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दिल्ली सरकार के अस्पतालों में होगा सबका इलाज: LG ने बदला केजरीवाल सरकार का फैसला

दिल्ली सरकार के अस्पतालों में बाहर के लोग भी इलाज करवा सकेंगे। उपराज्यपाल (LG) अनिल बैजल ने केजरीवाल सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें केवल दिल्ली के लोगों के इलाज की बात कही गई थी।

नए आदेशों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति दिल्ली के अस्पतालों में इलाज करा सकता है। रविवार को ही मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में बाहर के मरीजों का इलाज नहीं किया जाएगा।

जानकारी के मुताबिक उपराज्यपाल ने यह फैसला डीडीएमए चेयरपर्सन होने की हैसियत से लिया है। फैसले के साथ ही उपराज्यपाल ने इससे संबंधित सभी विभागों और प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिया है।

यह फैसला दिल्ली से बाहर के दूसरे राज्यों में रहने वाले उन लोगों के लिए राहत भरी खबर है जो केजरीवाल के एक आदेश के बाद से अपने या फिर अपने सगे-संबंधियों के कोरोना इलाज के लिए एक के बाद दूसरे अस्पतालों के चक्कर लगा रहे थे।

रविवार को सीएम अरविंद केजरीवाल की सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए साफ कर दिया था कि अब राज्य सरकार के अस्पतालों में बाहरी मरीजों का इलाज नहीं होगा। दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में अब सिर्फ दिल्ली के लोगों का ही इलाज होगा। दिल्ली में रह रहे दूसरे राज्यों के लोग या दूसरे राज्यों के वे लोग जो यहाँ आकर इलाज करवाना चाहते हैं, वो सिर्फ केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र वाले अस्पतालों (जैसे AIIMS) में यह सुविधा उठा सकते हैं।

मुख्यमंत्री ने बताया था कि दिल्ली कैबिनेट ने फैसला लिया है कि राज्य सरकार के अस्पताल अब दिल्ली के लोगों के लिए होंगे। केंद्र सरकार के अस्पताल में कोई भी इलाज करा सकता है। दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार दोनों के अस्पतालों में 10-10 हजार बेड हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सीएम केजरीवाल ने जानकारी देते हुए बताया था कि मार्च के महीने तक दिल्ली के सारे अस्पताल पूरे देश के लोगों के लिए खुले रहे। किसी भी समय हमारे दिल्ली के अस्पतालों में 60 से 70 फ़ीसदी लोग दिल्ली से बाहर के थे।

नक्शा विवाद के बीच नेपाल में शिक्षा की रोशनी फैलाएगा भारत, 7 जिलों में 56 स्कूलों का करेगा पुनर्निर्माण

नेपाल और भारत​ के बीच शिक्षा क्षेत्र में एक अहम समझौता हुआ है। नेपाल के सात जिलों में भारत स्कूलों का पुनर्निर्माण करेगा। समझौते पर हस्ताक्षर नेपाल के नए नक्शे पर जारी विवाद के बीच हुआ है।

नेपाल के भारतीय मिशन ने समझौते पर सोमवार (08 जून, 2020) को हस्ताक्षर किए गए। समझौते के मुताबिक नेपाल के सात जिलों में कुल 56 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों का पुनर्निर्माण किया जाएगा। यह समझौता ऐसे समय में आगे बढ़ा है कि जब भारत और नेपाल के बीच एक नक्शे को लेकर विवाद जारी है।

नेपाल ने 18 मई को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिमिपियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। नेपाल ने अपने नक़्शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया था। इसके बाद 22 मई को संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया था।

इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल को भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत दी थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, “हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वो ऐसे बनावटी कार्टोग्राफिक प्रकाशित करने से बचें। साथ ही भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें।”

ये इलाके भारत की सीमा में आते हैं। वहीं सोशल मीडिया पर लोग यह आशंका भी व्यक्त करते नजर आ रहे हैं कि हो सकता है नेपाल यह सब चीन के इशारे पर कर रहा हो। दरअसल, 8 मई को भारत ने उत्तराखंड राज्य के लिपुलेख दर्रे से कैलाश मानसरोवर के लिए सड़क का उद्घाटन किया था, जिसे लेकर नेपाल ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था।

BJP को सपोर्ट किया तो मिल रही गालियाँ और धमकियाँ, NIFT की छात्रा ने बताया सब कुछ

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फैशन एंड टेक्नोलॉजी में पढ़ने वाली छात्रा अक्षरा ने ट्विटर के जरिए उनके साथ किए जा रहे मानसिक उत्पीड़न, धमकियों और गालियों को शेयर किया है। उन्होंने बताया कि ये सब उन्हें सोशल मीडिया पर बने कुछ अपमानजनक एकाउंट्स द्वारा भेजा जा रहा है।

साथ ही उन्होंने दावा किया कि यह सब उनकी राजनीतिक विचारधारा और बीजेपी को सपोर्ट करने की वजह से हो रहा है।

अपने ट्विटर अकाउंट से एक नोट को शेयर करते हुए, अक्षरा ने कहा कि उन्हें कई महीनों से धमकियों और गालियों से भरे मैसेज मिल रहे हैं। उन्होंने आगे शेयर किया है कि सोशल मीडिया पर उनके पर्सनल इन्फॉर्मेशन और फोन नंबर लीक हो जाने के बाद अलग-अलग नम्बरों से फोन कॉल भी आ रहे हैं।

अक्षरा ने कहा है कि उनके साथ कई महीनों से यह बदतमीजी और उत्पीड़न जारी है। उन्होंने कहा, “मैं पहले से ही मानसिक बीमारियों से पीड़ित थी और अब जिस तरह कुछ महीनों से मुझे टारगेट करके परेशान किया जा रहा है, उसने मेरी दिक्कतों को और बदतर बना दिया है।”

उन्होंने आगे कहा कि उत्पीड़न और धमकी के बारे में कई शिकायतें की हैं लेकिन फिर भी यह बंद नहीं हुआ है। उनका कहना है कि वामपंथियों को अपने विचारों के साथ बोलने की आज़ादी है, लेकिन फिर उन्हीं लोगों द्वारा उन्हें और उनके कुछ दोस्तों को राजनीतिक विचारों की वजह से परेशान किया जाता है।

वहीं अंशुमन नाम के एक दूसरे व्यक्ति ने शेयर किया कि कैसे @/fuckbjp के नाम से एक इंस्टाग्राम हैंडल द्वारा कई लोगों को डराया और धमकाया जा रहा है। यह हैंडल ऐसे लोगों को टारगेट करता है जो अपनी राजनीतिक विचारों में भाजपा का समर्थन करते हैं।

अंशुमान ने यह भी खुलासा किया कि उस हैंडल से जुड़े लोगों ने ही अक्षरा की निजी जानकारी को ट्विटर पर लीक किया था। उस व्यक्ति (@/fuckbjp) ने एक रैंडम ट्वीट्स में जवाब देते हुए कई लोगों को टैग किया था। ताकि अक्षरा को एक साथ कई लोगों द्वारा डराया और धमकाया जा सके।

सोशल मीडिया पर अक्षरा की दुर्दशा देखते हुए, एक लेखक और कॉलमनिस्ट शेफाली वैद्या ने इस मुद्दे पर संज्ञान लेने और लड़की की मदद करने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा को टैग किया था।

