Home Blog Page 5280

राहुल गाँधी के ‘तमगे’: सुप्रीम कोर्ट की फटकार, नेशनल हेराल्ड घोटाला और झूठा प्रलाप

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी गुरुवार को अपने संसदीय क्षेत्र केरल के वायनाड में थे। यहाँ वनयांबलम में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के एक कार्यक्रम को उन्होंने संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों को ‘तमगा’ बताया। ऐसा-वैसा तमगा भी नहीं। मुकदमों की तुलना सैनिकों को बहादुरी के लिए मिलने वाले पदक से की।

उन्होंने कहा, “मेरे खिलाफ 15 से 16 मुकदमे हैं। जब आप सैनिकों को देखते हैं तो उनके सीने पर कई सारे पदक होते हैं। हर मुकदमा मेरे लिए पदक के समान है। इनकी संख्या जितनी अधिक होगी मैं उतना खुश होऊँगा।” उन्होंने कहा कि भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ देशभर में जो मुकदमे दर्ज कराए हैं उनसे वह डरे नहीं हैं। वे जब भी वे मेरे खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज कराते हैं तो वे मेरे सीने पर एक पदक जड़ते हैं।

चूॅंकि राहुल गॉंधी ने तुलना सैनिकों के पदक से की है तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उनके खिलाफ कैसे कैसे मुकदमे दर्ज हैं। कुछ मामले, जैसे 144 तोड़ने का, जुलूस निकालने का, सरकार के खिलाफ बयानबाजी करने का, परिस्थितियों के हिसाब से शायद राजनीति से प्रेरित हो सकते हैं और आप उन्हें राजनितिक ‘तमगा’ भी मान सकते हैं। लेकिन, यदि मामला गबन से जुड़ा हो, सुप्रीम कोर्ट की दुहाई देकर झूठ बोलने का हो तो न तो इसे राजनीति मानकर खारिज किया जा सकता है और न इसे ‘तमगा’ बताकर इसकी तुलना सैन्य पदक से की जा सकती।

नेशनल हेराल्ड- देश के लिए सस्ते में मिला, राहुल के लिए

आज भले नेशनल हेराल्ड कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा पत्र बन कर रह गया हो, लेकिन इतिहास में इसकी बहुत महत्वपूर्ण जगह है। राहुल की दादी के पिता पंडित नेहरू ने इसे उस समय शुरू किया था, जब आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी। पंडित नेहरू इसमें प्रधानमंत्री बनने के बाद भी लेख लिखते थे और पीएम बनने के पहले इसके ‘अंतरराष्ट्रीय संवाददाता’ थे। सरकार से अखबार और मीडिया के लिए रियायती दर पर मिली इसकी सम्पत्ति का बाजार मूल्य ₹5,000 करोड़ के आसपास बताया जाता है।

लेकिन एक दिन तकनीकी रूप से इसकी मालिक कम्पनी Associated Journals Limited (AJL) कॉन्ग्रेस पार्टी से बिना ब्याज का ₹90 करोड़ का क़र्ज़ लेती है और लौटाना ‘भूल’ जाती है। पहले तो सवाल यह उठता है कि क्या कॉन्ग्रेस एक राजनीतिक दल होने के नाते लाला और साहूकार की तरह पैसे का लेन-देन कर सकती है। तो बहाना यह मारा गया कि नहीं, पंडित नेहरू का अख़बार था, इसलिए कॉन्ग्रेस ने दे दिया।

अब दे भी दिया तो कायदे से कॉन्ग्रेस को इस क़र्ज़ की वसूली करनी चाहिए थी, क्योंकि कॉन्ग्रेस का पैसा देश के चंदे से इकठ्ठा हुआ है, राष्ट्र की सम्पत्ति है, लोगों को खैरात बाँटने के लिए नहीं है। लेकिन कॉन्ग्रेस ने इसकी वसूली नहीं की। इसकी जगह (कथित तौर पर, क्योंकि मामला अदालत में लंबित है) राहुल गाँधी, उनकी मम्मी सोनिया, ‘अंकल’ मोतीलाल वोरा आदि के साथ मिलकर महज़ ₹50 लाख की एक कम्पनी Young Indian बनाते हैं, जो ₹5,000 करोड़ की सम्पत्ति और ₹90 करोड़ के क़र्ज़ वाली AJL को अपने में समेट लेती है। यही है नेशनल हेराल्ड घोटाले का मूल।

पता नहीं कॉन्ग्रेस को Young Indian ने AJL पर चढ़ा ₹90 करोड़ का क़र्ज़ चुकाया या नहीं, लेकिन चाहे ऐसा किया हो या न किया हो, ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। जनहित के लिए, जनता का मीडिया बनाने के लिए रियायती सम्पत्ति से बनाए हुए ₹5,000 करोड़ पर देश की जनता का हक़ था- AJL को खुद को Young Indian को बेचने का हक ही नहीं था।

यही हेराफेरी, चार सौ बीसी राहुल गाँधी का तमगा है?

‘चौकीदार चोर है’ किसने कहा था?

राहुल गाँधी जब साल भर से पूरे देश में मोदी के खिलाफ राफेल में घोटाले का आरोप लगा-लगाकर थक गए, लेकिन जनता उनके बहकावे में नहीं आई; “चौकीदार चोर है” चिल्ला कर देख लिया, करोड़ों लोगों ने अपने नाम में ही चौकीदार लगा लिया, तो राहुल गाँधी ने अपना झूठ सुप्रीम कोर्ट के मुँह से बोलना शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने राफेल से जुड़ी याचिका को केवल सोचने भर के लिए स्वीकार क्या किया तो उन्होंने कह दिया, “अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है- चौकीदार चोर है।”

भाजपा को सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए भी था, क्योंकि अदालत ने ‘चौकीदार’ नरेंद्र मोदी को किसी भी तरीके से दोषी नहीं माना था और वह गई भी। और पहली ही सुनवाई में राहुल गाँधी ने मान लिया कि ‘चुनावी और मौसमी गर्मी में’ ज़बान फिसल गई। जाते-जाते तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने माफ़ तो कर दिया, लेकिन अगर न करते तो शायद आज राहुल गाँधी जेल के अंदर होते।

अपना झूठ सुप्रीम कोर्ट के मुँह से बोलना राहुल गाँधी का तमगा है?

आरएसएस के खिलाफ झूठा प्रलाप

राहुल गाँधी ने गाँधी जी के हत्यारे गोडसे को संघ का सदस्य बताया था, जो कि झूठ था। ऐसा भी नहीं हो सकता कि उन्हें पता नहीं हो, क्योंकि संघ 1948 में गाँधी की हत्या के दिन से ही इस झूठ के खिलाफ सच का प्रचार कर रहा है। लेकिन राहुल गाँधी ने यह जाने हुए भी न केवल इस झूठ को कहा, बल्कि अपने शब्दों पर कायम भी रहे।

लोगों को इतिहास के बारे में बरगलाने को ही राहुल गाँधी अपना तमगा मानते हैं?

