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यौन उत्पीड़न करने वाले पादरी के गले में क्रॉस घुसेड़कर पीड़ित 19 वर्षीय किशोर ने मार डाला

चर्च और यौन शोषण की घटनाएँ आए दिन चर्चा में रहती हैं और अब फ्रांसीसी मीडिया में एक रिपॉर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें अलेक्जेंडर वी के रूप में पहचाने जाने वाले एक 19 वर्षीय किशोर पर यह आरोप है कि उसने एक पादरी द्वारा उसके ऊपर यौन शोषण का प्रयास किए जाने के बाद उसने चर्च के पादरी की गला दबाकर हत्या कर दी थी। यह बताया जा रहा है कि पीड़ित किशोर और उसके पिता दोनों का फादर रोजर माटासोली द्वारा यौन शोषण किया गया था, इससे आहत एलेक्जेंडर ने पीडोफाइल पादरी के गले के में क्रॉस घुसेड़कर उसकी हत्या कर दी।

पीड़ित के वकील ने फ्रांसीसी मीडिया को बताया, “अब हम जानते हैं कि पीड़ित का पिता भी पादरी का शिकार था। हम यह भी जानते हैं कि इस पिता ने अपने बच्चों की रक्षा करने की कोशिश की और फिर, तलाक के बाद, वह माटासोली (Matassoli) के चंगुल में वापस आ गया। एलेक्जेंडर ने उन तथ्यों का उल्लेख किया है जो उसे बेहद परेशान करते थे। जैसे एलेक्जेंडर से नंगे होकर पादरी के घर की सफाई करने की बात की गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एलेक्जेंडर को गिरफ्तार कर लिया गया है और हत्या, पादरी को टॉर्चर करने और गिरफ्तारी का विरोध करने के आरोप में हिरासत में लिया गया है। फ्रांसीसी मीडिया के अनुसार, किशोर ने कहा है कि उसे पादरी की हत्या का कोई अफ़सोस नहीं है।

90 वर्षीय पादरी की 7 नवंबर 2019 को उसके अपने घर में यातनाएं दी गईं और उनकी हत्या कर दी गई थी। जब पादरी की डेड बॉडी मिली, तो उसके शरीर पर टॉर्चर जैसे सिर, पेट और चेहरे पर चोट के निशान थे। ज्ञात हो, 2009 में, यौन शोषण के आरोपों से घिरे पादरी को उसके कर्तव्य से हटा दिया गया था, हालाँकि,इसके बावजूद माटासोली 2018 तक बिशप के पेरोल पर रहे।

पादरी अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले चर्च की आतंरिक जाँच का विषय था। उसकी मृत्यु के बाद जाँच बंद कर दी गई। रिपोर्ट के अनुसार, रोम को अभी पादरी से जुड़ी कोई भी जाँच रिपोर्ट नहीं भेजी गई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जुलाई 2018 से मृत्यु तक तीन लोगों ने पादरी द्वारा यौन शोषण किए जाने के बारे में जानकारी के साथ स्थानीय बिशप कार्यालय से संपर्क किया था।

एक स्थानीय पत्र के अनुसार, सरकारी वकील के कार्यालय ने 2018 में दो शिकायतों की रिपोर्ट की जिसमें 10 से 14 वर्ष की आयु के दो युवा लड़कों का यौन उत्पीड़न फादर माटासोली द्वारा किया गया था। हालाँकि, इस पर मामला आगे नहीं बढ़ा था क्योंकि फ्रांसीसी कानून के तहत शिकायतें एक निश्चित समय सीमा में नहीं की गई थीं, क्योंकि एक घटना 1962 की थी, और दूसरा 1976 और 1980 के बीच का।

पादरी की हत्या के बाद, एक स्थानीय महिला ने उस डरावने पल की भी बात की, जो कि ईसाई पादरी ने उसके भाइयों के साथ किया था।

“कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें (1967 में) सेंट-आंद्रे में स्थानांतरित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने क्लरमॉन्ट (Clermont) में अपने दूसरे पैरिश में बच्चों से यौन दुर्व्यवहार किया था।” वह कहती है कि उसके दोनों भाइयों का पादरी द्वारा यौन शोषण किया गया था। उस महिला को उस दुर्व्यवहार का पता तब लगा जब उसके छोटे भाई, पॉल ने उसे बताया कि उसने पुजारी के साथ स्नान किया था। महिला के बड़े भाई ने भी पादरी के उसके साथ यौन शोषण की कहानी बताई।

ऐसे कई और यौन शोषण की घटनाएँ हैं जो चर्च में पादरियों द्वारा अंजाम दी गई हैं। भारत में केरल का मामला तो चल ही रहा है। कहा जाता है पूरे विश्व में ऐसे अनगिनत मामले हैं जहाँ पादरियों ने न सिर्फ बच्चों बल्कि नन को भी नहीं बख्शा है।

