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बगदाद में US दूतावास पर फिर बरसे रॉकेट, तनाव के बीच भारत ने की अमेरिका और ईरान से बात

ईरान और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है, इस तनातनी के बीच इराक की राजधानी बगदाद में रविवार को अमेरिकी दूतावास के बाहर हमले की ख़बर सामने आई है। इस हमले में किसी के हताहत होने की ख़बर नहीं है। बता दें कि यह हमला बगदाद में एयरपोर्ट पर अमेरिकी रॉकेट हमले में ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के बाद हुआ है। बगदाद स्थित ग्रीन ज़ोन में लगातार यह दूसरा हुआ हमला है। इससे पहले, शनिवार (4 जनवरी) की रात को भी रॉकेट से अमेरिकी दूतावास और एयरबेस पर रॉकेट से हमला किया गया था। हालाँकि, हमले में किसी के हताहत होने की जानकारी नहीं मिली थी।

ख़बर के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को ख़त्म करने के लिए यूरोपियन यूनियन और भारत समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है। ग़ौर करने वाली बात यह है कि दोनों ही देश भारत के अहम रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। लेकिन, दोनो देशों के बीच तनावपूर्ण स्थिति बरक़रार है। वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के शब्द बेहद तल्ख़ अंदाज़ लिए हुए हैं।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ अपनी मुलाक़ात के बाद पोम्पियो ने ट्वीट किया। इसमें उन्होंने लिखा, “डॉ एस जयशंकर और मैंने अभी-अभी बात की है, हमने ईरान द्वारा लगातार दी जा रही धमकियों और उसके उकसावे वाली कार्रवाई पर चर्चा की है। ट्रम्प प्रशासन अमेरिकी लोगों, हमारे दोस्तों और सहयोगियों की रक्षा के लिए ज़रा भी नहीं हिचकेगा।”  

प्रतिक्रिया स्वरूप, विदेश मंत्री एस जयशंकर का कहना है कि भारत ने अमेरिका के सामने अपने हितों और गंभीर विषयों को रखा है। इस सन्दर्भ में उन्होंने ट्वीट किया, “अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से खाड़ी क्षेत्र में पैदा हुए हालात के बारे में चर्चा की। हमनें भारत की चिंताओं और भारत के हित के बारे में उन्हें बताया।”

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री जावेद जाफरी से वर्तमान स्थिति को लेकर फोन पर चर्चा की। दोनों देशों (अमेरिकी और ईरान) से भारत ने एक-दूसरे के हालात के बारे मेें बात की। भारत ने अपना रुख़ स्पष्ट करते हुए ईरान को बताया कि भारत तनाव के स्तर को लेकर बेहद चिंतित है। इसके बाद, दोनों देश लगातार एक-दूसरे के सम्पर्क में बने रहने को लेकर भी सहमत हुए।

ग़ौरतलब है कि शुक्रवार (3 जनवरी) को बगदाद में एक एयर स्ट्राइक में ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया था। इसके बाद शनिवार की रात बगदाद में अमेरिकी दूतावास के बाहर रॉकेट से हमला किया गया। माना जा रहा है कि ये हमला ईरान की ओर से किया गया। ये हमला अमेरिकी दूतावास के नज़दीक और अमेरिकी एयरबेस पर हुआ। दो रॉकेट दूतावास के नज़दीक गिरे थे।

इस हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने फिर ईरान को अत्याधुनिक और ब्रैंड न्यू हथियारों से हमला करने के लिए चेताया था। ट्रम्प ने ईरान को सलाह देते हुए ट्वीट किया, “उन्होंने हमला किया और हमने उसका जवाब दिया। अगर वो फिर से हमला करेंगे, जो कि मैं उन्हें सलाह देता हूँ कि वो ना करें तो हम उन पर और ज़ोरदार हमला करेंगे जैसा अब तक कभी नहीं हुआ।”

इसके अलावा, राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने एक अन्य ट्वीट के ज़रिए ईरान को चेतावनी दी थी कि यदि वो अमेरिकी जवानों या सम्पत्ति पर हमला करेगा, तो अमेरिका 52 ईरानी स्थलों को निशाना बनाएगा और उन पर बहुत तेज़ी से और ज़ोरदार हमला करेगा। उन्होंने कहा था कि ईरान के 52 ठिकाने हमारे निशाने पर हैं, जो ईरान और ईरानी संस्कृति के लिए काफ़ी अहमियत रखते हैं। हम किसी भी तरह के हमले का मुँहतोड़ जवाब देने को तैयार हैं।

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‘चल निकल दलाल… तेरी माँ की…’- रिपब्लिक भारत का रिपोर्टर देखते ही प्रदर्शनकारी ने दिखाई अपनी हकीकत

जेएनयू में रविवार को पेरियार हॉस्टल के भीतर घुसकर छात्रों के साथ हुई हिंसा के बाद विश्वविद्यालय के बाहर काफी बवाल हुआ। सोशल मीडिया पर लोगों से फौरन अपना विरोध दर्ज कराने के लिए घटनास्थल पर पहुँचने की अपीलें की गईं और देखते ही देखते बड़ी तादाद में लोग यहाँ इकट्ठा हो गए। इस घटना के बाद कई सौ की तादाद में लोगों ने जेएनयू के बाहर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस बीच कई मीडियाकर्मी भी वहाँ रिपोर्ट करने पहुँचे। लेकिन, इसी दौरान रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर पीयूष मिश्रा को देखकर जेएनयू का एक प्रदर्शनकारी भड़क गया और उनसे गाली गलौच पर उतर आया।

सोशल मीडिया पर अपनी रिपोर्टिंग की वीडियो जारी करते हुए पीयूष ने अपने साथ हुए वाकये पर सबका ध्यान आकर्षित करवाया। उन्होंने अपने ट्वीट पर लिखा,”जेएनयू के बाहर, भारी तादाद में मौजूद पुलिस फोर्स के बीच, रिपोर्टिंग करते हुए इस प्रकार एक जेएनयू प्रदर्शनकारी ने मुझसे दुर्व्यवहार किया, गाली-गलौच की। इस दौरान किसी पुलिस कर्मी ने इन गुंडों को नहीं रोका।”