शेफाली वैद्या के ट्वीट के बाद, एनएसडब्लू की चेयरपर्सन रेखा शर्मा ने जवाब दिया है कि वह इस मामले पर ध्यान दे रही हैं। साथ यह भी कहा है कि एनसीडब्ल्यू इस मुद्दे को आज ही एड्रेस करेगा।

उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ सालों से आम लोगों को सिर्फ उनके राजनीतिक झुकाव और उनके विचारों को लेकर टारगेट कर परेशान किया जा रहा है।

हाल ही में, वामपंथियों, पाकिस्तानियों और इस्लामी कट्टरपंथियों के समूह द्वारा खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय हिंदुओं को उनकी राजनीतिक या वैचारिक राय के आधार पर लक्षित किया जा रहा था। जहाँ उन्हें उन देशों के सख्त निंदा कानूनों की चपेट में इस्लामोफोबिक’ के रूप में चित्रित किया गया।

इस दौर में जहाँ सोशल और डिजिटल मीडिया कई लोगों के प्रोफ़ेशनल जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। उस समय में डॉक्सिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न कर लोगों को टारगेट करना अक्सर पीड़ितों के लिए काफ़ी तकलीफदेह साबित होता है।

जिस लड़की ने किया था ‘बॉयज लॉकर रूम’ का खुलासा, उसे मिल रही धमकियाँ: शिकायत के बाद FIR दर्ज

साउथ दिल्ली की जिस लड़की ने ‘बॉयज लॉकर रूम’ विवाद का खुलासा किया था, उसे धमकियाँ मिल रही है। लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि जब से उसने इस पूरे मामले का पर्दाफाश किया, तब से उसे सोशल मीडिया पर धमकियाँ मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है।

दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने लड़की की शिकायत को आधार बनाते हुए इस मामले में एक और एफआईआर दर्ज कर लिया है। उक्त लड़की ने मई में ‘बॉयज लॉकर रूम’ नामक ग्रुप का खुलासा किया था और कई स्क्रीनशॉट्स शेयर किए थे।

दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने इंस्टाग्राम ग्रुप बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) पर अश्लील चैट करने के मामले में 15 साल के नाबालिग लड़के को पकड़ा था। नाबालिग के अलावा इस ग्रुप में 20 लड़कों के शामिल होने की बात पता चली थी। पुलिस ने सोशल मीडिया पर रजिस्टर फोन नंबर से लड़के के घर का पता लगाया था।

नाबालिग पर आरोप है कि उसने भी इंस्टाग्राम ग्रुप में तस्वीर शेयर की, जिसे देखते हुए पुलिस ने उसके घर जाकर पकड़ा था। लड़की ने कुछ स्क्रीनशॉट्स शेयर कर इस ग्रुप का खुलासा करते हुए लिखा था,

“दक्षिण दिल्ली के 17-18 साल की उम्र के लड़कों का एक ग्रुप है, जिसका नाम ‘बॉयज लॉकर रूम’ (Boys Locker Room/Bois Locker Room) है, जहाँ कम उम्र की लड़कियों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर आपत्तिजनक बनाया जा रहा था। मेरे स्कूल के दो लड़के इसका हिस्सा हैं।”

मई के पहले हफ्ते में ही गुरुग्राम की DLF फेज 5 के कार्ल्ट्न एस्टेट (DLF Carlton Estate) सोसायटी में 17 साल के एक नाबालिग ने 11वीं मंजिल से कूदकर कल आत्महत्या कर ली थी। इस घटना को भी ‘बॉयज लॉकर रूम’ से जोड़ कर देखा गया था। अगर इस ग्रुप की बात करें तो इसका खुलासा करते हुए लड़की ने आरोप लगाया था कि इस ग्रुप के सदस्य गैंगरेप की योजना बना रहे थे और उस पर चर्चा कर रहे थे।

कोरोना के खात्मे के लिए ब्राह्मणों ने लड़की की जीभ काट शिव मंदिर में चढ़ाई: सोशल मीडिया में वायरल दावे का सच

सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों ने एक लड़की की जीभ काट डाली और फिर उसे शिव मंदिर में चढ़ा दिया। ट्विटर यूजर ‘माइग्रेंट कामरान’ ने ये दावा किया और उसके बाद सभी ने इसे हाथोंहाथ लिया। इसे ब्राह्मणवाद और हिन्दुओं के अत्याचार के रूप में फैलाया जाने लगा। साथ ही एक लड़की की जीभ कटी हुई तस्वीर भी शेयर की जाने लगी। ये तस्वीर विचलित करने वाली भी है।

वायरल दावे में कहा जा रहा है कि लड़की आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। ये भी कहा जा रहा है कि ब्राह्मणों ने कोरोना वायरस संक्रमण के प्रकोप से बचने के लिए ये क्रूर हरकत की। लड़की के नाबालिग होने की बात कहते हुए लोगों से पूछा गया कि क्या वो ब्राह्मणों के इस कृत्य का समर्थन करते हैं? एक यूजर ने तस्वीर शेयर करते हुए लिखा:

“ये पाखंड और अंधविश्वास की सीमा है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में कोरोना वायरस संक्रमण के प्रकोप से बचाव हेतु ब्राह्मणों ने 8वीं कक्षा की एक नाबालिग लड़की की जीभ काट कर उसे शिवजी के मंदिर में चढ़ा दिया। लेकिन, न तो मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और न ही किसी सेलिब्रेटी ने इसके खिलाफ मुँह खोला।”

कामरान जैसे कितनों ने इस वायरल दावे को आगे बढ़ाया

इसके बाद ‘टाइम्स फैक्ट चेक’ ने इसका फैक्ट-चेक किया, जिसमें पाया गया कि उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के एक गाँव की रहने वाली इस लड़की ने स्वेच्छा ही गाँव को कोरोना से बचाने के लिए अपनी जीभ काटकर शिवजी के मंदिर में चढ़ा दी थी। ‘नवभारत टाइम्स’ की ख़बर के अनुसार, ये ख़बर मई 23, 2020 को ‘लाइव हिंदुस्तान’ की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी। इसमें ब्राह्मणों वाली कोई बात नहीं थी, इसलिए वायरल दावा झूठा है।

हमने भी इस ख़बर को खँगाला तो बाँदा वाली घटना तो कई न्यूज़ साइट्स पर मिली लेकिन इमेज का रिवर्स सर्च करने के बावजूद वायरल दावे के अनुरूप कुछ नहीं मिला। हाँ, हमने कीवर्ड्स को गूगल पर डाला तो बाँदा वाली ख़बर ज़रूर कुछ मीडिया वेबसाइट्स पर मिली। ‘लाइव हिंदुस्तान‘ ने अपनी ख़बर में लिखा है:

बदौसा थाना क्षेत्र के भदावल गाँव में रहने वाली गायत्री (14) शाम को बागै नदी किनारे स्थित शिव मंदिर पहुँची। पूजा के बाद गायत्री ने ब्लेड से अपनी जीभ काट ली। इसके बाद वहीं बेहोश होकर वहीं गिर गई। सूचना पर परिजन मौके पर पहुँचे और पुलिस को सूचना दी। लमेहटा चौकी से पहुँची पुलिस ने उसे जिला अस्पताल पहुँचाया। किशोरी के पिता सौखीलाल ने बताया कि वह शिव मंदिर में रोज पूजा के लिए जाती रही है।