‘ऐसी कार्रवाई की जाएगी कि दंगाइयों की 7 पुश्तें गुंडई करने से डरेंगी, कोई बख्शा नहीं जाएगा’

उत्तर प्रदेश में दंगाइयों के ख़िलाफ़ योगी आदित्यनाथ की सरकार कड़ी कार्रवाई कर रही है। जहाँ एक तरफ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों की संपत्ति को नीलाम कर भरपाई की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ पत्थरबाजों को सीसीटीवी के माध्यम से चिह्नित कर उन्हें गिरफ़्तार किया जा रहा है। यूपी पुलिस भी दंगाइयों को लेकर सख्त है। मेरठ के एसपी ने ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाने वालों को जम कर फटकार लगाई। वहीं वाराणसी में एक पुलिस अधिकारी ने बिना अनुमति उपद्रव करने वालों को कड़ी डाँट पिलाई। यूपी में सीएए के ख़िलाफ़ हुई हिंसा में 20 लोग मारे जा चुके हैं।

वहीं योगी सरकार में मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला ने कहा है कि दंगाइयों और गुंडों के ख़िलाफ़ ऐसी कार्रवाई की जाएगी कि उनकी सात पुश्तें याद रखेंगी। विपक्ष लगातार दंगाइयों पर कार्रवाई करने को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व यूपी पुलिस पर निशाना साध रहा है। ग्रामीण विकास व संसदीय कार्य राज्यमंत्री आनंद स्वरूप ने गाजीपुर में ये बातें कहीं। उन्होंने न सिर्फ़ अपनी सरकार की पीठ थपथपाई बल्कि जनता को भी आश्वासन दिया कि हिंसा करने वाले बख्शे नहीं जाएँगे। मंत्री शुक्ला ने कहा:

दंगाइयों पर पुलिसिया कार्रवाई का मैं पूर्ण समर्थन करता हूँ। जो भी व्यक्ति संविधान के खिलाफ जाकर हिंसात्मक रवैया अपनाएगा, उसके ख़िलाफ़ सख्त से सख्त कार्रवाई करने में प्रदेश सरकार पूरी तरह सक्षम है। मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दंगाइयों पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए बधाई देता हूँ। आगे भी दंगाइयों पर ऐसी कार्रवाइयाँ होनी हैं कि उनकी सात पुश्तें याद रखेंगी। उनकी सात पुश्तें गुंडई और दंगा करने से डरेंगी।”

मंत्री ने इस दौरान कॉन्ग्रेस को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष देश में अशांति फैलाना चाहता है। उन्होंने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वो वही भाषा बोल रहे हैं, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान करते आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सभी नेता प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए जा रहे बड़े-बड़े कार्यों से चिढ़ते हैं और इसीलिए जनता को भड़काने में लगे हुए हैं।

आनंद स्वरूप शुक्ला को योगी मंत्रिमंडल के विस्तार के क्रम में अगस्त 2018 में राज्यमंत्री का पद दिया गया था। इसके बाद बलिया पहुँचे शुक्ला काफ़ी भावुक हो गए थे। सतीश चंद्र पीजी कॉलेज में पढ़ने के दौरान छात्र संघ के अध्यक्ष रहे शुक्ला ने मंत्री बनने के बाद कॉलेज के प्रवेश द्वार की मिट्टी को माथे से लगाया था और अपनी माँ के पैर छू कर आशीर्वाद लिया थे। इसकी चर्चा पूरे यूपी में हुई थी।

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‘बाबरी मस्जिद का मलबा हमें दिया जाए’ – नई माँग पर हिंदू पक्ष ने कहा – ‘भाईचारे के लिए ले लीजिए’

राम जन्मभूमि मामले पर मुस्लिम पक्ष कानूनी लड़ाई हार चुकी है। लेकिन अब वो एक नई माँग के साथ याचिका दायर करने वाले हैं। बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी को बाबरी मस्जिद का मलबा और उससे जुड़े हुए तमाम सामान चाहिए। इस संबंध में वो सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर करेंगे।

लखनऊ में बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की एक मीटिंग हुई। इस मीटिंग में ही जॉइंट सेक्रेटरी हाजी महबूब ने बाबरी मस्जिद से जुड़े मलबे व अन्य सामानों को पाक बताते हुए वापस लेने की माँग की। इस संबंध में एक अलग याचिका दायर करने का निर्णय इसी के बाद लिया गया।