पीषूष ने अपने साथ हुई बदसलूकी पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को टैग किया और लिखा कि उन्हें एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से अनेपक्षित निंदा की अपेक्षा है।

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर कल की घटना के बाद जेएनयू के प्रदर्शनकारियों को लेकर एक अलग ही माहौल बना हुआ है। पीयूष मिश्रा से बदसलूकी पर लोगों का पूछना है कि क्या ड्यूटी कर रहे मीडियाकर्मी से गुंडागर्दी जायज है? वहीं, कुछ का कहना है कि क्या जिसने पीयूष के साथ इस तरह सलूक किया उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए, ऐसे लोग विरोध के नाम पर विद्रोह करते हैं।

यहाँ बता दें कि सोशल मीडिया पर वामपंथी गिरोह के लोगों द्वारा रिपब्लिक टीवी को केंद्र सरकार का गुणगान करने वाले चैनल के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। ऐसे में इस चैनल के रिपोर्टर को देखकर जेएनयू प्रदर्शनकारी के शब्द, उसकी बदसलूकी साफ दर्शाती है कि ये गाली वो सिर्फ़ पीयूष मिश्रा को नहीं दे रहा बल्कि केंद्र सरकार और उसके समर्थन में बोलने वाले लोगों को दे रहा है। जिनकी उपस्थिति से भी जेएनयू वालों को गुरेज है और जिन्हें देखकर उन्हें डर है कि उनके द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन का कोई दूसरा एंगल दर्शक तक न पहुँच जाए।

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रविवार (जनवरी 5, 2019) को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में लाठी-डंडों से लैस वामपंथियों ने जम कर उत्पात मचाया। जेएनयू कैंपस के अंदर हुई इस हिंसा को लेकर कई सारी भ्रामक सूचनाएँ फैलाई गई। हालाँकि जल्द ही इनके झूठ का पर्दाफाश हुआ और कैंपस के अंदर हुआ हिंसा में कॉन्ग्रेस की कड़ी उभरकर सामने आई और साथ ही हिंसा के पीछे वामपंथियों की भूमिका भी सामने आई। हिंदुत्व की राजनीति से लेकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक सब पर आरोप लगाने वाले नैरेटिव को खूब फैलाया गया।

हमले के बाद कई वीडियो सामने आए, जिसमें एक के बाद एक खतरनाक रूप से गढ़े गए प्रोपेगेंडा को देखा जा सकता है। कैंपस में हिंसा का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें नकाबपोश लोग डंडे और लोहे की रॉड लेकर मारपीट करते नजर आ रहे हैं। इसी दौरान प्रदर्शनकारी यह कहते सुने जा सकते हैं, ‘कौन हो तुम लोग? किसे डराना चाह रहे हो?… एबीवीपी वापस जाओ।’

वीडियो सामने आने के बाद जब वामपंथियों के प्रोपेगेंडा ने रफ्तार पकड़ ली तो एक ट्विटर यूजर ने आरोप लगाया कि वीडियो में नकाबपोश गुंडों में से एक लड़की एबीवीपी कार्यकर्ता थी।

दरअसल यह दावा उनके कपड़ों को आधार बनाकर किया गया था, जो दोनों ने पहने हुए थे। बता दें कि वीडियो में जिस एबीवीपी के कार्यकर्ता पर आरोप लगाया गया, उनका नाम शाम्भवी है, जो कि खुद हमले का शिकार हुई हैं। उन्हें काफी चोटें आई हैं और वो रविवार को एम्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती थीं।

बाएँ- नकाबपोश गुंडी, दाएँ- एबीवीपी कार्यकर्ता शाम्भवी

यह पता लगाने के लिए कि क्या नकाबपोश गुंडी और शाम्भवी, दोनों एक ही व्यक्ति हैं, हमें दोनों तस्वीरों को बारीकी से देखना चाहिए।

अगर हम दोनों तस्वीरों को देखें तो जाहिर तौर पर दिखता है कि दोनों की शारीरिक बनावट एक दूसरे से बिल्कुल अलग है। दोनों तस्वीरों को एक साथ देखते हैं तो यह भी स्पष्ट होता है कि नकाबपोश गुंडी दाईं ओर की लड़की (एबीवीपी कार्यकर्ता शाम्भवी) की तुलना में शारीरिक रूप से अधिक वजनदार है।

अगला, सबसे स्पष्ट चीज जो दिखाई देती है, वो है उनके शर्ट के चेक-पैटर्न में अंतर।

बाएँ- नकाबपोश गुंडी का शर्ट
दाएँ- एबीवीपी कार्यकर्ता शाम्भवी का शर्ट

जैसा कि बहुत स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि शाम्भवी की शर्ट के चेकों की तुलना में नकाबपोश गुंडी की शर्ट पर बहुत छोटे चेक बने हुए हैं। साथ ही चेक का पैटर्न भी पूरी तरह से अलग दिखाई देता है।

कलावा और जूतों में अंतर

इसके अलावा दोनों में कुछ अन्य अंतर भी हैं। दोनों लड़कियों के जूते अलग-अलग हैं। अब यहाँ पर यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि आरोप ये है कि ये दोनों चित्र लगभग उसी समय के हैं। यदि इन आरोपों को सच माना जाता है, तो इसका मतलब है कि शाम्भवी ने पहले अपने चेहरे को ढँककर हमला किया और फिर अस्पताल गईं।

अगर ऐसा है, तो ऊपर की तस्वीरों से यह बात सामने आती है कि शाम्भवी ने निम्नलिखित काम किया है।

1. उसने सभी पर हमला करने के बाद और अस्पताल जाने से पहले अपने जूते बदल दिए क्योंकि नकाबपोश गुंडी स्निकर्स पहने दिख रही है और अस्पताल में शाम्भवी चप्पल पहने हुए हैं।

2. रहस्यमय तरीके से शाम्भवी ने खुद के चेहरे पर नकाब लगाने और जेएनयू में हमला करने के बाद जाहिर तौर पर एक कलावा पहना, इससे पहले कि वह अस्पताल पहुँचती, घायल हो गईं।

