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14 साल की लड़की का अपहरण: जबरन धर्म परिवर्तन… फिर किडनैपर अब्दुल से ही निकाह

पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएँ रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। एक ओर जहाँ पाकिस्तानी लड़कियाँ चीन भेजी जा रही हैं तो वहीं उस मुल्क में रहने वाली दूसरे धर्म की लड़कियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं। ताजा मामला कराची का है, जहाँ 14 साल ही ईसाई नाबालिग लड़की हुमा यूनुस का पहले अपहरण किया गया फिर जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। और तो और, अपहरण के आरोपित अब्दुल जब्बार से ही उसका निकाह भी करा दिया गया।

हुमा 8वीं कक्षा में पढ़ती है। पहले हुमा को किडनैप किया गया फिर उन्हें डेरा गाजी खान ले जाया गया है और जबरन धर्म परिवर्तन कराने के बाद अपहरण करने वाले अब्दुल जब्बार से उसका निकाह करा दिया गया। इसके बाद बड़े ‘शान’ से और ‘हिम्मत’ के साथ निकाह के कागज हुमा के माता-पिता के पास भेज दिया गया – यह इसलिए क्योंकि समझ जाओ कि बेटी अब दूसरे की हो गई, लापता-मिसिंग-कोर्ट-कचहरी जाने का कोई फायदा नहीं! लेकिन हुमा की माँ ने इस मामले में डर कर बैठने के बजाय अदालत जाना उचित समझा। पाकिस्तान की पत्रकार नायला इनायत ने इस संबंध में ट्वीट भी किया है।

अदालत में सुनवाई के बाद हुमा की माँ नगीना यूनुस ने सवाल किया कि क्या पाकिस्तान में अपहरण और धर्म परिवर्तन ही उनका भविष्य है? अगर ऐसा ही है तो क्या ईसाई माताओं को अपनी बेटियों को मार देना चाहिए? अदालत में कहा गया कि लड़की 18 साल की है, जबकि उनकी माँ का कहना है कि वो 14 साल की है। उनका जन्म 2005 में हुआ है। नगीना ने कहा कि उनकी शादी 2004 में हुई थी और 2005 में हुमा का जन्म हुआ है।

इसके साथ ही नगीना ने बताया कि जब्बार उसे फोन और मैसेज के जरिए धमकियाँ दे रहा है कि वो चाहे तो ईसाई समुदाय की पूरी बिरादरी ही क्यों न इकट्ठी कर ले… वो उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। वो सवाल करती हैं, “क्या ये इस्लामिक मुल्क है तो यहाँ हमारा कुछ भी नहीं हो सकता? या फिर हम अपनी बच्चियों को पैदा होते ही उनका गला घोंट कर मार दें? नहीं तो वो आएँगे और हमारी बच्चियाँ ले जाएँगे और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।” उनका कहना है कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, बिलावल भुट्टो और सेना प्रमुख बाजवा से मदद की गुहार भी लगाई है।

हालाँकि पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन का यह पहला मामला नहीं है। पड़ोसी मुल्क से ऐसी खबरें लगातार ही सामने आती रहती हैं। 4 सितंबर को भी लाहौर के पंजाब प्रांत 15 साल की एक ईसाई लड़की जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया था। बता दें कि पीड़ित ईसाई लड़की जिस स्कूल में पढ़ती थी, वहाँ की प्रिंसिपल सलीमा बीबी ने ही उसका धर्म परिवर्तन करवाया था। सलीमा बीबी ने शेखपुरा जिले के एक मदरसे में लेकर जाकर उसका धर्मांतरण किया गया।

उल्लेखनीय है कि 3 सितंबर को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में दो हिंदू लड़की को अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन करवाया गया था। इससे पहले एक सिख युवती को भी अगवा कर उसका धर्म परिवर्तन करवाने के बाद उसकी मोहम्मद हसन से शादी करवा दी गई, जो कि हाफ़िज़ सईद के आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा का सदस्य है।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय यानी हिंदुओं, सिखों, ईसाईयों, अहमदियों और शियाओं पर अत्याचार की घटनाएँ आम है। हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह करवाने को मजबूर किया जाता है। खुद पाकिस्तान के विपक्षी दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने बीते दिनों कहा था कि पाकिस्तान सबसे बुरी किस्म की असहिष्णुता का सामना कर रहा है। अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को लेकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार आलोचना हो चुकी है। भारत भी कई मंचों से वहॉं अल्पसंख्यकों की दुर्दशा का मसला उठा चुका है। हालॉंकि पाकिस्तान इन आरोपों को नकारता रहता है। लेकिन, हुमा के साथ घटे वाकये ने एक बार उसकी धार्मिक असहिष्णुता उजागर कर दी है।

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निर्भया मामले के दोषियों को जल्द से जल्द फाँसी दिए जाने के कयास लग रहे हैं। इसी बीच चारों दोषियों में से एक अक्षय सिंह ने फाँसी की सजा पर दोबारा विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है।