हाजी महबूब के अनुसार राम जन्म गर्भगृह में जो बाबरी मस्जिद का मलबा है, वो पाक है। इसलिए मुस्लिम समाज उसे वापस लेकर अपने तरीके से खर्च करेगा या उसे नष्ट करेगा। उन्होंने बताया कि शरीयत के मुताबिक किसी भी मस्जिद की सामग्री किसी दूसरी मस्जिद या भवन में नहीं लगाई जा सकती है। साथ ही मस्जिद की मिट्टी हो या मलबा, इसका अनादर नहीं किया जा सकता है।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की मीटिंग में इस बात पर चर्चा हुई कि बाबरी मस्जिद के मलबे के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कोई स्पष्ट आदेश नहीं है। ऐसे में मलबे के हटाने के समय उसका अनादर किया जा सकता है। इससे बचने के लिए नई याचिका दायर करनी जरूरी है।

ऑल इंडिया मिलि काउंसिल (All-India Milli Council) के जेनरल सेक्रटरी खालिक अहमद खान ने इस संबंध में टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि हम तीन शताब्दी से इस मस्जिद में नमाज पढ़ते आ रहे थे, इसलिए इसके मलवे पर हम अपने हक के लिए याचिका दायर करेंगे।” जब उनसे पूछा गया कि क्या वो इस मलवे को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए 5 एकड़ जमीन पर ले जाएँगे तो उन्होंने जमीन लेने से ही मना करते हुए कहा, “हम सरकार से जमीन नहीं लेंगे। जमीन का बंदोबस्त कैसे करना है, यह हम ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड की मीटिंग में फैसला लेंगे।”

मुस्लिम पक्ष के मलवे संबंधी याचिका को लेकर रामलला विराजमान के पक्षकार त्रिलोकी नाथ पांडे ने कहा, “मुस्लिम समाज मलबा ले जा सकता है, हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। यह हमारी ओर से भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द्र का प्रतीक होगा।”

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2 महीने में दूसरी बार अजित पवार ने ली उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ, गठबंधन के छोटे दलों में नाराजगी

महाराष्ट्र की राजनीति में चले लंबे नाटक के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे और बारामती से विधायक अजित पवार ने दो महीने के भीतर दूसरी बार आज उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वहीं, पूर्व सीएम अशोक चव्हाण और कॉन्ग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार भी मंत्री बने। इसके अलावा बता दें कि मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को भी बतौर अहम पद मिलने की पूरी उम्मीद है।

इससे पहले 28 नवंबर को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के साथ शिवसेना, कॉन्ग्रेस और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस के 2-2 मंत्रियों ने शपथ ली थी।

बता दें कि कैबिनेट में नए मंत्रियों के शामिल होने के बाद विभागों में बदलाव हो सकता है। फिलहाल, अब तक गृह और उद्योग विभाग शिवसेना के पास हैं। वित्त और ग्रामीण विकास विभाग NCP को दिए गए हैं। जबकि कॉन्ग्रेस के पास राजस्व, पीडब्ल्यूडी और ऊर्जा मंत्रालय हैं।

उल्लेखनीय है कि अभी तक मंत्रिमंडल विस्तार में छोटे दलों को जगह मिलने की बात सामने नहीं आई है। जिससे गठबंधन में शामिल छोटे दलों में नाराजगी है। महा विकास अघाड़ी में स्वाभिमानी शेतकरी संगठन, शेकाप, समाजवादी पार्टी, सीपीएम, बहुजन विकास अघाड़ी, प्रहार और जोगेंद्र कवाडे की रिपल्बिकन पार्टी शामिल है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल विस्तार से पहले छोटे दलों के साथ कोई बातचीत नहीं की गई। इससे यह दल खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। हालाँकि, पहले खबर थी कि शेकाप के जयंत पाटिल, प्रहार के बच्चू कडू और जोगेंद्र कवाडे मंत्रिमंडल में शामिल हो सकते हैं। इनमें सपा के अबू आसिम आजमी का नाम भी शामिल था।

3000 दलित नहीं अपनाएँगे इस्लाम, सब भगवान राम के भक्त: गाँव वालों ने खोली फर्जी संगठन की पोल, करेंगे FIR

बीते दिनों तमिलनाडु के कोयंबटूर में मेत्तुपलायम नगर निगम में दीवार गिरने से हुई 17 लोगों की मौत के बाद खबर आई कि वहाँ 3000 से ज्यादा दलित इस्लाम अपनाने वाले हैं। खबरों में बताया गया कि दलित समुदाय के संगठन तमिल पुलिगल की एक राज्य स्तरीय बैठक के बाद यह निर्णय लिया। लेकिन, अब इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट के अनुसार कोयंबटूर में दलितों ने खबरों में आए इस दावे को खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में वहाँ के स्थानीय लोगों ने स्पष्ट बताया है कि मजहब विशेष के किसी समूह ने उनसे संपर्क नहीं किया, और वे केवल हिंदू देवी-देवताओं के भक्त हैं, जिनमें खासकर उनके आराध्य भगवान राम हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, तमिल पुलिगल काटची नामक संगठन के महासचिव इलवेनिल ने रविवार को उनसे बातचीत की थी। जिसमें उन्होंने कथित धर्म परिवर्तन को दलितों के साथ होते भेदभाव के ख़िलाफ़ एक जनआंदोलन बताया था। उन्होंने कहा कि जाति की ‘दीवार गिराने’ के लिए अब उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन, जब इस ‘इस्लाम स्वीकारने’ के संबंध में गाँव के लोगों से बात की गई तो उन्होंने संगठन से बिलकुल हटकर जवाब दिया।