राहुल गाँधी के खिलाफ ऐसे ही ओछी हरकतों के कारण चल रहे मामलों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है, मसलन असम के एक मंदिर में कथित तौर पर खुद अंदर नहीं गए और ठीकरा “कुछ आरएसएस वाले लोगों” के सिर पर फोड़ दिया– वह भी संसद में; नीरव मोदी-ललित मोदी के गुनाहों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपने आरोपों के आधार पर उन्होंने सारे मोदी को ही ‘चोर’ बता दिया, जिसके बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी से लेकर सूरत के भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने उनके ऊपर मानहानि का मुकदमा कर दिया, इत्यादि।

उनके खिलाफ मामले इसी तरह की वाहियात हरकतों के इतने सारे मामले हैं कि जिस चैनल एनडीटीवी के वह ‘फेवरेट’ हैं, जिसके एंकर रवीश कुमार उनके आगे-पीछे घूमकर इंटरव्यू लेते हैं, उसी चैनल ने उनके खिलाफ मामलों का एक अलग टैग ही बना रखा है।

चाहे झूठ बोलना हो या फिर गबन का मामला। ये न केवल कानूनी रूप से गलत हैं, बल्कि नैतिक और सामाजिक तौर पर भी ये गुनाह ही माने जाते हैं। एक व्यक्ति जो देश की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष रहा हो, 4 बार सांसदी जीत चुका हो, 50 के वय में हो उसे सार्वजनिक तौर पर ऐसे तमगों के लिए उसी तरह माफी मॉंगनी चाहिए जैसा राफेल मामले में राहुल गॉंधी ने सुप्रीम कोर्ट में किया था। लेकिन, कॉन्ग्रेसियों का चरित्र ही ऐसा नहीं है। शायद इसलिए तुलसीदास को लिख कर जाना पड़ा,

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥

हमाम में अकेले नंगे नहीं हैं चिदंबरम, सोनिया और राहुल गॉंधी सहित कई नेताओं पर लटक रही तलवार

मी लॉर्ड ने बख्श दिया पर राहुल गाँधी को मन से माफ नहीं कर पाएँगे कॉन्ग्रेसी

2-2 बार सीएम को धूल चटाई, राहुल गाँधी के करीब आते ही 10 महीने में 2 बार हारे

‘शौर्य दिवस’ से पहले हैदराबाद में धारा 144, राम मंदिर पर जहर उगलते रहे हैं ओवैसी

कल (शुक्रवार, 6 दिसंबर, 2019 को) बाबरी मस्जिद के ढाँचे के ध्वंस का दिन है। 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में हिंदूवादी कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद के ढाँचे को तोड़ डाला था। जहाँ हिंदूवादी और राष्ट्रवादी इसे ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं, वहीं सेक्युलरवादियों और इस्लामी समर्थकों के लिए यह ‘काला दिवस’ और ‘शोक दिवस’ होता है। पिछले महीने ही आए अयोध्या के फैसले के चलते इस बार प्रशासन बहुत ज़्यादा सतर्कता बरत रहा है, ताकि किसी भी पक्ष की भावनाएँ आहत होने से हिंसा न भड़क उठे। एहतियातन हैदराबाद में धारा 144 लागू कर दी गई है।

हैदराबाद पुलिस द्वारा जारी यह आदेश आज (गुरुवार, 5 दिनसंबर, 2019) से शनिवार (7 दिसंबर, 2019, परसों) तक जारी रहेगा। इसके तहत शाम को 6 बजे से सुबह के 6 बजे तक निषेधाज्ञा लागू रहेगी और लोग किसी भी प्रकार के धरने, प्रदर्शन, रैली (मोटरसाइकिल रैली को शामिल करते हुए) या बैठक में हिस्सा नहीं ले सकते। मज़हबी द्वेष उत्पन्न करने, समुदायों या विभिन्न समुदाय के लोगों के बीच वैमनस्य पैदा करने, या फिर अन्य किसी भी तरह से सार्वजनिक शांति एवं कानून-व्यवस्था को भंग करने वाले चित्रों, प्रतीक चिह्नों, झंडों पर मनाही होगी।

गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए दूसरे पक्ष को अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ़ कर दिया था कि दूसरा पक्ष विवादित ज़मीन के भीतरी हिस्से पर अपना दावा साबित करने में विफल रहा और सारा विवाद भीतरी हिस्से को लेकर ही है। इसीलिए इलाहबाद हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पूरा स्थल हिन्दुओं को दे दिया था।

इस फैसले के बाद हिन्दुओं से लेकर देश की न्यायपालिका तक पर विषवमन करने वाले नेताओं में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहाद अल मुसलमीन के प्रमुख अकबरुद्दीन ओवैसी सबसे आगे रहे थे, जो हैदराबाद से लोकसभा सांसद भी हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा था कि खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए।

देश हिंदू राष्‍ट्र की ओर आगे बढ़ रहा, अब वे काशी और मथुरा पर भी अपना दावा ठोकेंगे: असंतुष्ट ओवैसी

अली मियाँ से ओवैसी तक केवल चेहरे बदले, नहीं मिटा रामलला पर मन का खोट

नागरिकता विधेयक: मुस्लिमों को भगाने वाला कानून? नहीं ब्रो, वामपंथी प्रपंच फैला रहे हैं!

इससे पहले कि इस विषय पर कोई चर्चा हो सके, मैं फेसबुक पर से अपने मित्र के एक पोस्ट का जिक्र करना चाहूँगा, जो कि संदर्भ को स्पष्ट करेगा और विषय पर आपके कुछ प्रश्नों का उत्तर देगा। ये पोस्ट मूलतः नितिन त्रिपाठी जी ने शेयर की है, जिसमें समुचित संपादन के बाद नीचे रख रहा हूँ:

“मेरी एक अमेरिका में जन्मी मित्र थीं। शक्ल तो भारतीय थी, लेकिन उन्हें भारत से सख़्त नफ़रत थी। नफ़रत छोटा शब्द है, उन्हें भारत से घृणा थी। ग़लती उनकी भी नहीं थी। उनके पिता जी भारतीय मूल के थे। दशकों पूर्व अंग्रेज़ उनके परिवार को अफ़्रीका लेकर गए। धीमे-धीमे वह युगांडा में बस गए। जैसे भारतीय मेहनती, पराक्रमी होते हैं, तो अपनी मेहनत से उन्होंने भी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ी और युगांडा में उनका बढ़िया व्यवसाय हो गया।

फिर सत्तर के दशक में युगांडा में तानाशाह आया ईदी अमीन। तानाशाह ने सारे भारतीयों की सम्पत्ति ज़ब्त कर उन्हें देश से निकल जाने का हुक्म दिया। इधर भारत में नपुंसक सरकार थी। भारत की सेकुलर सरकार ने इन भारतीयों को भारत वापिस लेने से इंकार कर दिया। यदि वह मुस्लिम होते तो दुनिया के दसियों देश स्वीकार कर लेते (उनके स्टाफ़ के कुछ मुस्लिम खाड़ी देश चले भी गए), पर इनकी समस्या यह थी कि ये हिन्दू भारतीय थे, जिन्हें उनका देश ही वापिस लेने को तैयार नहीं – सेक्युलरिज़म भंग होती थी।

उनके परिवार ने सालों शरणार्थी बन काटा। अंततः इंग्लैंड, अमेरिका जैसे देशों ने दया दिखाई। मित्र का परिवार अमेरिका पहुँचा। एकदम अनजान देश। जब आपकी कर्मभूमि आपको लात मार निकाल दे, और जन्मभूमि स्वीकार करने से इंकार कर दे, उस दुःख की आप कल्पना नहीं कर सकते। वह जो युगांडा में महल में रहते थे, अमेरिका में होटेल में वॉशरूम, लैट्रीन साफ करने वाली नौकरी करने को विवश हुए।पुरुषार्थी थे, बीस वर्षों में अमेरिका में भी होटेल के मालिक बने, लेकिन जिन बच्चों ने अपना बचपन खोया वो भारत को कभी माफ़ नहीं कर पाए।”

आगे नितिन लिखते हैं कि संसद में जब यह विधेयक पास होगा तो भारत के आस-पास बसे हिन्दुओं या उनके ही अंग-प्रत्यंगों, के अनुयायियों के पास घरवापसी का एक विकल्प होगा कि उन पर कोई विपत्ति आए, धर्म के आधार पर उन्हें प्रताड़ित किया जाए, तो वो पूरे विश्व में कम से कम एक देश की तरफ उम्मीद से देख सकते हैं।