हालाँकि इन दोनों संभावनाओं का कोई मतलब नहीं बनता है।

निश्चित तौर पर इन तस्वीरों में दो लड़कियों का एक ही होना असंभव है। इसलिए यह आरोप कि नकाबपोश गुंडी एबीवीपी कार्यकर्ता शाम्भवी ही है, यह एक प्रोपेगेंडा था, किसी के द्वारा प्रेरित था।

उल्लेखनीय है कि ये भिड़ंत JNU के वामपंथी छात्रसंघ के द्वारा सर्वर डाउन करने को लेकर हुआ था। बता दें कि रविवार को रजिस्ट्रेशन का आखिरी दिन था। एबीवीपी के छात्र रजिस्ट्रेशन के लिए गए थे। मगर लेफ्ट विंग के छात्रों ने सर्वर रूम को लॉक कर दिया और वाई-फाई काट दिया। जिसकी वजह से उनका रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया। इसके बाद संगठन के छात्र विवेकानंद मूर्ति के पास रजिस्ट्रेशन की माँग कर रहे थे। 

इस बीच लेफ्ट के लोगों ने आकर एबीवीपी समर्थित छात्रों पर हमला कर दिया। जेएनयू एबीवीपी प्रेसिडेंट दुर्गेश कुमार ने इसकी जानकारी दी। इसके साथ ही बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने छात्राओं के प्राइवेट पार्ट्स पर लाठी-डंडों से मारपीट और बाथरूम में ले जाकर दुर्व्यवहार करने का दावा किया है।

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नोट: जिनकी आपबीती आप पढ़ने वाले हैं, उनकी समस्या यह है कि वो अब सरकारी अधिकारी बनने वाले हैं। ऐसे किसी राजनीतिक पोस्ट के प्रतिकूल असर को देखते हुए उन्होंने अपना नाम और पद गोपनीय रखने की शर्त रखी है।

BPSC में चयन के बाद से मैंने सोचा था कि अब राजनैतिक विषयों पर पोस्ट नहीं लिखूँगा, लेकिन कल JNU में जो कुछ हुआ उससे अभी तक उबर नही पाया हूँ, इसलिए लोगों के बीच कल के घटना की सच्चाई बताना अपना कर्तव्य समझता हूँ। कल रात 8 बजे मैं किसी तरह जंगलों के रास्ते कैम्पस से बाहर निकला। अभी किसी मित्र के घर शरण लिया हूँ क्योंकि कैम्पस में यदि रात को रुकता तो पता नहीं हमारे साथ क्या होता, मेरे बेहद करीबी मित्र “ब” का माथा फोड़ दिया गया। वह कावेरी छात्रावास से पेरियार छात्रावास यह देखने आ रहा था कि मैं सुरक्षित हूँ या नहीं और इसी दरम्यान उसे नक्सल गुंडों ने पीट-पीट कर अधमरा कर दिया।

मैं तीन रात से ठीक से सो नहीं पाया था क्योंकि बैंग्लोर में कई सारे मित्रों से मिलना हुआ था। कल दिन में 12 बजे के आसपास मैं बंगलोर से वापस पेरियार हॉस्टल पहुँचा। विंटर सेमेस्टर के रजिस्ट्रेशन का कल आखिरी दिन था, लेकिन नक्सलियों ने 2 दिन पहले ही पूरे कैम्पस का WiFi बंद कर दिया था, नकाबपोश गुंडों ने WiFi के सारे केबल काट दिए थे ताकि किसी भी सेंटर में रेजिस्ट्रेशन ना हो सके। तकरीबन 3 महीने से इन नक्सलियों ने JNU के सारे केंद्रों को जबरदस्ती बंद कर रखा था। जो छात्र रेजिस्ट्रेशन करवा रहे थे नक्सली उनकी लिस्ट तैयार कर रहे थे ताकि उन पर नक्सल कारवाई की जा सके। कल की घटना इसी नक्सल हमला के संदर्भ में हुई।

मित्र “क” और “ख” चार बजे दिन तक मेरे कमरे पर बैठ कर बातें कर रहे थे। जब मैंने बोला कि बहुत नींद आ रही है, मैं कुछ देर सोता हूँ, तो वे लोग चले गए। उनके गए हुए आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि अचानक पेरियार हॉस्टल के नीचे काफी शोर होने लगा, मैं इतना थका हुआ था कि उठ कर देखने का साहस नहीं हो रहा था कि क्या हुआ है, लेकिन 5 मिनट के अंदर ही ऐसा लगा कि हॉस्टल के शीशे टूट रहे हैं, मैं फटाफट उठ कर लॉबी में गया, देखा लगभग 200 नकाबपोश लोग हाथों में लोहे का रॉड तथा डंडे लिए पेरियार हॉस्टल के हरेक कमरे में घुसते चले जा रहे हैं, और डंडों से बेतरतीब प्रहार करके दरवाजे और खिड़कियों को तोड़ रहे हैं।

जैसे ही इन नकाबपोश नक्सलियों की नजर मेरे पर पड़ी उन्होंने मुझे गालियाँ दीं और मेरे कमरे की ओर झपटे। किसी तरह मैं कमरे में घुसकर, दरवाजा के पीछे लकड़ी का अलमीरा, टेबल तथा कुर्सियाँ लगाकर दरवाजा को ब्लॉक किया। वे दरवाजा पर आकर इतनी तेज लाठियाँ बरसा रहे थे जैसे मॉब लिंचिंग करने आए हों। 3-4 मिनट ऐसा करने के बाद वो दूसरी तरफ गए और हॉस्टल से चीखने चिल्लाने की आवाज़ आती रही।

उनके जाने के बाद मैं अपने कमरे के बालकनी में गया, मेरा बालकनी हॉस्टल के मुख्य गेट की तरफ खुलता है। मैंने वहाँ देखा करीब 500 लोग नकाब पहने हाथों में डंडे लिए गोदावरी छात्रावास में छात्रों को पीट रहे हैं, नकाबपोश लड़कियाँ पत्थरबाजी कर रही थीं। यह बहुत ही सिहरा देने वाला दृश्य था, मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि यह क्या हो रहा है मेरे JNU में। लगभग आधे घंटे में सारे नक्सली पेरियार से यह कहते हुए निकल गए कि चलो अब माही मांडवी हॉस्टल चलकर पीटते हैं। मुझे लगा अब शांत हो गया।

