उत्तरप्रदेश के महाराजगंज के पनरिया थाना क्षेत्र में अजहरुद्दीन उर्फ़ अजहर नामक एक मुस्लिम युवक ने अपनी बहन के हिंदू पति को कुल्हाड़ी से काट डाला। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित युवक खून से लथपथ हालत में खुद थाने पहुँचा और प्रतिशोध में अपनी बहन के पति की हत्या करने की बात को पुलिसकर्मियों के आगे स्वीकारा। युवक की बात सुनते ही पुलिस सन्न रह गई और मौक़े पर पहुँचकर मामले की जाँच की।
बताया जा रहा है कि 28 वर्षीय मृत युवक बृजेश ने 5 साल पहले अपने ही गाँव में रहने वाली सफीबुन नामक मुस्लिम लड़की से गोरखनाथ मंदिर में शादी की थी। शादी के दौरान लड़की ने अपना नाम बदलकर विजयलक्ष्मी कर लिया था। अब चूँकि मामला दो अलग-अलग धर्मों का था, तो लड़की पक्ष को यह संबंध नागवार था। लेकिन बृजेश फिर भी अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ उसी गाँव में रहता था।
जानकारी के मुताबिक, यही बात लड़की के भाई अजहर को भीतर ही भीतर चुभती थी। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अजहर ने पहले दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन जब उन्होंने उसकी बात नहीं मानी, तो उसने बृजेश को रास्ते से हटाने की ठान ली।
लंबे समय से बृजेश पर घात लगाए बैठे अजहर को अपनी बहन के पति पर हमला करने का मौका बुधवार को मिला। दोपहर के करीब ढाई बजे उसने बृजेश को चौराहे से वापस घर आते देखा और उस पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ हमला कर दिया।
हत्या के बाद बिलखते बृजेश के परिजन (साभार: oneindia.com)
वारदात को अंजाम देते हुए कई ग्रामीणों ने अजहर को देखा और उसे पकड़ने की कोशिश भी की। लेकिन अजहर वहाँ से भागकर सीधे पनियारा थाना पहुँच गया।
इकबाल-ए-जुर्म करते हुए अजहर ने पुलिस को बताया कि उसकी बहन ने दूसरे समुदाय के युवक से शादी की थी। इसलिए उसने बदला लेने के लिए इस घटना को अंजाम दिया।
गौरतलब है पूरा मामला दो समुदायों का जुड़ा होने के कारण गाँव में तनाव फैल गया था। जिसके कारण पुलिस को पूरे गाँव को छावनी में बदलना पड़ा। बताया जा रहा है कि घटना के बाद गुस्साई भीड़ ने आरोपित के घर को जलाने का प्रयास किया था, लेकिन पुलिस ने समय रहते स्थिति को संभाल लिया। जानकारी के मुताबिक अजहर अब पुलिस हिरासत में है। उससे मामले में आगे की पूछताछ की जा रही है। साथ ही गाँव की शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस सतर्क है।
एक 10 साल के बच्चे (लड़के) जिसके हाथों से अभी खिलौने छूटे भी नहीं थे, उस मासूम के दामन में वहशीपन की सारी हदें पार करते हुए मदरसे के मौलवी ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक ऐसी दर्द भरी दास्तां लिख दी, जिसकी भरपाई तो उनकी मौत से भी नहीं हो सकती।
दरअसल, पाकिस्तान के मानसेहरा ज़िले में 10 साल के एक बच्चे के साथ दरिंदगी भरा ऐसा दुर्व्यवहार किया गया जिससे किसी की भी आत्मा काँप जाए। GNN की ख़बर के अनुसार, एक मदरसे के मौलवी शमशुद्दीन ने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर 10 साल के बच्चे का 100 से अधिक बार बलात्कार किया।
पीड़ित बच्चे को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी सांसे ज़िंदगी और मौत के बीच अभी भी अटकी हुई हैं। बच्चे के साथ बर्बरतापूर्ण बलात्कार की वारदात को इस बेरहमी से अंजाम दिया गया कि उस मासूम की आँखों से आँसू की जगह ख़ून बह रहा था। ख़बर में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि आरोपितों ने बच्चे के साथ न सिर्फ़ दरिंदगी की बल्कि उस मासूम को कई तरह की अमानवीय यातनाएँ भी दीं।
प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट मिलने के बाद, पुलिस ने मदरसे के मौलवी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है, जबकि फ़रार आरोपितों की धर-पकड़ के लिए छापेमारी की जा रही है। इस बीच, पीड़ित बच्चे की गंभीर हालत को देखते हुए उसे अयूब मेडिकल कॉम्प्लेक्स में ट्रांसफर कर दिया गया। दूसरी ओर, खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री ने घटना को संज्ञान में ले लिया है। मुख्यमंत्री ने आला अधिकारियों को जल्द से जल्द दोषियों को गिरफ़्तार करने के निर्देश दिए हैं।