क्या है यह बिल

सरसरी निगाह डालने पर यह बिल भारत के तीन पड़ोसी देशों, अफगानिस्तान, बंग्लादेश, पाकिस्तान से आए हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई धर्मावलम्बियों को, अपने देश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किए जाने पर, भारत की नागरिकता प्रदान करने की बात करता है। इसमें मुस्लिम नहीं हैं, क्योंकि ये तीनों देश मुस्लिम-बहुल राष्ट्र हैं, और वहाँ मजहबी उत्पीड़न करने वाले लोग या सत्ता भी इस्लामी ही है, तो उन्हें यहाँ की नागरिकता देने का कोई सही कारण नहीं दिखता।

इस विधेयक में कोई समस्या नहीं है सिवाय इसके कि कुछ लिबरलों को ‘मुस्लिम’ शब्द की अनुपस्थिति खल रही है। चूँकि मुस्लिम शब्द भारतीय राजनीति का एक बहुत बड़ा मुद्दा है तो इस बिल के बारे में तमाम भ्रांतियाँ फैलाई जा रही हैं कि ये मुस्लिम विरोधी है। जबकि, मुस्लिम जनता ने इन तीनों देशों में, अपनी सत्ता के माध्यम से, वहाँ के अल्पसंख्यकों पर तरह-तरह के अत्याचार करते हुए, उनकी संख्या को लगातार गिराते हुए, लगभग नगण्य कर दिया है।

पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति बहुत खराब है। उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार होते हैं, उन्हें उनके पर्व मनाने पर बहुसंख्यक मुस्लिम उन्हें धमकाते हैं, और अगर कुछ और न मिले तो ‘ब्लासफेमी’ कानून को नाम पर उन्हें फाँसी के तख्ते तक पहुँचा देते हैं, जहाँ मुस्लिमों ने अगर कह दिया कि फलाने ने उनके मजहबी प्रतीकों या पैगम्बरों की निंदा की है, तो सजा-ए-मौत ही मिलनी है।

इज़रायल यहूदियों का देश है। एकमात्र देश जो कहता है कि दुनिया में यहूदी जहाँ भी है, उसके लिए उनके द्वार खुले हैं। सनातनी हिन्दू युगांडा में मेहनत से व्यवसाय बनाता है, और जब उसे वहाँ से सब-कुछ छीन कर भगा दिया जाता है तो भारत उसे नकार देता है। आखिर हिन्दू, जिसने बार-बार इस्लामी आतंकियों और आक्रांताओं के हमले को, अत्याचार को, आगजनी और हिंसा को झेला है, वो अगर दुर्भाग्यवश भारत की सीमा से अंग्रेजों के कारनामों के बाद कहीं और चला गया, वापस आना चाहता है, तो वो कहाँ जाएगा?

मुस्लिमों को भारत क्यों दे नागरिकता? जो यहाँ घुस आए हैं बांग्लादेश या म्यांमार से, वो चोरी, डकैती आदि से ले कर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की संभावना रखते हैं, और वो हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं। जो रोहिंग्या किसी राष्ट्र के बौद्ध लोगों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देता है, उसे हम भारत का नागरिक बना लें?

मुस्लिम तो बड़े ही गर्व से कहते हैं कि आधी पृथ्वी उन्हीं के मजहब के राष्ट्रों से पटी पड़ी है, तो फिर इन राष्ट्रों को आगे आ कर ले जाना चाहिए इन बेचारे मुस्लिमों को जिन्हें पाकिस्तान से ले कर म्यांमार तक हर जगह से भगाया जा रहा है! कई बार तो लोग बांग्लादेश या पाकिस्तान के किसी भी वैश्विक सूचकांक पर भारत से ऊपर होने पर यहाँ के कुछ लोग खुशी मनाते हैं, वो लोग आज क्यों परेशान हैं, रोहिंग्या जैसे चले जाएँ उन्हीं देशों में।

क्या भारत आत्महत्या के रास्ते खोल ले?

पूरा नैरेटिव ऐसे गढ़ा जा रहा है कि पहले NRC और अब इस नागरिकता (संशोधन) विधेयक के द्वारा भारत से मुस्लिमों को भगाने की कवायद हो रही है। ऐसे लोग प्रपंची और गिरी हुई गुणवत्ता के वैसे जीव हैं जिन्हें मानवमात्र की श्रेणी में रखना अनुचित है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इन दोनों ही तरीकों से भारत के लगभग बीस करोड़ भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता पर एक सवाल भी नहीं उठाया जा रहा, उन्हें बाहर फेंकने की बात तो रहने ही दीजिए।

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सरकार इस देश के सही नागरिकों की पहचान करते हुए, घुसपैठियों, और गैरकानूनी रूप से घुसे लोगों की पहचान करेगी और उन्हें यहाँ के तंत्र से बाहर करेगी। ये संख्या सिर्फ असम में 50 लाख, पश्चिम बंगाल में 57 लाख और पूरे देश में लगभग 2 करोड़ बताई जाती है। वहीं रोहिंग्याओं की बात करें तो कानूनी रूप से यूएन द्वारा रजिस्टर्ड लोगों की संख्या 14,000 है जबकि गैरकानूनी रूप से रह रहे इन मुस्लिमों की संख्या 40,000 के करीब है।

2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में तिब्बत के बौद्ध शरणार्थियों की संख्या लगभग 1,92,000 है, और श्रीलंका से भागे और तमिलनाडु में रहने वाले लोगों की संख्या एक लाख के क़रीब बताई जाती है। पाकिस्तान से, अगर बँटवारे को अलग रखें, आए हिन्दुओं की संख्या लगभग 20,000 है, जिसमें से 13,000 को भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है। अफ़ग़ानिस्तान में हिन्दुओं और सिक्खों की संख्या सिमट कर 5000 रह गई है।

घुसपैठिए अगर मुस्लिम हैं, जो भारत में बस इसलिए घुस आए हैं क्योंकि यहाँ की सरकारों ने उन्हें ‘वोट बैंक’ बन जाने का मौका दिया, उन्हें राशन कार्ड जारी किए और आज वो असम, त्रिपुरा और बंगाल के कई इलाकों में ‘किंग मेकर’ की भूमिका में हैं। इन घुसपैठियों को निकालना आवश्यक है क्योंकि ये भारतीय मुस्लिमों का वो हक मार रहे हैं, जो समस्त भारतीय टैक्सदाताओं के फंड से अल्पसंख्यक कल्याण हेतु जारी किया जाता है। इसलिए, भारत जैसे सीमित संसाधन वाले देश में, जहाँ गरीबी सर्वव्याप्त है, वहाँ हम इन दो करोड़ मुस्लिम घुसपैठियों को नहीं रख सकते।

ये लोग छोटे-छोटे समूह में रहते हैं, और जरूरत पड़ने पर इन्होंने पूरी कॉलोनी का घेराव किया है, पत्थरबाजी की है। ये शरणार्थी तो बिल्कुल नहीं हैं, ये चोर हैं, जो किसी पार्टी के लालच के कारण भारत में घुस आए हैं और यहाँ उपद्रव फैला रहे हैं। सब नहीं फैला रहे, लेकिन भारत की इसमें क्या गलती है? मुस्लिम हो, अपने देश में मन नहीं लग रहा, तो इस्लामी देश में जाओ जो तुम्हारी संस्कृति के करीब है। यहाँ जगह नहीं है।

कुछ स्मार्टीपैंट्स जो विधेयक में मजहब ढूँढ रहे हैं

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राहुल कँवल काफी ‘डिस्टर्ब’ हो गए हैं, मानसिक तौर पर। उसी परेशानी में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक प्रताड़ना को किनारे रख कर इसे हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा बना दिया। इन्हें हिन्दू-मुस्लिम करने में बहुत आनंद मिलता है। हाल ही में इन्होंने बीएचयू में डॉ फिरोज खान की धर्म विज्ञान संकाय में नियुक्ति को ले कर आंदोलन कर रहे छात्रों को कलंक कह दिया था। लेकिन, मेरे हिसाब से पत्रकार जब पत्रकारिता छोड़ कर, अनभिज्ञता या अज्ञानतावश साम्प्रदायिक बातों को हवा दे कर दंगे कराने की पृष्ठभूमि तैयार करने लगे तो उसे कलंक कहा जाना चाहिए।