अपनी याचिका में अक्षय सिंह द्वारा अन्य क़ानूनी दावे, जैसे खुद को दोषी साबित किए जाने की न्यायिक प्रक्रिया में खामी, दुनिया भर में मृत्युदंड के खिलाफ बन रहे माहौल आदि के अलावा एक बहुत ही ‘अजीब’ तर्क भी दिया गया है। याचिका के मुताबिक चूँकि दिल्ली के वायु और जल प्रदूषण से वैसे भी लोगों के जीवन की अवधि कम हो रही है, अतः अक्षय को मृत्युदण्ड दिया जाना निरर्थक है

याचिका में कहा है, “जब हम आसपास देखते हैं तो पता चलता है कि इंसान जिंदगी में विपरीत स्थितियों का सामना कर शव जैसा ही हो जाता है। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि दिल्ली एक गैस चेंबर में तब्दील हो चुकी है। हर कोई जानता है कि दिल्ली की हवा और पानी कितना खराब हो चुके हैं। हवा और पानी खराब होने के चलते जिंदगी लगातार कम हो रही है। ऐसे में मौत की सजा की क्या जरूरत है।”

याचिका में महात्मा गॉंधी का भी हवाला दिया गया है। कहा गया है, “गॉंधी जी कहते थे कि कोई भी फैसला लेने से पहले गरीब के बारे में सोंचे। सोंचे कि आपका फैसला कैसे उस व्यक्ति की मदद करेगा। आप ऐसा करेंगे तो आपके भ्रम दूर हो जाएँगे।”

अक्षय सिंह की याचिका

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ हुए गैंगरेप ने पूरे देश को झकझोर दिया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चार आरोपितों मुकेश, विनय शर्मा, अक्षय कुमार सिंह और पवन गुप्ता को सजा सुनाई थी। एक आरोपित राम सिंह ने जेल में फाँसी लगा ली थी और एक अन्य को नाबालिग होने का फायदा मिला था। बाद में हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी इन चारों दोषियों की फाँसी की सजा बरकरार रखी थी।

इस रिव्यू पिटिशन से पहले 29 अक्टूबर 2019 को जेल प्रशासन ने सभी कानूनी रास्ते बंद हो जाने पर दोषियों को राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने के लिए सात दिन का वक़्त दिया था। इनमें से केवल विनय शर्मा ने ही इसके लिए अर्जी दाखिल की थी। इसे दिल्ली सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अपनी अस्वीकार्यता के साथ ही दिल्ली सरकार ने इस सम्बन्ध में कड़ी टिप्पणी भी दर्ज की थी।

दिल्ली सरकार के गृहमंत्री सतेन्द्र जैन ने लिखा था, “प्रार्थी ने जघन्य अपराध को अंजाम दिया है। यह एक ऐसा केस है जिसमें दी जाने वाली सजा को नजीर के तौर पर देखा जाएगा ताकि आने वाले समय में कोई भी इस अपराध को अंजाम न दे। दया याचिका में कोई योग्यता नहीं है, हम इसे अस्वीकार करने की सिफारिश करते हैं।”

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चारों दोषियों को फाँसी पर लटकाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। बताया जा रहा है कि 16 दिसंबर को फाँसी दी जा सकती है। तिहाड़ जेल प्रशासन ने तख्त तैयार करके एक डमी का ट्रायल किया है। हालाँकि अभी तक फाँसी देने को लेकर जेल प्रशासन के पास कोई लेटर नहीं आया है।

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शिवसेना करेगी घर वापसी! बाल ठाकरे के ‘माना’ ने कहा- भाजपा का साथ बेहतर

महा विकास अघाड़ी (शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी) ने महाराष्ट्र में सरकार भले बना ली हो, लेकिन गठबंधन साझेदारों के बीच का मतभेद खत्म होता नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि अपने साथ शपथ लेने वाले मंत्रियों को मनपसंद कार्यालय दे चुके मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे आज तक उनके विभाग का बॅंटवारा नहीं कर पाए हैं। उद्धव ने छह मंत्रियों के साथ 28 नवंबर को बड़े तामझाम के साथ शपथ ली। तीनों दलों की तरफ से दो-दो लोगों ने मंत्री पद की शपथ ली थी।

तीनों दलों के बीच जारी मतभेद को लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है, “विधानसभा का शीत सत्र केवल छह दिनों के लिए बुलाया गया है। अब तक न तो मंत्रियों को विभाग बॉंटे गए हैं और न कैबिनेट का विस्तार किया गया है। यह सत्र केवल परंपरा के निर्वाह के लिए बुलाया गया है, क्योंकि किसी को पता नहीं है कि इस हालत के लिए जवाबदेह कौन है।”