इसी क्रम में नांदुरा आदि द्रविड़ गाँव के 70 वर्षीय एम सुब्रमणियम ने बताया कि उनके पास इस्लाम कबूल करने की कोई वजह नहीं हैं। उन्होंने कहा, “हर धर्म अच्छा है। इस्लाम उनके लिए अच्छा है, हिदूत्व हमारे लिए। हम क्यों परिवर्तित हों। घटना (दीवार गिरने से 17 लोगों की मौत) के बाद कई संगठनों ने हमसे संपर्क किया। जिसके लिए हमने उनका धन्यवाद दिय। लेकिन राजनीति के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों हो?”

वहीं,50 वर्षीय काली नामक एक किसान ने इस धर्म परिवर्तन की बात सुनकर कहा, “हम सब हिंदू हैं, हमारा धर्म परिवर्तन करने का कोई विचार नहीं हैं। हमें नहीं मालूम कि आखिर कौन इस तरह की अफवाहें फैला रहा है।”

इसी तरह, घटना में अपनी पत्नी को खोने वाले 50 वर्षीय के ईश्वरण ने तो यहाँ तक बताया कि मृतकों के परिवार वाले धर्म-परिवर्तन की अफवाह फैलाने वालों के ख़िलाफ़ पुलिस शिकायत करने की सोच रहे हैं।

वहीं, मनियम्मा नामक निवासी ने कहा, “हमारे इलाके में बहुसंख्यक आबादी में लोग राम के भक्त हैं। यहाँ मरघाजी माह में तो हम माँस तक नहीं खाते। हमारे इलाके में एक भी मु##म नहीं हैं और न ही किसी ने हमें धर्म परिवर्तन के लिए संपर्क किया है। सब एकदम झूठ है।”

गौरतलब है कि खबर के अनुसार, जब संगठन के महासचिव से ग्रामीणों की प्रतिक्रिया के बारे बात की गई तो उन्होंने दावा किया कि वे फिलहाल पुलिस के कारण गाँव नहीं जा पा रहे हैं। हो सकता है वे लोग बाद में इस्लाम कबूल करें। इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा कि आने वाली पाँच जनवरी को कम से कम 300 दलित इस्लाम कबूलेंगे। जिनमें तिरुपुर, कोयंबटूर और आसपास के क्षेत्रों के लोग शामिल होंगे।

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11 साल से भारत में रह रहा था ईरानी घुसपैठिया हामेद अबकरी, टकला होकर बौद्ध संन्यासी का धरा था रूप

पिछले 11 साल से बौद्ध संन्यासी का वेश धारण कर भारत में गुजर-बसर करने वाले एक ईरानी घुसपैठिए को पुलिस ने कल (दिसंबर, 29 2019) नेपाल जाते हुए इंडो-नेपाल बॉर्डर (चंपारण, बिहार) से गिरफ्तार कर लिया। घुसपैठिए की पहचान हामेद अबकरी के रूप में हुई। हामेद मूल रूप से ईरान के वैरिन शहर रजकान का निवासी है। घुसपैठिए ने पुलिस को खुद बताया है कि वह अवैध रूप से भारत में लंबे समय से रह रहा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में 11 साल से अवैध रूप से रह रहे ईरानी नागरिक को अब इमिग्रेशन की टीम ने अपनी हिरासत में ले लिया है। उसकी गिरफ्तारी बीती रात करीब 10 बजे बिहार के चंपारण में बोधगया से काठमांडू जा रही भारत-नेपाल मैत्री बस में जाँच के दौरान हुई। बस में हामेद बौद्ध संन्यासी का वेश धारण किए बैठा था।

जानकारी के अनुसार, टीम ने बस की जाँच के दौरान जब हामेद से वीजा माँगा तो उसके पास वीजा नहीं था। जिसके बाद अधिकारियों ने उससे पूछताछ शुरू की और कुछ ही देर में ईरानी नागरिक ने स्वीकार कर लिया कि वह बौद्ध संन्यासी के रूप में पिछले 11 साल से अवैध रूप से भारत में रह रहा था। इसके अलावा अधिकारियों ने अपनी जाँच में उसके पास से ईरानी पासपोर्ट भी बरामद किया। जिसे बाद में उन्होंने स्थानीय पुलिस को दे दिया।