वैसे ही क्लास के मॉनिटर का चुनाव जीतने पर खुश होने वाले वामपंथियों के नेता सीताराम येचुरी ने आदतानुसार छींकते-खाँसते हर बात में संविधान घुसाते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया। ये वामपंथी राष्ट्र की अवधारणा को क्यों तवज्जो देंगे! इनके युवा नेता केरल, बस्तर, पंजाब और कश्मीर को आजादी दिलाने पर तुले हैं, और इन्हें संविधान की याद आ रही है। अगर भारत राष्ट्र की चिंता है तो सारे वामपंथियों को झंडे का रंग भगवा कर के, उस पर लाल रंग से ‘ॐ’ लिखवा कर, नई पार्टी का गठन कर के ‘राम-नाम’ के जाप में शामिल हो कर आठ वर्षों के शुद्धीकरण के बाद नई पार्टी बना कर लोकतंत्र के पर्व में हिस्सा लेना चाहिए। आप कहेंगे, “अजीत जी, लेकिन आपने इनके प्रश्नों का उत्तर तो दिया ही नहीं!” मैं कहूँगा, “वामपंथी चम्पकों को लिए मेरे पास कटुपहास के अलावा कुछ है ही नहीं!”

किसी को ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की याद आ रही है, कोई ‘ईथोस’ की बात करता दिख रहा है! भारत ने आखिर किसे शरण नहीं दी? मेरे सहयोगी, ऑपइंडिया के सब-एडिटर, मृणाल ने इसी विषय पर जो लिखा वो बिल्कुल सटीक है:

“अगर वो भारत के मूल्यों को ही जानना चाहते हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि भारत के शासक हमेशा ठोक-बजाकर ही शरण देते थे। जब पारसी ईरान में उन्हीं मुस्लिमों के अत्याचार से जान बचाकर भारत पहुँचे, जिन्हें नागरिकता के लिए मना करने को ‘इंडिया टुडे’ के कार्यकारी संपादक साहिल जोशी जी भारत की अवधारणा के खिलाफ बता रहे हैं, तो भारत में जिस राजा के पास वे पहुँचे, उसने ऐसे ही शरण नहीं दे दी- उसने पहले उनके मज़हब को समझा, फिर उनके सामने शर्त रखी कि मूल उपासना-पद्धति के अलावा बाकी सारी संस्कृति हिन्दू ही अपनानी पड़ेगी, फिर शरण दी।

महाभारत में भी जब अपना रथ निकालने में जुटे कर्ण ने सुविधानुसार शरणागति माँगी, तो भगवान श्री कृष्ण ने शर्त रखी कि वह हथियार छोड़ दे और हमेशा जिस राजा युद्धिष्ठिर की शरण में आ रहा है उसकी दासता में रहना स्वीकार करे। क्या साहिल जोशी इसका समर्थन करेंगे कि शरणार्थी मुस्लिमों से वंदे मातरम गाने, कभी फिलिस्तीन का समर्थन न करने, कश्मीर में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों का विरोध न करने, हिन्दुओं का मतांतरण न करने और हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर उनका मज़हब न बदलवाने पर, लिखित और हमेशा के लिए समर्थन की शर्त रख दी जाए?”

ये कहिएगा तो वो भड़क जाएँगे कि ‘वंदे मातरम्’ कहना या न कहना ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और निजी चुनाव है। लेकिन मेरा तर्क यह है कि अगर किसी राष्ट्र में शरण ले कर, या पैदा होने के बाद, यहाँ की धूल-हवा-पानी में स्वयं को पाने के बाद, अगर यहाँ के राष्ट्रीय प्रतीकों या गीतों का सम्मान तुमसे नहीं हो पा रहा, तो फिर वहीं जाओ जहाँ ऐसी चीजों की अवधारणा नहीं है।

क्या यह सेकुलरिज्म के खिलाफ है?

सेकुलर शब्द की व्याख्या यह नहीं है कि दुनिया में मुस्लिम कहीं भी हो, वो भारत में नागरिक बनने आ सकता है। सेकुलर शब्द की परिभाषा यह नहीं है कि भारत अपनी बहुसंख्यक आबादी को भूल जाए और दो करोड़ घुसपैठियों को यहाँ नागरिक बना दे, जो कि बाद में कहाँ बम फोड़ेंगे, कहाँ डकैती डालेंगे, कहाँ आतंकियों को समर्थन देंगे, कहाँ सजायाफ्ता मुस्लिम आतंकवादी के जनाजे में शामिल होंगे… इनका हमें अंदाज़ा नहीं रहे!

भारत की जनसंख्या में दो करोड़ तो रहने दीजिए, लाख लोगों को भी जोड़ने की जगह नहीं है। कुछ हजार हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, सिख, ईसाई आदि जो अपने धर्म के नाम पर इन तीन देशों के मुस्लिमों द्वारा सताए गए हैं, उन्हें भारत छोड़ कर और कौन नागरिकता देगा? साथ ही, इन देशों में किसी हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई या सिख ने शरीर पर बम बाँध कर खुद को बाजार में फोड़ा नहीं। इनकी आस्था और संस्कृति भारतीय संस्कृति और आस्था के करीब है। ईसाई को छोड़ दिया जाए, तो बाकी धर्म के लोगों को लिए पूरी दुनिया में कहीं भी जाने का विकल्प नहीं है। क्या भारत अपनी ही धरती पर जन्मे धर्म के लोगों को मरने के लिए छोड़ दे?

मुस्लिमों को कौन सता रहा है? पाकिस्तान में या बांग्लादेश में मुस्लिमों को सताने वाले भी मुस्लिम ही हैं। उनके पास तो 1947 में ये विकल्प था कि वो भारत आएँ या मुस्लिमों के लिए अलग देश में जाएँ। अब, जब उधर चले गए, भारत ने तुम्हें रहने की जमीन दी, पैसे दिए, 71 में आजाद भी कराया, फिर अगर, अब भी शिया-सुन्नी, अहमदिया-सुन्नी खेल रहे हो, तो इसमें भारत तुम्हारी मदद क्यों करे? जिधर देख कर नाम जपते हो, उधर ही नाव का पाल खोल कर निकल लो।

सेकुलर होने का मतलब यह नहीं है कि दुकान खोल कर बैठ जाएँ कि आओ भाई, पर्चा भरो, भारतीय बनो। सेकुलर हम हैं, भारत में हैं, बीस करोड़ मुस्लिमों के साथ रह रहे हैं। कोई कट्टरपंथी कहीं कमलेश तिवारी की गला रेत कर हत्या कर देता है तो हिन्दू सारे मुस्लिमों को उसका गुनहगार नहीं मानता। कोई मुस्लिम किसी हिन्दू का बलात्कार करते वक्त उसे ‘भगवान नहीं, अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँग’ कहता है, तो हिन्दू लोग सारे मुस्लिमों को उस घृणित सोच से सना हुआ नहीं बताते। कुछ मुस्लिम सिर्फ हिन्दुओं को प्रेम जाल में फँसा कर, अपने बाप, भाई, या दोस्तों से उसका रेप करवा कर, हत्या कर देता है तो यहाँ का हिन्दू इकट्ठा हो कर सारे मुस्लिमों को भगाने की अपील नहीं करता।