इस बीच, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना के दिग्गज नेता मनोहर जोशी ने भविष्य में भाजपा के साथ आने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा, “मेरी राय में यह ज्यादा अच्छा होता कि शिवसेना और भाजपा साथ रहते। लेकिन दोनों पार्टियॉं फिलहाल ऐसा नहीं चाहती।” उनका बयान ऐसे वक्त में आया है जब नागरिकता संशोधन विधेयक पर स्टैंड को लेकर पार्टी की छीछालेदर हो रही है।

लोकसभा में सोमवार को जब इस बिल पर वोटिंग हुई तो शिवसेना के 18 सांसदों ने पक्ष में वोट किया। उसका यह कदम बिल का विरोध कर रही और महाराष्ट्र की सत्ता में साझेदार कॉन्ग्रेस को रास नहीं आया। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने इस बिल का समर्थन करने वालों को जब देशद्रोही करार देने की कोशिश की तो शिवसेना के सुर बदल गए। उद्धव ने कहा कि उनकी पार्टी राज्यसभा में इस बिल का तब तक समर्थन नहीं करेगी जब तक कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो जाती। इससे पहले पार्टी सांसद अरविंद सावंत ने कहा था कि राज्यसभा में भी पार्टी हिंदुत्व को लेकर अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटेगी।

नागरिकता संशोधन विधेयक पर शिवसेना के ‘पेंडुलम स्टैंड को लेकर उसकी खासी आलोचना हो रही है। एआईएमआईएम के नेता और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने चुटकी लेते हुए कहा है कि यह भांगड़ा पॉलिटिक्स है। ओवैसी ने कहा, “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में महा विकास अघाड़ी सरकार ‘सेकुलर’ है। ऐसे में उस बिल का समर्थन जो धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है, अवसरवाद की राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं है।”

असल में, शिवसेना की दिक्कत यह है कि उसकी कमाई ही हिंदुत्व की राजनीति की है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए उस पर हिंदुत्व के एजेंडे से समझौते के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय स्तर पर सरकार गठन के बाद सैकड़ों नेता इसी वजह से पार्टी छोड़कर गए है। ऐसे में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर वह नहीं चाहती कि उस पर लगे आरोपों को बल मिले।

सीएम बनने के बाद से उद्धव कई बार हिंदुत्व पर जोर भी दे चुके हैं। लेकिन, उनकी परेशानी यह है कि शिवसेना जब भी ऐसा करते दिखने की कोशिश करती है राज्य की सत्ता के साझेदार उसकी लगाम खींचने लगते हैं। उप मुख्यमंत्री, महकमों को लेकर पहले से ही मतभेद चल रहे हैं। ऐसे में उद्धव बखूबी जानते हैं कि हिंदुत्व के एजेंडे पर जोर देने से उनकी सरकार की अकाल मौत हो सकती है। वैसे इसकी संभावना सरकार गठन के वक्त से ही जताई जा रही है।

इसके अलावा कर्नाटक में कॉन्ग्रेस से बगावत कर भाजपा का साथ देने वाले विधायकों को उपचुनाव में जनता ने जिस तरह सिर आँखों पर बिठाया है, उससे भी शिवसेना सशंकित होगी। यह आशंका उसके मन में गहरे तक बैठी होगी कि भाजपा का साथ छोड़ने पर उसका भी ऐसा ही हश्र हो सकता है। यही कारण है कि मनोहर जोशी ने निजी राय बता कर भविष्य में दोनों दलों के साथ आने के संकेत दिए हैं।

शिवसेना में जोशी की हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में 1993 में जब पहली बार शिवसेना सत्ता में आई थी तो उद्धव के पिता बाल ठाकरे ने उन्हें ही मुख्यमंत्री के रूप में चुना था। लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके जोशी को बाल ठाकरे माना (मनोहर) कहा करते थे।

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NCP नेता नवाब मलिक को चढ़ा शेरो-शायरी का खुमार, ट्विटर पर हुए ट्रोल

5वीं बार के विधानसभा सदस्य और एनसीपी की मुंबई इकाई के अध्यक्ष नवाब मलिक को महा विकास अघाड़ी के
अपने साथी संजय राउत की तरह ट्विटर पर शेरो-शायरी करने का कीड़ा काट लिया है। उन्होंने न केवल बेहद आशिकाना शायरी आज (मंगलवार, 10 दिसंबर, 2019 को) ट्विटर पर शेयर की, बल्कि शिवसेना सांसद और सामना के कार्यकारी सम्पादक राउत को टैग भी कर दिया।

बस, फिर क्या था? ट्विटर पर उनकी आज शाम जमकर ट्रोलिंग हुई। एक व्यक्ति ने शब्दों की बजाय मीम में भावनाएँ व्यक्त करते हुए पोस्ट किया:

कुछ लोगों को उनका यह ‘टैलेंट’ इतना बुरा लगा कि:

सीवोटर के प्रबंध निदेशक और मुख्य सम्पादक यशवंत देशमुख भी उनकी भावनाओं पर “मैं वारी जावां” हुए बिना नहीं रह पाए।

और भी काफी लोगों को यह ‘हाले-दिल’ छू गया।

लेकिन कुछ निष्ठुर ट्विटर यूज़र भी थे, जिन्होंने नवाब मलिक की उम्र का तकाज़ा याद दिलाना शुरू कर दिया। साथ ही बहते पानी में हाथ धोते हुए राउत पर भी भड़ास निकाल ली।

एक शायरी के ‘हाथोंहाथ’ लिए जाने भर से नवाब मलिक का मन भी नहीं भरा। थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर लिखा:

शायरी से श्राप तक: क्लर्क से संपादक और नेता बने संजय राउत ने जब फैलाया था रायता, आज खुद फैल गए!

