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राहुल गाँधी समलैंगिक हैं, कॉन्ग्रेस उनकी वर्जिनिटी की जाँच कराए: स्वामी चक्रपाणि

कॉन्ग्रेस सेवा दल की बुकलेट में वीर सावरकर और नाथूराम गोडसे के बीच समलैंगिक रिश्तों के उल्लेख होने का मामला तूल पकड़ने के बाद अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणी ने शुक्रवार (जनवरी 3, 2020) को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पर निशाना साधा है।

उन्होंने बुकलेट में लगाए गए आरोपों को ‘बकवास’ कहा है और साथ ही सावरकर पर की गई ओछी टिप्पणी का पलटवार करते हुए कहा कि हमने भी सुना है कि राहुल गाँधी समलैंगिक हैं। बता दें इससे पहले चक्रपाणि ने राहुल के सावरकर के ख़िलाफ़ दिए बयान पर शिकायत दर्ज करवाई थी।

एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू महासभा के प्रमुख स्वामी चक्रपाणि ने कॉन्ग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा, “ये पूर्व महासभा अध्यक्ष वीर सावरकर के ख़िलाफ़ बेहूदा आरोप हैं। जाहिर तौर पर हमने भी यह सुना है कि खुद राहुल गाँधी समलैंगिक हैं और उनका सिंधिया जैसे अनेक लोगों के साथ समलैंगिक संबंध रहा है।”

वे आगे कहते हैं, “हम कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से माँग करते हैं कि अगर राहुल गाँधी से जुड़ी इस बात में सच्चाई नहीं है, तो कॉन्ग्रेस पार्टी उनकी (राहुल गाँधी) वर्जिनिटी की जाँच कराएँ, उनके समलैंगिक न होने की जाँच कराएँ। हम भी सावरकरजी पर मूल्यांकन के लिए तैयार हैं।”

स्वामी चक्रपाणि का बयान

गौरतलब है कि स्वामी चक्रपाणि का ये बयान मध्यप्रदेश के भोपाल में कॉन्ग्रेस द्वारा चलाए जा रहे अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस सेवा दल के प्रशिक्षण शिविर में बाँटी गई ‘वीर सावरकर कितने ‘वीर’?’ नाम की पुस्तिका में लिखी बातों के ऊपर आई है। जिसमें बीजेपी पर निशाना साधने के लिए सावरकर को टारगेट करते हुए उनके आसपास की कई घटनाओं, सवालों और विवादों का जिक्र है।

विनायक दामोदर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर कॉन्ग्रेस द्वारा जारी की गई विवादित पुस्तिका में दावा किया गया है, “महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के साथ हिंदू महासभा के सह-संस्थापक का शारीरिक संबंध था।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डोमिनिक लैपिएरे और लैरी कॉलिन्स की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में उल्लेखित एक घटना का उल्लेख करते हुए, कॉन्ग्रेस द्वारा जारी बुकलेट में कहा गया है, ”ब्रह्मचर्य धारण करने से पहले, नाथूराम गोडसे के एक ही शारीरिक संबंध का ब्यौरा मिलता है। यह समलैंगिक संबंध था। उनका पार्टनर था उनका राजनैतिक गुरू वीर सावरकर।”

ABP की पत्रकार का दंगाइयों के लिए छलका दर्द, डिप्टी CM से पूछा- बेचारे गरीब हैं कैसे करेंगे नुकसान की भरपाई

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ देशभर में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुए। इस दौरान जगह-जगह पर उपद्रवियों द्वारा मचाए उत्पात में न सिर्फ़ सावर्जनिक सम्पत्ति की भयंकर हानि हुई बल्कि पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों को भी निशाना बनाया। उग्र विरोध-प्रदर्शनों में इन पर हिंसक तरीक़ों से हमले किए गए। इनमें आगजनी, पथराव, पेट्रोल बम और तेज़ाब भरी बोतलों से जानलेवा हमले करना तक शामिल है।

इन सबके मद्देनज़र भला कोई यह कैसे कह सकता है कि उन्मादी भीड़ में कोई बेचारा और मासूम भी था। कोई यह कैसे कह सकता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वो फ़ैसला ग़लत है, जिसमें सार्वजनिक सम्पति को हुई हानि की वसूली उपद्रवियों से ही वसूले जाने की बात कही गई थी। 

ABP की पत्रकार शोभना यादव ने एक कार्यक्रम के दौरान यूपी के डिप्टी सीएम से पूछा, “आपने कहा है कि उपद्रवियों से पैसे की वसूली की जाएगी जो सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचा है? अब दिक्कत क्या खड़ी हो गई है जो आपने चिन्हित किए हैं कि वो इतने गरीब लोग हैं? जिसे कहा जाए कि टाट-पट्टी पर सोते हैं। माता-पिता भी गरीब हैं…. लेकिन जिसके पास घर ही नहीं है।” अपने इस बेतुके सवाल से ABP की पत्रकार कितनी चालाकी से जान लेने पर उतारू मुस्लिम भीड़ को पाक-साफ़ करने की कोशिश करती नज़र आईं।

दरअसल, गुरुवार (2 जनवरी) को, ABP शिखर सम्मेलन 2020 में, उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश में हुए नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ दंगों पर चर्चा की गई। विरोध-प्रदर्शन के नाम पर दंगाइयों ने पुलिसकर्मियों पर हिंसात्मक हमले किए और सार्वजनिक सम्पत्तियों को नुक़सान पहुँचाया था।

पत्रकार शोभना यादव के जवाब में यूपी के डिप्टी सीएम मौर्य ने कहा कि दंगाइयों ने उत्तर प्रदेश की पुलिस पर जानलेवा हमले किए फिर भी पुलिस ने संयम बरतते हुए कार्रवाई की और स्थिति पर नियंत्रण रखने की कोशिश की। उन्होंने दोहराया कि सरकार किसी भी तरह की हिंसा को स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि निर्दोष को सम्मान दिया जाएगा और जो लोग हिंसा में शामिल थे उन्हें किसी भी हाल में उसे बख़्शा नहीं जाएगा।

पत्रकार को जवाबी प्रतिक्रिया में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि उत्तर प्रदेश अमीर और ग़रीब के बीच भेदभाव नहीं करेगा। उन्होंने इस बात का स्पष्ट संकेत दिया कि दंगाइयों में जो भी दोषी पाया जाएगा उससे क्षतिपूर्ति की जाएगी।

केशव प्रसाद मौर्य ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दंगाइयों के इतर राज्य के अन्य मुसलमानों (निर्दोष) को किसी बात का डर नहीं सताता क्योंकि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर पूरा भरोसा है। मौर्य ने यह भी कहा कि भाजपा सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं से मुसलमानों को लाभ मिल रहा है और वे बिना किसी भेदभाव के आगे भी लाभ प्राप्त करते रहेंगे।

इसके अलावा, डिप्टी सीएम मौर्य ने राज्य में हिंसक भीड़ के समर्थन के लिए कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अख़्तियार किया था। उन्होंने इस बात का भी ज़िक्र किया था कि दंगों की आड़ में बड़ी संख्या में सिमी और PFI जैसे कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों के उपद्रवी शामिल थे। उन्होंने राज्य में राष्ट्र विरोधी तत्वों को हिंसा भड़काने के लिए उकसाने का काम किया।

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जिस अस्पताल में 6 साल में मरे 6646 बच्चे, वहाँ मंत्री के स्वागत में बिछा ग्रीन कारपेट

कोटा के जेके लोन अस्पताल में दिसंबर से अब तक मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़कर 105 हो गई है। शुक्रवार की सुबह यहॉं एक और मासूम ने दम तोड़ दिया। जिस बच्ची की मौत हुई वह केवल 15 दिन की थी। मॉं-बाप ने उसका नाम भी नहीं रखा था। वैसे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा के दौरे से पहले प्रशासन ने अस्पताल को चकाचक कर दिया है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार उनके स्वागत के लिए अस्पताल में ग्रीन कारपेट बिछाया गया है।