वो इसलिए, क्योंकि हिन्दू कहीं भी हो, कट्टर नहीं है। वो सामाजिक अपराध कर सकता है, धार्मिक आतंकवादी नहीं बनता। लेकिन, बांग्लादेशी मुस्लिम यहाँ दीमक की तरह फैल रहे हैं, और समाज को खोखला कर रहे हैं। इन्हें बाहर फेंकना समय की माँग है, इसलिए इन्हें नागरिकता देने का तो सवाल ही नहीं उठता। इन्हें चिह्नित कर के घरों से खींच कर बाहर निकाला जाए और इनके देशों की सीमाओं पर छोड़ दिया जाए। उसके बाद इनके लोग क्या करें वो उनका सरदर्द है।

भारत के पास दो करोड़ घुसपैठियों या कई करोड़ ‘इच्छुक’ मुस्लिमों को भारत में बसाने के संसाधन नहीं हैं। यहाँ जो 130 करोड़ हैं, उन्हीं को पालने में समस्या है। मुस्लिमों को छोड़ कर बाकी धर्म के लोगों के पास भारत छोड़ कर कहीं जाने का विकल्प है नहीं क्योंकि यही उनके पुरखों और देवताओं की भूमि है। अतः, भारत सरकार का यह बिल न्यायोचित, संवैधानिक, तर्कसंगत और मानवीय मूल्यों के निकटतम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुस्लिमों के लिए विश्व के अनगिनत देश हैं, वो लोग वैसे देशों की नाव पकड़ कर नारा-ए-जो-भी-होता है चिल्लाते हुए जा सकते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब के चक्कर में जमुना वैसे भी मृतप्राय हो चुकी है।

बंगाल: आम के बाग में मिला युवती का जला हुआ शव, बलात्कार के बाद हत्या का संदेह

पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िले में एक आम के बाग में गुरुवार (5 दिसंबर) को युवती के जले हुए शव के मिलने से दहशत का माहौल बन गया है। संदेह जताया जा रहा है कि बलात्कार के बाद युवती की हत्या की गई होगी। पुलिस उपाधीक्षक प्रशांत देबनाथ ने इस घटना के सन्दर्भ में बताया कि कहा कि मृतक युवती का शव इस क़दर झुलस चुका है कि उसकी पहचान करने में काफ़ी दिक्क्त हो रही है।

पुलिस अधीक्षक आलोक राजौरिया ने भी मौके पर पहुँच जाँच की। पुलिस उपाधीक्षक ने बताया कि शव को स्थानीय किसानों ने इंग्लिश बाज़ार पुलिस थाना क्षेत्र में आज सुबह देखा।

ख़बर के अनुसार, उन्होंने बताया, “ऐसा लगता है कि मृतका की उम्र 20 वर्ष की होगी। उसके शरीर पर कई जगह चोट के निशान हैं। हमने उसे मालदा मेडिकल कॉलेज में पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है।”

पुलिस विभाग के सूत्रों ने कहा कि शुरुआती जाँच से संकेत मिलता है कि उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी गई और फिर उसके शरीर को आग लगा दी गई। घटनास्थल पर शव के पास एक जोड़ी चप्पल और कई माचिस की तीलियाँ मिली हैं।

28 नवंबर को हैदराबाद के शादनगर में एक पुलिया के नीचे 25 वर्षीय पशु चिकित्सक के जले हुए शव मिलने के एक हफ्ते बाद यह घटना सामने आई है। इसी तरह की घटनाएँ बिहार के बक्सर और उत्तर प्रदेश के संभल में भी हुई थीं। गुरुवार (5 दिसंबर) को उत्तर प्रदेश में उन्नाव बलात्कार पीड़िता को ज़िंदा जलाने की घटना भी सामने आई। पीड़िता की हालत नाजुक बताई जा रही है।

…एक और ‘प्रीति रेड्डी’, उन्नाव में गैंगरेप पीड़िता पर लाठी-डंडे-चाकू से वार, केरोसिन डाल जलाया ज़िंदा

बक्सर में दोहराई गई हैदराबाद जैसी घटना, लड़की से सामूहिक दुष्कर्म के बाद पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी

प्रीति रेड्डी का आखिरी फोन कॉल… पहचान हुई उस लॉरी की जहाँ मौत के बाद भी दरिंदों ने उन्हें नोचा था

फेमस एक्ट्रेस और उनकी NRI दोस्त के साथ छेड़छाड़ और मारपीट: मुंबई से आरोपित शाहरुख गिरफ़्तार

स्प्लिट्सविला (Splitsvilla) की पूर्व प्रतिभागी व अभिनेत्री हैं हर्षिता कश्यप। इनके साथ छेड़छाड़ हुई है, मारपीट की गई है। आरोपित शख्स का नाम है – शाहरुख शेख। 29 साल के शाहरुख को चर्चगेट राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने चर्नी रोड रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार कर लिया है। पूछताछ से यह पता चला है कि वो वर्ली इलाक़े का रहने वाला है और वह दक्षिण मुंबई के एक नाइट क्लब में काम करता है।

ख़बर के अनुसार, टीवी कलाकार व ‘स्प्लिट्सविला 8’ की पूर्व प्रतिभागी हर्षिता कश्यप एक आगामी वेब सीरीज़ में काम कर रही हैं। वह मुंबई अंधेरी उपनगर के चार बंगला इलाक़े में रहती हैं। 26 वर्षीय हर्षिता ने बताया कि उनकी दोस्त इश पाला एक NRI है और साउथ अफ्रीका की रहने वाली हैं। वो मेडिकल टूरिज़्म में काम कर रही हैं। इसके आगे हर्षिता ने बताया कि पाला ने उन्हें चर्नी रोड के सैफ़ी हॉस्पिटल में बुलाया था। हॉस्पिटल में काम खत्म करने के बाद लगभग 3:30 बजे दोनो ने वहाँ से घर जाने के लिए ट्रेन से जाने की योजना बनाई।

हर्षिता के अनुसार,

“पाला ट्रेन की टिकट ख़रीदने के लिए लाइन में खड़ी थी। तभी मैंने नोटिस किया कि एक शख़्स उसे घूर रहा है। शुरुआत में तो हमने उसे इग्नोर किया लेकिन वह लगातार घूरे जा रहा था और हमारा पीछा कर रहा था। वह हमारे पीछे स्टेशन की सीढ़ियों तक भी आ रहा था। जब मैंने उससे पीछा करने की वजह पूछी, तो उसने अकड़कर कहा कि अगर मैं तुम्हें देख रहा हूँ, तो इसमें क्या प्रोब्लम है।”  

इसके बाद हर्षिता और उनकी दोस्त के साथ शाहरुख ने बहस करना शुरू कर दी। लेकिन, इसके बाद भी शाहरुख उन्हें घूरना नहीं छोड़ा। बात हाथापाई तक आ पहुँची। हर्षिता ने बताया,

“उसने पहले पाला को थप्पड़ मारा। मैंने उसे सबक सिखाने का फ़ैसला किया और उसे हिट करना शुरू किया। शाहरुख अपने बचाव में आया और मुझे भी हिट करने लगा। पुलिस के आने से पहले वहाँ मौजूद लोगों ने हमें बचाया और उसे पकड़कर प्लेटफॉर्म पर बनी जीआरपी चौकी ले गए।”  

इस मामले पर चर्चगेट जीआरपी के इंस्पेक्टर बी पवार ने बताया कि रेलवे पुलिस ने आरोपित के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 354 (A), 354 (B) और सेक्शन 323 के तहत मामला दर्ज कर, शाहरुख शेख को गिरफ़्तार कर लिया है।

‘वो छटपटा रही थी, मैं रेप कर रहा था, मरने के बाद भी… फिर बेटी के साथ भी’ – नसीरुद्दीन का कबूलनामा

…एक और ‘प्रीति रेड्डी’, उन्नाव में गैंगरेप पीड़िता पर लाठी-डंडे-चाकू से वार, केरोसिन डाल जलाया ज़िंदा

