है। मेरी सलाह है कि उनकी फ़िजूल की बातों को गंभीरता से लेने की बजाए, हमें अपने आँख-कान खुले रखने होंगे, जिससे ऐसी मानसिकता के भ्रमजाल में फँसने से बचा जा सके।
पाकिस्तानी मीडिया ने स्पष्ट किया है कि इमरान ख़ान की तीसरी और वर्तमान बीवी बुशरा का अक्स आईने में दिखता है। इससे पहले ख़बर आई थी कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पत्नी बुशरा मानेका का अक्स आईने में नहीं दिखता है। एएनआई ने लिखा था कि प्रधानमंत्री आवास में तैनात एक कर्मचारी ने यह दावा किया था। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, पाकिस्तान के कैपिटल टीवी पर खातून-ए-अव्वल (प्रथम महिला) को लेकर इस सनसनीखेज़ दावे का खुलासा किया गया था।
कैपिटल टीवी ने इसे फेक न्यूज़ करार दिया है। उसने कहा है कि चैनल ने इस प्रकार की कोई भी रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है या ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया है। आपको बता दें कि इस ख़बर को एएनआई (समाचार एजेंसी) ने प्रकाशित किया था, जिसके आधार पर सभी इंडियन मीडिया (हमने भी) ने इस खबर को दिखाया। अब कैपिटल टीवी ने कहा है कि एएनआई ने जो टेम्प्लेट का प्रयोग किया, वह एक फेक इमेज है, जो 2018 में ही वायरल हुआ था। कैपिटल टीवी ने कहा कि उसने 2018 में भी किसी अधिकारी के हवाले से इमरान ख़ान की पत्नी को लेकर ऐसा कुछ दावा नहीं किया था।
Fake News Alert; Indian Media using photoshopped template of Capital TV against PM Imran Khan’s wife Bushra Bibi to promote their propaganda
एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया था कि इमरान खान की तीसरी पत्नी बुशरा की छवि एक तंत्र-मंत्र और जादू टोना करने वाली शख्सियत के रूप में है। दावा तो ये भी किया जाता है कि बुशरा ने दो जिन्न भी पाल रखे हैं और वह उन्हें पका हुआ गोश्त परोसती हैं। बुशरा प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के चीफ इमरान खान की तीसरी पत्नी हैं। कहा जाता है कि बुशरा तंत्र विद्याओं को बखूबी जानती हैं और उनके पास बहुत सी शक्तियाँ हैं। लोगों का मानना है कि बुशरा के पास जो दो जिन्न हैं, उसका इस्तेमाल वह कई अलग-अलग कामों के लिए करती हैं।
हालाँकि, अब एएनआई ने अपनी वेबसाइट से इस रिपोर्ट को हटा दिया है। वैनिटी फेयर की रिपोर्ट बताती है कि एक बार बुशरा बीबी ने भविष्यवाणी थी कि जिन्नों को पका हुआ माँस खिलाना इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उन्हें उपयुक्त महिला से शादी करनी होगी। फिर प्रधानमंत्री का पद संभालने के 6 महीने पहले इमरान खान ने बुशरा बीबी के साथ एक निजी समारोह में निकाह कर लिया था।
बहुचर्चित रामपुर विधानसभा क्षेत्र के लिए होने वाले उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने आज़म ख़ान की पत्नी डॉक्टर तंजीन फातिमा को अपना उम्मीदवार बनाया है। फातिमा फ़िलहाल राज्यसभा सांसद हैं। 53% मुस्लिम जनसंख्या वाला रामपुर विधानसभा क्षेत्र उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले से ही चर्चित रहा है क्योंकि विवादित नेता आज़म ख़ान यहाँ से 9 बार विधायक रह चुके हैं। वह 1980-1995 और 2002-2019 तक रामपुर के विधायक रहे हैं। इसी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए वह कई बार उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे और सरकार में अक्सर उन्हें मुलायम परिवार के बाद दूसरा सबसे प्रभावी नेता माना गया।