उसके 20-25 मिनट के अंदर एक बार फिर से पेरियार हॉस्टल में 500 की संख्या में नकाबपोश नक्सली दौड़ते हुए आए, इस बार पेरियार हॉस्टल के गेट पर ही उन्होंने पेरियार के छात्रों को बेतहाशा पीटा, मैं बालकनी से सब देख रहा था। मुझे वे नीचे से इशारा कर रहे थे कि रुको छोड़ूँगा नहीं। इसी बीच 50 लोगों की एक टुकड़ी फिर से हॉस्टल के अंदर दौड़े, फिर से दरवाजे खिड़कियों को तोड़ने का क्रम शुरू, इस बार मैं काफी डर गया था, मैंने पुलिस को फोन किया कि हम बेहद खराब स्थिति में फँसे हुए हैं, कृपया हमें बचाया जाए। मैंने अपनी आँखों से JNUSU अध्यक्ष आईशी घोष को पेरियार हॉस्टल के हमारे विंग में भाग कर आते देखा। उस समय तक वो दुरुस्त थीं, मुझे नहीं पता फिर उसे चोट कब आई। करीब एक घंटे तक पेरियार के गेट पर पत्थरबाजी चलती रही।

लगभग एक घंटे के बाद मेरे मोबाइल पर एक शिक्षक “द” का बहुत सारा कॉल आया कि मेरा मित्र “ब” फोर्टिस अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में है, मुझे हॉस्टल छोड़ कर निकल जाना चाहिए। हॉस्टल का कार्यकारी अध्यक्ष मेरे कमरे पर आया। उसने बताया कि हॉस्टल मेस में भी तोड़-फोड़ की गई है। उसने बताया कि आज खाना नहीं मिलेगा और रात को और भी गहरा नक्सली अटैक होने की संभावना है, यदि निकल सकते हैं तो निकल जाइए। मैंने सपनों में भी नहीं सोचा था कि ऐसे किसी दिन JNU छोड़कर जाना होगा, जिस JNU पर हम सबसे सुरक्षित होने का अभिमान करते थे। मेरे लॉबी में अब तक सारे कमरों में ताला लग चुका था।

जैकेट में मुँँह ढककर मैं जंगलों के रास्ते 8:30 के करीब कैम्पस से बाहर निकल गया। बाहर आते ही मुझे मित्रों से पता चला कि मीडिया में लोग बता रहे हैं कि ABVP वालों ने पिटाई की है, मेरे पास सफ़ाई में बोलने के लिए कुछ नहीं है। मैं कुशल हूँ, आप सबके कॉल और मेसेज आ रहे हैं, चिंता की कोई बात नहीं है। दुख की बात बस इतनी सी है कि JNU के अपने अंतिम दिनों में मैंने वामपंथ का चरमपंथी आतंकी स्वरूप अपने आँखों से देखा।

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जेएनयू के हॉस्टलों में घुसकर छात्रों के साथ हुई हिंसा निस्संदेह ही शर्मनाक घटना है। लेकिन इस घटना के लिए बिन सोचे समझे केंद्र सरकार या फिर एबीवीपी पर हमलावर हो जाना उतना ही अधिक निंदनीय। रविवार की रात मुँह पर नकाब पहने और हाथ में लाठी लिए परिसर में घुसे कुछ दंगाई कौन थे? कहाँ से आए थे? किस समूह से थे? ये किसी को नहीं मालूम। मगर फिर भी अगर सोशल मीडिया पर देखें तो कुछ ही पल में एक नैरेटिव तैयार किया गया कि ये सब भाजपा के छात्र संघ एबीवीपी का किया धरा है। और तो और ये लोग प्रोपेगेंडा के तहत आनन-फानन में गृहमंत्री से इस्तीफा भी माँगने लगे!

इस पूरे प्रकरण में एबीवीपी के छात्र खुद काफी चोटिल हुए और घटना के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी भी अन्य समूह जितनी ही रही। लेकिन, फिर भी इसी बीच वामपंथी गिरोह के लोगों द्वारा अपना नैरेटिव सिद्ध करने के लिए, कुछ व्हॉट्सअप चैट वायरल की जाने लगीं और दावा किया गया कि जेएनयू में जो कुछ हुआ, वो सब पहले से निर्धारित था।

उल्लेखनीय है कि इन व्हॉट्सएप स्क्रीनशॉट्स की क्या प्रमाणिकता है, ये किसी को अभी तक नहीं मालूम। मगर, फिर भी जेएनयू की पूर्व अध्यक्ष गीता द्वारा शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स से लेफ्ट का ही पर्दाफाश हो गया… वो कैसे? आइए जानें…

दरअसल, एबीवीपी को बदनाम करने के लिए जिस ग्रुप चैट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर जेएनयू की पूर्व अध्यक्ष गीता द्वारा शेयर किया गया, उसमें कई नंबर साफ नजर आए। ऐसे में जब इन नंबरों की पड़ताल हुई तो एक नंबर उसमें अमन सिन्हा नामक छात्र का निकला।

अमन सिन्हा द्वारा साल 2016 में किए ट्वीट पर उसका नंबर साफ तौर पर लिखा है। जबकि उसका फेसबुक अकॉउंट देखने पर पता चलता है कि अमन सिन्हा, जिसका नंबर लेफ्ट टेरर डाउन नामक ग्रुप में है और जिसे लेकर दावा किया जा रहा है कि वो एबीवीपी का ‘गुंडा’ है। उसका लेना-देना संघ या भाजपा से नहीं, बल्कि कन्हैया कुमार, उमर खालिद जैसे वामपंथियों और कट्टरवादियों से है। जिनके द्वाया आयोजित कार्यक्रमों में अक्सर उसे देखा जाता है।

अमन सिन्हा की वॉल पर, उसके द्वारा शेयर की गई तस्वीरों से साफ पता चलता है कि इस पूरे कारनामे को सुनियोजित ढंग से अंजाम देने के लिए किसने अपनी भूमिका निभाई।