बता दें कि घुसपैठिए हामेद को फॉरेनर एक्ट 1946 के सेक्शन 14बी के तहत दोषी पाते हुए रक्सौल थाने को सौंप दिया गया है। जहाँ पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेजा जाएगा।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है, जब इस इलाके से पुलिस ने इस तरह किसी विदेशी घुसपैठिए को गिरफ्तार किया हो। इससे पहले बिहार के इसी इलाके में कई विदेशियों को पुलिस ने नेपाल भागने की कोशिश करते हुए गिरफ्तार किया था। आखिरी गिरफ्तारी 19 दिसंबर को सोमालिया के एक शख्स की हुई थी, जबकि उससे पहले 2 लोगों को अगस्त में गिरफ्तार किया गया था।

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‘धर्मांतरण कर लो…वरना नौकरी तो जाएगी ही, बीवी-बच्चों को भी मार दूँगा’ – जामिया उर्दू संस्थान के अफसरों की धमकी

अलीगढ़ में एक जामिया उर्दू संस्थान है। यहीं एक गार्डनर सुपरवाइजर हैं, नाम है – कमल सिंह। कमल पिछले 11 साल से जामिया उर्दू संस्थान में काम कर रहे। लेकिन अब उनकी हाजरी व सैलरी पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके पीछे जो कारण कमल सिंह ने बताया है, वो बहुत ही चिंताजनक है।

कमल सिंह ने जामिया उर्दू संस्थान के ओएसडी फरहत अली व रजिस्ट्रार समुनरजा नकवी पर धर्म परिवर्तन को लेकर दबाव बनाने का आरोप लगाया है। कमल सिंह ने बताया कि ओएसडी फरहत अली व रजिस्ट्रार समुनरजा नकवी न सिर्फ उन पर बल्कि उनकी पत्नी मीना पर भी काफी समय से मुस्लिम धर्म अपनाने का दबाव बना रहे थे।

दैनिक जागरण में 30 दिसंबर को प्रकाशित खबर

इन दबावों के बावजूद कमल सिंह ने हिंदू धर्म अपनाए रखा। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि इसके कारण उन्हें नौकरी से हटाने व बच्चों को मार डालने की धमकी दी गई। मारपीट तक की गई और सितंबर 2019 से ओएसडी फरहत अली व रजिस्ट्रार समुनरजा नकवी ने मिलकर उनकी हाजरी व सैलरी पर प्रतिबंध लगा दिया है।

इस संबंध में थाना क्वार्सी में मामला दर्ज कराया गया है। चूँकि मामला धर्म परिवर्तन से जुड़ा था, इसलिए कमल सिंह के साथ स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने थाने का घेराव किया। इसके बाद जब इंस्पेक्टर विनोद कुमार ने मामले पर FIR दर्ज की, तो हंगामा शांत हुआ।

इस संबंध में कमल सिंह अपनी पत्नी मीना के साथ एटा के सांसद राजवीर सिंह से भी मिले। सांसद ने इस संबंध में डीआईजी प्रीतिंदर सिंह को फोन किया और ठोस कार्रवाई की माँग की। इसके बाद पीड़ित दंपती डीआईजी से उनके ऑफिस जाकर भी मुलाकात की। तब डीआईजी ने खुद संबंधित एसएसपी को जाँच व कार्रवाई के निर्देश दिए।

हालाँकि जामिया उर्दू संस्थान के ओएसडी फरहत अली ने बताया, “कमल सिंह चार महीने पहले खुद संस्थान छोड़कर भाग गया था तो सैलरी कैसे मिलेगी? धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने जैसे आरोप बेबुनियाद हैं। इनका भाई यहीं काम कर रहा है। कमल को निकालना तो दूर, उल्टा वापस बुलवाया गया था।”

इस पूरे मामले में एक और बात सामने आई है। कमल सिंह ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके बड़े भाई रघुराज सिंह का भी धर्म परिवर्तन कराया जा चुका है। लेकिन रघुराज सिंह ने इंस्पेक्टर विनोद कुमार को लिखित में दिया कि उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है।

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जिस आंदोलन में रेप, हत्या, किडनैपिंग हुई, उसमें दर्ज केस वापस: हेमंत सोरेन का पहला काम, ऋण माफी पर चुप्पी