इस खबर का अन्य मीडिया संस्थानों ने भी फैक्ट-चेक किया और सभी ने बाँदा वाली ख़बर को ही छेड़छाड़ कर पेश किए जाने की बात कही। दरअसल, ब्राह्मणों को बदनाम करने के लिए ऐसा पहले भी किया जाता रहा है। अक्सर फकीरों ने कोई अपराध किया हो तो उसे तांत्रिक बता कर हिन्दू साधु की फोटो दिखाई जाती है। साथ ही मौलवियों के अपराधों को ढकने के लिए भी ‘Godman’ लिखकर हिन्दू संतों की तस्वीर ख़बर में चला दी जाती है।

दिल्ली में बाहरी का इलाज नहीं होगा: काश कि ये पोस्ट रवीश लिखते… नहीं लिखा तो हमने लिख दिया

कल तक अखंड भारत के नक्शे के सामने खड़े हो भारत माता और राष्ट्रवाद के नाम पर वोट माँग प्राधिकरण में आने वाले और हिंदुस्तान में नई तरह की राजनीति के मसीहा अरविंद केजरीवाल ने साफ कह दिया है कि दिल्ली में रहने वाले किसी भी ऐसे व्यक्ति का इलाज दिल्ली सरकार नहीं कराएगी, जिसके पास दिल्लीवासी होने के कागजात नहीं हैं।

इसके साथ ही दिल्ली सरकार ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की एक सूची जारी की है, जिनको दिखाए बिना कोई भी मरीज सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज नहीं करा पाएगा। खुद को हरियाणा की पैदाइश और गाजियाबाद के निवासी बताने वाले केजरीवाल किस आधार पर दिल्ली के बाहर के लोगों के लिए इतनी नफरत से भरे हैं, ये बिलकुल ही समझ से परे है।

लगता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री स्मृति विलोप के शिकार हो अदालत की पिछली फटकार को भूल चुके हैं, जो उन्हें कथित तौर पर दिल्लीवालों के साथ भेदभाव करने के लिए पड़ी थी। अगर उन्होंने याद रखते हुए यह सब किया है तो वे अपनी क्षुद्र राजनीति के लिए दिल्लीवासियों का इस्तेमाल कर अदालत और संविधान की भावना के खिलाफ जाने का अपराध कर रहे हैं।

बात क्षेत्र और जाति आधारित राजनीति की हो तो खुद को दबे-कुचलों का मसीहा कहलाने वाले रवीश कुमार का जिक्र यहाँ बहुत ही जरूरी हो जाता है। वही रवीश कुमार, जो हर शाम प्राइम टाइम में आकर कहते हैं कि लोगों को अब सिर्फ उनसे उम्मीद रह गई है। सरकार और न्यायपलिका तो बस नई दुल्हन की तरह मुँह दिखाने के लिए रह गई है।

बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा आदि राज्य की जनता उन्हें ढूँढ रही है, उम्मीद लगाए बैठी है कि किसी दिन प्राइम टाइम में उनकी व्यथा भी दिखाई जाएगी। देखने वाली बात यह होगी कि हर दिन अपने पास सैकड़ों आम आदमी के व्हाट्सएप मैसेज पहुँचने का दावा करने वाले रवीश कुमार के पास इस समस्या से संबंधित मरीजों का संदेश पहुँच पाता है या नहीं?

जिस मुख्यमंत्री ने कोरोना की बीमारी के बाद अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए केंद्र से 5000 करोड़ रुपए का पैकेज माँगा, वही आज बाहर के बीमारों के लिए इलाज नहीं करने की बात कर रहे हैं।

दिल्ली के रामलीला मैदान में संविधान और जनता के अधिकारों के समक्ष ‘तीसरी कसम’ खाने वाले केजरीवाल यह भूल गए कि जनता ने उन्हें जनादेश क्यों दिया था। अरविंद केजरीवाल ने खुद को कॉन्ग्रेस के विकल्प के रूप में पेश किया था। इन्होंने अन्ना हजारे की पहचान की टोपी में सिर घुसाने के बाद वाम की जमीन पर अपनी खास आम आदमी वाली छवि की फसल काटी। मजदूरों को ठेकेदारों से मुक्ति दिलाने का वादा करने वाले केजरीवाल खुद ही ठेकेदार वाली भाषा बोल कर भेदभाव की लठैती पर उतर आए हैं।

दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के लिए नवउदारवादी राजनीति के खिलाफ जाकर बिजली, पानी और परिवहन के मुद्दे पर पूरी दुनिया की वाहवाही बटोरी। जनता को शासक से मुक्त कर आम आदमी को सत्ता में हिस्सेदार बनाने का सपना दिखाया। कहा था कि हम शासक नहीं होंगे, जनता को सशक्त करेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री अब जनता को ही संकीर्ण सोच में बाँट रहे हैं। महज दस-बीस साल पहले उत्तर प्रदेश, बिहार या हरियाणा से आकर दिल्ली का मतदाता बना शख्स बाहर से आकर मुख्यमंत्री बने केजरीवाल को बताएगा कि दिल्ली में बाहरी लोगों का इलाज होना चाहिए या नहीं।

नेता की भूमिका जनता का नेतृत्व करना, उसे नया रास्ता दिखाने की होती है। जनता को सोच, विचार, चेतना से लैस कर राजनीतिक दखल करवाने की होती है। लेकिन इसके उलट केजरीवाल जनता के मन को मैला कर रहे हैं। क्या स्वास्थ्य सेवा का मतलब सिर्फ अपने घर के लोगों का इलाज करना होता है? नेता की तरह जनता की सोच भी इतनी क्षुद्र हो जाएगी तो क्या होगा? कारखाना चलाने के लिए दूसरे राज्यों से मजदूर चाहिए, लेकिन उन्हीं राज्यों से बीमार आएँगे तो उन्हें इलाज नहीं देंगे।

सवाल यहाँ पर यह भी उठता है कि दिल्ली के लोगों को ही समय पर इलाज नहीं मिल रहा है तो दूसरे राज्यों के मरीजों को क्या इलाज मुहैया करा पाएँगे मुख्यमंत्री केजरीवाल। केजरीवाल सरकार लगातार हॉस्पिटल में इलाज और बेड के उपलब्ध होने का दावा करते हैं, मगर कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ मरीजों को अस्पताल नहीं मिला, इलाज नहीं मिला, जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई। ऐसे एक दो नहीं कई मामले हैं, मगर इस पर केजरीवाल सरकार के पास कोई जवाब नहीं है।

दिल्ली सरकार की हेल्पलाइन नंबर पर भी मरीजों को जवाब नहीं दिया जाता। दिल्ली अस्पताल की व्यवस्था का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बीते दिनों दो व्यक्ति को LNJP अस्पताल के बाहर से ठेले पर शव ले जाते हुए दिखाई दिए। लोकनायक अस्पताल में शवों की बदतर स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और तीनों नगर निगमों को नोटिस भी जारी किया था।

दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन ने भी कोरोना से मौतों के आँकड़े छुपाने का आरोप लगाया। कोरोना वायरस की वजह से हुई मौत को लेकर अस्पताल द्वारा दिए जा रहे आँकड़े और दिल्ली सरकार के हेल्थ बुलेटिन में काफी अंतर पाया गया। स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक दिल्ली में कुल 28936 कोरोना संक्रमित मामले हैं और मौत की दर इतनी तेजी से बढ़ रही है कि सरकार को नए कब्रिस्तान-शमशान घाट की तलाश करनी पड़ रही है। साथ ही वर्तमान शमशान घाटों-कब्रिस्तानों की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। पहले जहाँ श्मशान घाटों में 45-50 शवों के अंतिम संस्कार की क्षमता थी, उसे बढ़ाकर निगमों ने 100 प्रतिदिन कर दिया है।

केजरीवाल की राष्ट्रीयता की भावना संकीर्णतावाद के इस निम्नतम स्तर पर है कि वो प्रतिक्रियावादी बन जाने के लिए मजबूर करते हैं। केजरीवाल जनता के बीच वैमनस्य पैदा कर रहे हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के साथ दिल्ली का एक सहज रिश्ता है, जिसमें वह जहर घोल रहे हैं। वैमनस्यता का यह विषाणु कोरोना से भी ज्यादा घातक है।

पुष्यमित्र शुंग: सनातन संस्कृति का ध्वजवाहक, जिसका स्वर्णकाल वामपंथी प्रोपेगेंडा की भेंट चढ़ गया

इतिहास कभी मिथ्या नहीं हो सकता। इतिहास तो स्वयं एक अटल सत्य है जो काल चक्र के किसी पहलू में अंकित हो चुका है। किन्तु इतिहास को मिथ्या बनाया जाता है। इतिहास के तथ्य मर्दन का कार्य करते हैं वामपंथी इतिहासकार और शिक्षाविद।

भारत की सदैव से यह समस्या रही है कि यहाँ इतिहास के व्याख्याकारों में सभी प्रभावी विद्वान वामपंथी थे। इन्होंने इतिहास को ऐसे प्रदर्शित करने का प्रयास किया, जिससे पूरा भारतीय इतिहास जातिवाद और सामाजिक कुरीतियों से परिपूर्ण प्रतीत हो।

वास्तव में अंग्रेजों के समय से ही भारतीय इतिहास को तोड़ने मरोड़ने का कार्य संस्थागत रूप से प्रारम्भ हो चुका था, जो स्वतंत्रता के पश्चात भी अनवरत चलता रहा। मुगल काल में भी भारतवर्ष के महान इतिहास को कलंकित करने का कार्य हुआ। किन्तु मुगल इतने योग्य नहीं थे जो भारतीय सनातन का महात्म्य समझ पाएँ। उनके इस प्रयास को नमन करते हुए आधुनिक भारत के इतिहासकारों ने इन क्रूर मुगलों को इतिहास में एक श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है, जिसे हम आज भी ढो रहे हैं।

वामपंथी इतिहासकारों एवं बुद्धिजीवियों की एक साझा समस्या रही कि इन्हें ब्राह्मण से अथाह घृणा थी। ब्राह्मण शब्द सुनकर ही ये बुद्धिजीवी ऐसे विचलित हो जाते हैं, जैसे नेवले को देखकर सर्प। ब्राह्मण घृणा का ही परिणाम है- भारतवर्ष के एक महान शासक का चरित्रहरण। एक ऐसा शासक जिसने अखंड भारत के स्वप्न को पूर्ण करने के लिए न जाने कितने प्रयास किए। भारतवर्ष की अखंडता की सुरक्षा के लिए कितने ही युद्ध किए।

भारतवर्ष के इस महान शासक को इतिहास में मुगलों के दसवें हिस्से के बराबर भी स्थान नहीं दिया गया। उसका अपराध इतना ही था कि वह एक ब्राह्मण था और उसने भारतवर्ष में क्षीण हो रहे सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का स्वप्न देखा।

यह शासक था पुष्यमित्र शुंग जिसने शुंग वंश की स्थापना की थी। इस लेख में हम उन मिथ्या तथ्यों और सूचनाओं पर विचार करेंगे जिनके आधार पर पुष्यमित्र को नरसंहारक और कट्टर कहा गया।

मौर्य वंश की दुर्बलता, भारतवर्ष पर बढ़ता संकट और पुष्यमित्र का उदय

जिस अखंड भारत की कल्पना आचार्य चाणक्य ने की थी, उनकी मृत्यु के बाद वह परिकल्पना धुॅंधली होने लगी। मौर्य वंश के शासक वैदिक धर्म के प्रति उदासीन होने लगे। चन्द्रगुप्त मौर्य, जैन धर्म का अनुयायी हो गया था। चन्द्रगुप्त के पुत्र बिन्दुसार ने स्वयं आजीविक सम्प्रदाय से अपनी दीक्षा ली। इसके बाद बिन्दुसार का पुत्र अशोक राजगद्दी पर विराजमान हुआ। भयंकर हिंसा करके अपने साम्राज्य का विस्तार करने वाला सम्राट अशोक अहिंसक हो गया। उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। इसके बाद अशोक का पूरा जीवनकाल बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में व्यतीत हुआ।

जब पूरा विश्व सीमा विस्तार के संकट से जूझ रहा था तब अशोक की अहिंसा ने भारतवर्ष की वीरता पर गहरा आघात किया। अशोक ने 20 वर्षों तक एक बौद्ध सम्राट के रूप में शासन किया। इसी कारण पूरे भारतवर्ष का शासनतंत्र निर्बलता की भेंट चढ़ गया।

मौर्य वंश के शासकों का दूसरे पंथों की ओर झुकाव गलत नहीं था। यह उनका निजी विषय था, किन्तु शासनतंत्र की सहायता से भारतवर्ष के सनातन धर्म को क्षीण करने का कार्य करना गलत था। भारतवर्ष के वैदिक अस्तित्व पर बौद्ध पंथ की शिक्षाओं को थोपना गलत था। भारतवर्ष अहिंसा की चपेट में आता जा रहा था। भारतीय सनातन धर्म से विरक्ति की यह प्रक्रिया मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ तक चलती रही।

बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित में भी बृहद्रथ प्रतिज्ञादुर्बल कहा गया है क्योंकि राजगद्दी पर बैठते समय एक राजा अपने साम्राज्य की सुरक्षा का जो वचन देता है उसे पूरा करने में बृहद्रथ पूर्णतः असफल रहा।

मौर्य साम्राज्य निरंतर दुर्बल होता जा रहा था और बृहद्रथ के शासनकाल में यह दुर्बलता अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। अधिकांश मगध साम्राज्य बौद्ध अनुयायी हो चुका था।

इन सब के बीच यह खबर आई कि ग्रीक शासक भारतवर्ष पर आक्रमण करने की योजना बना रहे हैं। पुष्यमित्र शुंग जो कि बृहद्रथ का सेनानायक था, इस बात से व्यथित था कि एक ओर शत्रु आक्रमण के लिए आगे बढ़ा चला आ रहा है और दूसरी ओर उसका सम्राट किसी भी प्रकार की कोई सक्रियता नहीं दिखा रहा है।

पुष्यमित्र ने अपने स्तर पर प्रयास प्रारम्भ किया। उसे अपने गुप्तचरों से शीघ्र ही यह सूचना मिली कि ग्रीक सैनिक बौद्ध भिक्षुओं के वेश में मठों में छुपे हुए हैं और कुछ बौद्ध धर्मगुरु भी उनका सहयोग कर रहे हैं। इस सूचना से व्यथित होकर पुष्यमित्र ने बौद्ध मठों की तलाशी लेने की अनुमति माँगी, किन्तु बृहद्रथ इसके लिए तैयार नहीं हुआ।