उधर भाजपा ने भारत भूषण गुप्ता को रामपुर से अपना उम्मीदवार बनाया है। उनका सामना 3 प्रमुख दलों के मुस्लिम उम्मीदवारों से होगा। कॉन्ग्रेस ने अरशद अली ख़ान गुड्डू और बसपा ने जुबैर मसूद ख़ान को टिकट दिया है। रामपुर विधानसभा के लिए 21 अक्टूबर को उपचुनाव होगा और 24 अक्टूबर को मतगणना होगी। इस विधानसभा क्षेत्र की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ हुए अब तक के 17 चुनावों में हरेक बार मुस्लिम उम्मीदवारों की ही जीत होती आई है। अगर भाजपा के उम्मीदवार इस बार जीतते हैं तो वह इस क्षेत्र के पहले हिन्दू विधायक होंगे।
उत्तर प्रदेश में एक चुनाव में बुरी हार के बाद अब महागठबंधन बिखर गया है क्योंकि सपा, बसपा और कॉन्ग्रेस- तीनों ही अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव में आज़म ख़ान से पराजित हो चुकीं जया प्रदा विधानसभा उपचुनाव में भी उनके ख़िलाफ़ प्रचार कर रही हैं। महिलाओं की एक सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने गाने भी सुनाए।
आज़म ख़ान ने 2019 लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद विधायक के पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद यह सीट खाली हुई थी। आज़म पहली बार संसद बने हैं। आज़म ख़ान के बेटे अब्दुल्ला आज़म ख़ान भी विधायक हैं। उधर ख़बर आई है कि आज़म खान के वकील ने कहा है कि वह बीमार हैं और रामपुर से बाहर जाकर इलाज कराना चाहते हैं। वकील ने कहा है कि आज़म की सेहत ख़राब हो गई है और वह इस वक़्त रामपुर में नहीं हैं। उन्होंने थाने में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए 15 दिनों की मोहलत माँगी है। उनके ख़िलाफ़ अब तक 80 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
“भैया, मुझे अपनी छोटी बहन समझ कर माफ़ कर दीजिए। छोड़ दीजिए।” “बहुत बदनामी हो जाएगी। छोड़ दीजिए भैया।”
इंसानी खाल में छिपे भेड़ियों से घिरी एक बच्ची बस इतना ही बोलती रही। उस पर टूटने वाले दरिंदे मंगल ग्रह से नहीं आए थे। वे भी उसी समाज से हैं, जिससे हम और आप आते हैं। वे भी उसी जमीन पर पले-बढ़े हैं, जहॉं उनकी दरिंदगी की शिकार हुई पीड़िता का पालन-पोषण हुआ है।
घटना बिहार के राजगीर की है। राजगीर गौतम बुद्ध और महावीर की स्थली रही है। उसी राजगीर के विपुलांचगिरि पर्वत पर 16 सितम्बर 2019 को मानवता को शर्मसार करने वाली यह घटना हुई। प्रशासन की नींद तो तब टूटी जब घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गया।
राजगीर को बिहार सरकार वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल बनाने की कोशिशें कर रही हैं। यहाँ महात्मा गाँधी के 150वें जन्म दिवस पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ऐसे में इस घटना ने इतिहास में 8 वर्ष पीछे जाने को मजबूर कर दिया, जब राजगीर में घूमने विदेशी पर्यटक आए हुए थे। इसी दौरान विपुलांचगिरि पर्वत पर 22 सितंबर 2011 को एक अमेरिकी लड़की घूम रही थी, तभी कुछ लड़के आ गए और उसके साथ दुर्व्यवहार किया। वह भारत की कैसी छवि लेकर अपने देश गई होगी?
हम इस घटना की चर्चा इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि ताज़ा घटना इसी विपुलांचगिरि पर्वत की है। एक सजग नागरिक के रूप में आप सरकार को दोष दे सकते हैं कि जब यह पर्यटन स्थल है और पूर्व में भी ऐसी घटनाएँ हो चुकी है, तो यहाँ उस तरह से सुरक्षा-व्यवस्था क्यों नहीं लगाई गई? लेकिन, एक समाज के रूप में आप या हम केवल दूसरों से प्रश्न पूछ कर भाग नहीं सकते। हम ख़ुद के अंदर, ख़ुद के घर में और ख़ुद के समाज में झाँक कर देख सकते हैं कि गड़बड़ी कहाँ है? सबसे पहले जानते हैं कि ताज़ा घटना है क्या और इसका जिक्र हम क्यों कर रहे हैं?