10 साल का एक मासूम, जो एक मौलवी के भेष में छिपे राक्षस को पहचानने में पूरी तरह से असमर्थ था, वो अबोध इस बात से बिल्कुल बेख़बर था कि मौलवी की गंदी नज़रें उसे धर-दबोचने के लिए न जाने कब से उसके कोमल बदन पर गड़ी हुई थीं, और मौक़ा मिलते ही उसने बच्चे को वो ज़ख्म दे डाले जो ताउम्र न उसे जीने देंगे और न मरने देंगे। यह सोचकर भी कलेजा मुँह को आ जाता है कि ऐसे वहशियों के लिए अगर फाँसी की सज़ा भी मुक़र्रर की जाए तो वो भी कम पड़ जाएगी।
देश के लिए बलिदान कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए सबसे ऊपर है। हमारी स्थापना के बाद से, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और आगे भी हमेशा सबसे पहले भारत है।
कॉन्ग्रेस ने यह ट्वीट शनिवार (28 दिसंबर 2019) को किया। अपने 135वें स्थापना दिवस पर। लेकिन, क्या उसके लिए 2019 का भी यही सच है? इसका आकलन करने के लिए उसके स्थापना दिवस से बेहतर मौका क्या हो सकता है।
2019 के कॉन्ग्रेस पर गौर करने से पहले 2017-18 के उसके कारनामों पर एक नजर डाल लेते हैं। 2014 के आम चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद हार की समीक्षा के लिए एके एंटनी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने एक समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि पार्टी की हार का एक बड़ा कारण हिंदू विरोधी छवि बन जाना है। यह छवि रातोंरात नहीं बनी थी। न ही इसमें भाजपा और मोदी के उभार का योगदान था। असल में सालों से जो कॉन्ग्रेस तुष्टिकरण के पत्ते फेंक रही थी उसके कारण ही आम हिंदुओं के मन उसकी यह छवि यह गहरी हुई थी। सो, कायदे से इस छवि से बाहर आने के लिए कॉन्ग्रेस को बहुसंख्यकों की भावनाओं का सम्मान करना सीखा। लेकिन, उसने मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा के बहाने इस छवि से बाहर निकलने का रास्ता तलाशा।
यही करण है कि 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गॉंधी मंदिरों की सीढ़ियॉं चढ़ते देखे गए।कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बकायदा ऐलान किया- राहुल गॉंधी जी सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि वह जनेऊधारी हिंदू हैं। गुजरात की सत्ता से कॉन्ग्रेस का वनवास तो खत्म नहीं हुआ, लेकिन अरसे बाद वह लड़ती दिखाई पड़ी। फिर आया 2018। इसी साल के अंत में तीन राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा से छिटक कर कॉन्ग्रेस की झोली में गए। इसी साल राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल ने खुद को कौल ब्राह्मण और दत्तात्रेयी गोत्री बताया।
तीन राज्यों में जीत से उत्साहित कॉन्ग्रेस 2019 के आम चुनावों में औंधे मुॅंह गिरी। दादी इंदिरा गॉंधी जैसी नैन-नक्श का हवाला देकर जिस प्रियंका गॉंधी के लिए दावा किया जाता था कि वह सियासत में पूरी तरह सक्रिय होंगी तो मोदी मैजिक काफूर हो जाएगा, वह पार्टी महासचिव के रूप में उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की परंपरागत सीट से अपने भाई और पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गॉंधी की हार भी टाल नहीं पाईं। आम चुनावों के बाद पार्टी ने जिस अधीर रंजन चौधरी को लोकसभा में अपना नेता चुना उन्होंने पार्टी की फजीहत कराने का कोई मौका नहीं छोड़ा। यहॉं तक कि सदन में ही कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसला और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ‘निर्बला’ तक कह डाला। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए तो वह चौथे नंबर की पार्टी बन गई। हरियाणा में जाटों की हिंसा के सहारे सत्ता में लौटने का उसका सपना टूट गया। झारखंड में वह महज 14 फीसदी वोटरों का भरोसा ही जीत पाई। वैसे भी, लिबरलों को छोड़कर कॉन्ग्रेस से इन चुनावों में किसी को चमत्कार की उम्मीद नहीं थी और वह उम्मीदों पर खरी ही उतरी।
लेकिन अपनी जिस छवि को तोड़ने के लिए 2017-18 में वह तीन-तिकड़म करती दिख रही थी, उससे बाहर निकलने के उसे 2019 में दो बड़े मौके मिले। उसने दोनों हाथों से इसे गॅंवाया। अगस्त में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया। यह मौका था कॉन्ग्रेस के लिए शेष भारत की भावनाओं के सम्मान का। कश्मीर में किए गए नेहरू के प्रयोगों का फातिहा पढ़ने का। लेकिन, इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस ने विरोध के जो सुर दिखाए उसका हवाला लेकर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ पहुॅंच गया। मजहब विशेष की तरफदार बनते-बनते उसकी छवि देश विरोधी हो गई। यही कारण है कि उस समय सोशल मीडिया में ऐसे संदेशों की भरमार थी जिसमें कहा गया था- दरअसल कॉन्ग्रेसी विरोध नहीं कर रहे हैं, कॉन्ग्रेस का पिंडदान कर रहे हैं।