सोशल मीडिया पर खुलासा होते ही, अन्य यूजर भी अमन सिन्हा से जुड़े कई तथ्य निकालकर लेकर आने लगे। लोगों ने पूछा कि क्या ये वही छात्र है, जिसने अफजल गुरु के शहीदी के नारे लगाए और उसके पोस्टर लेकर घूमा था।

गौरतलब है कि अभी तक रविवार को जेएनयू में छात्रों पर हुए हमले के पीछे लोगों की पहचान का खुलासा नहीं हुआ है। लेकिन लेफ्ट द्वारा लगातार एबीवीपी हमला बोलना खुद उन्हें सवालों के घेरे में घेर रहा है। सोशल मीडिया पर एक ओर जहाँ कई लोग इस हिंसा के लिए उचित कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। तो वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो प्रत्यत्क्ष रूप से लेफ्ट को जिम्मेदार बता रहे हैं और अमन सिन्हा का खुलासा होने के बाद उनसे सवाल भी कर रहे हैं।

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…जब आसिफा अपने बच्चों के साथ फँस गईं तो CRPF ने बर्फ में 12 Km पैदल चल पहुँचाया खाना: मिसाल नहीं, परंपरा है यह

भारतीय सेना और सुरक्षा बलों के जवानों के अदम्य साहस की कहानियों से पूरा देश बख़ूबी वाक़िफ़ है। ऐसे क़िस्से कई बार हमारे सामने आए हैं, जहाँ जवानों ने बिना अपनी जान की परवाह किए ज़रूरतमंदों की मदद करके अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी के साथ पूरा किया। ऐसा ही एक ताज़ा मामला जम्मू-कश्मीर का है। दरअसल, 2 जनवरी को रामबन के पास राष्ट्रीय राजमार्ग में पर भूस्खलन की वजह से आसिफा का परिवार जाम में फँस गया था।

विषम परिस्थितियों में आसिफा ने शाम को 5:30 बजे केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) की ‘मददगार’ हेल्पलाइन पर सम्पर्क साधा और बताया कि उनका परिवार जाम में फँसा हुआ है। आसिफा ने फोन पर बताया कि उनके बच्चे भूखे हैं और उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया है। इतना सुनते ही CRPF की 157वीं बटालियन तुरंत एक्शन में आ गई और दाल-चावल, दो-ढाई लीटर दूध, 6 लीटर गर्म पानी, फल और बिस्किट के पैकेट बाँधकर पैदल ही बर्फ़ीले रास्ते पर निकल पड़े। इस टीम में CRPF के जवान जमा देने वाली कड़ाके की ठंड में 12 किमी तक पैदल चले और आसिफा तक पहुँचे।

CRPF की 157वीं बटालियन के कमांडेंट डीपी यादव ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को बताया कि जम्मू-कश्मीर राजमार्ग पर रामबन के डिगडोल इलाक़े में फँसी आसिफा ने CRPF के जवानों से अपने भूखे बच्चों को खाना मुहैया कराने की मदद माँगी थी। इसके बाद टीम में इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह समेत CRPF के अन्य जवानों के साथ खाने का सामना और दूध लेकर पहुँचे।

ख़बर के अनुसार, इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह ने बताया कि उनके लिए बच्चों तक खाना पहुँचाने का काम अलग तरह का था। उन्होंने बताया कि इस काम के लिए तुरंत 6 जवानों की टीम बनाई गई। 2 किमी पैदल चलने के बाद उन्हें मार्ग पर लंबा जाम दिखा, लेकिन, उस परिवार तक पहुँचने में कुल 12 किमी चलना पड़ा। उन्होंने बताया कि महिला का फोन आया था इसलिए उन्हें और उनकी टीम को आसिफा के परिवार को खोजने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई। 

इंस्पेक्टर ने बताया कि वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि आसिफा के दो बच्चे हैं, जिनमें से एक की उम्र 3 साल और दूसरे की उम्र 4 साल थी और वो भूख से बेहाल थे। इस दौरान उन्होंने बच्चों और उनके परिवार से कहा,

“हमने कहा कि घबराने की ज़रूरत नहीं है। खाना आ गया है। यह सुनकर उनके चेहरे पर चमक आ गई। बच्चों के होंठों पर मुस्कान आ गई। हमने उस परिवार से कहा कि हमारे साथ चलिए, लेकिन गाड़ी में बैठी दोनों महिलाओं ने पैदल चलने में असमर्थता जताई।”

इसके बाद इंस्पेक्टर सिंह ने कहा कि अगर जाम नहीं खुलेगा तो वो उनकी मदद के लिए उन्हें उठाकर अगले स्टेशन तक ले चलेंगे। इस पर महिलाओं का कहना था कि वो अपने बच्चों के साथ वहीं रुकेंगी। उन्होंने कहा कि जाम में और भी बहुत सी गाड़ियाँ फँसी हुई हैं, इसलिए उन्हें किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं है, उन्हें सिर्फ़ खाना चाहिए था।

पूरी घटना के सन्दर्भ में इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह का कहना था कि बच्चों ने जब तक खाना खा नहीं लिया, तब तक वो और उनकी टीम वहीं रुके रहे। उन्होंने आसिफा को अपना फोन नंबर भी दिया और कहा कि अगर उन्हें और खाने की ज़रूरत हो तो बताएँ। इतना कहकर जवानों की टीम वहाँ से रवाना हो गई और रात को 11 बजे अपने कैंप में पहुँच गए। इंस्पेक्टर सिंह ने बताया कि यह बात बहुत सुकून देने वाली थी कि जम्मू पहुँचने पर उस परिवार का फोन आया और उन्होंने CRPF का शुक्रिया अदा किया।

ग़ौरतलब है कि कश्मीर में टेलीफोन सेवा बंद होने पर ‘मददगार’ हेल्पलाइन ने हज़ारों लोगों की मदद की थी। इसने देश के अलग-अगल हिस्सों में रहने वाले लोग जो कि कश्मीर में परिजनों के साथ सम्पर्क नहीं कर पा रहे थे, उनके लिए भी इस हेल्पलाइन को शुरू किया गया था। लोग ‘14411’ नंबर और 9469793260 नंबर पर सम्पर्क कर कश्मीर में अपने परिजनों से सम्पर्क कर पा रहे थे। इस हेल्पलाइन से बाबा अमरनाथ की वार्षिक यात्रा में भी लोगों की मदद की थी।