मुंबई में 6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार: 60 वर्षीय अब्दुल हामिद अंसारी गिरफ़्तार

विकास के लिए पैसे चाहिए तो कॉन्ग्रेस में शामिल होना होगा: कमलनाथ के मंत्री का वीडियो वायरल

मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में चल रही कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्री एक बार फिर गलत वजहों से चर्चा में हैं। राज्य के गृह मंत्री बाला बच्चन का एक वीडियो सोशल मीडिया में पर घूम रहा है। इसमें वे लोगों को कॉन्ग्रेस में शामिल होने की शर्त बता रहे हैं।

वीडियो में वे यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि अगर लोगों को विकास के लिए पैसे चाहिए तो कॉन्ग्रेस का सदस्य बनना पड़ेगा। वे यह उदाहरण भी देते हैं कि जहाँ कहीं उनकी पार्टी को 600-700 वोटों की लीड मिली, वहाँ पार्टी ने 50-50 करोड़ सड़क बनवाने के लिए मुहैया कराए।

वीडियो सोमवार (2 दिसंबर, 2019) की रात का बताया जा रहा है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक राजपुर से 4 बार विधायक बन चुके बच्चन ने कहा कि अब और पैसे तब मिलेंगे जब उनकी पार्टी को ‘लीड’ (चुनावों में बढ़त) मिलेगी। बताया गया है कि बच्चन राजपुर क्षेत्र के ही जलगाँव जिले में थे, जब उन्होंने यह बात कही। वहाँ वे पाटिल समाज द्वारा आयोजित एक समारोह में शिरकत करने पहुँचे थे।

वहाँ इकठ्ठा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “क्योंकि हमें इनको सबको भी जवाब देना है… हम मूर्ख नहीं बनने वाले।” मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने ग्रामीणों को “फूल-फूल” करने (भाजपा का समर्थन करने) के लिए भी फटकारा। साथ ही दावा किया कि कई गाँवों के लोग 50 प्रतिशत लोगों का कर्ज माफ़ होने और पैसे मिलने के बाद भी कॉन्ग्रेस के खिलाफ हो गए। बकौल बाला बच्चन, बहुत लोग तो उनके और कॉन्ग्रेस सरकार के पैसे से बने मंदिर में बैठकर वादा करने के बाद में भी उनके ख़िलाफ हो गए थे।

मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी बताए जाने वाले बच्चन राजपुर सीट से 2013 में 11,000 वोटों के अंतर से जीते थे। 2018 में प्रदेश में 15 साल से चल रही बीजेपी सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद वे महज 900 वोटों से जीत पाए थे।

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब बच्चन विवादों में आए हैं। उनकी बड़ी बहन ताराबाई पर शौचालय निर्माण में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। ताराबाई उस समय वसावी गाँव की ग्राम पंचायत में सरपंच थीं। जाँच में उनके खिलाफ आरोप सही पाए गए थे। ताजा विवाद पर बच्चन ने सफाई देते हुए कहा है कि उनकी पार्टी की बैठक चल रही थी। मैंने कुछ गलत नहीं कहा। वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है।

कमलनाथ के 2 मंत्री: एक के साथ महिला खिंचवाने लगी फोटो तो दूसरे उखड़े, मिला टका सा जवाब

महिला कमिश्नर (IAS) ने झुक कर छुआ कमलनाथ के मंत्री का पैर, हो गया Video Viral

MP में नई स्कीम: कमलनाथ सरकार से चाहिए ₹51000 तो दूल्हे को भेजना होगा शौचालय से सेल्फी

लालू-मनमोहन का सपना पूरा करने चले थे मोदी, टाँग अड़ा रही है सोनिया गाँधी की कॉन्ग्रेस

जब से महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार बनी है, सालों पुराने एक सपने के पूरा होने पर ग्रहण लगता नजर आ रहा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार ने अब तक जो संकेत दिए हैं उससे बुलेट ट्रेन परियोजना के अधर में लटकने की आशंका बढ़ गई है। भले ही मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन का परिचालन शुरू करने की परियोजना की नींव मोदी सरकार ने डाली हो, लेकिन इस सपने को पंख तब लगे थे जब मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए-1 सरकार चल रही थी। उस समय राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री हुआ करते थे।

वही लालू जो आजकल चारा घोटाले में जेल की सजा काट रहे हैं। रेल मंत्री रहते लालू जापान की यात्रा पर गए थे। बुलेट ट्रेन की सवारी की। इतने प्रभावित हुए कि जनवरी 2009 में ऐलान किया कि देश में हाई स्पीड ट्रेनों के परिचालन पर सरकार गंभीरता से पहल कर रही है। उन्होंने कहा था, “वह दिन दूर नहीं जब देश में बुलेट ट्रेन दौड़ेगी। कुछ मार्गों पर बुलेट ट्रेन सेवा शुरू करने के लिए वैश्विक स्तर पर निविदाएँ आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।”

उस जमाने में भी लालू आज ही की तरह कॉन्ग्रेस के भरोसेमंद साथी हुआ करते थे। उस समय भी कॉन्ग्रेस की कमान उन्हीं सोनिया गॉंधी के हाथों में थी जिनके पास आज है। अंतर केवल इतना ही है कि उस समय सोनिया पर्दे के पीछे से सरकार चला रही थी और आज विपक्ष में बैठी हैं। लालू ने केवल बुलेट ट्रेन की ही बात नहीं की थी। इसके संभावित मार्गों में मुंबई-अहमदाबाद रूट का जिक्र भी किया था। उन्होंने कहा था, “हम मुंबई-अहमदाबाद, दिल्ली-चंडीगढ़ और दिल्ली-पटना जैसे कुछ रूटों पर इस ट्रेन के परिचालन की संभावनाओं की पड़ताल कर रहे हैं।” बुलेट ट्रेन में सफर के अपने अनुभवों को लेकर उन्होंने कहा था, “यह बहुत अच्छा था। जापान में बुलेट ट्रेन का परिचालन बेहतरीन तरीके से हो रहा है।”

फरवरी में 2009-10 का रेल बजट पेश करते हुए लालू ने फिर से बुलेट ट्रेन का जिक्र किया। उन्होंने सदन में कहा, “मैंने जापान, जर्मनी और फ्रांस में 300 से 350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाली ट्रेनों को देखा है। 2007-08 के बजट में मैंने घोषणा की थी कि आवश्यकता, व्यवहारिकता को ध्यान में रख कर देश के विभिन्न इलाकों में बुलेट ट्रेन का परिचालन शुरू करने के लिए अध्ययन किया जाएगा। दिल्ली-अमृतसर, अहमदाबाद-मुंबई-पुणे, हैदराबाद-विजयवाड़ा-चेन्न्ई, चेन्न्ई- बेंगलुरु-एर्नाकुलम और हावड़ा-हल्दिया के बीच बुलेट ट्रेन परिचालन की व्यवहारिकता का अध्ययन करने के लिए कदम उठाए गए हैं।” उन्होंने कहा, “सम्मानित सदस्यों को यह बताते हुए मुझे खुशी हो रही है कि जल्द ही दिल्ली-पटना रूट पर बुलेट ट्रेन चलाने की संभावनाओं की पड़ताल के लिए अध्ययन शुरू किया जाएगा।”

न केवल रेल मंत्री लालू, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी बुलेट की ट्रेन की संभावनाओं को लेकर उत्साहित थे। जून 2012 में तो उनकी सरकार द्वारा मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखाने की बात भी सामने आई थी।

रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से न्यूज एजेंसी पीटीआई ने बताया था कि मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हाई स्पीड रेल कॉरिडोर को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक हुई। इसमें मुंबई-अहमदाबाद रूट पर पहला बुलेट ट्रेन चलाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखाई गई। अधिकारी के मुताबिक इस कॉरिडोर का आगे जाकर पुणे तक विस्तार किया जाना था। अधिकारी ने यह भी बताया था कि इस परियोजना पर 60,000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। धन जुटाने के तमाम विकल्पों पर सरकार गौर कर रही है। अधिकारी के अनुसार दो विकल्प उभरकर सामने आए थे। पहला, पीपीपी मॉडल। दूसरा, किसी अन्य देश के साथ इस संबंध में समझौता।

यूपीए सरकार में वो तमाम दल शामिल थे, जिन्हें आज बुलेट ट्रेन से परेशानी है। ज्यादातर विपक्षी दल तो उसी दिन से इस परियोजना के पीछे पड़े हैं जब मोदी सरकार ने इसकी नींव डाली। लेकिन, तब इन दलों को इससे कोई समस्या नहीं थी जब मनमोहन सिंह पीएम और लालू रेल मंत्री थे। ऐसे में उनका विरोध राजनीतिक ओछेपन के अलावा कुछ नहीं है। उन्हें बुलेट ट्रेन से समस्या नहीं है। उनको दिक्कत इस बात से है कि यदि यह परियोजना समय पर पूरी हो जाएगी तो इसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाएगा।

2009 में रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने कहा था कि जल्द ही देश में बुलेट ट्रेन दौड़ेगी। एक दशक बाद जब हम इस रास्ते आगे बढ़ रहे हैं तो कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दल परियोजना में ब्रेक लगाने की ताक में हैं। मनमोहन सिंह की ‘मौन’ वफादारी और हर मौसम में साथ टिके रहने की लालू की प्रतिबद्धता के बावजूद सोनिया गॉंधी बुलेट ट्रेन दौड़ने के उनके सपने में ब्रेकर बनी खड़ी हैं!

69 लोग एक झटके में अनफॉलो: राहुल बाबा नाराज़ क्यों? पार्टी में भीतरघात से लेकर JNU कनेक्शन पर शक!

कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड से लोकसभा सांसद राहुल गाँधी ने एक ही दिन में ट्विटर पर 69 लोगों को फॉलो करना छोड़ दिया है। पहले जहाँ वे 315 लोगों को ट्विटर पर फॉलो कर रहे थे, वहीं यह संख्या अब गिर कर 246 हो गई है। पहले का आँकड़ा उनके ट्विटर अकाउंट के आर्काइव्ड संस्करण से लिया गया है।

11 नवंबर को कुछ ऐसी थी राहुल गाँधी के ट्विटर अकाउंट की स्थिति
आज की तारीख में (5 दिसंबर, 2019 को) राहुल गाँधी ने कम कर दिया है लोगों को फॉलो करना

वेबसाइट socialblade.com पर राहुल गाँधी के अकाउंट की जानकारी खंगालने पर हमें पता चला कि उन्होंने 21 नवंबर, 2019 को एक ही झटके में 69 लोगों को अनफॉलो कर दिया था।


इस आकस्मिक बदलाव का कारण क्या है, इसको लेकर कयास ही लगाए जा सकते हैं।

कॉन्ग्रेस IT सेल के नेतृत्व में बदलाव

“भाजपा आईटी सेल” को अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ का ज़िम्मेदार ठहराने वाली कॉन्ग्रेस की भी खुद की आईटी सेल है, जिसकी अध्यक्षा कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री राम्या उर्फ़ दिव्या स्पंदना को मई, 2017 में बनाया गया था। लेकिन अपने दाहिने हाथ कहे जाने वाले चिराग पटनायक के खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले को दबाने और पीड़िता को परेशान करने के आरोपों के बाद राम्या ने यह पद छोड़ दिया। बाद में राहुल गाँधी ने यह ज़िम्मेदारी रोहन गुप्ता को सौंपी।

ऐसे में यह सम्भव है कि इन 69 लोगों में से कई स्पंदना के नेटवर्क के लोग रहे होंगे, जिन्हें राहुल ने केवल शिष्टाचारवश या स्पंदना के कहने पर फॉलो कर दिया होगा। अब जबकि आईटी सेल में नए निजाम रोहन गुप्ता हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि राम्या के लोगों को मिल रही सुविधाएँ, जिनमें लग रहा है कि राहुल बाबा द्वारा फॉलो किया जाना भी शामिल है, बंद होंगी।

JNU का बवाल

एक एंगल यह भी हो सकता है कि राहुल गाँधी के राजनीतिक सलाहकारों में से एक प्रमुख नाम संदीप सिंह इस कदम के पीछे हों। एक समय कॉन्ग्रेस के विरोधी रहे और जेएनयू में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काले झंडे दिखाने वाले संदीप अब राहुल के भाषण भी लिखते हैं।

एक संभावना यह भी हो सकती है कि अगर राहुल गाँधी का अकाउंट संभालने की ज़िम्मेदारी उन्हें दे दी गई होगी तो उन्होंने कॉन्ग्रेस के वामपंथी इकोसिस्टम का हिस्सा रहते हुए भी जेनएयू में फीस और अन्य नियमों को लेकर हुए बवाल पर कम्युनिस्टों से अलग लाइन लेने वाले या मौन साध लेने वाले अकाउंट्स को अनफॉलो कर दिया होगा। इस हाइपोथिसिस को बल इस बात से भी मिलता है कि जेएनयू का बवाल भी चरम पर 21 नवंबर के ही आसपास पहुँचा था।

विशुद्ध राजनीति?

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस कई तरह की उथल-पुथल से जूझ रही है। मध्य प्रदेश में जहाँ ज्योतिरादित्य सिंधिया न केवल मुख्यमंत्री कमलनाथ के समानांतर शक्ति का केंद्र बनकर उभर रहे हैं बल्कि आलाकमान को भी पार्टी छोड़ने की मौन धमकी अपने ट्विटर बायो में से कॉन्ग्रेस हटा कर दे चुके हैं, वहीं महाराष्ट्र में भी चीज़ें उनकी मर्ज़ी के हिसाब से नहीं जा रहीं हैं।

माना जा रहा है कि ‘हिंदुत्ववादी’ के बिल्ले को छोड़ने से शिव सेना के परहेज के चलते राहुल उसके साथ जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन सोनिया गाँधी, जिन्हें कमलनाथ ने कथित तौर पर मनाया था, ने अपनी मुहर इस बेमेल गठबंधन पर लगा दी थी। ऐसे में हो सकता है कि कॉन्ग्रेस के भीतर ही अपनी मनमर्ज़ी के रास्ते में खड़े होने वालों को राहुल गाँधी ने अनफॉलो कर दिया हो।

बहरहाल, चाहे इतने सारे लोगों को एक ही झटके में अनफॉलो करने की राहुल गाँधी की जो भी वजहें रहीं हों, बेहतर यही होगा कि वे अपने संसदीय क्षेत्र, अपनी पार्टी और देश के प्रति ज़िम्मेदारी को समझते हुए विपक्षी नेता के तौर पर ज़मीन पर उतरें, न कि ट्विटर पर ही सारी वीरता दिखाएँ। वायनाड, कॉन्ग्रेस, लोकतंत्र और खुद राहुल गाँधी- चारों का हित इसी में है।

लोकसभा में सो रहे थे राहुल गाँधी, भारत-चीन पर बोल रहे थे अधीर रंजन: देखें वीडियो

15274 मौतें, एंडरसन, शहरयार… सुषमा स्वराज ने जब राहुल गाँधी से कहा- अपनी ममा से पूछें डैडी ने…

166 लोगों की मौत के तुरंत बाद 800 लोगों के साथ ‘पार्टी ऑल नाइट’ में मशगूल हो गए थे राहुल गाँधी

संसद की कैंटीन में नहीं मिलेगा सस्ता खाना, MPs को मिलने वाली सब्सिडी ख़त्म: हर साल 17 करोड़ रुपए की बचत