संजय राउत ने जब बना दिया ‘धोबी का कुत्ता’, तब उद्धव का इशारा- BJP से गठजोड़ की उम्मीद

राम मंदिर में टाँग अड़ाने सुप्रीम कोर्ट पहुँचा लिबरल गिरोह, 40 में से कोई नहीं था मूल मुकदमे में पक्षकार

राम जन्मभूमि को लेकर चल रहे करीब 500 साल पुराने विवाद का सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से भले पटाक्षेप हो गया हो, लेकिन कुछ लोग हैं जो चाहते हैं की देश इस मुद्दे से बाहर नहीं निकले। इनमें फैसला कबूल करने की बात कह मुकरे मुस्लिम संगठन ही नहीं हैं। पूरा का पूरा लिबरल गिरोह इसमें शामिल है। कल (सोमवार 10 दिसंबर, 2019) को ऐसे 40 लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डाली। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “एक आस्था को दूसरी आस्था पर तरजीह देना वाला” बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि इस फैसले से “देश की सामंजस्यपूर्ण संस्कृति और संविधान में परिकल्पित उसके सेक्युलर फैब्रिक पर सीधा असर पड़ेगा।”

रामजन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का कल आखिरी दिन था। जब पूरा देश नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस में लगा था तो अयोध्या में राम मंदिर की राह में रोड़ा डालने के मकसद से यह याचिका दाखिल की गई।

याचिका दाखिल करने वालों में इरफ़ान हबीब, शबनम हाशमी, अपूर्वानंद झा, नंदिनी सुंदर और इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कर चुके और लम्बे समय से हिन्दू-विरोधी कार्यों में लिप्त हर्ष मंदर शामिल हैं। इनमें से एक भी व्यक्ति 1949-50 से 2019 तक चले मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं था। इरफ़ान हबीब ने इस मुकदमे में हिन्दू पक्ष के साक्ष्यों को झुठलाने की कोशिश अवश्य की थी, लेकिन असफल रहे थे।

गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें मुस्लिम जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

अपनी याचिका में इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के ऊपर ही मुकदमे की प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया है। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जमीन के मालिकाना हक से आगे बढ़कर मुक़दमे की परिधि में हिन्दू और मुस्लिम आस्थाओं के टकराव को शामिल कर लिया था।

इस याचिका को दायर करने वाले अधिवक्ता पूर्व आम आदमी पार्टी नेता, राफेल घोटाले के याचिकाकर्ता और जनमत संग्रह की आड़ में कश्मीर पाकिस्तान को सौंप देने की माँग का समर्थन कर इसके लिए पिटने वाले प्रशांत भूषण हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हिन्दू पक्ष को जन्मभूमि की ज़मीन देने का आधार केवल आस्था को माना गया है, जबकि मस्जिद के पक्ष में पुरातात्विक साक्ष्यों को नज़रंदाज़ कर दिया गया। यह कोरा झूठ है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया था कि वह हिन्दू पक्ष को यह ज़मीन आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि पुरातत्व विभाग की खुदाई में मस्जिद के हज़ारों साल पहले तक मंदिर के साक्ष्य मिलने, मस्जिद बनने के बाद से 19वीं सदी के छठे दशक के बीच हिन्दू पक्ष द्वारा अपनी पूजा साबित करने और मुस्लिमों द्वारा इसी कालखंड में लगातार नमाज़ साबित न कर पाने के चलते दे रहा है।

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राम मंदिर फैसले पर पुनर्विचार याचिका का उमर खालिद कनेक्शन, आतंकी संगठन SIMI से भी है रिश्ता

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मिशनरियों के एजेंट का ‘बैन’: मोदी बन गए पीएम, अमित शाह का सफर…

भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की अमेरिका को रह-रहकर होने वाली खुजली नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे पर एक बार फिर सामने आ गई है। अमेरिकी सरकार की दुनिया में चौधराहट कायम रखने के लिए बने प्रोपेगेंडा आयोग U.S. Commission on International Religious Freedom (USCIRF) ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर ‘चिंता’ जताते हुए अमेरिकी सरकार से ‘गुज़ारिश’ की है कि इसके लिए वह गृह मंत्री अमित शाह “और अन्य चोटी के नेताओं” पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करे।

पहली बात तो किस “और अन्य चोटी के नेताओं” पर प्रतिबंध का मंसूबा USCIRF पाल रही है? अमित शाह से वरिष्ठ तो केवल पीएम मोदी हैं। मोदी जब गुजरात के सीएम थे, तब USCIRF ने कोशिश की थी– नतीजा यह निकला कि मोदी प्रधानमंत्री बन गए। अब उन्हें अमेरिका का चुनाव जितवाना चाहती है ये कमीशन?