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‘रजिस्ट्रेशन कराने गईं छात्राओं के प्राइवेट पार्ट पर हमला, बाथरूम ले जाकर दुर्व्यवहार’ – JNU मामले में गंभीर आरोप

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में रविवार (जनवरी 5, 2019) शाम वामपंथियों ने एक बार फिर से हिंसा को अंजाम दिया। इस दौरान मास्क पहने वामपंथी गुंडों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं की पिटाई करने के साथ ही लड़कियों के प्राइवेट पार्ट पर हमला किया, कई लड़कियों के साथ बाथरूम में ले जाकर दुर्व्यवहार भी किया गया।

दरअसल ये भिड़ंत JNU के वामपंथी छात्रसंघ के द्वारा सर्वर डाउन करने को लेकर हुआ। बता दें कि रविवार को रजिस्ट्रेशन का आखिरी दिन था। एबीवीपी के छात्र रजिस्ट्रेशन के लिए गए थे। मगर लेफ्ट विंग के छात्रों ने सर्वर रूम को लॉक कर दिया और वाई-फाई काट दिया। जिसकी वजह से उनका रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया। इसके बाद संगठन के छात्र विवेकानंद मूर्ति के पास रजिस्ट्रेशन की माँग कर रहे थे। इस बीच लेफ्ट के लोगों ने आकर एबीवीपी समर्थित छात्रों पर हमला कर दिया। जेएनयू एबीवीपी प्रेसिडेंट दुर्गेश कुमार ने इसकी जानकारी दी।

बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने दावा किया कि जब कुछ छात्राएँ मैनुअली रजिस्ट्रेशन करवाने जा रहे थीं तो उनके हिप और प्राइवेट पार्ट्स पर लाठी-डंडों से हमला किया गया। इतना ही नहीं, कई छात्राओं को बाथरूम में ले जाकर उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया। मीनाक्षी लेखी ने कहा कि कई छात्रों ने उन्हें बताया कि कुछ लोग जामिया से भी जेएनयू आए थे। मीनाक्षी लेखी का कहना है कि पीड़ित लड़कियाँ इन बातों को बताने में भी शर्मिंदा हैं।

बता दें कि रविवार को मास्क पहने गुंडों ने हॉस्टल में जम कर पत्थरबाजी भी की। उन्होंने छात्रों के साथ-साथ गार्डों को भी निशाना बनाया। हालाँकि, वामपंथियों के नेतृत्व वाले जेएनयू छात्र संगठन ने इन आरोपों से इनकार किया है और दावा किया है कि एबीवीपी झूठ फैला रही है। एबीवीपी ने कहा है कि अभी छात्रों का इलाज पहली प्राथमिता है। इसके बाद संगठन इस मामले की पुलिस में शिकायत दर्ज कराएगा।

वैसे पिछले 2-3 महीने से JNU कैंपस के अंदर जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसके बिंदुओं को जोड़ने पर बहुत कुछ स्पष्ट होने लगता है। मसलन विरोध के नाम पर क्लास नहीं होने देना, विरोध के नाम पर शोध कर रहे प्रोफेसरों को लैब में जाने से रोकना, विरोध के नाम पर एम्बुलेंस का रास्ता रोकना या फिर पुलिस से पहचान छिपाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाना – यह सुब कुछ इन्हीं लिबरलों के द्वारा किया जा रहा है।

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मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने कहा है कि वो अब प्रोफेसर दिलीप मंडल की सेवाएँ नहीं लेगा। छात्रों की जाति पूछ कर कथित उच्च-जाति के छात्रों से भेदभाव करने वाले मंडल पर आरोप है कि वो जाति के आधार पर छात्रों को भड़काते हैं। दिलीप मंडल सोशल मीडिया पर भी अक्सर जहरीले बयानों के कारण सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। मंडल को एमसीयू द्वारा लेक्चर के लिए बुलाया जाता था। उन्हें प्रति लेक्चर के हिसाब से भुगतान किया जाता था।

दिलीप मंडल के बारे में बयान देते हुए रजिस्ट्रार दीपेंद्र बघेल ने बताया कि छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से उनकी शिकायत की थी, जिसके बाद ये फ़ैसला लिया गया। यूनिवर्सिटी ने मंडल का पक्ष जानने के लिए उनके पास कई स्पीड पोस्ट व ईमेल भेजे लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया। मंडल ने एक बार भी जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। इसीलिए, अब निर्णय लिया गया है कि उन्हें भविष्य में लेक्चर के लिए आमंत्रित नहीं किया जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के पास दिलीप मंडल की कारगुजारियों के ख़िलाफ़ कई सबूत मिले हैं, जो उनके ख़िलाफ़ जाँच में कारगर सिद्ध होंगे।

दिलीप मंडल के ट्वीट का विरोध कर देने पर कई छात्रों को एमसीयू से निष्काषित कर दिया गया था। इस मामले को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उठाया था। विधानसभा में गूँजने के बाद मामले ने तूल पकड़ा। शिवराज ने आरोप लगाया था कि दिलीप मंडल का विरोध करने पर छात्रों के साथ आतंकियों की तरह व्यवहार किया गया। सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू से इस मामले की शिकायत की थी। बाद में दबाव के बाद छात्रों का निष्कासन वापस ले लिया गया था।

दिलीप मंडल से नाराज़ होकर छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में धरना दिया था। इसके बाद उलटा छात्रों के ख़िलाफ़ ही शासकीय कार्य में बाधा पहुँचाने का मामला दर्ज कर लिया गया था। पुलिस ने भी छात्रों की पिटाई की थी। इसके बाद मामले की जाँच के लिए एक समिति बनाई गई थी। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर 23 छात्रों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई थी।