संसद की कैंटीन में सासंदों को मिलने वाली सब्सिडी अब ख़त्म हो सकती है। इसका परिणाम यह होगा कि सासंदों को खाने पर जो सब्सिडी मिलती है, उसे अब जल्द ख़त्म कर दिया जाएगा। सीधे-सरल शब्दों में कहें तो अब संसद की कैंटीन में जो खाना उपलब्ध होगा, उसकी क़ीमत खाने की लागत के आधार पर तय होगी और सांसदों को उसका भुगतान करना होगा। हालाँकि, इस सन्दर्भ में सभी पार्टियाँ एकमत हो गई हैं, इसलिए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जल्द ही संसद की कैंटीन की नई रेट लिस्ट आएगी।

ख़बर के अनुसार, लोकसभा स्पीकर ओम बिडला के सुझाव के मद्देनज़र बिज़नेस एडवाइज़री कमिटी ने इस मामले पर चर्चा की थी। इस चर्चा के दौरान अधिकतर राजनीतिक पार्टियों ने अपनी सहमति जताई थी। अगर भविष्य में संसद की कैंटीन से सब्सिडी हटा दी गई तो इससे 17 करोड़ रुपए सालाना की बचत होगी। दरअसल, पिछली लोकसभा में कैंटीन में खाने का दाम बढ़ाया गया था और सब्सिडी का बिल कम कर दिया गया था। लेकिन, अब सब्सिडी को पूरी तरह से ख़त्म करने की तैयारी है।

india-today-parliament-canteen-rti-003-647x1684_120519024059.jpg
संसद की कैंटीन की रेट लिस्ट (सौजन्य: आजतक)

संसद की कैंटीन में मिलने वाली सब्सिडी कई बार विवादों का हिस्सा रही है। बीते दिनों संसद की कैंटीन की रेट लिस्ट भी वायरल हुई थी। सब्सिडी के तहत देश के सांसदों के संसद की कैंटीन में खाना काफ़ी कम दाम पर मिलता था।

दरअसल, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में साल 2016 में कैंटीन में मिलने वाले भोजन के दाम बढ़ाए गए थे। इसके बाद अब सब्सिडी ख़त्म करने का फ़ैसला लिया गया है। साल 2016 से अब तक शाकाहारी थाली के दाम 30 रुपए है, जबकि 2016 से पहले 18 रुपए थे। वहीं, नॉन-वेज थाली अब 60 रुपए में उपलब्ध है, जबकि पहले यह 33 रुपए में उपलब्ध थी। थ्री कोर्स मील का रेट अब 90 रुपए है, जबकि पहले इसका रेट 61 रुपए था।

सूचना के अधिकार के तहत दिए गए ब्योरे के अनुसार, वर्ष 2012-13 से वर्ष 2016-17 तक संसद कैंटीनों को कुल 73,85,62,474 रुपए बतौर सब्सिडी दिए गए। वहीं, अगर पिछले पाँच वर्षों की बात करें तो पता चला है कि वर्ष 2012-13 मे सांसदों के सस्ते भोजन पर 12,52,01867 रुपए, वर्ष 2013-14 में 14,09,69082 रुपए सब्सिडी के तौर पर दिए गए। ठीक इसी तरह, 2014-15 में 15,85,46612 रुपए, वर्ष 2015-16 में 15,97,91259 रुपए और वर्ष 2016-17 में सांसदों को कम क़ीमत पर खाना उपलब्ध कराने पर 15,40,53365 रुपए की सब्सिडी दी गई।

शेहला को परेश रावल ने दिखाया आईना, कहा- तुम्हें इंटरनेट की पड़ी है, कश्मीरी पंडित सालों से बेघर हैं

पार्ट टाइम प्रदर्शनकारी, ऑड दिनों में मुस्लिम और ईवन दिनों में वामपंथन शेहला रशीद ने एक बार फिर कश्मीर पर खटराग छेड़ने की कोशिश की है। उन्हें ट्वीट कर दुनिया को याद दिलाया है कि ‘भारत’ ने कश्मीर में 4 महीनों से इंटरनेट बंद कर रखा है। उनके ट्वीट की भाषा ऐसी है जैसे ‘भारत’ उनका देश न हो, बावजूद इसके नागरिकों की सभी सुविधाएँ लेने में वे एक कदम आज तक पीछे नहीं रहीं। चाहे वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो या जेएनयू में मुफ़्त की रोटी। साथ ही बताया है कि 4 महीना ‘साल का एक चौथाई’ हिस्सा होता है।

गौरतलब है कि 5 अगस्त, 2019 को केंद्र की मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष दर्जा समाप्त कर दिया था। साथ ही, सुरक्षा कारणों से घाटी की इलेक्ट्रॉनिक संचार व्यवस्था को अस्थायी रूप से बंद कर दिया था।

शायद, शेहला रशीद की गणित भी उनकी राजनीतिक सोच की तरह ही ओछी है। इसलिए उन्हें ध्यान नहीं रहा कि 4 महीने साल का चौथाई नहीं, बल्कि एक-तिहाई हिस्सा होते हैं। इसके अलावा शेहला रशीद ने यह नहीं बताया कि बीच में सरकार ने लैंडलाइन टेलीफोन सेवाएँ, लैंडलाइन के ज़रिए आने वाला ब्रॉडबैंड इंटरनेट, पोस्टपेड मोबाइल आदि बहाल किए थे। लेकिन उसके बदले में उसी इंटरनेट के इस्तेमाल से कश्मीरियों ने घाटी में ऐसा आतंक मचाया, ऐसी हिंसा की कि सरकार को मजबूरन इंटरनेट सेवाएँ फिर से बंद कर देनी पड़ीं।

इस ट्वीट पर शेहला को आईना दिखाने वालों में अभिनेता और पूर्व भाजपा सांसद परेश रावल भी हैं। उन्होंने लिखा, “4 महीने के इंटरनेट की आपको पड़ी है? पंडितों के पास सालों से रहने के लिए घर नहीं है।”

रावल का इशारा उन कश्मीरी पंडितों की ओर था, जो कश्मीर में हिन्दुओं का आखिरी समुदाय थे। 1989-90 के बीच 5 से 7 लाख कश्मीरी पंडितों को मुस्लिमों ने हत्या, अपहरण, बलात्कार, मतांतरण की धमकी के इस्तेमाल से घाटी रातों रात छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। उस दिन से आज तक अधिसंख्य कश्मीरी पंडित दिल्ली, जम्मू, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, यूपी, उत्तराखण्ड समेत देश के अलग-अलग इलाकों में बेघर होकर रिफ्यूजी कैम्पों और कॉलोनियों में रह रहे हैं। इनमें से अधिकांश के हालात का औसत देश के सबसे आर्थिक और सामजिक रूप से विपन्न और पिछड़े हुए समाजों से भी गया-गुजरा है।

उल्लेखनीय है कि कश्मीर पर अफवाह फैलाने में शेहला रशीद पुरानी उस्ताद रही हैं। अगस्त में ट्वीट कर उन्होंने जम्मू-कश्मीर की हालत बेहद खराब होने का दावा करते हुए सशस्त्र बलों पर कश्मीरियों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। सेना ने इसे खारिज करते हुए आरोपों को बेबुनियाद बताया था। साथ ही कहा था कि असामाजिक तत्व और संगठन लोगों को भड़काने के लिए फर्जी खबरें फैला रहे हैं।

शेहला रशीद के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज, सेना पर लगाए थे झूठे आरोप

सुश्री शेहला जी, राजनीति तो आपने घंटा नहीं छोड़ी है और किसी को फर्क भी घंटा नहीं पड़ता

डियर शेहला डोंट वरी! कहना, कंडोम वाले लौंडों को चिढ़ा रही थी