यह राजस्थान के उस खस्ताहाल अस्पताल की हकीकत है जहॉं बीते 6 साल में 6646 बच्चे मरे हैं। ये आँकड़े खुद राजस्थान सरकार के हैं और इसे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने ट्विटर पर साझा किया है। इन्हीं आँकड़ों का हवाला दे राज्य सरकार कह रही कि पहले 1500 बच्चे मरते थे। इस साल सबसे कम बच्चे मरे हैं। आप जब इन आँकड़ों पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि बच्चों की मौत के मामले में मामूली कमी सरकारी व्यवस्था में सुधार के कारण नहीं हुआ है। इन आँकड़ों का एक सच यह भी है कि इस अस्पताल में दिसंबर महीने में सबसे ज्यादा मौत पिछले साल ही हुई है।

साभार: Twitter/@RaghusharmaINC

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट बताती है कि इतनी मौतों के बाद भी प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार की नींद टूटती नहीं दिख रही। अस्पताल भगवान भरोसे ही चल रहा है। एनआईसीयू वार्ड में एक वार्मर पर दो-दो शिशु भर्ती हैं। डॉक्टर जॉंच के लिए तो लिख देते हैं पर जॉंच के लिए कोई वार्ड में नहीं आता। बच्चे की सॉंस चलती रहे इसके लिए परिजन खुद ऑक्सीजन का सिलेंडर हाथ में थामे चल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राजस्थान के एक भी अस्पताल में बच्चों का सुपर स्पेशलिटी डॉक्टर नहीं है। राज्य में हर साल 28 दिन से कम उम्र में ही 34 हजार से ज्यादा बच्चे दम तोड़ देते हैं। एक वर्ष तक की उम्र के 41 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो रही। राज्य के मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध अस्पतालों में 230 में से 44 वेंटीलेटर खराब हैं। 1430 वार्मर खराब पड़े हैं। नतीजतन हर उम्र के प्रति सप्ताह 490 से अधिक बच्चे दम तोड़ रहे हैं।

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में 3 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की रिपोर्ट बताती है कि अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही बच्चों की मौत का एक अहम कारण है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जेके लोन अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं। दरवाजे टूटे हुए हैं। इसके कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते रहते हैं। अराजकता का आलम यह है कि जेके लोन अस्पताल के वार्ड में लगाने के लिए पिछले सप्ताह 27 हीटर खरीदे गए। लेकिन, ये हीटर कहॉं गए यह अस्पताल के अधीक्षक तक को मालूम नहीं है।

इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर शर्मा कहते हैं कि राज्य में सबसे पहले ICU की स्थापना कॉन्ग्रेस की सरकार ने 2003 में की थी। कोटा में भी बच्चों के ICU की स्थापना कॉन्ग्रेस सरकार ने 2011 में की थी। जेके लोन अस्पताल बीमार शिशुओं की मृत्यु पर सरकार संवेदनशील है। इस पर राजनीति नही होनी चाहिए।

लेकिन, इस मसले को राजनीतिक रंग देती तो खुद राज्य सरकार दिख रही है। ऐसा नहीं होता तो शर्मा ट्विटर पर गोरखपुर के एक अस्पताल को लेकर अखबार में प्रकाशित खबर की कटिंग ट्विटर पर शेयर नहीं कर रहे होते। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से नहीं पूछ रहे होते कि क्यों उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर राजस्थान से अधिक है? इतना ही नहीं वे यह भी कह चुके हैं कि बच्चों की मौत का मामला पीएमओ के इशारे पर उठाया जा रहा ताकि सीएए के खिलाफ विरोध दबाया जा सके। मौतों को नई बात नहीं मानने वाले राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी कह चुके हैं कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पूरे देश में जो माहौल बना हुआ है, उससे ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है।

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पाकिस्तान ने प्रोपगेंडा वॉर छेड़ने के लिए ISPR में भर्ती किए 1000 युवा: जिनका काम होगा भारत के ख़िलाफ़ झूठा प्रचार

पाकिस्तान में मेजर जनरल आसिफ गफूर के नेतृत्व वाली Inter-Services Public Relations (ISPR) ने भारत के खिलाफ सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार करने के लिए भारी संख्या में युवाओं की भर्ती की है। बताया जा रहा है ISPR ने इस काम के लिए 1000 युवाओं को 1 साल में ही बतौर इंटर्न भर्ती किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस काम के लिए पाकिस्तान सेना की मीडिया विंग ISPR हर महीने प्रतियोगिता आयोजित करती है। जिसमें सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ फर्जी माहौल बनाने वाले और अपने ट्वीट पर सबसे ज्यादा रिट्वीट पाने वाले युवाओं को पुरस्कार दिया जाता है। यहाँ पुरस्कार के रूप में इन पाकिस्तानी नेटिजन्स को फौजी फाउंडेशन में जॉब मिलती है।

रिपोर्ट के अनुसार, कहा जा रहा है कि अब तक इस प्रतियोगिता में 1 लाख से ज्यादा लोग भाग ले चुके हैं। जहाँ इन लोगों को भारत में ज्यादा फॉलोविंग वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स की लिस्ट दी गई और भारत के नेताओं, सैनिकों और नौकरशाहों के खिलाफ माहौल बनाने को कहा गया।

गौरतलब है कि बुधवार को मेजर जनरल गफूर ने एक ट्रेनर फाइटर प्लेन के मलबे का फोटो पोस्ट किया था, जिसका बालाकोट हमले से कुछ लेना-देना नहीं था। लेकिन फिर भी ट्वीट करते हुए गफूर ने लिखा कि पाकिस्तान ने बालाकोट हमले के दौरान इसे मार गिराया था।

पाकिस्तानी एजेंडे के तहत भारत के खिलाफ प्रोपगेंडे को हर रोज भारी तादाद में सोशल मीडिया पर फैलाने के लिए यूथ मशीनरी को पाक ISPR में भर्ती कर रहा हैं। झूठ फ़ैलाने के लिए युवाओं को बाकायदा ट्रेनिंग का भी प्रावधान किया गया है।

बता दें युवाओं को इस काम के लिए प्रेरित करने के लिए ISPR ने उन्हें कहा है कि वे सैनिकों की तरह भारत के साथ उनका नैरेटिव ध्वस्त करने की लड़ाई लड़ेंगे।

कॉन्ग्रेसी नेता ने भी हथियाई आदिवासियों की जमीन, सोनभद्र में 3 महिलाओं समेत 11 की कर दी गई थी हत्या

सोनभद्र के उम्भा गॉंव में बीते साल जुलाई में आदिवासियों की जमीन पर कब्जे को लेकर 3 महिलाओं समेत 11 लोगों की हत्या कर दी गई थी। यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है, इसलिए विपक्ष ने खूब शोर-शराबा मचाया था। आरोपों की झड़ी लगा दी। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी तो लाशों पर राजनीति करने को इतनी आतुर थीं कि सोनभद्र जाने की इजाजत नहीं मिलने पर सड़क पर ही बैठ गईं थी। उस समय भी यह बात सामने आई थी कि यह विवाद आजादी से भी पुराना है और इसके पीछे भ्रष्ट अधिकारी और कॉन्ग्रेस के नेता रहे हैं। अपर मुख्य सचिव (राजस्व) रेणुका कुमार की अध्यक्षता वाली जॉंच कमेटी ने भी इस तथ्य पर मुहर लगाई है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी है। रिपोर्ट के अनुसार सोनभद्र और मिर्जापुर में 6,602 एकड़ जमीन फर्जी सहकारी समितियॉं बनाकर कब्जा कर ली गई थी। इसमें से एक सहकारी समिति कॉन्ग्रेस के एक बड़े नेता की है। मौजूदा समय में इस जमीन की कीमत करीब 660 करोड़ रुपए आँकी गई है।

अपर मुख्य सचिव रेणुका कुमार द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में इस बात का भी ख़ुलासा हुआ है कि कॉन्ग्रेसी नेता के अलावा और भी कई लोग हैं जिन्होंने फ़र्ज़ी सहकारी समितियाँ बनाकर ज़मीन हड़पी थी। रेणुका कुमार की अध्यक्षता में गठित 6 सदस्यीय जाँच समिति ने 1100 पन्नों की रिपोर्ट दी है। इसमें बताया गया है कि सोनभद्र की तीन और मिर्ज़ापुर की चार सहकारी समितियों ने अवैध रूप से 6,602 एकड़ सरकारी ज़मीन पर अपना क़ब्ज़ा जमाया। बता दें कि जाँच समिति ने 1952-2019 तक के दस्तावेज़ों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपी गई इस रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि अवैध ज़मीन हड़पने वालों में कॉन्ग्रेस के कई अन्य नेता भी शामिल हैं, जिनके पास हज़ारों एकड़ ज़मीन है। उन्होंने दस्तावेज़ों में फेरबदल कर सरकारी ज़मीन हड़प कर उसे अपने नाम कर लिया। 