फिर भी पुष्यमित्र ने अपने स्तर पर कार्यवाही की। इस कार्यवाही के दौरान पुष्यमित्र और उसके सैनिकों की मुठभेड़ मठों में छिपे शत्रुओं के सैनिकों से हुई। कई शत्रु सैनिक मृत्यु के घाट उतार दिए गए। बृहद्रथ, पुष्यमित्र की इस कार्यवाही से रुष्ट हो गया। वह पुष्यमित्र से भिड़ गया।

एक ओर शत्रु भारत विजय का कुस्वप्न लिए बढ़ रहा था और यहाँ भारतवर्ष का सम्राट अपनी सीमाओं की सुरक्षा में लगे सेनानायक से संघर्ष में लगा हुआ है। अंततः सम्राट और सेनानायक के संघर्ष में सम्राट मृत्यु को प्राप्त होता है। सेना पुष्यमित्र के प्रति अनुरक्त थी। पुष्यमित्र शुंग को राजा घोषित कर दिया गया।

राजा बनने के तुरंत बाद पुष्यमित्र शुंग ने अपंग साम्राज्य को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए तमाम सुधार कार्य किए। उसने भारतवर्ष की सीमाओं की ओर बढ़ रहे ग्रीक आक्रांताओं को खदेड़ दिया और भारतवर्ष से ग्रीक सेना का पूरी तरह से अंत कर दिया।

इस प्रकार पुष्यमित्र शुंग ने पुनः एक नए अखंड भारत की नींव रखी। एक ऐसे अखंड भारतवर्ष की जहाँ वैदिक सनातन धर्म अपनी मूल महानता की ओर लौटने लगा। बौद्ध पंथ की ओर जा चुके हिन्दू पुनः सनातन धर्म की शरण में लौट आए।

पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में वैदिक शिक्षा अपने चरम पर पहुँच गई। उसने राष्ट्र निर्माण के तत्वों में सनातन धर्म के महत्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। ऐसा कहा जाता है कि पुष्यमित्र के शासनकाल में मगध साम्राज्य के लगभग सभी निवासियों तक वैदिक शिक्षा की पहुँच थी। इसी का परिणाम था कि भारतवर्ष पुनः अपनी सनातन महानता को प्राप्त करने लगा था।

मौर्य साम्राज्य के शिथिल हो जाने के कारण केंद्रीय नियंत्रण में भारी कमी आ गई, जिससे मगध साम्राज्य के कई हिस्सों में सामन्तीकरण की प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही थी। पुष्यमित्र ने शासक बनने के बाद शासन-व्यवस्था की इस दुर्बलता को दुरुस्त करने का कार्य किया गया।

पुष्यमित्र के शासनकाल में राज्यपाल और सह-शासक नियुक्त करने की व्यवस्था प्रारम्भ हुई। शासन की सबसे सूक्ष्म इकाई के रूप में ग्रामों का विकास किया गया। इस प्रकार पुष्यमित्र ने न केवल सनातन धर्म की स्थापना की अपितु शासन पद्धति को सुव्यवस्थित करने का कार्य भी भली-भाँति किया। यही कारण था कि पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार की दक्षिणतम सीमा तक और पश्चिम में सियालकोट से लेकर पूर्व में मगध तक विस्तृत था।

पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण अवश्य था, किन्तु कट्टर नहीं

एक ब्राह्मण शासक होने का यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि वह शासक कट्टर है। यदि पुष्यमित्र कट्टर प्रवृत्ति का होता तब स्वयं उसकी सेना उसके विरुद्ध हो जाती, जिसका कहीं भी कोई उल्लेख नहीं है।

पुष्यमित्र शुंग के विषय में एक मार्क्सवादी इतिहासकार गार्गी चक्रवर्ती ने एजेंडा बनाया कि वह कट्टरपंथी ब्राह्मण था। यह सर्वविदित है कि वामपंथी और मार्क्सवादी भारतीय वर्ण-व्यवस्था और विशेषकर ब्राह्मणों के भयंकर विरोधी हैं। ऐसे में इनसे यह आशा नहीं की जा सकती है कि ये किसी ब्राह्मण शासक का निष्पक्ष चरित्र चित्रण करेंगे। गार्गी किस प्रकार की इतिहासकार हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि उन्हें दिव्यावदान को आधार बनाकर पुष्यमित्र को कट्टर बताया है।

अब बात करते हैं दिव्यावदान की। दिव्यावदान का अर्थ है, दिव्य आख्यान। आख्यान को अंग्रेजी में नैरेटिव कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि दिव्यावदान एक नैरेटिव है, जो बौद्धों के महान चरित्र-चित्रण का एक माध्यम था।

बौद्ध पंथ में अवदान साहित्य का अर्थ ही है, किसी भी व्यक्ति का कथाओं के माध्यम से महान चरित्र-चित्रण। अब यह विचारणीय है कि यदि किसी नैरेटिव के माध्यम से बौद्धों का चरित्र-चित्रण सकारात्मक रूप में किया जाएगा तो नकारात्मक कौन होगा? निश्चित रूप से वही व्यक्ति जिसका बौद्धों के साथ संघर्ष हुआ है। वह व्यक्ति है पुष्यमित्र शुंग। नैरेटिव का अर्थ ही होता है किसी व्यक्ति या संगठन के पक्ष में अथवा विपक्ष में विचारों का निर्माण करना। पुष्यमित्र का बौद्धों के साथ संघर्ष कितना सत्य है, इस विषय में आगे चर्चा की जा रही है।

पुष्यमित्र शुंग न तो बौद्ध विरोधी था और न ही बौद्धों का हत्यारा

कल्पना कीजिए कि कोई पंथ जिसे दशकों तक शासन का भरपूर समर्थन मिलता रहा हो। जिसके अनुयायियों में एक महान साम्राज्य के शासक रहे हों। वह पंथ लगातार फल-फूल रहा हो और एक राष्ट्र के कोने-कोने में अपने अनुयायी बनाता जा रहा हो। इन सब के बीच एक ऐसा शासक आ जाए जो पंथ-परिवर्तन का विरोधी हो और ऐसे कार्यों के लिए शासन की सहायता बंद कर दे। ऐसे में उस शासक और पंथ के मध्य संघर्ष होना स्वाभाविक है। यही सत्य है पुष्यमित्र और बौद्धों के संघर्ष का।

अशोक के शासनकाल से ही बौद्धों को राज्य का समर्थन प्राप्त होता रहा और इस समर्थन की सहायता से बौद्ध पूरे भारतवर्ष में लगातार बढ़ते चले गए। बृहद्रथ के शासनकाल तक यह पंथ-परिवर्तन चलता रहा, किन्तु पुष्यमित्र शुंग के राजगद्दी में बैठने के बाद बौद्धों के इस विस्तार में अंकुश लग गया। इसी प्रतिबन्ध से बौखलाए बौद्धों और पुष्यमित्र के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।

पुष्यमित्र पर जिन बौद्ध भिक्षुओं की हत्या का आरोप लगाया जाता है, वो कोई और नहीं अपितु भिक्षुओं का वेश धारण किए हुए ग्रीक सैनिक थे, जिनके विषय में ऊपर लेख में बताया गया है।