पुलिस गिरफ्तार करने के बाद यूनिवर्सिटी के बगल के एमपी नगर थाने ले जाने की बजाए ठंड की रात में पुलिस छात्रों को लगभग 20 किलोमीटर दूर बिलखिरिया थाने ले गई थी। थाने में देर रात छात्रों के कपड़े उतरवाए गए थे। इसके बाद छात्रों को कुछ कागजों पर दस्तख़त के लिए मजबूर किया गया था। छात्रों का कहना था कि अक्सर जातिगत पोस्ट लिखकर ये सवर्ण जातियों को टारगेट करते हैं। उनके अलावा प्रोफेसर मुकेश कुमार पर भी ऐसे ही गंभीर आरोप लगे थे।

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…जिसका दादा हिंदू नरसंहार का सहयोगी, छोटा भाई 15 मिनट में हिंदुओं को देख लेने की धमकी दे – वो ओवैसी ‘झूठा’

असदुद्दीन ओवैसी ने हमेशा अपनी योग्यता का इस्तेमाल उन लोगों पर हमला करने के लिए किया, जो उनके इस्लामी राजनीति पर सवाल उठाते रहे और उनकी आलोचना करते रहे हैं। वह अक्सर कहते हैं कि उन्होंने जिन्ना के पाकिस्तान या दो-राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज कर दिया। यह भी कहा कि उन्हें हमेशा भारतीय मुसलमानों पर गर्व है। यह बयान सबसे अधिक बार तब दिया जाता है कि जब ओवैसी देश में मुस्लिमों के लिए विशेषाधिकार की माँग कर रहे हों या यह साबित करने के लिए कि मुस्लिम समुदाय धर्मनिरपेक्ष है जबकि हिंदुत्व के अनुयायी सांप्रदायिक हैं।

AIMIM प्रमुख औवेसी ने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों पर अत्याचार का आरोप लगाने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा एक फर्जी वीडियो साझा करने के बाद फिर से यह टिप्पणी की। ओवैसी ने कहा, “हमें भारतीय मुसलमानों पर गर्व है और इंशाल्लाह, फैसले के दिन तक, भारतीय मुसलमानों पर गर्व रहेगा।” हालाँकि, ओवैसी के शब्दों पर यकीन नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर उनके भाई ने एक बार माँग की थी कि देश में 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा दिया जाए ताकि मुसलमान हिंदुओं को दिखा सकें कि कौन असली बॉस है। हालाँकि उनके इस बयान को लेकर उन्हें किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई नहीं झेलनी पड़ी।

दोबारा प्रधानमंत्री के तौर पर चुने गए मोदी। और उसके बाद ऐसे बयानों की मानो हवा निकल गई। चूँकि हम अकबरुद्दीन ओवैसी के उस विवादास्पद बयान को गंभीरता से नहीं लेते, इसलिए हमें बड़े ओवैसी मतलब असदुद्दीन ओवैसी को भी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ऐसे में हमें खुद से सवाल करना होगा कि क्या वह वास्तव में सच बोल रहे हैं?

हम साफ तौर पर कह सकते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी झूठ बोल रहे हैं, जब वह कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने दो-राष्ट्र सिद्धांत और जिन्ना को खारिज कर दिया था। जबकि ऐसे बहुत से भारतीय मुसलमान हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को अस्वीकार कर दिया था। लेकिन यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि असदुद्दीन ओवैसी के परिवार ने आज तक पाकिस्तान को अस्वीकार नहीं किया। वास्तव में, वह एक ऐसे परिवार से आते हैं जिनके नाम स्वतंत्र भारत के इतिहास में सांप्रदायिक सद्भाव और सहिष्णुता का सबसे खराब रिकॉर्ड रहा हो।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) एक रजाकारों की विरासत है। एक जिहादी आतंकी समूह, जिसने निजाम के राज्य में हिंदुओं के खिलाफ अनगिनत अत्याचार किए। जिसे भारत के लौह पुरुष सरदार पटेल द्वारा कुचल दिया गया था। वर्ष 1927 में स्थापित मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन निज़ाम समर्थक पार्टी थी। जो कि निज़ाम के हैदराबाद को पूरी तरह से भारतीय संघ में विलय नहीं करना चाहती थी।

अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एमआईएम के कासिम रिज़वी ने नेतृत्व वाले रजाकारों को बुलवाया। दरअसल रजाकार मूल रूप से जिहादी भीड़ थी, जिसे एमआईएम ने सड़कों पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए इस्तेमाल किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र रहे रिजवी को वर्ष 1946 में एमआईएम का अध्यक्ष चुना गया था, जिसने रजाकारों का नेतृत्व किया था। तब उसने इस क्षेत्र में हिंदुओं के खिलाफ सबसे जघन्य अपराध किए थे। यहाँ तक कि रजाकारों ने महिलाओं और बच्चों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार किए, हिंदुओं का उत्पीड़न किया और हिंदुओं की हत्याएं कीं। लेकिन जल्द ही सरदार पटेल ने सामने आकर इस पागलपन का अंत कर दिया। उन्होंने निज़ाम को घुटने के बल लाया और उसे भारतीय संघ में प्रवेश करने के लिए मजबूर कर दिया। ऑपरेशन पोलो भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया था, जिससे रजाकार भारतीय सेना से दंग थे। यही कारण था कि उन्होंने विनम्रतापूर्वक आत्मसमर्पण कर दिया। जिसके बाद निजाम के मंत्री लईक अली और कासिम रिज़वी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जिसके चलते रिजवी ने आखिरकार नौ साल की जेल की सजा काटी और फिर उसे इस शर्त पर रिहा किया गया कि वह पाकिस्तान के लिए रवाना हो जाएगा। जिसे उसने पूरा किया।

हालाँकि, पाकिस्तान जाने से पूर्व एमआईएम की एक बैठक में रिजवी ने एमआईएम के नेतृत्व को असदुद्दीन ओवैसी के दादा अब्दुल वाहिद ओवैसी को पार्टी का पुनरुद्धार करने के लिए सौंप दिया। जिसके बाद एमआईएम ने अखिल भारतीय एमआईएम के रूप में खुद को फिर से चुना और चुनाव लड़ने के लिए खुद को आगे बढ़ाया। इस प्रकार साफ तौर पर असदुद्दीन ओवैसी के परिवार को एआईएमआईएम के नेतृत्व में एक नरसंहारकारी व्यक्ति द्वारा सौंपा गया था। जो चाहता था कि हैदराबाद या तो स्वतंत्र रहे या पाकिस्तान में मिल जाए।