बिहार के नालंदा में एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। आरोपितों ने घटना का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिया। बिहार में ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं। ताज़ा घटना का वीडियो दिल दहला देने वाला है। इसे शेयर नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति ने राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा को टैग कर के इस वीडियो को ट्वीट कर दिया। शर्मा ने आग्रह किया कि चूँकि इस वीडियो में पीड़िता का चेहरा दिख रहा है, इसीलिए इसे शेयर न किया जाए। महिला आयोग की अध्यक्ष को सारे विवरण जानने के बाद यह कहने को विवश होना पड़ा कि इन सभी आरोपितों को एक साथ फाँसी पर लटका देना चाहिए।
Pl send me the details. I really am dying to take action against these sic men. They need to be hanged at once.
आख़िर उस वीडियो में ऐसा क्या था? यह वीडियो बिहार के नालंदा जिला स्थित राजगीर का है। नालंदा, जहाँ तब शिक्षा का विशाल दीप जला था, जब यूरोप में एक भी विश्वविद्यालय नहीं था। नालंदा, बिहार के मुख्यमंत्री और पिछले डेढ़ दशक से राज्य में सत्ता के सिरमौर नीतीश कुमार का गृह जिला है। राजगीर, उन दुर्लभतम स्थलों में एक है, जहाँ बुद्ध और महावीर- दोनों ने ही कई दिनों तक रुक कर शिक्षाएँ दीं। शायद अब वहाँ का समाज उन्हें भूल चुका है। उक्त वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पीड़िता अपने मित्र के साथ पहाड़ के पास बैठी हुई है। तभी 10 के क़रीब बदमाश वहाँ पर आ धमके।
उनके पास हथियार था, पिस्तौल था, चाकू था। जब लड़की के दोस्त ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने दोस्त की भी पिटाई की। विरोध करने पर पीड़िता को भी पीटा। साथ ही गैंगरेप करने वाले बदमाशों ने पीड़िता को धमकी भी दी। उन्होंने कहा कि अगर उसने मुँह खोला तो पूरे परिवार को जान से मार डाला जाएगा। हथियार के बल पर घेर कर 10 में से 6 लड़कों ने गैंगरेप किया। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक असहाय लड़की 10 हथियारबंद लोगों के बीच विवश होकर क्या सब सोच रही होगी और उसके मन में क्या सब चल रहा होगा? ऐसा लगता है जैसे वह कोई लड़की नहीं बल्कि कोई निर्जीव वस्तु हो, जो सोच सकता हो और जिसे दर्द की अनुभूति होती हो। लेकिन, वह कर कुछ नहीं सकता।
दरिंदों ने अपनी घटिया नीयत का परिचय देते हुए लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया। नाबालिग पीड़िता 9वीं की छात्रा है। उसके पिता एक ग़रीब मजदूर हैं। ऐसे में सवाल है कि इतनी संख्या में आरोपितों के ख़िलाफ़ न्याय की इस लड़ाई में वह कहाँ तक पहुँचेगी? ऐसा नहीं है कि जब दरिंदे वहाँ पर पहुँचे, तब लड़की ने बचने की कोशिश नहीं की। उसने खूब कोशिश की। गिड़गिड़ाई, रोई, मिन्नतें की लेकिन सब बेकार। हवस के भूखों ने उसकी एक न सुनी। आप इसी बात से प्रशासन की सक्रियता का अंदाजा लगा लीजिए कि सोमवार (सितम्बर 16, 2019) को हुई इस घटना का वीडियो उसके 9 दिन बाद सोशल मीडिया पर आया और तब प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की।
बिहार में ऐसी घटनाओं की बाढ़ आ गई है
यह सब क्यों हो रहा है? इस साल अप्रैल में बिहार के जहानाबाद में एक नाबालिग लड़की का गैंगरेप हुआ और इसका वीडियो बना लिया गया। इस मामले में 14 आरोपितों को गिरफ़्तार किया गया। मई में पटना के नौबतपुर में ऐसा ही वाकया हुआ, जिसमें 2 लोग गिरफ़्तार हुए। वजीरगंज में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसमें 3 लोगों ने आत्म-समर्पण किया। ये सभी बिहार की वारदातें हैं। ऐसा नहीं है कि दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं होता लेकिन सवाल यह उठता है कि दोष किसका है? जब कोई लड़की कहीं एकांत में बैठी हुई है और 6 लोग उसका गैंगरेप करते हैं तो क्या इसमें हमारे समाज का दोष नहीं?