कमीशन के बयान में कहा गया है कि यह “आस्था के आधार पर नागरिकता तय करने की न्यायिक ज़मीन तैयार कर रहा है”, यह बिल “भारत के ‘सेक्युलर बहुलतावाद’ के इतिहास के विपरीत है”, “लाखों मुस्लिमों से नागरिकता छीनने की दिशा में कदम है”- वही सारे झूठ, जो भारत में वामपंथी और विपक्षी नेता गढ़ रहे हैं।

यह कमीशन न केवल इस बात के लिए बदनाम है कि दूसरे देशों में अमेरिकी सरकार ने आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक हस्तक्षेप और आधिपत्य के लिए बहाना तैयार करने में इसकी रिपोर्टों का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा कई देशों पर सैन्य कार्रवाई करने के लिए गिनाए गए कारणों में भी इसकी रिपोर्ट का हवाला अमेरिकी सरकारें देती रही है। यानी, यह अमेरिका को दूसरे देशों पर हमले करने के बहाने देने के लिए भी आरोपित रहता है।

इसके अलावा इसे ईसाई मिशनरियों को गैर-ईसाई देशों में बढ़ावा देने और ईसाई मत में जबरन/लोभ द्वारा मतांतरण में भी संलिप्त पाया गया है। इस कमीशन को 1998 में बनाने वाले सांसदों में से एक सैमुएल ब्राउनबैक थे, जिन्हें अमेरिका में कट्टर और दूसरे मज़हबों का मतांतरण कराने वाले ईसाई के रूप में जाना जाता है।

पिछले साल ईसाई मिशनरी जॉन एलन चाउ ने अंडमान की विलुप्तप्राय और जैविक रूप से बीमारियों को लेकर संवेदनशील सेन्टिनलीज़ जनजाति के लोगों की जान खतरे में डाल उन्हें ईसाई बनाने की कोशिश की थी और उनके हाथों मारा भी गया था। उसके लिए भी पहले मिशनरियों ने अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश की कि भारत सरकार को सेन्टिनलीज़ जनजाति के लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए वह मजबूर करे। लेकिन चूँकि उस मामले में चाउ ने सेन्टिनलीज़ लोगों की जान से खिलवाड़ करने की कोशिश की थी और भारत ही नहीं, दुनिया भर के हिन्दुओं ने इस बात को लेकर मिशनरियों के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर किया था, अतः खिसिया कर ब्राउनबैक को कहना पड़ा कि अमेरिकी सरकार चाउ की गलती मानती है और भारत सरकार से
सेन्टिनलीज़ जनजाति के खिलाफ किसी कदम के लिए दबाव इस मामले को लेकर नहीं बनाएगी।

यही नहीं, इस कमीशन के वर्तमान अध्यक्ष टोनी पर्किन्स नामक अमेरिकी राजनेता हैं, जिनकी इस कमीशन में नियुक्ति का अमेरिकी हिन्दुओं ने शुरू से विरोध किया था। पर्किन्स ने अमेरिका में ईश्वर की परिकल्पना को “केवल यहूदी और ईसाई” बताते हुए “अमेरिका और हिन्दू धर्म में कोई संबंध नहीं है” कहा था। एक झटके में अमेरिका के लाखों लोगों को अपने मज़हब या देश में से किसी एक को चुनने का फरमान देने वाले ‘बिगट’ की अध्यक्षता वाला कमीशन दूसरे देशों को क्या सीख दे रहा है? उन्होंने हिन्दू और बौद्ध ध्यान पद्धतियों का भी मखौल उड़ाया था और इन्हें अमेरिकी सिपाहियों को सिखाए जाने का विरोध किया था।

टोनी पर्किन्स को समस्या केवल हिन्दुओं से ही हो, ऐसा भी नहीं है। जिस इस्लाम के भारत में भविष्य की उन्हें चिंता हो रही है, उसी को उन्होंने ‘evil’ कहा था। यह भी कहा था कि उनकी राय के अनुसार अमेरिकी संविधान का आस्था की आज़ादी देने वाला कानून लोगों को इस्लाम चुनने की इजाज़त नहीं देता, क्योंकि उनके अनुसार इस्लाम को पूरी तरह से माना गया तो अमेरिकी समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा। इसके अलावा उन्होंने यह भी दावा किया था कि “यहूदियों-ईसाइयों का वाला परमेश्वर ही” अमेरिका को आस्था की आज़ादी देता है। यानी, उनके कथन के हिसाब से अमेरिका का परमेश्वर यह ‘इजाज़त’ देता है कि अमेरिकी लोग कोई भी आस्था चुन लें, बशर्ते वह ईसाइयत हो