हेमंत शोरेन दूसरी बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। रविवार (29 दिसंबर 2019) को शपथ ग्रहण के तीन घंटे के अंदर ही हेमंत सोरेन ने अपनी पहली कैबिनेट मीटिंग में एक बड़ा फैसला लिया। फैसला था – पत्थलगड़ी आंदोलन में शामिल लोगों पर दर्ज एफआइआर वापसी। साथ ही रघुबर दास की सरकार द्वारा किए गए सीएनटी-एसपीटी (छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट, संथाल परगना टेनेंसी एक्ट) संशोधन का विरोध करने वालों भी दर्ज एफआइआर वापस लिया जाएगा। कैबिनेट मीटिंग में इन दोनों मामलों में दर्ज FIR वापस लेते हुए आवश्यक कार्यवाही का निर्देश संबंधित आला अधिकारियों को दिया गया।

अपने चुनावी एजेंडे को लेकर आगे बढ़ने में हेमंत सोरेन ने कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी दिखाई। मसलन वो दोपहर 2:19 पर शपथ लेते हैं और 5: 45 शाम में कैबिनेट की पहली मीटिंग में ही FIR वापसी का फैसला। दरअसल झारखंड में आदिवासी हितों के नाम पर राजनीति करने वाले शिबू सोरेन ने चुनाव से पूर्व ही स्पष्ट कह दिया था कि उनकी सरकार बनते ही पत्थलगड़ी हिंसा के आरोपितों पर से सभी केस हटा लिए जाएँगे। शिबू सोरेन की राजनीति का फल खा रहे हेमंत भला अपने पिताजी की बातों से पीछे कैसे हटते! भले ही इस पत्थलगड़ी आंदोलन में जम कर हिंसा हुई हो या इसके नाम पर गैंगरेप तक किया गया हो। भले ही इस दौरान खूँटी के सांसद करिया मुंडा के आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों का पत्थलगड़ी समर्थकों ने अपहरण तक कर लिया हो। भले ही किसी पत्रकार की जान तक चली गई है!

पत्थलगड़ी आंदोलन

झारखंड को अगर जानते हैं तो पत्थलगड़ी का नाम ज़रूर सुना होगा आपने। इसका मोटा-मोटी मतलब हुआ – स्वतंत्र सरकार। मतलब पहले से स्थापित सरकार से परे, एकदम आजाद। मतलब हमारी सीमाओं में सिर्फ हमारा कानून चलेगा, राज्य या केंद्र सरकार जैसी किसी व्यवस्था या संस्था का कोई मतलब नहीं। और इन सीमाओं को पत्थल (पत्थर) गाड़ कर, उस पर अपने कानून की बातें लिखकर घोषित किया जाता था।

ऐसे किसी आंदोलन को राज्य-विद्रोहियों या देशद्रोहियों का समर्थन न मिले, यह संभव नहीं। और हुआ भी वैसा ही। आदिवासियों के इस मूवमेंट को कुछ मिशनरियों व कट्टरवादियों का समर्थन मिला। इसे रघुवर दास की सरकार और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई का प्रतीक बना दिया गया था। खूँटी, गुमला से लेकर एक समय तक यह आंदोलन लोहरदगा, राँची और सिमडेगा तक फैल गया था।

कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को संभालने के लिए तब रघुबर दास की सरकार ने नुक्कड़ नाटकों, ग्राम सभाओं आदि से भी जन-कल्याणकारी योजनाओं, आम लोगों के हितों में उठाए गए सरकारी कदम से जन-जन तक बात पहुँचाने की कोशिश की थी। लेकिन बाहर से मिल रहे समर्थन के कारण भ्रम की स्थिति बनी रही और आंदोलन हिंसक होता गया। यहाँ तक कि सरकारी योजनाओं को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए कोचांग नामक गाँव में नुक्कड़ नाटक करने आई 5 लड़कियों का अपहरण कर उनका बलात्कार किया गया था।

अंततः प्रशासन को पुलिस एक्शन का सहारा लेना पड़ा। और इस हिंसक व भ्रमित आंदोलन को खत्म किया गया। लेकिन तत्कालीन राज्य सरकार और सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। क्योंकि विपक्षी पार्टियों (हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख रूप से) ने पुलिस एक्शन को आदिवासियों पर हिंसक कार्रवाई के तौर पर पेश किया। नक्सल-मिशनरी समर्थित इस मूवमेंट वाले इलाक़ों में मुख्यमंत्री रघुबर दास के ख़िलाफ़ ख़ूब दुष्प्रचार अभियान चलाया गया। लोगों के बीच अफवाह फैलाई गई कि भाजपा आदिवासी विरोधी है।

झारखंड: जनता और विकास

नतीजा सबके सामने है। पत्थलगड़ी आंदोलन में शामिल लोगों पर हुई FIR वापस। आप आरोप भी नहीं लगा सकते क्योंकि इसी चुनावी वादे के साथ लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर सत्ता हासिल की है हेमंत सोरेन ने। लेकिन क्या सिर्फ यही एक वादा किया गया था झारखंड की जनता से? नहीं। तभी तो किसानों की ऋण माफी घोषणा भी इन्हीं चुनावी वादों में से एक थी। और यह महत्वपूर्ण इसलिए थी क्योंकि जिन-जिन राज्यों में BJP से सत्ता छीन कर गैर-भाजपा पार्टियों ने कुर्सी पाई है, हर उस राज्य में “किसानों की ऋण माफी” को ही प्रमुख रूप से चुनावी घोषणा में उछाला गया था।