पुलिस ने इस मामले में 7 आरोपितों को गिरफ़्तार किया है: ‘दैनिक जागरण’के बिहारशरीफ संस्करण में छपी ख़बर
ऐसे लड़कों को आख़िर किस परिवेश में पाला जाता है कि जब वे कहीं एकांत में मौक़ा पाकर किसी लड़की को देखते हैं तो उन्हें बस एक ही चीज सूझता है। ऐसे युवाओं को आख़िर किस समाज से यह शिक्षा मिलती है कि वे ऐसे घृणित अपराध को करते समय न सिर्फ़ पीड़िता के दुःख और दर्द को बल्कि अपने अंजाम को भी भूल जाते हैं? आख़िर हवस की कौन सी पट्टी उनके आँखों पर बंधी होती है कि उन्हें इस अपराध की सज़ा का भान होता है, फिर भी वे क्षणिक सुख के लिए रेप, गैंगरेप और फिर उसका वीडियो बनाने जैसी घिनौनी हरकतें कर के किसी की ज़िंदगी एक झटके में बर्बाद कर देते हैं?
एक लड़की के साथ कुछ भी बुरा होता है तो अकेले वह लड़की नहीं बल्कि उसके माता-पिता का सिर झुक जाता है, यह सच्चाई है। सिर झुकना चाहिए इस अपराध को अंजाम देने वाले दोषियों का, उनका पालन-पोषण करने वाले समाज का, उसके परिवार का और उनको शिक्षा देने वाले परिवेश का क्योंकि अगर दर्जन भर की संख्या में झुण्ड में निकल कर लोग इस तरह का बर्ताव कर रहे हैं तो समाज यह कह कर बच नहीं सकता कि वे अपवाद हैं। वे अपवाद नहीं हैं, समाज की सच्चाई हैं। एक ऐसे समाज की, जो युवाओं और वयस्क हो रहे बच्चों को इस बात की शिक्षा देना भूल जाता है कि महिलाओं की इज्जत कैसे करनी है?
शक्ति पूजा के अवसर पर हम यह सब देखने को मजबूर क्यों?
रविवार (सितम्बर 29, 2019) से शक्ति की आराधना का सबसे बड़ा पर्व शुरू हो रहा है। वह पर्व, जिसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सिलिकॉन वैली में फेसबुक के दफ्तर में भारत के आलोचकों को चुप कराया था, जो यह कह रहे थे कि भारत में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जिस देश में, जिस समाज में, जिस धरती पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ऊर्जा अर्थात शक्ति की परिकल्पना एक महिला के रूप में की गई है, उसकी यह कैसी पूजा कर रहे हैं हम? शक्ति पूजा के अवसर पर हम ऐसी ख़बरें पढ़ने को विवश हो रहे हैं, जिसमें शक्ति का रूप मानी जाने वाली महिलाओं में वयस्क को तो छोड़िए, नाबालिगों को भी हवस का शिकार बनाया जा रहा है।
#BREAKING#नालंदा-गैंगरेप की कोशिश मामला’ नाबालिग के साथ गैंगरेप की कोशिश मामला’ पीड़िता ने की आरोपियों को फांसी देने की मांग’ अपने और परिवार की सुरक्षा की मांग की’ राजगीर थाना क्षेत्र का मामला.. pic.twitter.com/uIS5yFilLV
किसी युवती या नाबालिग लड़की के साथ यौन दुर्व्यवहार करते समय उसका वीडियो बनाने से कैसा सुख मिलता है कि थोक में इसी समाज के युवा सड़कों पर निकल आते हैं और दरिंदगी करते हैं। ख़ुद के द्वारा की गई दरिंदगी का वीडियो ख़ुद बना लेने में कैसा मज़ा मिलता है? आरोपितों में से एक के पिता फुटपाथ दुकानदार हैं तो एक के पिता टोंगा (घोड़ागाड़ी) चलाते हैं। इन आरोपितों ने अपने परिवार को, माता-पिता को दिन-रात संघर्ष करते देखा होगा, देखते होंगे। लेकिन, क्या ऐसी अक्षम्य हरकतें करते समय इनके मन में अपने परिवार का चेहरा नहीं कौंधा होगा? क्या उन्हें इस बात का डर नहीं सताया होगा कि अगर उनके परिवार के किसी सदस्य के साथ कोई दरिंदा ऐसा करता तो उन पर और पूरे परिवार पर क्या बीतेगी?