ग़ौरतलब है कि सोनभद्र में हुए नरसंहार में यूपी के पूर्व राज्यपाल चंद्रशेखर प्रसाद नारायण के चाचा और कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद महेश्वर प्रसाद नारायण का नाम सामने आया था। साथ ही घटना का मुख्य अभियुक्त ग्राम प्रधान समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक रमेश चंद्र दुबे का नज़दीकी बताया गया। दरअसल, वनभूमि की लूट में कई बड़े-बड़े नेताओं के नाम सामने आए थे। इनमें, रेनुकूट डिवीजन के गाँव जोगेंद्रा में बसपा सरकार के पूर्व मंत्री शामिल थे जिन्होंने वन विभाग की 250 बीघा जमीन पर क़ब्ज़ा कर रखा था। इसी तरह सोनभद्र ज़िले के गाँव सिलहट में एसपी के पूर्व विधायक ने 56 बीघे ज़मीन का बैनामा अपने भतीजों के नाम पर करवाया हुआ था।

इनके अलावा, ओबरा वन प्रभाग के वर्दिया गाँव में एक कानूनगो के बारे में पता चला था कि उसने पहले अपने पिता के नाम ज़मीन करवाई और फिर बाद में उसे बेच दिया। घोरावल रेंज के धोरिया गाँव में भी ऐसे ही एक रसूखदार ने 18 बीघा ज़मीन 90 हज़ार रुपए में ख़रीदी और फिर इसकी आड़ में बाकी ज़मीन पर भी अपना क़ब्ज़ा जमा लिया।

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सोनभद्र: वनभूमि लूट में सपा-कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम, सांसद से लेकर पूर्व विधायक तक शामिल

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मजहबी चोले में राणा अयूब ने फैलाया झूठ, हिंसा करती कट्टरपंथियों की भीड़ को बताया शांतिपूर्ण प्रदर्शन

पत्रकारिता की आड़ में इस्लामिक चोला पहन अपना मजहबी अजेंडा चलाने वाली राणा अयूब गुरुवार को एक बार फिर ऑनस्क्रीन झूठ फैलाती नजर आईं। राणा अयूब ने मीडिया से बात करते हुए सीएए के ख़िलाफ़ विरोध पर उतरे समुदाय विशेष से जुड़े हिंसक प्रदर्शनकारियों को ‘शांतिपूर्ण’ बताया। साथ ही दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं, जो डर फैलाकर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। इसके अलावा तथाकथित पत्रकार ने मोदी सरकार पर कई और झूठे दावे कर निशाना साधा। कश्मीर, अयोध्या जैसे मुद्दों पर अपनी दबी कुंठा व्यक्त करते हुए राणा अयूब ने कहा कि पिछले 6 साल से समुदाय विशेष अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार की मुखालफत कर रहा है। लेकिन आर्टिकल 370 और नागरिकता कानून पर लिए फैसलों ने अब विशेष मजहब को सीधे सड़कों पर आने पर मजबूर कर दिया है।

टॉक शो में बात करते हुए राणा अयूब ने अयोध्या का मुद्दा भी उठाया और मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि राम मंदिर के पक्ष में आए फैसले के पीछे भी मोदी सरकार ही जिम्मेदार है। दिलचस्प बात ये रही कि उन्होंने इस टॉक शो के दौरान बातों ही बातों में स्वीकार लिया कि हाल ही में सड़कों पर उतरी भीड़, सीएए के ख़िलाफ़ होते प्रदर्शन सब स्वाभाविक रूप से मजहबी थे। वे कहती हैं कि मुस्लिम आज सड़कों पर हैं, ताकि मोदी सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ खुलकर अपनी मजहबी पहचान बता सकें।

अब, चूँकि ऐसी स्थिति में जब सीएए के विरोध के नाम पर प्रदर्शनकारियों को देश ने अपनी आँखों के आगे, मीडिया के जरिए, सोशल मीडिया के हवाले से करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति फूँकते देखा है, तब अगर राणा अयूब कह रही हैं कि मुस्लिमों ने प्रदर्शन ‘शांतिपूर्ण’ किया, तो एक बार बीते दिनों राज्य में हुई घटनाओं पर एक नजर दोबारा डालने की जरूरत है। जिससे पता चल सके कि आखिर इस विरोध में उतरे समुदाय विशेष के लोग कितने शांतिपूर्ण थे…

पश्चिम बंगाल

जुमे की नमाज के बाद और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन पाकर यहाँ मुस्लिम भीड़ ने अपना उत्पात शुक्रवार के दिन शुरू किया। पूरे राज्य में हिंसा भड़काई गई। रेलवे स्टेशन, बस, टोल प्लॉजा जैसी अनेकों सार्वजिनक संपत्तियों को देखते ही देखते नष्ट कर दिया गया।

राणा अयूब द्वारा उल्लेखित इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाली मुस्लिम भीड़ ने एंबुलेंस पर पत्थर फेंका और बेलडांगा रेलवे स्टेशन पर भी तोड़फोड़ मचाई। साथ ही कई वीडियो में भी भीड़ रेलवे पटरियों को उखाड़ती दिखी।

इसके बाद भीड़ ने पश्चिम बंगाल में हावड़ा जिले में उत्पात मचाया। रेलवे स्टेशनों के रास्ते ब्लॉक कर दिए गए। यहाँ भी ट्रेन पर पत्थरबाजी हुई। ट्रेन का ड्राइवर घायल हो गया। साथ ही पूर्वी रेलवे के पश्चिमी विभाग को इसके कारण परेशानी झेलनी पड़ी।

फिर, इसी राज्य में मुस्लिमों की भीड़ ने मुर्शिदाबाद में आतंक मचाया। टोल प्लाजा को आग लगाया। सुजनीपारा रेलवे स्टेशन पर हमला किया। संकरेल रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर को निशाना बनाया और फिर उसे भी आग लगा के छोड़ दिया। इसी तरह ये सब चलता रहा…

अब बात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली

बंगाल में हुई हिंसा धीरे-धीरे देश के कई कोनों में भड़क गई। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। यह देखते ही देखते कुछ समय में हिंसक हो गया। उपद्रवियों ने पहले खुद बसें जलाई, फिर बाद में इल्जाम पुलिस पर डाल दिया। हालाँकि, हाल में आई वीडियो से स्पष्ट हो गया कि आगजनी के पीछे कौन था।

बता दें, इस दौरान विश्वविद्यालय परिसर में सांप्रदायिक नारे लगे। जिससे दिल्ली के अन्य इलाकों में भी मुस्लिमों ने प्रदर्शन के नाम पर हिंसा शुरू कर दी। सीलमपुर में इस बीच राणा अयूब के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों द्वारा स्कूल बस पर पत्थर फेंके गए और पुलिस पर पत्थरबाजी के साथ बम फेंकने तक का प्रयास हुआ। इसके बाद दरियागंज में भी इस तरह का विरोध देखने को मिला।

राजनीति का केंद्र उत्तरप्रदेश

प्रदेश में भाजपा सरकार होने के कारण शांतिदूत यहाँ और भी उग्र नजर आए। पुलिस पर पत्थरबाजी हुई। जुमे की नमाज के बाद कई जगह सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया। अमरोहा से लेकर बहराइच और संभल से लेकर अलीगढ़ तक हर जगह इस भीड़ द्वारा तोड़फोड़, आगजनी तो आम रही। मेरठ में तो दो युवकों ने खुलेआम पुलिस पर गोली चलाई। स्थिति इतनी ज्यादा हाथ से निकल गई कि पुलिस को हिंसा रोकने के लिए आँसू गोले का इस्तेमाल करना पड़ा और लाठी चार्ज करके उपद्रवियों को तितर-बितर करना पड़ा।

गुजरात

19 दिसंबर को गुजरात के अहमदाबाद में भी प्रदर्शन हुआ। जहाँ इसी मुस्लिम भीड़ ने उत्पात मचाया। पत्थरबाजी की, पुलिस पर हमला किया और कई अधिकारियों को पीटा भी।