कॉन्ग्रेस के लिए दूसरा मौका आया इस साल के आखिरी महीने में। इस्लामी मुल्क पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का रास्ता साफ करने के लिए केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लेकर आई। यह मौका था कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू की सोच के साथ खड़े होने का। वही सोच जिसकी झलक तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा 8 जनवरी 1948 को बीजी खेर को भेजे टेलीग्राम में मिलती है। इसमें नेहरू ने कहा है- स्थितियों को देखते हुए (सिंध में गैर-मुस्लिमों की हत्या और लूट-पाट हो रही थी), सिंध से हिन्दू और सिख लोगों को निकालना होगा। पहले लोकसभा चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र पर टिके रहने का। इस घोषणा पत्र को नेहरू ने खुद तैयार किया था। इसमें कहा गया था- पिछले चार सालों की सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों का पुनर्वास है। इस पर तात्कालिक और लगातार ध्यान देने की जरूरत है।
जब इस वादे की याद दिलाई गई तो कॉन्ग्रेस को वह भी रास नहीं आया। केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि मोदी सरकार ने महात्मा गाँधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस द्वारा किया गया वो वादा पूरा किया है जो उन्होंने पाकिस्तान में प्रताड़ित किए गए लोगों से किए था। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम की नींव साल 1985 और 2003 में रख दी गई थी। मोदी सरकार ने इस अधिनियम को केवल कानूनी रूप दिया है। खान के यह कहने पर कॉन्ग्रेस ने उनसे उस कार्यक्रम में नहीं आने को कहा जिसका उन्हें न्योता भेजा गया था। यहॉं जानना जरूरी है कि आरिफ मोहम्मद पुराने कॉन्ग्रेसी रहे हैं और राजीव गॉंधी की कैबिनेट में भी थे। इस कानून से जिन लोगों को लाभ होना है उनमें बहुतायत दलित और वंचित तबके से हैं। लेकिन, कॉन्ग्रेस की शह पर इसके खिलाफ जिस तरह के हिंसक प्रदर्शन हुए उसने कॉन्ग्रेस के बहुसंख्यक विरोधी होने की धारणा को और मजबूत किया है। यहॉं तक कि दिल्ली से लेकर देश के अन्य हिस्सों में हुए हिंसक प्रदर्शनों में कॉन्ग्रेस के नेता नामजद तक हुए हैं।
बावजूद इसके कॉन्ग्रेस समुदाय विशेष का भरोसा जीतने में भी कामयाब होती नहीं दिख रही। सीएए विरोधी हिंसा के बीच झारखंड में चुनाव हुए। लोकनीति और सीएसडीएस का सर्वे बताता है कि भले ही भाजपा इस राज्य में हार गई हो, लेकिन उसे मजहब विशेष के भी 14 फीसद वोट मिले हैं। यानी, वह दौर भी बीत चुका है कि जब समुदाय विशेष आँख मूॅंद कॉन्ग्रेस के पीछे लग लेते थे।
कॉन्ग्रेस की दुश्वारियॉं इतनी ही नहीं हैं। महाराष्ट्र में भले ही वह पिछले दरवाजे से सत्ता में उसी तरह एडजस्ट हो चुकी हो जैसा उसने 2018 में कर्नाटक में किया था। लेकिन, 2019 में कर्नाटक का प्रयोग असफल साबित हुआ था। महाराष्ट्र के भी लक्षण वैसे ही दिख रहे। झारखंड में तो कॉन्ग्रेस का उसी सरकार के विरोध में धरने पर बैठने का इतिहास ही रहा है, जिनमें वह शामिल रही है। यहॉं तक कि अब उसे चलाने में गॉंधी परिवार की दिलचस्पी भी नहीं दिखती। सोनिया ने तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में एक भी रैली नहीं की। प्रियंका की एकमात्र रैली झारखंड में हुई। राहुल ने महाराष्ट्र और झारखंड में पॉंच-पॉंच तथा हरियाणा में दो रैलियॉं की।
2019 में भी कॉन्ग्रेस के पास कोई रणनीति नहीं दिखी। न उसकी सोच स्पष्ट रही। हॉं, नीयत का खोट हर मौके पर दिखा। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या सीएए, एनपीआर या फिर एनआरसी। इन सभी मसलों पर कॉन्ग्रेस के झूठ एक-एक कर सामने आ रहे हैं। ऐसे में 2020 कॉन्ग्रेस के लिए किसी भयावह सपने जैसा साबित हो तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए।
सोमालिया की राजधानी मोगादिशु के व्यस्त इलाक़े में शनिवार (28 दिसंबर) को एक कार बम विस्फोट हुआ। इस विस्फोट में 90 से अधिक लोगों के मारे जाने की ख़बर है। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं। घायलों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
Breaking: At least 50 people dead after a suicide bombing in Mogadishu, Somalia. (Via Radio Dalsan) pic.twitter.com/p02ol7NStp