सबकी एक ही माँग – फाँसी हो
अधिकतर मामलों में पीड़िता दोषियों को फाँसी देने की माँग करती हैं। राजगीर वाली घटना इतनी वीभत्स है कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष तक को कहना पड़ा की वह ‘कार्रवाई करने के लिए मरी जा रही हैं’ और दोषियों को एक साथ फाँसी पर लटका देना चाहिए। ग्रामीणों ने पूरे इलाक़े में विरोध प्रदर्शन किया और दोषियों को फाँसी देने की माँग की। यह घटना किसी महानगर की नहीं थी, इसीलिए इसे लेकर उतना आउटरेज नहीं हुआ, कैंडल मार्च नहीं निकले और इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया गया। दूर दिल्ली और पटना में बैठी सरकारें और मुंबई और बंगलौर में अपना रूटीन वर्क कर रहे लोगों तक ये ख़बर तो पहुँची ही नहीं।
पूर्व सांसद पप्पू यादव ने पीड़िता के परिवार से मिलने के बाद क्या कहा?
ताज़ा घटना में ग्रामीणों का क्या कहना था? ग्रामीणों का कहना था कि सारे आरोपितों को उन्हें सौंप दिया जाए जाए, वही न्याय करेंगे। अगर ग्रामीणों ने उन आरोपितों को रंगे हाथों पकड़ लिया होता तो वह सच में अपने हिसाब से ‘न्याय’ कर देते। और इससे कोई मॉब लिंचिंग की घटना निकल कर आती तो वह गैंगरेप से ज्यादा सनसनीखेज ख़बर बनती। यही आज के राजनीतिक परिदृश्य और मीडिया की सच्चाई है। यही आज के ‘प्रोपेगंडा ड्रिवेन नैरेटिव’ का बैकग्राउंड है। समाज के लोगों को आगे आकर यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बीच ऐसे लोग तो नहीं पल रहे, जो किसी लड़की को देखते ही अपनी हवस मिटाने के लिए मचल उठते हैं।
बिहार में क्या है महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की स्थिति?
अकेले जनवरी से मई तक बिहार में रेप के 605 मामले सामने आए हैं। इसमें से अधिकतर राज्य सरकार की नाक के नीचे हुए हैं। जी हाँ, 41 घटनाएँ तो अकेले राजधानी पटना की है। सुशासन के नाम पर सत्ता में आए नीतीश कुमार ने 2005 चुनावों में क़ानून व्यवस्था को ही मुद्दा बनाया था और सरकार में आते-आते उन्होंने कुछ अहम बदलाव किए थे। लेकिन, अब स्थिति वैसी नहीं है। राजगीर का वीडियो सोचने को विवश कर देता है। बिहार महिला आयोग ने नालंदा पुलिस से इस सम्बन्ध में जानकारी माँगी, जिसे देने में भी देर की गई।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध संगठन ‘संकल्प’ के एक कार्यक्रम के दौरान जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 370 को लेकर कई अफवाहों का जवाब दिया और लोगों को सच्चाई से वाकिफ कराया। शाह ने आतंकियों के बारे में बड़ा बयान देते हुए कहा कि आतंकवादी कही भी हों, उन पर गोली चलेगी ही। उन्होंने सरदार पटेल की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने आज़ादी के बाद 600 से भी अधिक रियासतों को एक किया। शाह ने कहा कि उस समय कुछ लोगों ने बहुत कोशिश की कि भारत बिखर जाए लेकिन सरदार पटेल ने उन सबको भारत के साथ जोड़ा।
शाह ने कहा कि 630 रियासतों को एक करने का काम पटेल देख रहे थे जबकि 1 रियासत यानी जम्मू कश्मीर का कार्य प्रधानमंत्री कार्यालय देख रहा था। उन्होंने कहा कि 630 रियासतों को मिलाने में कोई दिक्कत नहीं आई लेकिन जम्मू कश्मीर पर मामला फँस गया। उन्होंने नेहरू की आलोचना करते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में लेकर जाना हिमालयन मिस्टेक (बहुत बड़ी गलती) था, यह हिमालय से भी बड़ी ग़लती थी। उन्होंने कहा कि किसी भी देश में ऐसा नहीं होगा कि 2 झंडे, 2 संविधान और 2 प्रधानमंत्री हों।
Several misconceptions are still widely spread about Article 370 and Kashmir.