कर्नाटक

अभी हाल ही में मंगलुरु से एक वीडियो आई। जिसमें दिखा कि उपद्रवी किस तरह पहले सीसीटीवी को नीचे की ओर अडजस्ट कर रहे हैं, ताकि उनकी करतूत वीडियो में न आ सके और फिर बड़ी तैयारी से इलाकों में हिंसा को अंजाम दे रहे हैं।

उम्मीद है ऊपर इन राज्यों में हुई घटनाओं से और प्रदर्शनकारियों के नाम पर काला पट्टी बाँधकर हिंसा कर रहे दंगाइयों की वीडियो राणा अयूब ने भी देखी होगी। लेकिन, उनका एजेंडा इन वीडियो के ईर्द-गिर्द नहीं है। शायद इसलिए वे इसपर बात नहीं करना चाहतीं। मगर, अगर समुदाय विशेष के लोगों के जुर्मों पर सरेआम बोल नहीं सकतीं, तो कम से कम मोदी सरकार को घेरने के लिए इस उपद्रवियों को शांतिदूत को न ही बताएँ। इस समय सोशल मीडिया पर कई सौ या शायद हजारों की तादाद में ऐसे सबूत वायरल हो रहे हैं जो राणा अयूब की फर्जी दावों को झूठा साबित करते हैं और बताते हैं कि सड़कों पर उतरी मुस्लिमों की भीड़ न शांतिपूर्ण हैं और न ही उनके उद्देश्य।

बता दें, ये पहला, दूसरा, या तीसरा मामला नहीं है जब मोदी सरकार को घेरने के लिए राणा अयूब और उनके मीडिया कॉमरेडों का पर्दाफाश हुआ। इससे पहले कई ऐसे मौक़े आए हैं जिनके बाद इन लोगों की प्रतिक्रिया देखकर मालूम हुआ है कि ये मोदी सरकार की छवि को जनता के सामने धूमिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। चाहे फिर उसके लिए उन्हें खुलेआम झूठ बोलना पड़े। चाहे फिर उसके लिए सोशल मीडिया यूजर उन्हें ट्रोल ही क्यों न कर दें। चाहे फिर उनकी कही बातों पर फैक्ट चेक ही क्यों न हो जाए।

गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले ही अमेरिका की हिन्दू-विरोधी राजनीतिक विशेषज्ञ क्रिस्टीन फेयर ने ट्विटर पर भारतीय प्रोपेगंडाबज पत्रकार राणा अयूब को जम कर लताड़ा था। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि अयूब भी उन्हीं की तरह हिन्दू-विरोधी है, क्रिस्टीन ने अपना ट्वीट डिलीट कर लिया। 

उन्होंने लिखा था, “तुम बलूचिस्तान के नागरिकों, पश्तून और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के नागरिकों के लिए ख़ास दुआ क्यों नहीं कर रही हो? पाकिस्तानियों द्वारा इन सब पर अत्याचार किया जा रहा है। तुम्हारी फौज (पाकिस्तानी) और आईएसआई द्वारा तालिबान के आतंकियों का इस्तेमाल कर अफ़ग़ानों का नरसंहार कराया जा रहा है। “

दंगे में मरने वाले 14 हैं मुस्लिम: फर्जी पत्रकार राणा अयूब ने योगी को कहा इस्लाम-विरोधी

मुस्लिमों को घर में घुस कर मार रहे हैं RSS कार्यकर्ता और UP पुलिस: राणा अयूब का झूठ बेनकाब

राणा अयूब ने विदेशी पत्रकार को J&K में अवैध रूप से घुसाया, भारत-विरोधी प्रचार किया: देश के साथ गद्दारी!

15 दिन में 2.75 लाख गाँव में लगेगी भगवान राम की प्रतिमा, इन्हीं गाँवों से 30 साल पहले राम मंदिर के लिए आई थी ईंटे

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से पहले विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने एक बड़े कार्यक्रम का बीड़ा उठाया है। विश्व हिन्दू परिषद देश के 2.75 लाख गाँवों में भगवान राम की प्रतिमा लगाएगी। ‘रामोत्सव’ नाम से चलने वाला यह कार्यक्रम 25 मार्च को शुरू होगा और 8 अप्रैल को इसका समापन होगा। साल 1989 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान इन्हीं गाँवों से अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए ईंटें आई थीं।

अयोध्या में राम मंदिर के लिए आंदोलन में VHP की भूमिका काफी सक्रिय रही है और अब निर्माण से पहले उसने एक बड़े कार्यक्रम की घोषणा की है। VHP की नज़र राम मंदिर के लिए पुजारियों पर भी है। वह मंदिर के लिए दलित पुजारी चाहती है। VHP का मानना है कि दलित पुजारी की नियुक्ति के जरिए सामाजिक समरसता का बड़ा संदेश दिया जा सकता है। VHP का यह भी कहना है कि मंदिर का निर्माण सरकार नहीं समाज के पैसों से किया जाए।

VHP चाहता है कि ट्रस्ट में राजनीतिक लोगों को शामिल न किया जाए।ख़बर के अनुसार, VHP के प्रवक्ता विनोद बंसल का कहना है कि ट्रस्ट का काम सरकार को करना है, इसमें हमारा किसी तरह से कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। यदि दलित पुजारी की नियुक्ति होती है तो उसका स्वागत है। VHP दलित पुजारियों को तैयार करने में लंबे समय से जुटा हुआ है। VHP में धर्माचार्य सम्पर्क विभाग और अर्चक पुरोहित विभाग बनाकर काफी समय से अनुसूचित वर्ग के लोगों को पूजा-पाठ के लिए प्रशिक्षित कर पुजारी बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद छोटे और बड़े मंदिरों में समारोह आयोजित करेगी, वहीं ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद भी करेगी।

बता दें कि राम मंदिर आंदोलन से दलितों को जोड़ने के लिए संघ, VHP जैसे संगठन शुरुआत से ही लगे हैं। 9 नवंबर, 1989 को जब राम मंदिर का शिलान्यास हो रहा था उस समय पहली ईंट बिहार के दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों रखवाई गई थी। इसके जरिए राम मंदिर आंदोलन के पीछे सम्पूर्ण हिन्दू समाज के खड़ा होने का संदेश दिया गया था।

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए हर परिवार से 11 रुपए और एक ईंट का योगदान देने की अपील की थी। मुख्यमंत्री योगी ने यह अपील झारखंड में चुनाव रैली के दौरान की थी। झारखंड चुनावों में बीजेपी के उम्मीदवार को वोट देने के लिए लोगों से अपील करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था,“मैं उस प्रदेश से आता हूँ जिसने भगवान राम दिया और उनके शासन की प्रणाली को रामराज्य कहा गया, एक प्रणाली जिसमें नीतियाँ गरीब, युवा, महिला और समाज के हर तबके को ध्यान में रखते हुए बगैर भेद के बनाई जाती हैं। वही कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया जा रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 9 नवबंर को इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 5 सदस्यों वाली बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाने को कहा था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था। इस फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं को भी शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया था।

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित सभी मामलों को देखने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक अलग डेस्क बनाया गया है। इस डेस्क में तीन अधिकारी होंगे। इनका नेतृत्व अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार करेंगे।

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सत्ता के लिए तीन-तिकड़म में लगी थी शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी, महाराष्ट्र में 300 किसानों ने कर ली आत्महत्या

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी के नेता सरकार बनाने के लिए गुणा-भाग करने में लगे थे उसी समय बेमौसम बरसात की मार से परेशान राज्य के 300 किसानों ने आत्महत्या कर ली। पिछले चार सालों में एक महीने में किसानों के आत्‍महत्‍या की यह सबसे अधिक संख्या है। बीते साल के नवंबर महीने से पहले वर्ष 2015 में कई मौकों पर एक महीने में किसानों की आत्‍महत्‍या का आँकड़ा 300 के पार गया था। लेकिन प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहे किसानों की आत्‍महत्‍या से बेपरवाह महाराष्‍ट्र के राजनेता जोड़-तोड़ में व्‍यस्‍त रहे।