अब इसकी तुलना दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों से कीजिए जहाँ दंगे स्वयं हिन्दुओं के विरोध में हुए। दंगे करने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी थे, जो अब पुलिस जाँच में बाहर आ रहे हैं। लेकिन पूरे स्थानीय मीडिया में दिल्ली के दंगों को सीएए विरोध के नाम पर दबाने का प्रयास किया गया।

यहाँ तक की वामपंथी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के द्वारा दिल्ली दंगों को भाजपा सरकार की सहायता से हिन्दुओं के द्वारा मजहब विशेष के दमन का नाम दे दिया गया। कहने का तात्पर्य यही है कि सनातन धर्म और हिन्दुओं के विरुद्ध तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना पहले भी होता था और आज भी हो रहा है।

इसके बाद पुष्यमित्र पर आरोप लगाया जाता है कि उसने बौद्ध स्मारकों को नष्ट करने का कार्य किया।

इस आरोप के विरुद्ध भी तर्क हैं। सबसे पहले तो यह सभी को ज्ञात है कि साँची और भरहुत जैसे बौद्ध स्तूपों का अधिकांश हिस्सा पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में निर्मित हुआ है। यदि पुष्यमित्र बौद्धों का इतना ही विरोधी होता तो आज आप साँची में बौद्ध स्तूप नहीं, अपितु भगवान विष्णु का मंदिर देख रहे होते।

एक शासक जिसने 36 वर्षों तक शासन किया और जो एक महान साम्राज्य के साथ एक महान सेना का भी स्वामी था, वह भारतवर्ष से बौद्धों की एक-एक पहचान को नष्ट कर सकता था।

पुष्यमित्र के शासनकाल की तुलना मुगलों के शासनकाल से कीजिए, जिन्होंने भारतवर्ष में हिन्दुओं के पूजा-स्थल नष्ट कर दिए। उन्होंने हिन्दुओं के सबसे पूज्य धर्म स्थलों को अपना निशाना बनाया। जिनमें अयोध्या, काशी और मथुरा प्रमुख हैं। मुगलों ने इन सनातन केंद्रों को न केवल नष्ट किया, अपितु वहाँ मस्जिदों का निर्माण भी करवाया।

इसके विपरीत पुष्यमित्र जैसा कट्टर ब्राह्मण कोई मंदिर बनाने की तो बात छोड़िए एक स्तूप भी नष्ट न कर सका। भारत में इतिहास की व्याख्या करने वाले ऐसे ही निष्पक्ष रहे हैं, जिन्हें हजारों मंदिर तोड़ने वाले मुगल महान लगते हैं और एक ब्राह्मण शासक कट्टर जिसने मात्र अपने सनातन धर्म का पालन किया।

पुष्यमित्र पर बौद्धों के धर्म परिवर्तन का आरोप भी लगाया जाता है। किन्तु यह सर्वथा भ्रामक है। मौर्यों के शासनकाल की बात करें तो बौद्धों ने स्वयं भारी संख्या में हिन्दुओं को बौद्ध पंथ अपनाने के लिए प्रेरित किया। शासनकाल के संरक्षण से मगध साम्राज्य का एक बड़ा हिस्सा बौद्ध हो चुका था।

पुष्यमित्र के राजगद्दी में बैठने के बाद वो हिन्दू जो बौद्ध हो गए थे, सनातन धारा में लौटने लगे थे। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब मतावलम्बियों में अपने धर्म के प्रति विश्वास सुदृढ़ होता है, तब ऐसी स्थिति में ये लोग अपने धर्म की ओर वापस आते हैं।

वर्तमान परिस्थितयों में आरएसएस और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ के ऊपर भी ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। ये पूर्णतः निराधार हैं क्योंकि हिन्दू कभी भी धर्म परिवर्तन का कार्य नहीं कर सकता। किन्तु जो हिन्दू सनातन छोड़कर दूसरे पंथ में सम्मिलित होता है, वह एक न एक दिन वापस अवश्य आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सनातन से अधिक स्वतंत्रता और विचारशीलता किसी और पंथ में नहीं है। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में भी यही हुआ।

पुष्यमित्र के कट्टर न होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं, वामपंथियों की लाडली इतिहासकार रोमिला थापर। रोमिला जी ने स्वयं अपनी पुस्तक अशोक एवं मौर्यों का पतन (Asoka and the Decline of the Mauryas) में स्पष्ट रूप से यह कहा है कि पुष्यमित्र द्वारा बौद्धों के नरसंहार का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

अपनी पुस्तक “Popular Controversies in World History” में स्टीवन एल डेनवर भी यही संभावना व्यक्त करते हैं कि मौर्य साम्राज्य में मिल रही सहायता बंद होने के बाद बौद्ध पुष्यमित्र विरोधी हो गए थे।

एटिने लमोत्ते (Etienne Lamotte) जो कि बौद्ध इतिहास के एक बड़े ज्ञाता थे उन्होंने ऊपर बताई गई स्टीवन की पुस्तक में कहा है कि महान बौद्ध विचारक और इतिहासकार भी इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं कि पुष्यमित्र बौद्ध विरोधी था अथवा उसने किसी भी प्रकार से बौद्धों का नरसंहार किया।

इन सभी तथ्यों और तर्कों से यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पुष्यमित्र शुंग न तो कट्टर था और न ही नरसंहारक। पुष्यमित्र के साथ जो अन्याय इतिहासकारों ने किया वह नया और अनापेक्षित नहीं है। भारत में यही होता आया है।

आज जब सूचना-प्रौद्योगिकी अपने चरम पर पहुँच चुकी है, उस समय भी हिन्दू विरोधी नैरेटिव बनाने के लिए कपिल मिश्रा को दिल्ली दंगों का और नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों का आरोपी बनाया जा चुका है।

विचार कीजिए उस प्राचीन इतिहास का जब सूचना तंत्र आज के समान आधुनिक नहीं थे, किस प्रकार एक महान शासक के विरुद्ध नैरेटिव बनाया गया होगा। उस नैरेटिव को आधुनिक इतिहासकारों ने हाथोंहाथ हाइलाइट किया और बताया कि हिन्दू सम्राट कितना क्रूर हो सकता है।

भारतवर्ष के इतिहास में जिसने भी सनातन धर्म का पालन किया उसे या तो इतिहास में कलंकित कर दिया गया अथवा हाशिए पर छोड़ दिया गया। भारतीय इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों को टीपू सुल्तान से बड़ा प्रेम है जो वास्तव में क्रूर था और जिसने हिन्दुओं का जीवन नर्क के समान बना दिया था। यह टीपू सुल्तान आज के बुद्धिजीवियों और सेक्युलर राजनेताओं का नायक है, लेकिन पुष्यमित्र शुंग कट्टर ब्राह्मण और हत्यारा।

पुष्यमित्र का अपराध ही यही है कि वह एक महान हिन्दू सम्राट था। उसमें भी ब्राह्मण और सबसे बड़ी बात कि वह सनातन धर्म का एक निष्ठावान अनुयायी था। अब यह आपको तय करना है कि आप किसे अपना नायक स्वीकार करते हैं। उन मुगलों को जिन्होंने हमारे मंदिर तोड़े, हमारी महिलाओं के साथ बलात्कार किया, भयंकर लूट-पाट मचाई अथवा उस पुष्यमित्र को जिसने क्षीण हो रहे धर्म को पुनर्जीवित किया।