इस कार बम विस्फोट की पुष्टि मोगादिशु के मेयर उमर मुहम्मद ने की है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि विस्फोट में कम से कम 90 नागरिक मारे गए, जबकि अधिकतर छात्र घायल हुए। इस विस्फोट की ज़िम्मेदारी अभी तक किसी ने नहीं ली है।
Mogadishu Mayor Omar Filish says 90 people injured in the truck bomb on Saturday morning on the ex-control busy junction he did not mention the death toll, he also said that the truck was heading to Mogadishu but the security forces intercepted. #Somaliapic.twitter.com/AfchHapUoz
इसके बाद क़ानूनविद अब्दिरिजाक मोहम्मद ने भी ट्विटर के माध्यम से इस घटना की सूचना दी। उनके अनुसार, बम विस्फोट में 17 पुलिस अधिकारी, 73 नागरिक और 4 विदेशी नागरिक विस्फोट के पीड़ितों में शामिल हैं। ये बम विस्फोट शहर के टैक्स ऑफ़िस के पास हुआ है। इसमें 4 तुर्की इंजीनियरों के साथ 50 लोगों के मारे जाने की बात कही गई है। इसके अलावा अन्य लोग भी मारे गए हैं। ये भीड़भाड़ वाला इलाक़ा बताया जा रहा है।
BREAKING: Death toll in Mogadishu car bombing rises to at least 90, including 17 police officers and 4 foreign nationals, MP Abdirizak Mohamed says https://t.co/uz2bOOYFKX
रेडियो दलसन ने सोमाली सुरक्षा सेवाओं के हवाले से कहा कि विस्फोट में मारे गए तुर्की के इंजीनियर हमलावरों का मुख्य निशाना हो सकते हैं। बता दें कि सोमालिया 1991 के बाद से एक हिंसक संघर्ष में उलझा हुआ है और अल-क़ायदा से संबद्ध अल-शबाब समूह द्वारा किए गए बम हमलों से नियमित रूप से परेशान है। ये ग्रुप यहाँ आए दिन किसी न किसी तरह से विस्फोट करके शांति व्यवस्था को ख़राब करता रहता है। समूह यूएन-बैक सोमाली सरकार को बाहर करने की माँग कर रहा है। जबकि समूह को मोगादिशु से निष्कासित कर दिया गया है, यह राजधानी में आतंकी वारदातों को अंजाम देता है।
बीते दिनों देश भर में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में सड़कों पर दंगा करने उतरे उपद्रवियों को मीडिया गिरोह के लोगों ने खूब समर्थन दिया। रवीश कुमार, बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई जैसे चेहरों ने इन दंगाइयों को इस पूरे अंतराल में नायक/नायिका बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। द वायर, द प्रिंट, ऑल्ट न्यूज़, बीबीसी जैसे कई मीडिया संस्थानों ने अपने एजेंडे के तहत पुलिस पर हुई हिंसा का पक्ष न दिखाकर, दंगाइयों पर हो रहे पुलिस एक्शन को अत्याचार की तरह दिखाया। लेकिन इसी बीच एनडीटीवी इन सबसे दो कदम ज्यादा आगे निकल गया। NDTV ने अपनी रिपोर्टिंग में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयान को ही अपने प्रोपेगेंडा के अनुरूप बदलकर न्यूज तैयार कर दी।
दरअसल, यूपी में पिछले दिनों भड़की हिंसा पर कानून प्रशासन की सख्ती को लेकर कल (27 दिसंबर 2019) योगी आदित्यनाथ ऑफिस के ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट आया। इसमें उन्होंने संदेश देना चाहा कि योगी सरकार की सख्ती देख कर अब राज्य में हिंसा भड़काने वालों के मनसूबे शांत हैं। हर दंगाई हतप्रभ है। हर उपद्रवी हैरान है। अपने ट्वीट में उन्होंने दंगाइयों को चेतावनी भी दी कि हिंसक गतिविधि करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। जिन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है, उनकी संपत्ति से ही उस क्षति की क्षतिपूर्ति की जाएगी।
हर दंगाई हतप्रभ है।
हर उपद्रवी हैरान है।
देख कर योगी सरकार की सख्ती मंसूबे सभी के शांत हैं।
कुछ भी कर लो अब, क्षतिपूर्ति तो क्षति करने वाले से ही होगी, ये योगी जी का ऐलान है।
हर हिंसक गतिविधि अब रोयेगी क्योंकि यूपी में योगी सरकार है। #TheGreat_CmYogi
अब हालाँकि किसी के बोले शब्दों को अपने वाक्यों में गढ़कर खबर बना देना एक आम बात है, लेकिन उसमें समाहित संदेश के साथ छेड़छाड़ करना न केवल नैतिक रूप से गलत है बल्कि अपराध भी है। NDTV इंग्लिश वाली वेबसाइट ने योगी आदित्यनाथ ऑफिस के द्वारा ट्वीट की गई कविता का जो अनुवाद किया, उसमें दरअसल संदेश के साथ छेड़छाड़ का ही मामला है। जबकि उसका अंग्रेजी में ट्रांस्लेशन कुछ इस प्रकार होना चाहिए था।
Every rioter is stunned. Every rowdy/troublemaker is shocked. Watching Yogi govt’s strict ways everyone is sitting calm. Do whatever you wish, rioters will pay for the damage, this is Yogi ji’s announcement. Every violent act will now cry (of fear) because now UP has Yogi govt.