ख़बर के अनुसार, राज्‍य में अक्‍टूबर महीने में बेमौसम की भारी बारिश के बाद आत्‍महत्‍या की घटनाओं में काफी तेजी आई। इस बारिश में किसानों की 70% खरीफ़ की फसल नष्‍ट हो गई। अंतिम बार वर्ष 2015 में राज्‍य में किसानों की आत्‍महत्‍या का आँकड़ा 300 के पार पहुँचा था। राजस्व विभाग के नवीनतम आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल अक्‍टूबर से नवंबर के बीच आत्‍महत्‍या की घटनाओं में 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अक्टूबर में 186 किसानों ने आत्महत्या की थी।

राज्य के सूखा प्रभावित मराठवाड़ा क्षेत्र में नवंबर महीने में सबसे अधिक यानी 120 आत्‍महत्‍या के मामले और विदर्भ में 112 मामले दर्ज किए गए। वहीं, विदर्भ क्षेत्र से ही किसानों के आत्‍महत्‍या की सबसे अधिक ख़बरें आती रहती हैं। किसानों की आत्‍महत्‍या में अचानक आई इस तेज़ी की वजह से जनवरी से नवंबर 2019 के बीच 11 महीने में आत्‍महत्‍या के मामलों में पिछले साल इसी अवधि के दौरान हुई घटनाओं से अधिक है।

वर्ष 2019 में कुल 2,532 आत्‍महत्‍या के मामले आए जबकि वर्ष 2018 में यह आँकड़ा 2,518 था। अनुमान के मुताबिक़ बेमौसम की बारिश से राज्‍य के एक करोड़ किसान प्रभावित हुए जो स्‍वीडन की कुल जनसंख्‍या के बराबर है। यह राज्‍य के कुल किसानों की संख्‍या का दो तिहाई है। इनमें से लगभग 44 लाख किसान मराठवाड़ा क्षेत्र के रहने वाले हैं। अब राज्‍य सरकार इन किसानों को मुआवज़ा दे रही है।

अधिकारियों ने बताया कि प्रभावितों को अब तक 6,552 करोड़ रुपए वितरित किए जा चुके हैं। महा विकास आघाडी सरकार ने भी दिसंबर 2019 में दो लाख तक के कर्ज़-माफ़ी की घोषणा की थी। इससे पहले की भाजपा नीत सरकार ने 2017 में कर्ज़-माफ़ी की घोषणा की थी जिसके कारण 44 लाख किसानों का 18,000 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ़ किया गया था।

वहीं, किसानों के हितों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि कर्ज़-माफ़ी और मुआवज़े से परे राज्य को खेती को और अधिक लाभदायक बनाने की ज़रूरत है। विदर्भ के कार्यकर्ता विजय जौंधिया ने कहा, “खेती की लागत और मज़दूरी काफ़ी बढ़ गई है। इस वजह से किसान एक ख़राब मौसम बर्दाश्‍त नहीं कर पाते। यही आत्‍महत्‍या की मुख्‍य वजह है। किसानों को उनके उत्‍पाद का और अधिक पैसा मिलना चाहिए। किसानी की अर्थव्‍यवस्‍था किसानों के ख़िलाफ़ झुकी हुई है।”

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CAA-NRC: कुछ कट्टरपंथियों के भीतर का हिन्दू घृणा वाला ज़हर इनकी सेकुलर केंचुली से बाहर रिस रहा है

कहते हैं आदमी ‘आदम’ से आया था। आदम को अंग्रेज़ी में एडम कहते हैं। इससे जुड़ी एक कहावत है ‘बाबा आदम के जमाने से’। हिन्दू लोग आदम में यकीन नहीं करते क्योंकि कोई मतलब नहीं है। उनका फंडा अलग है। आदमी आज के दौर में व्यक्ति को कहते हैं, मानव को कहते हैं। देश के लिए नागरिक की अवधारणा होती है जहाँ लोगों के पहचान मिट जाते हैं, और बस राष्ट्रीय पहचान होती है कि हम भारतीय है, जापानी हैं, चीनी हैं, अरबी हैं।

भारत एक सेकुलर देश माना जाता है। माना इसलिए जाता है क्योंकि इस शब्द विशेष को लोग सहूलियत से इस्तेमाल करते हैं। अमूमन सेकुलर का मतलब गैर हिन्दू या गैर दक्षिणपंथी होता है। आप लाख मुझे समझा लें कि ऐसा नहीं है, मैं नहीं मानूँगा क्योंकि मैं शब्दों को उनके स्वतंत्र अस्तित्व में, उन्हें अक्षरों का मेल भर नहीं मानता, बल्कि मैं मानता हूँ कि शब्दों के मायने काल, परिस्थिति, देश और संदर्भ में बदल जाते हैं।

सेकुलर के नाम पर आप हिन्दुओं के देवी-देवताओं का अपमान कर सकते हैं, उनकी मूर्तियाँ तोड़ सकते हैं, मंदिरों को गिरा सकते हैं, उनके प्रतीक चिह्नों का उपहास कर सकते हैं, और न तो हिन्दू, न ही भारत का कोई कानून आपका कुछ कर पाएगा। उसे हमारे सेकुलर संविधान में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ कहा गया है। यही आज़ादी किसी भी गैर हिन्दू (या हिन्दू के अंग-प्रत्यंग) वाले मजहबों के ऊपर नहीं है। अगर आपने गलत संदर्भ में भी कुछ भी कह दिया, कुछ भी मतलब कुछ भी, तो दो-दो साल से घात लगा कर बैठा मजहबी आदमी आपको ऐसे रेत देगा कि लाश देखने वालों की आत्मा काँप जाएगी।

ये ‘सेकुलर इंसान’ वहीं तक नहीं रुकता। वो आपको कमेंट में, उसके ख़िलाफ़, उसके दंगों के ख़िलाफ़ लिखने पर, आपको याद दिलाएगा कि ‘तुझे भी काटेंगे साले कमलेश तिवारी की तरह, इंशाअल्लाह’। ऐसा मजहबी आदमी ऐसे दुष्कृत्यों को सम्मान की तरह देखता है। ऐसा ‘सेकुलर’ आतंकियों को, जिसने उसके पूर्वजों की बस्तियों को आग लगाया था, उनकी लड़कियों का बलात्कार किया था, उनके मंदिर तोड़े थे, और अंत में तलवार की नोक पर धर्मांतरण कर दिया था, बस इसलिए महान समझता है क्योंकि वो भी मुस्लिम हैं।

आज इनकी बात क्यों कर रहा हूँ?

आज इसलिए उनकी चर्चा हो रही है क्योंकि आम तौर पर जिन लोगों को पूरा भारत कवि, शायर, इतिहासकार, पत्रकार, धर्महीन वामपंथी समझता रहा, वो CAA और NRC के विरोध के नाम पर हो रहे दंगों को न सिर्फ सहमति दे रहे हैं, बल्कि उकसा रहे हैं मरना ही है तो लड़ कर मर जाओ। ये लोग अब रंगरेज के नीले रंग वाले नाँद से जितना दूर जा रहे हैं, इनका हरा रंग उतना ही बाहर आता जा रहा है।

हरे रंग में समस्या नहीं है, समस्या तब है जब तुम दिख तो हरे रहे हो, लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हो कि ‘हम तो नीले हैं।’ ये सारे कवि, शायर, पत्रकार, इतिहासकार, वामपंथन अचानक से आदमी से ‘मुस्लिम’ हो गए हैं। और सिर्फ मुस्लिम नहीं, वैसे मुस्लिम हो गए हैं जो सेकुलर होने की परिभाषा से कहीं बहुत दूर, भारत को ये बता रहे हैं कि इनके बापों ने भारत पर राज किया था, ये लिख रहे हैं कि तिलकधारियाँ नहीं चलतीं, ये कह रहे हैं कि भारत माता की जय कम्यूनल है, और ला इलाहा इल्लल्लाह बिलकुल भी कम्यूनल नहीं, ये चिल्ला रहे हैं कि मुस्लिमों के साथियों को मजहबी नारे का सम्मान करना ही होगा…

और ये सारी इस्लामी बातें किस बात के विरोध में? एक राजनैतिक कानून के विरोध में जिसका भारत के समुदाय विशेष से कोई वास्ता नहीं। तो सवाल यह है कि ये जो मुनव्वर राणा अचानक से ‘मजहबी’ हो कर ‘मरना ही मुकद्दर है तो फिर लड़ के मरेंगे’ की बात करने लगे हैं, वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? आखिर इनको दर्द किस बात का है कि ये अभिजात्य अल्फ़ाज़ में दंगाइयों को उकसा रहे हैं कि ‘लड़ के मरो’?