क्या आप उन इस्लामिक कट्टरपंथी शासकों को महान मानेंगे, जिन्होंने भारतवर्ष के महान सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्रों को जलाकर नष्ट कर दिया अथवा उस शुंग वंश के संस्थापक को जिसके शासनकाल में न केवल हिन्दू धर्म अपितु अन्य पंथों के साहित्य का विकास हुआ। वामपंथी आपको यह नहीं बताएँगे कि अफगानिस्तान को बौद्ध विहारों से मुक्त किसने कर दिया। लेकिन वे आपको पुष्यमित्र द्वारा बौद्धों के नरसंहार की झूठी कथा सदैव सुनाते रहेंगे।

आज भारत जाग रहा है और अपना वास्तविक इतिहास जान रहा है। आशा है कि भारत के नागरिक अपने उस शासक को उचित सम्मान देंगे, जिसके कारण भारतवर्ष का सनातन धर्म सुरक्षित रहा और आज भी अपनी चरम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। पुष्यमित्र शुंग इतिहास में, हिन्दुओं के आदर्शों में अमर रहेगा।

छत्तीसगढ़: घर से निकलने पर थाना प्रभारी ने नाबालिग को बेरहमी से पीटा, बचाने आई माँ को भी दिया धक्का, Video

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के उरला थाना के प्रभारी नितिन उपाध्याय ने सड़क पर लोगों को निकला देखकर उन्हें बेरहमी से पीट दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विभागीय जाँच के आदेश दिए हैं।

वायरल वीडियो में हम देख सकते हैं कि थाना प्रभारी उपाध्याय हाथ में झोला थामे एक युवक को पीट रहे हैं और बचाने आई उसकी माँ को धक्का दे रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह वीडियो रविवार (जून 7, 2020) सुबह रिकॉर्ड किया गया था। हालाँकि, थाना प्रभारी नितिन उपाध्याय इससे पहले भी कुछ राहगीरों को वीडियोज में पीटते नजर आए थे। इन विडियोज में देखा गया था कि टीआई ने सड़क से गुजर रहे लोगों को रोक-रोक कर बेरहमी से पीटा।

इसी क्रम में वह नाबालिग लड़के और उसकी माँ के पास पहुँचे। वीडियो में देखा गया कि पहले टीआई ने माँ-बेटे से कुछ बात की। फिर, हाथ में पकड़ी छड़ी से बेटे को मारने लगे। इस दौरान लड़के की माँ बीच में आईं। लेकिन, टीआई ने उनका ख्याल भी नहीं किया।

महिला को धक्का देते हुए थाना प्रभारी ने लड़के को मारना जारी रखा। खास बात ये है कि जिस समय नितिन उपाध्याय ने इस वाकये को अंजाम दिया, उस वक्त वह वर्दी में भी नहीं थे।

उल्लेखनीय है कि अभी रायपुर शहर के बीरगाँव इलाके को कंटेनमेंट जोन घोषित किया गया है। जिसके कारण बीरगाँव पूरी तरह से सील है। लोगों के आने जाने पर भी यहाँ प्रतिबंध हैं। जरूरत के सामान भी यहाँ प्रशासन द्वारा पहुँचाए जा रहे हैं।

मौजूदा सूचना के मुताबिक, इस लाठीबाजी में कई लोगों को काफी चोटें आई। मामला प्रकाश में आने के बाद सीएम बघेल ने इसपर संज्ञान लिया और टीआई को तत्काल छुट्टी पर भेजा। इसके अलावा उनके ख़िलाफ़ जाँच के आदेश भी दिए गए हैं। कई लोग ट्विटर पर इस घटना को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं।

लोगों का पूछना है कि आखिर यह एक अपराधिक मामला है। अगर, आरोपित सरकारी कर्मचारी भी है तो भी इसमें विभागीय जाँच का क्या काम है? वहीं, कुछ लोगों का ये भी कहना है कि ऐसे अधिकारी को फौरन नौकरी से निकालना चाहिए।

तृणमूल के गुंडों ने BJP विधायक सब्यसाची दत्ता की सरेआम पिटाई की, तमाशबीन बन देखती रही बंगाल पुलिस

पश्चिम बंगाल में एक बार फिर से तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा नेताओं के साथ बदसलूकी करने का मामला सामने आ रहा है। सोमवार (जून 8, 2020) को पश्चिम बंगाल भाजपा के नेता सब्यसाची दत्ता के साथ बदसलूकी की गई।

उनके साथ टीएमसी के गुंडों ने धक्का-मुक्की की। सब्यसाची दत्ता वहाँ भाजपा के कुछ चोटिल कार्यकर्ताओं को देखने पहुँचे थे। वीडियो से पता चलता है कि ममता बनर्जी की पार्टी के लोगों ने उनकी पिटाई भी की

सब्यसाची राजारहाट न्यू टाउन विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वो 2015-19 तक विधाननगर के पहले मेयर रहे हैं और इलाक़े में एक जाना-पहचाना नाम हैं। भाजपा में शामिल होने से पहले वो तृणमूल कॉन्ग्रेस में ही थे

राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने सब्यसाची दत्ता की पिटाई की निंदा करते हुए कहा कि ममता बनर्जी के ‘जंगल राज’ में लोकतंत्र की स्थिति ये है कि टीएमसी के गुंडों ने पुलिस के सामने ये सब किया लेकिन पुलिस शांत रही। भाजपा के अन्य कार्यकर्ताओं को भी दौड़ाया गया।

सब्यसाची ने तृणमूल नेताओं निताई दत्ता और कृष्णपाद दत्ता पर मारपीट का आरोप लगाया है। उन्होंने जानकारी दी कि इस घटना को लेकर पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज करा दी गई है।

निताई को पश्चिम बंगाल के मंत्री सुहित बोस का करीबी बताया जाता है। बोस ममता बनर्जी सरकार में फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज विभाग में मंत्री हैं। अभी तक टीएमसी की तरफ से इस मामले में कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है।

पश्चिम बंगाल के भाजपा कार्यकर्ताओं ने वीडियो शेयर किया है, जिसमें सब्यसाची दत्ता को तृणमूल के गुंडे खदेड़ते और पिटाई करते दिख रहे हैं। साथ ही लोगों ने पूछा कि जब एक विधायक और पूर्व मेयर के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है तो बंगाल में आम भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ क्या होता होगा, ये सोचने वाली बात है। पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं और संघ के स्वयंसेवकों की हत्या होती रही है। टीएमसी के गुंडों पर अक्सर आरोप लगते हैं।

‘हथिनी ने गलती से विस्फोटक खा लिया’ – शुरुआती जाँच का यह एंगल खतरनाक और बहुत ही असंवेदनशील

केरल के पलक्कड़ से कुछ दिन पहले एक गर्भवती हथिनी की मौत का मामला सामने आया था। जहाँ उसने विस्फोटक से भरा अनानास खा लिया था। उसके मौत की खबर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद देश भर में इसको लेकर बवाल मच गया था।

इस फ़ोटो में आप देख सकते हैं कि किस तरह मुँह में विस्फोटक के फटने की वजह से असहनीय दर्द को बर्दाश्त करते हुए पल-पल मरती हुई हथिनी शांतिपूर्वक पानी में खड़ी है। इस दृश्य को देखकर क्या कहा जा सकता है? क्या हथिनी को जानबूझकर टॉर्चर करने के लिए ये किया गया या फिर इन सब के पीछे कोई और मकसद था?