रजाकार और एमआईएम को केवल भारतीय सेना और भारत के लौह पुरुष सरदार पटेल की इच्छाशक्ति के कारण अपने पागलपन को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। असदुद्दीन ओवैसी ने यह दावा करने के लिए कि उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान को खारिज कर दिया है और दो-राष्ट्र सिद्धांत की थ्योरी को खारिज कर दिया है तो यह बिल्कुल झूठ है। इसके अलावा उनके दादा साफ तौर पर नरसंहार के एक सहयोगी थे। जिन्होंने रजाकारों का नेतृत्व किया, जबकि उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ अत्याचारों की मेजबानी की। इसके अलावा उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी के आचरण से साबित होता है कि रजाकारों के समय से उनकी विचारधारा में कोई ख़ास बदलाब नहीं आया है। यह तो केवल उनकी रणनीति है जो कुछ बदल गई है।

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JNU में आतंक के 8 घंटे: मास्क लगाए गुंडों ने मचाई तबाही, छात्र-छात्राओं से लेकर टीचर-गार्ड तक घायल

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वामपंथियों ने रविवार (जनवरी 5, 2019) को जम कर उत्पात मचाया। न सिर्फ़ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं की पिटाई की गई बल्कि अन्य छात्रों को भी उनके हॉस्टल रूम में घुस-घुस कर मारा पीटा गया। कई तस्वीरों में गुंडे मास्क पहन कर हाथ में डंडे लिए घुमते दिख रहे हैं। उपद्रवियों ने लोहे के रॉड से अन्य छात्रों की पिटाई की। ये वारदात पेरियार हॉस्टल में हुई। कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए हैं। कई अन्य छात्रों को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।

जेएनयू एबीवीपी के अध्यक्ष दुर्गेश ने बताया कि क़रीब 500 की संख्या में वामपंथी छात्र अचानक से हॉस्टल में जमा हो गए। वो सभी लाठी-डंडों और रॉड से लैस थे। उन्होंने हॉस्टल में तोड़फोड़ मचानी शुरू कर दी। फिर वो कमरे में घुस-घुस कर छात्रों की पिटाई करने लगे। एबीवीपी नेता व जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी मनीष को इस घटना में ख़ासी चोट आई है। एबीवीपी की महसचिव निधि त्रिपाठी ने अधिक जानकारी देते हुए बताया:

“जेएनयू में पिछले कई दिनों से नक्सली गिरोह का आतंक चरम पर है और वे छात्रों को सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं करने दे रहे हैं। आज जब छात्रों ने वामी नक्सलियों की बात नहीं मान कर रजिस्ट्रेशन की माँग की तो छात्रावास के कमरों में घुसकर लाठी और लोहे की रॉड से हमला किया। कई छात्र बुरी तरह से घायल हैं।”

जेएनयू हॉस्टल में आतंक

मास्क पहने गुंडों ने हॉस्टल में जम कर पत्थरबाजी भी की। उन्होंने छात्रों के साथ-साथ गार्डों को भी निशाना बनाया। हालाँकि, वामपंथियों के नेतृत्व वाले जेएनयू छात्र संगठन ने इन आरोपों से इनकार किया है और दावा किया है कि एबीवीपी झूठ फैला रही है। एबीवीपी ने कहा है कि अभी छात्रों का इलाज पहली प्राथमिता है। इसके बाद संगठन इस मामले की पुलिस में शिकायत दर्ज कराएगा।

वामपंथी छात्रों पर लगा हिंसा का आरोप

वीडियो में देखा जा सकता है कि हॉस्टल में शीशे के टुकड़े बिखरे पड़े हुए हैं और तोड़फोड़ मची हुई है। साथ ही हाथों में डंडे व रॉड लिए घुमते चेहरे ढके लोगों को भी देखा जा सकता है। गुंडों ने क़रीब 8 घंटे तक हिंसा व दंगे किए। इस वारदात के बाद एबीवीपी के 2 छात्र गायब बताए जा रहे हैं। कुछ अन्य छात्रों का भी कुछ अता-पता नहीं है। इस हमले में 25 छात्र घायल हुए हैं। कुल 11 छात्र अभी भी मिसिंग बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि मास्क पहने गुंडों बाहरी भी हो सकते हैं।

एबीवीपी ने दिल्ली पुलिस से गुहार लगाई है कि उसके छात्रों को बचाया जाए। कई छात्राओं ने कुर्सी व टेबल के नीचे छिप कर ख़ुद को मास्क पहने गुंडों के आतंक से बचाया। एक छात्रा वेलेंटिना ब्रह्मा ने बताया कि उसे वामपंथी छात्रों ने पीटा है। उसने पूछा कि अब छात्र रजिस्ट्रेशन के लिए कहाँ जाएँगे?

ABVP के आरोपों के उलट वामपंथी छात्र संगठनों ने JNU में हुई हिंसा का आरोप एबीवीपी पर ही लगाया है। कौन से गुट ने हिंसा की, यह तो पुलिस जाँच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा लेकिन ऊपर के वीडियो में दिख रही महिला सुरक्षा गार्ड ने स्पष्ट बताया है कि पेरियार हॉस्टल के दाढ़ी वाले लड़के ने, जो हरे रंग का शॉल ओढ़े हुए था, उसने लात मारी।

पिछले 2-3 महीने से JNU कैंपस के अंदर जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसके बिंदुओं को जोड़ने पर बहुत कुछ स्पष्ट होने लगता है। मसलन विरोध के नाम पर क्लास नहीं होने देना, विरोध के नाम पर शोध कर रहे प्रोफेसरों को लैब में जाने से रोकना, विरोध के नाम पर एम्बुलेंस का रास्ता रोकना या फिर पुलिस से पहचान छिपाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाना – यह सुब कुछ इन्हीं लिबरलों के द्वारा किया जा रहा है।

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