कमीशन के प्रोपेगेंडा के जवाब में जब विदेश मंत्रालय उनके पूर्वाग्रह और उनके पिछले इतिहास की बात करता है, तो यही सब चीज़ें होतीं हैं।

इस कमीशन के पिछले अध्यक्ष थे डॉ. तेंज़िन दोरजी। इस संस्था ने कुछ महीने पहले भी जब भारत में मज़हबी स्वतंत्रता के बारे में प्रोपेगेंडा करने की कोशिश की थी, तो उन्होंने बहुमत से अलग न केवल राय रखी बल्कि संख्याबल से दबाए जाने पर कमीशन की रिपोर्ट से अलग राय का असहमति-पत्र (डिसेंट नोट) लिखा। इस नोट में डॉ. दोरजी ने साफ-साफ लिखा कि कमीशन की रिपोर्ट ने हिंदुस्तान का जो चित्रण किया है, उनके व्यक्तिगत अनुभव उससे कतई मेल नहीं खाते। उन्होंने बताया कि एक तिब्बती बौद्ध होने के नाते वह हिंदुस्तान के सबसे कमज़ोर अल्पसंख्यक वर्ग के तौर पर 30 वर्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने “पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता” का अनुभव किया है। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि महज़ तीन महीने के भीतर डॉ. दोरजी अपने पद पर नहीं हैं।

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छात्राओं को देख नईम खान करता था गंदी हरकत, महिला सिपाही ने जूतों से पीट सिखाया सबक: Video वायरल

उत्तरप्रदेश के बिठूर में मंगलवार (दिसंबर 10, 2019) को शनिदेव चौराहे के पास एक महिला सिपाही ने गंदी हरकत करने पर एक मनचले युवक को बीच सड़क पर सबक सिखाया। इस दौरान महिला सिपाही ने जूते से युवक की जमकर पिटाई की। युवक की पहचान नईम खान के रूप में हुई है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। हर कोई इस सिपाही की तारीफ कर रहा है। मामला तूल पकड़ने पर अफसरों ने अब इसे संज्ञान में लिया है। नईम के ख़िलाफ़ बिठूर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

जानकारी के अनुसार, दुष्कर्म और हत्या की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर यूपी सरकार ने महिला सुरक्षा को लेकर जनपदों की पुलिस प्रशासन को दिशा-निर्देश जारी किए हैं और पुलिस की एंटी रोमियो टीम को काम पर लगाया है। इसी क्रम में चौराहे पर महिला सिपाही को मनचलों पर नजर रखने के लिए तैनात किया गया था। जहाँ आसपास पर 4-5 स्कूल है और जिधर रोजाना सुबह-दोपहर छात्राओं का आना जाना रहता है। अब ऐसे में मंगलवार की सुबह एक मनचला वहाँ खड़े होकर लड़कियों पर फब्तियाँ कसता और अश्लील गाने गाता दिखा। जिससे तंग आकर कुछ छात्राओं ने सिपाही को इसकी जानकारी दी।

सूचना मिलने के बाद एंटी रोमियो टीम की चंचल चौरसिया नामक महिला सिपाही ने उसे पकड़ लिया। जब समझाने पर भी वो नहीं माना तो पहले चंचल चौरसिया ने उसे थप्पड़ मारे और फिर पैर से जूता निकाल उसे जमकर पीटा। इसी बीच किसी ने इस घटना की वीडियो बना लिया और यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद अफसरों ने इसे संज्ञान में लिया और कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए। एंटी रोमियो टीम इसके बाद मनचले को थाने में ले गई। जहाँ उसने अपनी पहचान नईम खान के रूप में की।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार थाना प्रभारी विनोद कुमार सिंह ने बताया आरोपित नईम मूलरूप से फतेहपुर का रहने वाला है और चमनगंज में रहता है। उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जा रहा है।

जिसने किया भारत पर सबसे पहला हमला, उसी संग नेहरू ने किया समझौता: इसी कारण बनी CAB

लोकसभा में सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को नागरिकता संशोधन बिल 2019 की बहस के दौरान सदन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नेहरू-लियाकत समझौते को नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) की वजह बताई। साथ ही उन्होंने 1950 में लागू हुए इस समझौते के बारे में उन्होंने कई सवाल भी उठाए। विधेयक पेश करने के दौरान विपक्षियों ने इसे मजहब विशेष के खिलाफ भेदभाव बताया था, मगर अमित शाह ने नेहरू-लियाकत समझौते का उल्लेख करते हुए नए कानून को सही ठहराया।

उन्होंने कहा कि नेहरू-लियाकत समझौता विफल रहा। इसलिए यह बिल लाने की आवश्कता पड़ी। यदि पाकिस्तान द्वारा संधि का पालन किया गया होता, तो इस विधेयक को लाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। असम के मंत्री हेमंत विस्व शर्मा ने भी लोगों को नेहरू लियाकत समझौता की याद दिलाई। विस्व शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि यह बिल नेहरू-लियाकत समझौता की ऐतिहासिक भूलों को ठीक करने वाला है।