इस मामले में नकदी फसलों और मसालों की खेती करने वाले एक इस्टेट के कर्मचारी पी विल्सन को गिरफ्तार किया गया है। वहीं दो अन्य संदिग्ध अपराधी इस्टेट के मालिक अब्दुल करीम और उसका बेटा रियासुद्दीन फिलहाल फरार हैं। पी विल्सन इन्हीं के यहाँ काम करता था।

कथित तौर पर जाँच अधिकारियों के पूछे जाने पर आरोपित ने कहा कि उन्होंने जंगली सूअरों को डराने के लिए पटाखे से भरे फलों का एक जाल बनाया था, जो अक्सर उनके खेतों को नष्ट कर देते हैं। जाहिर तौर पर, खेतों में घुसने और फसलों को नष्ट करने वाले जंगली सूअरों को “डराने” के लिए केरल में फलों के अंदर विस्फोटक या विस्फोटक पदार्थों का इस्तेमाल करना उनके लिए आम बात है।

हालाँकि, आरोपित द्वारा अपने बचाव में कही गई बात सुनने में ही थोड़ी अजीब है, क्योंकि एक जंगली सूअर या किसी भी जानवर को फलों में विस्फोटक लगाकर डराने का कोई तुक ही नहीं बनता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से जानवर को किसी तरह फल खिलाना है, जिसका परिणाम बहुत ही घातक होगा, जैसा कि हाथी के मामले में हुआ।

सरकार, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा जारी स्पष्टीकरण किसी तरह से एक संवेदनशील इंसान को आश्वस्त नहीं कर सकता है। यह स्पष्टीकरण प्रकाश जावड़ेकर की अध्यक्षता में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है। संभवत: पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी किया गया यह बयान केरल सरकार द्वारा की जा रही जाँच के आधार पर है।

पर्यावरण मंत्रालय ने अपने बयान में पहले इस बात को स्वीकार किया था कि जंगली सूअर, जो पेड़ो को नुकसान पहुँचाते हैं, उन्हें फँसाने के लिए विस्फोटक से भरे फल लगाना ‘गैरकानूनी’ है। हालाँकि, इस बात पर भी जोर दिया कि हाथी ने ‘गलती से फल खा लिया होगा’।

एक तरह से यह कह देना कि ‘हाथी ने गलती से फल खा लिया होगा’; ‘हाथी को नहीं बताया गया था कि उसे खाने से पहले फल की गुणवत्ता की जाँच कर लेनी चाहिए थी’ या फिर ‘निर्देश पुस्तिका को पढ़ना चाहिए था’। हालाँकि यहाँ सवाल बहुत बड़ा है कि ऐसे बयान जारी करते वक़्त पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जरूरी बातों को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है।

न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के अनुसार हाथी को आखिरी बार खेत में देखा गया था और जो आरोपित है, वह भी उसी खेत में काम करता था। दो अपराधी, जो इस वक़्त फरार है, वो उस खेत के मालिक हैं। इससे यह साबित होता है कि जंगली सूअरों को प्रताड़ित करने और उन्हें खेतों से दूर भगाने के लिए फलों में भरे हुए विस्फोटक का उपयोग करने का तरीका केरल में लंबे समय से स्थापित गैरकानूनी तरीका है।

अगर जंगली सूअरों की हत्या करने के लिए पहले से ही खेत में फलों से भरे विस्फोटक लगाए गए थे और चूँकि हाथी खेत में था, तो उसने वहाँ लगाए गए बहुत से विस्फोटक भरे फलों का सेवन किया होगा।

गौरतलब है चूँकि विस्फोटक में किसी भी प्रकार का मशीन नहीं लगा था कि यह केवल जंगली सूअर के खाने पर ही विस्फोट होगा, तो फिर इसका सेवन कोई भी दूसरा जानवर कर सकता था जिससे उसके मुँह में यह विस्फोटक फट जाता। और यही उस वक़्त गर्भवती हथिनी के साथ भी हुआ।

इस प्रकार यह कहना कि हथिनी ने गलती से जंगली सुअरों के लिए बनाया गया विस्फोटक खा लिया, तर्कसंगत नहीं है। इस तरह की बातें सिर्फ़ हमसे कुछ जंगली धारणाएँ बनाने के लिए गढ़ी या कही जाती है।

पहली बात, खेत के मालिक और वहाँ काम करने वाले ने क्या वहाँ से हथिनी के खाने के बाद विस्फोटक को हटा दिया होगा? जैसे हाथी के साथ ये हुआ, वैसे ही अगर खेत में सुअर होता तब भी श्रमिकों और मालिकों द्वारा केवल उनकी खेती को रौंदने की संभवना को लेकर उस जानवर की जिंदगी को बर्बाद करने का मकसद था?

इसलिए हाथी द्वारा गलती से विस्फोटक का सेवन करने जैसा तर्क किसी भी तरह उन लोगों का बचाव नहीं करता है। विस्फोटक खेत में आने वाले किसी भी जानवर के लिए था और उस वक़्त गर्भवती हाथी की किस्मत उसके साथ नहीं था। मीडिया में यह मामला फैलने के बाद लोगों हुए आक्रोश के कारण इसे केवल प्रसिद्धि मिली है।

जिस बयान में यह कहा गया कि हथिनी ने गलती से विस्फोटक खा लिया था, उसका अनिवार्य रूप से मतलब है कि उसे जानबूझकर खिलाने वाली अफवाह या खबर दरअसल झूठी है।

हथिनी को टारगेट करके विस्फोटक नहीं खिलाया गया था, उसे कोई और भी खा सकता था। किसी ने भी उसे जबरदस्ती विस्फोटक नहीं खिलाया है, इस मामले में जानबूझकर कर खिलाने वाला कहने का मतलब बिल्कुल अलग है।

केरल में खेत के मालिकों द्वारा क्रूर तरीके से गर्भवती हथिनी के विस्फोटक खाने की वजह से हुए मौत को लेकर देश भर में लोग आक्रोशित हैं। हालाँकि पर्यावरण मंत्रालय स्वीकार कर रहा है कि यह तरीका गैरकानूनी है, लेकिन इस बात पर भी अधिक जोर नहीं दिया गया कि हथिनी द्वारा गलती से विस्फोटक का सेवन कैसे किया गया।

इसमें यह भी कहा गया कि इन क्रूर तरीकों को लागू करने वालों को किसी भी तरह से छूट नहीं देनी चाहिए लेकिन कानूनी सीमा के अंतर्गत ही इन्हें सजा दी जाएगी।

यह कहना कि हथिनी ने गलती से विस्फोटक खा लिया, जो किसी दूसरे जानवर के लिए बना था। यह बात इस ओर संकेत करती है कि इस तरह की क्रूर घटना वन जीवन को हानिकारक रूप में प्रभावित करेगी। इस तरह की क्रूर प्रथा को न ही राज्य सरकार और न ही पर्यावरण मंत्रालय को सामान्य रूप से देखा जाना चाहिए।