आखिर ‘माँ’ के नाम पर शायरी करने वाले मुनव्वर राणा किस बात से इतने दुखी हो गए कि टिक-टॉक विडियो पर “800 वर्षों तक हमने देश पर राज किया, लेकिन हमारी हड्डी में उबाल नहीं आया, लेकिन पाँच साल से तुम्हें सत्ता मिल गई है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! बहुत ज्यादे सनक में मत रहो, वरना अगर हम अपने पर आ गए तो भागने का रास्ता नहीं रहेगा…” बोलने वाले लम्पट का परिष्कृत संस्करण बन कर ‘यही वो मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था’ लिख रहे हैं?

आखिर राहत इंदौरी ‘ये तिलकधारियाँ नहीं चलती’ कह कर ‘तिलक करने वाले हिन्दुओं को इतने घृणित लहजे में क्यों ललकार रहा है? इस आदमी को क्या समस्या हो गई है जिसकी महफिलों में समुदाय विशेष से ज्यादा हिन्दू ही हुआ करते हैं? वो तिलकधारियों को मक्कार क्यों कह रहा है? आखिर एक शायर, जिसे संवेदनशील और ग़ैर राजनीतिक माना जाता है, वो किसी पार्टी और देश के प्रधानमंत्री, और उन्हें वोट देने वालों पर शब्दों की मदद से ऐसे निशाने क्यों लगा रहा है?

आख़िर फ़ैज अहमद फ़ैज के उस नज़्म को गाने की ज़रूरत आज के भारत में क्यों पड़ती है, जहाँ लगातार दो बार, पूर्ण बहुमत से चुन कर एक प्रधानमंत्री आया है, जो नज़्म एक पाकिस्तानी तानाशाह के लिए गाई गई थी? मैं क्या संदर्भ भूल जाऊँ कि तुमने मेरे चुने हुए, लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री को पहले तो तानाशाह कहा और फिर, इस्लामी शायरी से ले कर तमाम तरीक़ों में काफिरों के लिए एक अंतर्निहित, स्थायित्व लिए हुए घृणा ली हुई बातों को दोहराया जहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ का मतलब सीधा इस बात से है कि भाजपा को ‘हिन्दुओं की पार्टी’ कहा जाता है। क्या हम इतने मूर्ख हैं कि बिम्बों को न समझ सकें?

क्या हम ये कह कर तुम्हारी बात मान लें कि वो बस एक नज़्म थी, जो गाई गई IIT कानपुर में? क्या वो नज़्म किसी ने ट्विटर पर डाली थी, एक रैंडम दिन में किसी ने अपनी प्रेमिका को भेजी थी वो नज़्म, या फिर किसी तानाशाह के लिए लिखी गई और आज के दौर में गाई गई उस नज़्म में तानाशाह मोदी है, और ‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है? हम क्या इतने मूर्ख हैं कि इस्लामी शायरी के भीतर की हिन्दू घृणा के ज़हर को समझ न सकें? तुम मोदी को हिटलर से प्रतीकात्मक तौर पर तौलते रहो, तुम नाज़ियो के चिह्न से हमारा पवित्र ‘ॐ’ बना दो, नीचे ‘फक हिन्दुत्व’ लिखो, और हम ये मान लें कि ये तो विरोध का एक तरीका है, हिन्दुत्व से मतलब हिन्दुओं से नहीं राजनैतिक विचारधारा से है!

इसी नज़्म पर एक और नौटंकी जो दिखी वो यह थी कि सारे वामपंथी और हिन्दुओं से घृणा करने वाले एक फर्जी खबर बना कर फैलाने लगे कि IIT कानपुर ने इस बात की जाँच पर एक कमिटी बिठा दी है कि ‘ये नज्म हिन्दू विरोधी है या नहीं’। जबकि सच्चाई इससे अलग यह है कि कमिटी इस बात की जाँच करेगी कि जो आयोजन हुआ वो संस्थान के नियमों के हिसाब से हुआ या नहीं, उसके बाद सोशल मीडिया पर जो बातें कही गईं, वो सही थीं, या गलत। लेकिन इरफान हबीब जैसे लोग अपना एजेंडा ठेलने से बाज नहीं आए।

जो खुद को वामपंथन कहती है। जिस वामपंथ में धर्म-मजहब की कोई पहचान है ही नहीं, वो शेहला रशीद, मुस्लिमों के मजहबी उन्मादी नारों की बात करते हुए कहती है कि अगर आप उनसे शर्मिंदा हैं तो आप हमारे सहयोगी नहीं हैं। अगर आपको इन नारों से दिक्कत है, तो आप भी समस्या का ही हिस्सा हैं। और जनाब इनके वो मजहबी नारे क्या हैं? वो नारे हैं: हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर, तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह…

ये हैं वो नारे जो एक मजहबहीन वामपंथन ‘नॉन-नेगोशिएबल मानती है। और आप फिर सोचेंगे कि एक राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन में ‘मजहबी नारों की क्या ज़रूरत है’ तो आपको जवाब नहीं मिलेगा। शेहला रशीद यह मान कर चल रही है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही सेकुलरिज्म तेल लेने चला गया था। ये बात और है कि जब इनका सेकुलरिज्म तेल ले कर वापस लौटा तो पहले जामिया में आग लगाई, फिर सीलमपुर में पेट्रोल बम फेंका, फिर लखनऊ के परिवर्तन चौक में आग लगाई, फिर बंगाल में ट्रेन फूँक दिया, बिजनौर में आग लगाई, मेरठ और अलीगढ़ को लहका दिया। वाकई, सेकुलरिज्म तेल तो बार-बार लेने गया है मोदी के आने के बाद, खास कर समुदाय विशेष का सेकुलरिज्म जहाँ वामपंथन भी खुल कर मुस्लिम हुई जा रही है!

शशि थरूर ने लम्बे समय के बाद कुछ ढंग की बात कही कि मुस्लिमों को समझना चाहिए कि CAA/NRC के प्रदर्शन में ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ जैसे नारों की जगह नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह को लाया जा रहा है। ये बात कई मुस्लिमों को नहीं पची क्योंकि उनके लिए हर प्रदर्शन विशुद्ध रूप से मजहबी है क्योंकि उनके लिए पहचान का मतलब भारतीयता, नागरिकता और सामान्य बातों से परे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है, उम्माह है, कौम है।

स्वयं को पत्रकार कहने वाली आरफ़ा खानम ने कुछ समय पहले ट्वीट किया था कि ‘हाँ, भारत माता की जय एक साम्प्रदायिक नारा है’, उसने आज पत्रकारिता को ढोंग त्यागते हुए, खुल कर सामने आ कर कहा कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, इंशाअल्लाह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक, इस्लामी कट्टरपंथी नारे नहीं हैं। इन सारे नारों को या तो आप सीधा ‘शब्दों को झुंड’ के रूप में देख सकते हैं, या फिर आप इन्हें संदर्भ में देखेंगे।

‘भारत माता की जय’ कहने से हम किसी देवी की पूजा नहीं करते, हम अपनी मातृभूमि की जय-जयकार करते हैं। यहाँ किसी का मुस्लिम होना तब तक प्रभावित नहीं होता जब तक वो इस भाव से जय-जयकार न करे जहाँ वो यह मानने लगे कि ‘अल्लाह के अलावा भी कोई है जिसे वो पूजनीय मानता है’। दूसरी बात, साम्प्रदायिक मानने के लिए किसी भी बात में नकारात्मकता आवश्यक है, वहाँ शाब्दिक या और तरह की हिंसा होनी चाहिए, मंशा होनी चाहिए नीचा दिखाने की।

मुझे नहीं लगता कि ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए कोई किसी को नीचा दिखाना चाहता है, या किसी भी प्रकार के हिंसक भाव रखता है। लेकिन, उसके उलट एक राजनैतिक कानून के विरोध में, जब हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, फक हिन्दुत्व आदि के साथ-साथ, उसी समय-काल में, उन्हीं परिस्थितियों में, उसी संदर्भ में जब ‘नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर’ गूँजता है, तो वो विशुद्ध मजहबी उन्माद है क्योंकि ये नारा तुम सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और एक दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए लगा रहे होते हो। तुम ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहो, कोई समस्या नहीं, लेकिन ये सिर्फ मजहबी जमावड़े में बोलो, राजनैतिक में घुसाओगे तो हमें याद आएगा कि तुम्हारा लक्ष्य तो गजवा-ए-हिन्द और ख़िलाफ़त तक का है।