गौर देने वाली बात है चूँकि ट्वीट में ‘उपद्रवी’ और ‘दंगाई’ शब्द लिखा है, तो उसका अनुवाद अंग्रेजी में rioter, trouble maker, rowdy आदि होता है। लेकिन एनडीटीवी ने अपने प्रोपगेंडा फैलाने के लिए इन शब्दों की जगह ‘protester’ शब्द का प्रयोग किया। जैसा ऊपर बताया कि इन दंगाइयों को कुछ मीडिया गिरोह के लोगों ने पूरी हिंसा के बीच नायक/नायिका बनाने की कोशिश की, शायद ये उसी कड़ी का अगला भाग है – दंगाइयों को Hero/Shero बनाओ और मुख्यमंत्री चूँकि BJP का है, इसलिए उन्हें खलनायक।
How conveniently NDTV translated the word उपद्रवी to ‘Protester’ and changed the complete meaning of Yogi’s tweet and said ‘Yogi Justifies UP Crackdown’ pic.twitter.com/07VWCjUovs
सब जानते हैं कि protester शब्द सकात्मक रूप में प्रदर्शन पर बैठे लोगों के लिए इस्तेमाल होता है। लेकिन दंगाइयों के लिए इसे इस्तेमाल करने का क्या मतलब? वो भी तब जब आप अपनी खबर में किसी ऐसे व्यक्ति के बयान को आधार बना खबर लिख रहे हैं, जो भारत के सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री है। तब इस तरह की गलती का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन आप तो ठहरे NDTV, आप खबर कम प्रोपेगेंडा में ज्यादा विश्वास रखते हैं इसलिए…
खैर, एनडीटीवी ने यहाँ केवल सिर्फ़ शब्दों के अनुवाद में फेरबदल की गलती नहीं की, बल्कि उसने पूरे ट्वीट के अर्थ को ही अपने मनमुताबिक बदल दिया। क्योंकि ट्वीट की जिस पंक्ति का एनडीटीवी ने मतलब बदला, उसका असलियत में अंग्रेजी अनुवाद All the rioters are shocked (to see police action) होगा। लेकिन, अपनी रिपोर्ट में NDTV जानबूझकर उल्टा लिखा। NDTV ने लिखा, ‘SHOCKED EVERY PROTESTER’ जिसका मतलब है कि ‘हर प्रदर्शनकारी को (पुलिस ने/सरकार ने) हैरान कर दिया है।’
Everyone knows that NDTV is culprit to manipulate the words and creating narrative according to them but nobody taking action against them……
हालाँकि, साल 2014 के बाद से ये बात सब जान चुके हैं, कि एनडीटीवी शब्दों में उलट-फेर करके, दर्शकों को मुद्दे से भटकाकर अपना नैरेटिव तैयार करने में माहिर है। लेकिन, इस बार उन्होंने अपनी कुंठा निकालने के लिए यूपी के मुख्यमंत्री के बयान के साथ जो छेड़छाड़ की है, वो न केवल निंदनीय है बल्कि शर्मनाक भी। इस हरकत के लिए सोशल मीडिया पर यूजर्स न केवल उनकी थू-थू कर रहे हैं, बल्कि एनडीटीवी के ‘मीडिया संस्थान’ होने के तमगे पर भी सवाल उठा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि कोई एनडीटीवी वालों को अच्छी डिक्शनरी लाकर दे, तो किसी का कहना है कि अगर इस संस्थान वालों की हिंदी बेकार है तो वो गूगल ट्रांस्लेटर का प्रयोग कर सकते हैं। वहीं, एक यूजर का कहना है कि इनका बस अगर चले तो ये ‘हाफिज’ को भारत रत्न दे दें।
How conveniently NDTV translated the word उपद्रवी to ‘Protester’ and changed the complete meaning of Yogi’s tweet and said ‘Yogi Justifies UP Crackdown’ pic.twitter.com/07VWCjUovs
इतिहासकार और लेखक विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple) ने एक कार्यक्रम के दौरान यह स्वीकार किया कि देश में वामपंथी शिक्षाविदों और नेहरूवादी इतिहासकारों ने वास्तव में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को अपने क़ब्ज़े में कर भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद अपने प्रोपेगेंडा को फैलाना शुरू कर दिया था।
पिछले हफ्ते दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस द्वारा आयोजित एक टॉक शो – ‘Express Adda’ में बोलते हुए, लेखक डालरिम्पल ने कहा कि यह सच था कि शुरुआत में नेहरूवादी पाठ्य-पुस्तकें रोमिला थापर और अन्य मार्क्सवादियों द्वारा लिखी गई थीं। उन्होंने यह भी कहा कि मार्क्सवादियों ने दिल्ली के राजनीति चश्मे से मुगलों का महिमामंडन और हिन्दू-मुस्लिम एकता के खोखले दावे करते हुए मनगढ़ंत इतिहास को गढ़ने का काम किया। इतिहास लेखन के कार्य में वामपंथियों ने दक्षिणपंथियों को बिल्कुल हाशिए पर रखा और उनके लिए कोई जगह बाक़ी नहीं छोड़ी, जबकि वो यह अच्छी तरह से जानते थे कि वास्तव में वो भारत का इतिहास था ही नहीं, जिसका प्रचार वामपंथी अपने प्रोपेगेंडा के तहत कर रहे थे।
इस कार्यक्रम के होस्ट ने डालरिम्पल से पूछा कि क्या यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद क्या शिक्षाविदों का वामपंथियों द्वारा हरण कर लिया गया था और क्या अकादमिक हिस्से पर वामपंथियों ने लगभग कब्जा कर लिया था, जैसा दक्षिणपंथियों द्वारा आरोप लगाया जाता रहा है?