Clarity about this is very important, both among the people of Kashmir as well as the Rest of India: Shri @AmitShahpic.twitter.com/8LqaRklq6o
शाह ने बताया कि अनुच्छेद 370 के प्रभाव में आने से लेकर निरस्त होने तक, कुल 12 जन-आंदोलन हुए और भाजपा तथा जनसंघ ने अपने सहयोगी संगठनों के साथ मिल कर इन सभी आन्दोलनों में महत्वपूर्व भूमिका निभाई। अमित शाह ने कहा कि अनुच्छेद 370 के लिए पहले सिविलियन बलिदानी जनसंघ के संस्थापक-अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उन्होंने याद दिलाया कि किस तरह शेख अब्दुल्ला को कॉन्ग्रेस की सरकार ने 11 सालों के लिए जेल में डाला है। उन्होंने कहा, “अभी तो हमारा जुमा-जुमा 2 महीना नहीं हुआ और आप चिल्ला रहे हो लेकिन आपने तो शेख अब्दुल्ला को 11 साल जेल में डाला था।“
इस दौरान अमित शाह ने मानवाधिकार का रोना रोने वालों से पूछा कि जम्मू कश्मीर में वीरगति को प्राप्त जवानों और उनके परिवारों का कोई ह्यूमन राइट नहीं है क्या? उन्होंने आँकड़े गिनाते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में आज़ादी के बाद से अब तक आतंकवाद के कारण 41,000 लोग मारे गए। शाह ने पूछा कि जब कश्मीर में सूफी संतों की परंपरा को उखाड़ फेंका गया, तब ह्यूमन राइट्स के चैंपियन कहाँ थे? उन्होंने पूछा कि जब कश्मीरी पंडितों को अपनी मातृभूमि से निकाल बाहर किया गया, तब मानवाधिकार के चैंपियन कहाँ थे?
‘संकल्प’ के कार्यक्रम में वर्तमान व पूर्व अधिकारियों को सम्बोधित करते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह
उन्होंने ‘कश्मीरियत’ का नाम लेकर भाजपा और केंद्र सरकार की आलोचना करने वालों को करारा जवाब देते हुए बताया कि पूरे विश्व में सबसे ज्यादा भाषाएँ और बोलियाँ हमारे देश में हैं। उन्होंने पूछा कि गुजरात में अनुच्छेद 370 न होने से गुजराती समाप्त हो गई है क्या? उन्होंने आगे पूछा कि गुजरात का गरबा समाप्त हो गया क्या? बंगाल में अनुच्छेद 370 नहीं है तो दुर्गा पूजा और रविंद्र संगीत ख़त्म हो गया क्या? उन्होंने कहा कि जब बगैर अनुच्छेद 370 के देश की बाकी सारी संस्कृतियाँ फल-फूल रही हैं तो कश्मीर को इसकी क्या ज़रुरत है? अमित शाह ने कहा:
“मैंने जब संसद में पूछा कि अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को क्या मिला, तो कोई भी नेता संतोषप्रद जवाब नहीं दे पाया। जम्मू कश्मीर में दलितों को आरक्षण नहीं मिलता था। दिव्यांगों और महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया था। बच्चों को शिक्षा का अधिकार पूरे देश में तो था लेकिन जम्मू कश्मीर में यह नहीं था। यह सब अनुच्छेद 370 ने रोक कर रखा था। यह सब ह्यूमन राइट्स का उल्लंघन नहीं है क्या? अब तक अन्याय होता आया था, जिसे 5 अगस्त को नरेंद्र मोदी ने समाप्त कर दिया। अनुच्छेद 370 से सबसे बड़ा नुकसान था- भ्रष्टाचार। सारे राज्यों में एंटी-करप्शन ब्यूरो है लेकिन जम्मू कश्मीर में यह नहीं था।”
I want to ask the new champions of Human Rights that why did you not raise your voice for the 41,800 widows and their children?