क्या है नेहरू-लियाकत समझौता

ये वो दौर था जब भारत और पाकिस्तान विभाजन का दंश झेल रहे थे। स्वतंत्र भारत और नए बने पाकिस्तान बँटवारे के बाद हुए भीषण दंगों से लोग पीड़ित थे। सैकड़ों दंगा पीड़ित लोग इस सीमा से उस सीमा को पार करते रहते थे। इसी पृष्ठभूमि में 1950 में इस समझौते पर दिल्ली के गवर्मेंट हाउस में दोनों देशों के पहले प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान ने दस्तखत किए थे। समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने देश में अल्पसंख्यक आयोग गठित किए थे। इस समझौते के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच दिल्ली में 6 दिनों तक बातचीत हुई थी। इसे दिल्ली पैक्ट (Delhi Pact) के नाम से भी जाना जाता है।

तात्कालिक चिंता पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं और पश्चिम बंगाल के मुस्लिमों का पलायन था। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले ही जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की घुसपैठ के की वजह से संबंध तनावपूर्ण बन गए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच दिसंबर 1949 तक आर्थिक संबंध टूट गए थे। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों, जैन और बौद्धों के पलायन और भारत में मजहब विशेष को गंभीर शरणार्थी संकट का सामना करना पड़ा।

समझौते की मुख्य बातें:-

1. प्रवासियों को ट्रांजिट के दौरान सुरक्षा दी जाएगी। वे अपनी बची हुई संपत्ति को बेचने के लिए सुरक्षित वापस आ-जा सकते हैं।

2. जिन औरतों का अपहरण किया गया है, उन्हें वापस परिवार के पास भेजा जाएगा। अवैध तरीके से कब्जाई गई अल्पसंख्यकों की संपत्ति उन्हें लौटाई जाएगी।

3. जबरदस्ती धर्म परिवर्तन अवैध होगा, अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा के अधिकार दिए जाएँगे। दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह का कुप्रचार नहीं चलाने दिया जाएगा।

4. दोनों देश, युद्ध को भड़ाकाने वाले और किसी देश की अखंडता पर सवाल खड़ा करने वाले प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे।

समझौते के समय गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल भी मौजूद थे। इस समझौते का विरोध करते हुए नेहरू सरकार के उद्योगमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा दे दिया था। मुखर्जी तब हिंदू महासभा के नेता थे। उन्होंने पैक्ट को मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला करार दिया था।

बता दें कि लियाकत अली खान विभाजन और आजादी से पूर्व भारत में एक अस्थायी और कम समय की सरकार में पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल सहयोगी रहे थे। वित्त मामलों को देखने की जिम्मेदारी को तरीके से नहीं निभाने के कारण लियाकत काफी विवादित रहे। AMU से पढ़े लियाकत बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने। उन्हीं के कार्यकाल में भारत पर पाकिस्तान की ओर से पहला सैन्य हमला किया गया।

मोहम्मद अली जिन्ना से राजनीति सीखने वाले लियाकत ने अपना पहला चुनाव मुजफ्फरनगर (यूनाइटेड प्रोविंसेज) से लड़ा था। पाक के प्रधानमंत्री के तौर उनकी एकमात्र बड़ी उपलब्धि 1949 में नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान बनाने का है। 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के कंपनी बाग में लियाकत अली खान की गोली मारकर हत्या कर दी गई। लियाकत की हत्या के बाद पहले दशक में ही पाकिस्तान में लगातार रहने वाले सैन्य शासन की शुरुआत हो गई।

आखिर क्यों पड़ी नागरिकता संशोधन बिल (CAB) लाने की जरूरत

लोकसभा में विपक्ष को जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा कि इस देश का विभाजन धर्म के आधार पर नहीं होता, तो इस बिल को लेकर आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। बिल पर शाह ने कहा कि 1950 में नेहरू-लियाकत एक समझौता हुआ। उस समझौते के तहत ये निश्चित किया गया कि दोनों देश अपने-अपने अल्पसंख्यकों का ध्यान रखेगा। बाद में बांग्लादेश बना। भारत-पाक दोनों देशों के सरकार ने ये विश्वास दिलाया था कि पाकिस्तान के अंदर जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी हैं, उनका पाकिस्तान ध्यान रखेगा और भारत में जो माइनॉरिटी है उसका हिंदुस्तान ध्यान रखेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। भारत ने तो उसका अनुसरण किया, लेकिन पाकिस्तान में 1950 का नेहरू-लियाकत समझौता धरा का धरा रह गया।