सेकुलर होने का ढोंग, मुस्लिम होना और मुस्लिम होने का घमंड करना

इन लोगों की ही तरह दसियों मुस्लिम ऐसे मिलेंगे आपको जो बिना इस कानून को पढ़े, बिना ये जाने कि NRC के ड्राफ्ट तक अभी बाहर नहीं आया है, इन दंगाइयों को अपनी सहमति ये कह कर दे रहे हैं कि मुस्लिमों के अस्तित्व पर संकट आ गया है। सामने से पूछे जाने पर ये बार-बार यह भी कह रहे हैं कि आम लोगों को सरकार समझाने में असफल रही है, जबकि सत्य यह है कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन यही लोग आम लोगों में डर भरते जा रहे हैं।

मुनव्वर राणा की, राहत इंदौरी की, इरफान हबीब की, शेहला रशीद की, आरफा खानम की और उन हजारों दंगाई मुस्लिमों की समस्या CAA या NRC नहीं है। इनकी समस्या यह है कि इनके भीतर का घमंड, एक विशेष होने का भाव जो पिछली सरकारों ने इनमें गहरे भर दिया था, वो अचानक से छिन-सा गया है। वो, जिनके मजहब के लोगों के आतंकी होने पर, 22 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी, रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिए जाते थे, उनकी बात की अब कोई वैल्यू नहीं रही।

वो जो यह चिल्लाते थे कि ‘तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निगलेगा’, आज दंगा करने के बाद योगी सरकार को अपने समुदाय द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे लौटा रहे हैं। वो, जो मजहब की आड़ में भारत का झंडा, राष्ट्रीय गीत और जय बोलने से कतराते थे, आज, भले ही दंगा करने और आग लगाने के लिए ही सही, भीड़ में तिरंगा लिए घूम रहे हैं। इनके घमंड के गुब्बारे में जो हवा भरी जाती रही थी, उसमें इस सरकार ने पहले तो हवा भरना बंद किया, और दूसरे चरण में पिन मारना भी शुरू कर दिया है, तो फटे गुब्बारे से कुछ आवाज तो आएगी ही।

वो, जो सोचते थे कि कश्मीर से पंडितों के भगा देने के बाद, कश्मीर को अलग देश बना लेंगे और उसी चक्कर में कश्मीर को नक्शे पर भी न पहचान सकने वाले मुस्लिम भी खुश हो जाते थे, आज परेशान हैं कि कश्मीर में अब भारत का संविधान लागू है, और उसका झंडा भी तिरंगा है। वो, जो सोचते थे कि संविधान से ऊपर कोई मजहबी पर्सनल लॉ बोर्ड है, तीन तलाक के ग़ैर क़ानूनी करार दे दिए जाने से इसे मजहब पर हुए हमले के रूप में देख रहे हैं।

वो, जिन्होंने सोचा था कि इरफान हबीब जैसा चिरकुट उपन्यासकार, अपने चेलों को कोर्ट में भेज कर, भारत को यह समझा देगा कि भारत का इतिहास मुस्लिम आतंकवादी बाबर के आने के बाद से ही शुरू होता है, वो राम मंदिर के गगनचुम्बी शिखरध्वज को कैसे देख पाएँगे? वो, जो सोचते हैं कि बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देने वाले आतंकी रोहिंग्या और बांग्लादेश से भारत में घुसे घुसपैठियों को भारत में इसलिए जगह मिल जानी चाहिए क्योंकि वो उनके उम्माह का हिस्सा हैं, उनके हकूक हैं, उन्हें भारतीय नागरिकों के रजिस्टर बनने से तो समस्या होनी ही है।

इसीलिए, केंचुली उतार कर ये पूरा विरोध अब ‘हम बनाम वो’ का हो गया है। इस पूरे विरोध का लहजा ‘मुस्लिम बनाम काफिर’ का हो चुका है। वो खुल कर कह रहे हैं कि ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, वो चिल्ला कर जामिया की गलियों में कह रहे हैं कि उन्हें ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ चाहिए। वो दिन के उजाले में दीवारों पर हमें ‘कैलाश जाओ’ लिख कर बता रहे हैं। वो एक राजनैतिक प्रदर्शन में हजारों की भीड़ जुटाते हैं और पूछते हैं कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और आवाज आती है ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’। वो ख़िलाफ़त 2.0 के ख्वाब AMU की दीवारों पर लिख रहे हैं और हिन्दुत्व, यानी हिन्दुओं से जुड़ी हर बात, विचार, पूजा, व्यक्ति, ग्रंथ आदि की कब्र खोदने की बातें कर रहे हैं।

और हिन्दू आज भी पॉलिटिकली करेक्ट होना चाह रहा है। वो ये मान रहा है कि ये लोग भटके हुए, गुमराह लोग हैं, इनके नारों का कोई मतलब नहीं, ये तो बस ऐसे ही है। ये लड़ाई अब खुले में सुनाई पड़ रही है। अब दिख रहा है कि इनका लक्ष्य कोई कानून या संविधान नहीं, इनकी आँखें शिथिल हो कर ‘गजवा-ए-हिन्द’ का आस देख रही है, और दाहिने-बाएँ इन्हें कुछ नहीं दिख रहा। ये नारे सीढ़ियाँ हैं, ये वो चरण है प्रयोग का जहाँ देखा जा रहा है कि पूरे भारत का मुस्लिम बाहर आ सकता है क्या?

अभी आँकने का मौका है कि जब महत्वपूर्ण जगहों पर बैठे मुस्लिम, एक पहचान पा चुके मुस्लिम, वैसे मुस्लिम जो वैचारिक स्तर पर नेतृत्व दे सकते हैं, उनके खुल कर बाहर आने पर कितने मुस्लिम उनकी बातें मानेंगे। इसीलिए, आज पढ़ा-लिखा, कॉलेज जाता मुस्लिम भी NRC के आए बिना ही कह रहा है कि उसके कागज तो बाढ़ में बह गए, 90 साल की बुजुर्ग असमा कह रही है कि दसवीं फेल मोदी अपने सात पुश्तों के नाम गिनाए। जब आम आदमी गृहमंत्री की अपील को सीधे कह दे कि वो तो झूठ बोल रहा है, एक चुनी हुई सरकार के सासंदों द्वारा पारित कानून को यह कह कर नकार दे कि सासंद तो बस 300 ही हैं, हम तो हजारों में हैं, तब आप समझ जाइए रंग उतरा ही नहीं, रंग दिखाया जा रहा है कि पहचानो, हम कौन हैं!

मजहबी नारे, इतिहास के आतंकियों के शासक होने के दिन, और हिन्दुओं से घृणा की बातें खुल कर हो रही हैं। बाकी का काम मीडिया गिरोह सक्रिय हो कर कर ही रहा है जहाँ बीस दिन की नवजात बच्ची को विरोध-प्रदर्शन की नायिका के रूप में भुनाया जा रहा है। अचानक से भीम-मीम में इसलिए दरार पड़ती दिख रही है कि भीम वालों को मजहबी नारे अनुचित लगते हैं। अब भीम सोच रहा है कि मीम वाले तो उनको पागल बना रहे हैं, इनका एजेंडा तो कुछ और ही है। बाकी का काम इस उम्मीद ने कर दिया जहाँ शेहला रशीद कहती है कि अगर तुम हमारे साथ हो तो आरक्षण में हमें भी हिस्सा दे दो!

भीम वाला आज भी जोगेंद्र नाथ मंडल को नहीं जानता कि मीम के झंडाबरदारों ने उनका क्या हश्र किया था। भीम वालों की लड़ाई राजनैतिक है, वो अपने हक के लिए बार-बार उठते रहे हैं। उनकी लड़ाई शोषण से है, बराबरी की है, और अब अचानक से उनसे कहा जा रहा कि ‘बोलो भाई तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और भीम वाला सोच में पड़ जाता है कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कैसे बोल दे!