इसका जवाब देते हुए विलियम डालरिम्पल ने कहा कि विशेष रूप से 1950 के दशक में लिखी गई इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों पर उनकी प्रामाणिकता को लेकर आज भी कई तरह के शक बरक़रार हैं। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर के लगभग सभी नेहरूवादी इतिहासकार महान इतिहासकार थे, जबकि इसके विपरीत दक्षिणपंथी इतिहासकारों की अगली पीढ़ी में वो बात नहीं दिखी।
इस पर डालरिम्पल से पूछा गया कि क्या उनका यह मतलब है कि दक्षिणपंथी वर्ग के द्वारा वामपंथी इतिहासकारों पर जो आरोप लगाए जाते रहे हैं, वो सही हैं? तो डालरिम्पल ने जवाब देते हुए कहा, “मार्क्सवादियों द्वारा लिखी गई इतिहास की किताबों में हिन्दू-मुस्लिम एकता को चाशनी में डूबा, कुछ ज्यादा ही महिमामंडित करता हुआ दर्शाया गया, इसलिए वामंथियों द्वारा गढ़े जा रहे मनगढ़ंत इतिहास पर उन्हें आपत्ति होती थी, जिसका वो पुरज़ोर विरोध भी करते थे।
दरअसल, इस सब बातों में ग़ौर करने वाली बात यह है कि विलियम डालरिम्पल का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब इन मार्क्सवादी इतिहासकारों की विश्वसनीयता और पक्षपात को लेकर देश भर में बड़ी बहस छिड़ी हुई है। इन्होंने (वामपंथियों) अपनी विचारधारा को जनता के बीच पहुँचाने के लिए पाठ्य-पुस्तकों को अपने प्रचार करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। अत: अब यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि हमने जो भारतीय इतिहास पढ़ा है, वह मनगढ़ंत है, और यह वामपंथियों की देन है।
इतिहास की ये पाठ्य-पुस्तकें कुछ और नहीं बल्कि उन नेहरूवादी शिक्षाविदों और मार्क्सवादी विद्वानों की करतूत हैं, जिनके अंदर एक हिन्दू-बहुल देश में हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार से डर बैठा हुआ था। यही कारण है कि धीरे-धीरे एक आंदोलन पनप रहा है, जिसके तहत भारत के इतिहास की किताबों के संशोधन की माँग लगातार की जा रही है।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध की आड़ में दंगा किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में इन दंगाइयों की हिंसक भीड़ ने सबसे ज्यादा उत्पात मचाया। अंततः पुलिस को भी वो तरीके अपनाने पड़े, जिनसे अमूमन प्रशासन बचता है। उत्पाती और दंगाई भीड़ को शांत करने के लिए पुलिस को कहीं लाठियाँ तो कहीं आत्मरक्षा में गोली तक चलानी पड़ी। दंगाइयों की भ्रामक बातें और लोगों तक न पहुँचें और कम से कम लोग उनकी चाल में फँसे, इसी को लेकर मेरठ के सिटी एसपी अखिलेश नारायण सिंह संबंधित एरिया में लोगों को समझाते (उग्र होकर, गुस्से में) हैं। और उनका यह वीडियो वायरल कर दिया जाता है मीडिया गिरोह के द्वारा।
इस विडियो में कुछ गालियाँ हैं (जिसकी ऑपइंडिया निंदा करता है), लेकिन जिस तरह से NDTV ने संदर्भ हटा कर पुलिस को ‘मुस्लिमों को धमकाया’ कह कर चलाया है, उससे प्रतीत होता है कि समुदाय विशेष के लोग चाहे आग लगाएँ, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करें, पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाएँ, NDTV उन सारी बातों को उनके अल्पसंख्यक होने का गीत गा कर झुठला देगा।
इस विडियो में पुलिस बार-बार बता रही है कि ‘खाओगे यहाँ (भारत) का, गाओगे वहाँ (पाकिस्तान) का’ नहीं चलेगा। किस देश में वहाँ की पुलिस या वहाँ का राष्ट्रभक्त नागरिक इस बात को बर्दाश्त करेगा कि कुछ लोगों को एक दुश्मन देश ज्यादा प्रिय है? पुलिस ने तर्क के साथ दंगाइयों को सही बात समझाने की कोशिश की है। चूँकि माहौल संवेदनशील है, टेंशन वाला है तो पुलिस के मुँह से कुछ अपशब्द भी निकले जो गुस्से में हम-आप सब के मुँह से निकलते हैं। जहाँ बात जीवन और मृत्यु की हो, लोगों की जानें जा सकती हों, आगजनी और दंगे हो रहे हों, वहाँ पुलिस की भाषा पर सवाल नहीं उठाना चाहिए, फिर भी ऑपइंडिया इस भाषा का समर्थन नहीं करता।
लेकिन NDTV ने वही किया जो उसे करने में आनंद मिलता है। ये कमाल की बात है (और नहीं भी) कि NDTV ने पाकिस्तान ज़िंदाबाद का विचार रखने वाले समुदाय विशेष को कुछ नहीं कहा। क्या अब ‘विरोध’ के नाम पर दुश्मन देश के पक्ष में नारे लगेंगे क्योंकि वहाँ ‘अपनी कौम’ के मुस्लिम रहते हैं? फिर ऐसे लोगों को अगर पुलिस पाकिस्तान जाने बोल रही है तो इसमें समस्या क्या है?
अपने मतलब की चीज या प्रोपेगेंडा पर संदर्भ की बात करने वाले मीडिया गिरोह यह भूल जाते हैं कि संदर्भ तो हर एक पल, हर एक इंसान या हर एक फैसले का होता है। फैज की “हम देखेंगे… बस नाम रहेगा अल्लाह का” वाले पर इसी मीडिया गिरोह ने संदर्भ की बात करते हुए लेख पर लेख दे मारे। तो क्या दंगे-आगजनी की जगह पुलिस के निर्णय संदर्भ से परे हो जाते हैं? उसकी व्याख्या क्यों नहीं! क्योंकि ये आपके नैरेटिव को सूट नहीं करता।
फिर भी संदर्भ जानना जरूरी है। और इससे बेहतर क्या होगा जब संदर्भ वो इंसान खुद बताए, जिसने सारी बातें कहीं हैं। सुनिए मेरठ के सिटी एसपी की बात कि क्यों उन्हें उग्र भाषा में चेतावनी देनी पड़ी थी उस दिन।
#Breaking | Meerut SP AN Singh responds to the charge against Meerut top cop who was seen asking protesters to ‘go to Pakistan’ in a viral video.