अमित शाह ने आँकड़े गिनाते हुए कहा कि आज़ादी के बाद से भारत सरकार की ओर से अब तक जम्मू कश्मीर को 2,77,000 करोड़ रुपए भेजा जा चुका है। उन्होंने पूछा कि आखिर यह रुपया कहाँ गया, कौन खा गया? अमित शाह ने जम्मू कश्मीर में पर्यटन की संभावनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि यह एक विकसित राज्य बनेगा। उन्होंने बताया कि राज्य में अच्छे होटल नहीं थे क्योंकि कौन जाता बनाने? उन्होंने कहा कि गलतियाँ सबसे होती हैं लेकिन गलतियों को स्वीकार करने का सहस सार्वजनिक जीवन में होना चाहिए। इसी कार्यक्रम में अमित शाह ने इतिहास दोबारा से लिख कर सच्चाई सामने लाने की बात भी कही।
इस कार्यक्रम में आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल शर्मा भी मंच पर उपस्थित थे। ‘संकल्प’ यूपीएससी की कोचिंग देता है और साथ ही छात्रों को राष्ट्रीयता का पाठ भी पढ़ाता है। इससे जुड़े कई छात्र सरकारी सेवाओं में विभिन्न पदों पर रह चुके हैं और कार्यरत हैं।
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक नाबालिग के साथ गैंग रेप का मामला सामने आया है। जिले के थाना भावनपुर क्षेत्र की 15 साल की पीड़िता अपनी दादी के साथ मिट्टी लाने खेत गई थी। इसी दौरान चार युवक उसे खींच कर खेत में ले गए और दुष्कर्म किया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरोपितों की पहचान चॉंद, उस्मान, अजहर और शाहिब उर्फ बुडला के तौर पर हुई। चारों पीड़िता के गॉंव के ही रहने वाले हैं। अजहर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।
पुलिस क्षेत्राधिकारी अखिलेश भदौरिया के हवाले से खबरों में बताया गया है कि पीड़िता का मेडिकल करवा कर आरोपितों को पॉक्सो एक्ट के तहत नामजद किया गया है। बताया जाता है कि लड़की जिस जगह मिट्टी लेने गई थी वह उसके घर से महज तीन सौ मीटर दूर है। लौटते वक्त वह दादी के पीछे-पीछे चल रही थी। इसी दौरान आरोपितों ने अचानक उसका मुॅंह कपड़े से दबा दिया और उसे गन्ने के खेत में खींच कर ले गए।
कुछ दूर चलने के बाद जब दादी को एहसास हुआ कि पोती साथ में नहीं है तो उसने घर आकर लोगों को इसकी जानकारी दी। काफी तलाश के बाद किशोरी गन्ने के खेत में बदहवास हालत में मिली। ग्रामीणों की सूचना पर पुलिस गॉंव पहुॅंची और किशोरी मेडिकल परीक्षण के लिए अस्पताल भेजा।
किशोरी के साथ गैंगरेप: ‘दैनिक जागरण’ के मेरठ संस्करण में छपी ख़बर
गौरतलब है कि बीते दिनों इसी तरह यूपी के कौशांबी में घास लेकर लौट रही दलित नाबालिग के साथ गैंगरेप को अंजाम दिया गया था।