क्या भारत की राजनीति का सबसे बड़ा बदलाव चुनावी नतीजों में नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस के केंद्र में हुआ है? PM मोदी मजबूत हों या कमजोर, सत्ता में BJP रहे या विपक्ष आए, क्या हिन्दू पहचान और हिन्दू समाज से जुड़े सवाल अब भारतीय राजनीति के केंद्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं?
SC/ST Act, आरक्षण, Caste census, सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति जैसे मुद्दे निश्चित रूप से सवर्णों में असंतोष पैदा कर सकते हैं। इन प्रश्नों को खारिज करना भी राजनीतिक मूर्खता होगी।
लोकतंत्र इंसान की कमियों को स्वीकार कर समझौतों से चलता है। लेकिन सोशल मीडिया का अनियंत्रित दौर हर छोटी कमी को भ्रष्टाचार बताकर लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट कर रहा है। कैसे आज का सोशल मीडिया और डिजिटल यूटोपियनवाद हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।