कर्नाटक के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस के विधायक डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु से 50 किमी दूर अपने कनकपुरा विधानसभा क्षेत्र के लोगों को क्रिसमस के तोहफ़े के रूप में ईसा मसीह की सबसे ऊँची प्रतिमा बनाने के लिए 10 एकड़ ज़मीन दी थी। इसकी क़ीमत उन्होंने अपने निजी कोष से 10.80 लाख रुपए देकर चुकाई थी।
ख़बर के अनुसार, येदियुरप्पा सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी द्वारा स्वीकृत भूमि की फिर से जाँच करने का फ़ैसला किया है। राजस्व मंत्री आर अशोका ने कहा कि आवंटित भूमि गोमला (चारागाह के तौर पर इस्तेमाल होने वाली सामुदायिक ज़मीन) है, न कि एक बंजर भूमि, जिसका दावा शिवकुमार ने किया था। उन्होंने कहा, “मैंने रामनगर ज़िले के डिप्टी कमिश्नर को भूमि आवंटन पर एक रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है।”
दरअसल, कनकपुरा में हरोबेले के ईसाई बहुल गाँव कपालीबेट्टा में ईसा मसीह की 114 फीट ऊँची प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव है। कनकपुरा शिवकुमार का विधानसभा क्षेत्र है। शिवकुमार के कार्यालय ने बताया कि उन्होंने अपने फंड से कपालीबेट्टा में न्यास के लिए सरकार से 10 एकड़ ज़मीन ख़रीदी थी। यह न्यास ही इस प्रतिमा का निर्माण करवा रहा है। कॉन्ग्रेस नेता शिवकुमार ने दावा किया कि यह प्रतिमा दुनिया में ईसा मसीह की सबसे ऊँची प्रतिमा होगी। इसकी आधारशिला उन्होंने 25 दिसंबर को एक प्रार्थना सभा में रखी थी।
वहीं, शिवकुमार पर तीखा हमला करते हुए ग्रामीण विकास मंत्री के एस ईश्वरप्पा ने कहा कि राम मंदिर के निर्माण का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस नेता ईसा मसीह की प्रतिमा के लिए धन दे रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “अपने नेता पर प्रभाव बनाने के लिए, कॉ़न्ग्रेस के नेता, जो भारत में जन्में वह भगवान राम के लिए भव्य मंदिर के निर्माण के विरूद्ध हैं। लेकिन, अपने पैसे से ईसा मसीह की प्रतिमा बनाने जा रहे हैं। अब तो सिद्धरमैया भी उन्हें (डी शिवकुमार को) कर्नाटक कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनने से नहीं रोक सकते।”
ನಮ್ಮ ಪವಿತ್ರ ದೇಶದಲ್ಲೇ ಹುಟ್ಟಿದ ಪ್ರಭು ಶ್ರೀ ರಾಮನ ಭವ್ಯ ಮಂದಿರ ನಿರ್ಮಾಣ ವಿರೋಧಿಸಿದ್ದ ಕಾಂಗ್ರೆಸ್ ನವರು, ತಮ್ಮ ನಾಯಕಿಯನ್ನು ಮೆಚ್ಚಿಸಲು ತಮ್ಮದೇ ಹಣದಲ್ಲಿ ವ್ಯಾಟಿಕನ್ ನಲ್ಲಿ ಹುಟ್ಟಿದ ಯೇಸುವಿನ ಪ್ರತಿಮೆ ನಿರ್ಮಿಸಲು ಹೊರಟಿದ್ದಾರೆ.
ಇನ್ನು ಇವರು ಕೆಪಿಸಿಸಿ ಅಧ್ಯಕ್ಷರಾಗುವುದನ್ನು ತಪ್ಪಿಸಲು ಸ್ವತಃ ಸಿದ್ದರಾಮಯ್ಯನವರಿಗೂ ಆಗುವುದಿಲ್ಲ. pic.twitter.com/wWenDz4mYZ
ग़ौरतलब है कि कर्नाटक कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधायक डीके शिवकुमार वर्तमान में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ज़मानत पर बाहर हैं। उन्हें इस मामले के संबंध में चार दिनों की पूछताछ के बाद 3 सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ़्तार किया था। ईडी ने गिरफ़्तार करने के बाद उनसे 14 दिन तक लगातार पूछताछ की थी। इसके बाद, 17 सितंबर को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें 1 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। इसके बाद 30 सितंबर को उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवाई हुई, उस समय कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई 14 अक्टूबर तक के लिए टाल दी थी।
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि गुवाहाटी हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए वर्ष 2009 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने पहले डिटेंशन सेंटर की स्थापना की थी। यहाँ पर घुसपैठियों (अवैध तरीके से देश में घुस आए लोग) को रखा जाता है।
शुक्रवार (27 दिसंबर) को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में तरुण गोगोई ने हाईकोर्ट के आदेश पर न सिर्फ डिटेंशन कैंप बनवाने की बात कही बल्कि यह क्यों जरूरी है, इस पर भी चर्चा की। बता दें कि असम में तरुण गोगोई लगातार तीन बार 15 साल तक प्रदेश में कॉन्ग्रेस सरकार का नेतृत्व कर चुके हैं।
ख़बर के अनुसार, असम में वर्तमान में ‘अवैध विदेशियों’ को रखने के लिए छ: डिटेंशन सेंटर हैं, लेकिन ये सभी जेलों के अंदर स्थित हैं। इसके अलावा, एक नया डिटेंशन सेंटर – केवल ‘अवैध विदेशियों’ को हिरासत में रखने के लिए गोलपारा ज़िले में निर्माणाधीन है।
पूर्व मुख्मंत्री ने डिटेंशन सेंटर की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा,