विडंबना देखिए कि मध्य प्रदेश, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक में इसके लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। हर बार इन राज्यों के मुख्यमंत्री गोल-मोल जवाब देकर निकल लेते हैं। हेमंत सोरेन ने इतना करना भी उचित नहीं समझा। या फिर प्राथमिकता में ही नहीं रही होगी। क्योंकि उनकी प्राथमिकता थी – पत्थलगड़ी, अपने बाबूजी की राजनीति! तभी तो भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने तंज मारा, “हेमंत सोरेन सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में किसानों के ऋण माफ करने की घोषणा टाँय-टाँय फिस्स हो गई। किसानों के ऋण माफी की घोषणा करने की बात को नई सरकार ने भुला दिया।”

फीका ही रहा मोरहाबादी का मेला, उद्धव की तरह हेमंत सोरेन भी नहीं जमा सके कर्नाटक जैसा रंग

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…तो झारखंड के CM होंगे हेमंत सोरेन, लेकिन इनकी संपत्ति 5 साल में दोगुनी से अधिक, 10 साल में 11 गुनी!

‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ पर थरूर ने जताई आपत्ति, इस्लामी कट्टरपंथियों ने कहा – हमें न सिखाओ, तुम खुद सॉफ्ट कट्टर

तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह
Say It In The Tear Gas, ला इलाहा इल्लल्लाह
Say It On The Barricade, ला इलाहा इल्लल्लाह
Say It In The Lathi Charge, ला इलाहा इल्लल्लाह

यही वो नारे हैं, जिन्हें जामिया मिलिया इस्लामिया में विरोध प्रदर्शन के दौरान आक्रामक तरीके से लगाया गया। ये ही वो नारे हैं, जिन्हें हिन्दुओं के ख़िलाफ़ घृणा और कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया। बड़ी संख्या में जामिया के छात्रों ने चीख-चीख कई ऐसे नारे लगाए। ये ही वो नारे हैं, जिन्होंने बता दिया कि ये प्रदर्शन सीएए के विरोध में नहीं है, ये महज भाजपा या केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ नहीं है और ये सिर्फ़ छात्रों का आंदोलन नहीं है। इन नारों ने बता दिया कि ये इस्लामिक कट्टरपंथी विचारधारा ‘उम्माह’ की दिशा में प्रयास है।

सोशल मीडिया पर इसे खूब वायरल किया गया। इस वीडियो में इतनी आक्रामकता थी कि सीएए के कट्टर विरोधी कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर भी एक पल के लिए चौंक गए और उन्होंने चेताया कि हिंदुत्ववादी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ ‘उन लोगों’ की लड़ाई का फ़ायदा इस्लामिक कट्टरपंथी न उठा पाएँ, इसका ध्यान रखना होगा। थरूर ने कहा कि सीएए के विरोधी एक समावेशी भारत के लिए लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी मजहबी कट्टरवाद को देश की ‘अनेकता में एकता’ अथवा विविधता को नुकसान नहीं पहुँचाने दिया जाएगा। उन्होंने ट्विटर यूजर अनज़ मोहम्मद की वीडियो पर ये टिप्पणी की।

इसके बाद ‘न्याय’ के लिए लड़ने का दावा करने वाली संस्था ‘इंडिया रेसिस्ट्स’ ने लिखा कि इस देश में किसी भारी चीज को उठाने या ज़्यादा ऊर्जा लगने वाले कार्य को करने से पहले लोग ‘जय बजरंग बली’ बोलते हैं लेकिन इसे तो कोई सांप्रदायिक नहीं कहता। उसने लिखा कि आज मुस्लिमों को धक्के देकर निकालने का प्रयास हो रहा है और जब उनकी माँगें सेक्युलर हैं तो अपना आत्मविश्वास ऊँचा रखने के लिए मजहबी नारे लगाना ग़लत नहीं है। उसने थरूर के बयान को ‘सॉफ्ट कट्टरता’ करार दिया।

इसके बाद शशि थरूर के तेवर ढीले पड़ गए। उन्होंने कहा कि वो किसी को चोट नहीं पहुँचाना चाहते। उन्होंने लिखा कि अधिकतर लोगों के लिए ये लड़ाई भारत के लिए है, इस्लाम या हिंदुत्व के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि ये लड़ाई संवैधानिक मूल्यों और स्थापित सिद्धांतों को बचाने के लिए है। थरूर ने दावा किया कि सीएए के विरोध की कथित लड़ाई बहुवाद, अर्थात प्लुरलिज़्म के लिए है। उन्होंने याद दिलाया कि ये एक मजहब की किसी दूसरे मजहब से लड़ाई नहीं है, बल्कि भारत के आत्मा की रक्षा करने की लड़ाई है।