आप भी इस मजहबी उन्माद को समझिए। आप भी यह समझिए कि सेकुलर होने का मतलब मुस्लिमों के लिए अलग है, हिन्दुओं के लिए अलग। एक सेकुलरिज्म की आड़ में आपके देवी-देवता का उपहास करता है, और आप हैं कि ईद की सेवइयाँ खाने के लिए पागल हुए जा रहे हैं। हिन्दुओं के लिए सेकुलर होने का मतलब है ‘सहना’। इसलिए, वो आज भी इन मजहबी उन्मादियों को आग लगाता देख रहा है और यह मान कर चल रहा है कि ये आग उसके घर तक नहीं पहुँचेगी।

यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके ‘जय श्री राम’ नारे को आतंकी नारा बना कर एक महीने में कम से कम दस बार झूठ बोला गया ताकि उसके धर्म को बदनाम किया जा सके। यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके दसियों भाइयों को कट्टरपंथियों की भीड़ ने लिंच किया है। हिन्दू यह भी भूल जाता है कि सैकड़ों साल पहले भी उसके मंदिर तोड़े जाते थे, आज भी हौज काजी समेत कई जगहों पर वही हो रहा है। हिन्दुओं को यह भी याद नहीं कि उनके काँवड़ यात्रा पर इस साल सावन के महीने में कितने जगहों पर पत्थरबाजी हुई है।

कट्टरपंथियों के बीच की हस्तियाँ अब मुस्लिम बन कर ही सामने आ रही हैं। उनके लिए इस्लाम ही एकमात्र पहचान है। उन्हें राजनैतिक विरोध प्रदर्शन में ‘नारा ए तकबीर’ और ‘हिन्दुओं से आजादी’ कहने में कोई समस्या नहीं दिख रही। मैं चाहता हूँ कि हिन्दू इस बात को बस दूर से देखे, दिमाग में बिठाए और अकेले में जा कर सोचे कि ये ‘सेकुलर’ शब्द जो है, उसका मतलब आखिर होता क्या है।

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NRC का असर: घर लौटने लगे घुसपैठिए, बांग्लादेश ने माना 2 महीने में 445 भारत से वापस आए

पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने की कल्पना से ही विपक्षी दल क्यों घबराए हुए हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है। असल में इससे उनके पाले-पोसे एक वोट बैंक के दूर जाने का खतरा है। असम में इसे लागू करने का असर भी दिखने लगा है। बांग्लादेश ने खुद माना है कि एनआरसी लागू किए जाने के बाद दो महीने में उसके 445 नागरिक घर लौटे हैं।

बांग्लादेशी अर्धसैनिक बल के प्रमुख ने गुरुवार (2 जनवरी) को कहा कि भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के प्रकाशन के बाद बीते दो महीनों में 445 बांग्लादेशी नागरिक वापस आए हैं। बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के महानिदेशक मेजर जनरल मोहम्मद शफीनुल इस्लाम ने एक प्रेस वार्ता के दौरान इन आँकड़ों का ख़ुलासा किया। उन्होंने बताया:

“भारत और बांग्लादेश से अवैध सीमा पार करने के लिए 2019 में लगभग 1,000 लोगों को गिरफ़्तार किया गया, जिनमें से 445 लोग नवंबर और दिसंबर में घर लौट आए थे।”

उन्होंने बताया कि स्थानीय प्रतिनिधियों द्वारा उनकी पहचान सत्यापित किए जाने के बाद, BGB को यह पता चला कि सभी घुसपैठिए बांग्लादेशी हैं। इस्लाम ने कहा कि इनके खिलाफ 253 मामले दर्ज किए गए हैं। सभी पर गैरकानूनी रूप से सीमा पार करने का मामला दर्ज किया गया है। प्रारंभिक जाँच में पाया गया है कि इनमें से कम से कम तीन मानव तस्कर थे।

पिछले हफ्ते इस्लाम ने भारत का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने कहा था कि NRC का मुद्दा पूरी तरह से भारत का “आंतरिक मामला” है और दोनों देशों की सीमा की रक्षा करने वाली सेनाओं के बीच सहयोग बहुत अच्छा है। उन्होंने कहा कि BGB अपने शासनादेश के अनुसार अवैध सीमा पार रोकने के अपने काम को जारी रखेगा। इस्लाम के नेतृत्व में BGB का प्रतिनिधिमंडल, सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ डीजी-स्तरीय सीमा वार्ता के लिए भारत के द्विपक्षीय दौरे पर आया था।

यह वार्ता 26-29 दिसंबर को हुई थी। इस दौरान सीमा पार से तस्करी और अपराधियों और अन्य लोगों की गतिविधियों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हुई थी। एक सवाल के जवाब में, इस्लाम ने कहा, “सम्मेलन में (NRC) पर कोई चर्चा नहीं हुई थी।”

उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में आयोजित पाँच दिवसीय वार्ता के दौरान, BGB ने माँग की कि BSF को बांग्लादेशियों की मोर्चे पर हत्या को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए क्योंकि 2019 में आकस्मिक आँकड़े तेज़ी से बढ़े हैं।

BGB प्रमुख ने कहा, “2019 में सीमा पर मृतकों की संख्या पिछले चार वर्षों में सबसे अधिक थी। हमारी गणना के अनुसार, ऐसी अप्रत्याशित मौतों की संख्या 35 थी।” डीजी स्तर की वार्ता के समापन के बाद नई दिल्ली में पिछले महीने BSF द्वारा जारी एक बयान में कहा गया:

“सीमाओं पर बांग्लादेशी नागरिकों की मौत के संबंध में BGB की चिंता पर, उन्हें यह सूचित किया गया कि सीमाओं पर BSF कर्मियों द्वारा एक गैर-घातक हथियार नीति का कड़ाई से पालन किया जाता है। फायरिंग का सहारा केवल आत्मरक्षा में लिया जाता है, जब BSF के गश्ती दल को घेरा जाता है और ‘दाह’ (तेज धार वाले हथियार) आदि से हमला किया जाता है। यह निर्दिष्ट किया गया था कि BSF राष्ट्रीयता के आधार पर अपराधियों के बीच भेदभाव नहीं करता है।”

इतना ही नहीं सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने पिछले साल मेघालय में भारत-बांग्लादेश सीमा से 10,000 से अधिक गायें ज़ब्त की गई हैं। एक अधिकारी ने गुरुवार को यह जानकारी दी। इन मवेशियों की क़ीमत 16.86 करोड़ रुपए आँकी गई।

ख़बर के अनुसार, BSF ने 2019 में वैध दस्तावेज़ों के बिना देश में प्रवेश करने के लिए कुल 176 विदेशियों (अवैध) को गिरफ़्तार भी किया। BSF के एक प्रवक्ता ने बताया, “पिछले साल 31 दिसंबर तक मेघालय में BSF ने 10239 मवेशियों को ज़ब्त किया, जिनकी क़ीमत 16.86 करोड़ रुपए आँकी गई।”

BSF के एक प्रवक्ता ने कहा कि पिछले एक साल के दौरान गायों की लगातार ज़ब्ती से सीमा पर पशु तस्करी के प्रयास में भारी वृद्धि के संकेत मिले हैं। उन्होंने बताया कि मवेशियों को हाथ-पाँव और मुँह बाँधकर अधिकतर उन्हें ट्रकों में ले जाया जाता था।

अधिकारी ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि राज्य पुलिस के साथ संयुक्त अभियान में BSF के जवानों ने 2019 में 3,665 की सँख्या में याबा टैबलेट नाम की प्रतिबंधित नशीली दवा भी बरामद की। उन्होंने कहा कि BSF ने पिछले एक वर्ष के दौरान शून्य रेखा से 20 लाख रुपए नकद भी ज़ब्त किए। उन्होंने बताया कि एक बांग्लादेशी के पास से 1 लाख रुपए मूल्य के नकली भारतीय नोट भी ज़ब्त किए गए।

पिछले दिनों बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने एनआरसी को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए कहा था, ‘हम बांग्लादेशी नागरिकों को वापस आने की अनुमति देंगे, क्योंकि उनके पास अपने देश में प्रवेश करने का अधिकार है।’ उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश-भारत के संबंध सामान्य और काफी अच्छे हैं और इस पर एनआरसी से कोई असर नहीं पड़ेगा।

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