“डिटेंशन कैंप ज़रूरी हैं। जेलों में क़ैद विदेशियों की सज़ा पूरी होने के बाद, उन्हें कहाँ रखा जाएगा? जब तक उन्हें उनके देश में वापस नहीं भेजा जाता है, जहाँ से वे आए थे, तब तक आपको उन्हें एक डिटेंशन कैंप में ही रखना होगा।”
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारतीय अदालतों द्वारा दोषी ठहराए गए अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को राज्य के 100 विदेशियों के न्यायाधिकरणों (FTs) द्वारा ‘अवैध विदेशी’ के रूप में ‘घोषित’ श्रेणी से अलग रखा गया है।
इसके अलावा, केरल में विदेशी क़ैदियों के लिए एक ऐसी इमारत की खोज की जा रही है, जिसमें डिटेंशन सेंटर (हिरासत केंद्र) स्थापित किया जा सके। केरल के सामाजिक न्याय विभाग (DSJ) को डिटेंशन सेंटर में सुविधा स्थापित करने का काम सौंपा गया है।
नए डिटेंशन सेंटर की सुविधाएँ:
डिटेंशन सेंटर में सुविधा स्थापित करने का काम सामाजिक न्याय विभाग को सौंपा गया है।
इस विभाग को विदेशी क़ैदियों का विवरण राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (SCRB) से माँगना होगा।
यह डिटेंशन सेंटर उन लोगों का आवास होगा, जिन्होंने अवैध रूप से देश में प्रवेश किया था।
यह उन विदेशियों का भी आवास होगा, जिनके वीज़ा और पासपोर्ट की अवधि समाप्त हो गई थी।
इसमें विदेशी मूल के विचाराधीन क़ैदी भी शामिल रहेंगे।
विदेशी अपराधी जो यहाँ जेल की अवधि पूरी कर चुके हैं और निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उन्हें भी डिटेंशन सेंटर की सुविधाएँ मिलेंगी।
कुल मिलाकर असम के 3 बार के CM और केरल के सामाजिक न्याय विभाग द्वारा डिटेंशन सेंटर की आवश्यकता से उस भ्रमजाल को समझा जा सकता है, जो वर्तमान में विपक्षी पार्टियाँ फैला रही हैं। तरुण गोगोई (कॉन्ग्रेसी) हैं और केरल की वामपंथी सरकार जब खुद डिटेंशन सेंटर के पक्ष में है तो फिर गृहमंत्री अमित शाह ने जो इन्टरव्यू में कहा कि ‘आखिर घुसपैठियों को कहाँ रखा जाए’ वाली बात पर बवाल क्यों? यह तो किसी भी देश की एक आम प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे किसी कॉन्ग्रेसी-BJP-वामपंथी चश्मे से देखने की जरूरत नहीं। जब तक अवैध तरीके से किसी भी देश में घुसपैठिये आते रहेंगे, उस देश में डिटेंशन सेंटर की आवश्यकता बनी रहेगी।
केरल के कासरगोड क्षेत्र में शुक्रवार (27 दिसंबर) को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा निकाले गए रूट मार्च के दौरान डेमोक्रेटिक यूथ फेडेरेशन ऑफ़ इंडिया (DYFI) के गुंडों ने RSS कार्यकर्ताओं पर पत्थरबाजी की। हिंसा पर क़ाबू पाने के लिए केरल पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। इस हिंसा में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस मामला दर्ज करने की तैयारी में है। बता दें कि इस हिंसक झड़प में RSS के 15 कार्यकर्ता घायल हो गए हैं, जबकि इनके बचाव में आई पुलिस के 4 कर्मियों को भी चोटें आई हैं। इनमें 4 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।
ख़बर के अनुसार, कासरगोड के डीएसपी ने बताया कि शुक्रवार को नीलेश्वरम इलाक़े में RSS ने अपना मार्च निकाला था। इस दौरान DYFI के गुंडों ने RSS के कार्यकर्ताओं पर पत्थरबाज़ी की। DYFI के गुंडे RSS के मार्च को रोकने का प्रयास कर रहे थे। इस वजह से RSS और DYFI के गुंडों के बीच झड़प हो गई और उन्होंने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।
घटना की सूचने मिलने पर मौक़े पर पहुँची पुलिस को वहाँ अनियंत्रित भीड़ को हटाने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। फ़िलहाल, पुलिस इस हिंसा में शामिल उपद्रवियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने की तैयारी कर रही है। इस हिंसक झड़प में 4 पुलिसकर्मी के अलावा, 15 लोगों (RSS कार्यकर्ताओं को) को चोटें लगी हैं।
आपको बता दें कि RSS पर वामपंथी गुंडों के द्वारा हमले की यह पहली घटना नहीं है। इस महीने की 2 तारीख को पश्चिम बंगाल के मेटियाब्रुज में RSS से जुड़े वीर बहादुर सिंह पर दिन-दहाड़े गोली मारी गई थी, जिससे वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। मेटियाब्रुज वही इलाक़ा है, जिसे तृणमूल कॉन्ग्रेस के एक मंत्री ने ‘मिनी पाकिस्तान’ करार दिया था।
एक पाकिस्तानी पत्रकार को मेटियाब्रुज के बारे में बताते समय ममता बनर्जी के मंत्री फरहाद हाकिम ने बताया था कि गार्डन रीच वाला इलाक़ा कोलकाता का ‘मिनी पाकिस्तान’ है। उन्होंने ‘द डॉन’ के पत्रकार से कहा था- “आइए, आपको मिनी पाकिस्तान की सैर कराता हूँ।”