हालाँकि, थरूर ने दिन में 5 बार ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ बोलने पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। उनकी आपत्ति बस वीडियो में प्रयुक्त नारे से थी, और उसे जिस तरीके से पेश किया गया था, उस पर थी। ‘उम्माह’ मतलब वो आवाज, वो कॉल, जिसके तहत मुस्लिम अपने लिए एक अलग देश की माँग करते हैं। अर्थात, भारत का एक और टुकड़ा। दूसरे नारों में (हिन्दुओं के) ऐसा नहीं कहा जाता कि ‘हमारा भगवान सबसे ऊपर है, तुम्हारे वाले से बेहतर है’, जबकि मुस्लिमों की नारेबाजी का अर्थ है कि वो ‘अल्लाह’ को बाकी धर्मों या उनके ईश्वर से ऊपर मान रहे हैं और चाहते हैं कि सभी इसी का अनुसरण करें। यह खतरनाक है।

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मेरा कॉलर नोचना चाहते थे 88 वर्षीय असहिष्णु वामपंथी इतिहासकार: राज्यपाल ने सुनाई आपबीती

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ख़ान ने कथित इतिहासकार इरफ़ान हबीब पर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि 88 वर्षीय इरफ़ान हबीब उनके क़रीब आना चाहते थे। बता दें कि इरफ़ान हबीब ने राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ख़ान के सम्बोधन में व्यवधान डाला और वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की। इरफ़ान हबीब को असहिष्णु करार देते हुए आरिफ मोहम्मद ख़ान ने कहा कि वो उनके समीप आकर क्या करना चाह रहे थे, इसका उन्हें भान नहीं है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि इरफ़ान हबीब शायद उनका कॉलर खींचना चाहते थे। राज्यपाल ख़ान ने बताया कि उनका कार्यक्रम 1 घंटे से ज़्यादा का नहीं हो सकता था लेकिन बाकी वक्ता डेढ़ घंटे तक बोलते रहे।

उन्होंने कहा कि वक्ताओं ने केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर भली-बुरी बातें कहीं और लगातार इसके विरोध में बोलते रहे। बकौल आरिफ मोहम्मद ख़ान, वो उन सभी बातों को चुपचाप सुनते रहे। वक्ताओं ने उस दौरान संविधान पर ख़तरे का भी आरोप लगाया। इरफ़ान हबीब ने राज्यपाल को बोलने से रोकने के लिए राज्यपाल के सुरक्षाकर्मी का बैज तक नोच लिया। इसके बाद उन्होंने वहाँ मौजूद अन्य सुरक्षाकर्मियों के साथ बदसलूकी की। कन्नूर यूनिवर्सिटी के वीसी ने बीच में खड़े होकर हबीब को रोका।

राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने कहा कि इरफ़ान हबीब न तो उन्हें सुनना चाहते थे और न ही कार्यक्रम से बाहर जाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि इन असहिष्णु लोगों का पहले से ही यही रवैया रहा है। इरफ़ान हबीब की हरकतों को देख कर नीचे बैठे लोगों ने हंगामा भी किया। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए ‘आजतक’ को आरिफ मोहम्मद ख़ान ने बताया:

“राज्यपाल होने के नाते संविधान और कानून की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। अगर मैं संसद द्वारा पारित किसी क़ानून से सहमत नहीं हूँ, तो मुझको इस्तीफा देकर अपने घर चले जाना चाहिए। लेकिन, अगर संसद द्वारा पारित किसी क़ानून से मैं सहमत हूँ, तो मुझको उसका बचाव करना चाहिए। अगर किसी को ऐसा लगता है कि मेरी मौजूदगी में कोई संसद से पारित क़ानून पर हमला करेगा और मैं चुप होकर सुनता रहूँगा और जवाब नहीं दूँगा, तो यह ग़लत है। संवैधानिक पदों पर बैठे हर शख्स की यह जिम्मेदारी है कि वह संसद से पारित कानून की रक्षा करे।”

राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ने कहा कि अज्ञानी लोगों को इसकी जानकारी नहीं रहती है कि संसद से पारित होने के बाद कोई क़ानून किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं रहता, देश का क़ानून बन जाता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सहमति-असहमति जायज है लेकिन जिन्हें न क़ानून का ज्ञान है और जिन्होंने न कभी संविधान पढ़ा है, उनकी अज्ञानता का कोई समाधान नहीं है।

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