इसी का परिणाम है कि 1947 में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 23 फीसदी थी, लेकिन 2011 में 3.7 फीसदी हो गई। इसी तरह बांग्लादेश में 1947 में 22 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी थी, लेकिन 2011 में यह 7.8 पर्सेंट हो गई। अफगानिस्तान में 1992 से पहले दो लाख से अधिक हिंदू और सिख थे, जिनकी संख्या 500 से कम बची है। आखिर ये लोग कहाँ चले गए? या तो मार दिए गए या भगा दिए गए या फिर इनका धर्मांतरण करा दिया गया। आखिर उनका क्या दोष था? हम चाहते हैं कि इन लोगों का सम्मान बना रहे। इसलिए इस बिल को लाने की आवश्यकता पड़ी।

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निर्भया केस: फाँसी पर लटकने का इंतजार कर रहे अक्षय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की पुनर्विचार याचिका

निर्भया मामले के दोषियों को जल्द से जल्द फाँसी दिए जाने के कयास लग रहे हैं। इसी बीच चारों दोषियों में से एक अक्षय सिंह ने फाँसी की सजा पर दोबारा विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है।

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ हुए गैंगरेप ने पूरे देश को झकझोर दिया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चार आरोपितों मुकेश, विनय शर्मा, अक्षय कुमार सिंह और पवन गुप्ता को सजा सुनाई थी। एक आरोपित रामसिंह ने जेल में फाँसी लगा ली थी और एक अन्य को नाबालिग होने का फायदा मिला था। बाद में हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी इन चारों दोषियों की फाँसी की सजा बरकरार रखी थी।

इस रिव्यू पिटिशन से पहले 29 अक्टूबर 2019 को जेल प्रशासन ने सभी कानूनी रास्ते बंद हो जाने पर दोषियों को राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने के लिए सात दिन का वक़्त दिया था। इनमें से केवल विनय शर्मा ने ही इसके लिए अर्जी दाखिल की थी। इसे दिल्ली सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अपनी अस्वीकार्यता के साथ ही दिल्ली सरकार ने इस सम्बन्ध में कड़ी टिप्पणी भी दर्ज की थी।

दिल्ली सरकार के गृहमंत्री सतेन्द्र जैन ने लिखा था, “प्रार्थी ने जघन्य अपराध को अंजाम दिया है। यह एक ऐसा केस है जिसमें दी जाने वाली सजा को नजीर के तौर पर देखा जाएगा ताकि आने वाले समय में कोई भी इस अपराध को अंजाम न दे। दया याचिका में कोई योग्यता नहीं है, हम इसे अस्वीकार करने की सिफारिश करते हैं।”

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चारों दोषियों को फाँसी पर लटकाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। बताया जा रहा है कि 16 दिसंबर को फाँसी दी जा सकती है। तिहाड़ जेल प्रशासन ने तख्त तैयार करके एक डमी का ट्रायल किया है। हालाँकि अभी तक फाँसी देने को लेकर जेल प्रशासन के पास कोई लेटर नहीं आया है।

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लोकसभा में हाँ, राज्यसभा में ना: नागरिकता संशोधन विधेयक पर शिव सेना का ‘पेंडुलम हिंदुत्व’

पेंडुलम एक यंत्र होता है, जिसमें धागे से बंधी गेंद या गोला लगातार दो सिरों के बीच झूलता रहता है। शिव सेना आजकल वही गोला बनी हुई है। बाला साहेब के हिंदुत्व और अपनी नई संगिनी कॉन्ग्रेस के बीच झूलती पार्टी विचारधारा के मुद्दों पर लगातार यूटर्न ले रही है।

ताज़ा यूटर्न पार्टी सुप्रीमो उद्धव ठाकरे का मीडिया में घूम रहा वह बयान है, जिसमें नागरिकता संशोधन विधेयक के राज्यसभा में समर्थन के लिए वे ना-नुकुर कर रहे हैं। बकौल समाचार एजेंसी एएनआई, महाराष्ट्र के मुख़्यमंत्री और महा विकास अघाड़ी के सदस्य ठाकरे ने कहा है कि उनकी पार्टी इस बिल का समर्थन (राज्यसभा में) तब तक नहीं करेगी, जब तक “चीज़ें स्पष्ट नहीं हो जाएँगी।”

इस बयान पर आपत्तियाँ मुख्यतः दो कारणों से उठ रहीं हैं। पहला तो कॉमन सेंस का है। अगर शिव सेना को बिल के मसौदे से कोई समस्या थी, तो उसने वह दिक्कतें लोक सभा में क्यों नहीं उठाईं? क्यों उसके 18 सांसदों ने उस कॉन्ग्रेस को नाराज करने का जोखिम लेता दिखने की कोशिश की, जो शिव सेना की अघाड़ी सरकार की ऑक्सीजन भी है, और इस बिल के सख्त खिलाफ भी?

आपत्ति का दूसरा कारण राजनीतिक है। जब शिव सेना यह दिखाने की कोशिशों में लगी थी कि उसने एनडीए छोड़ा है, हिंदुत्व नहीं, और इसी के लिए नागरिकता विधेयक के समर्थन का दावा कर रही थी, तो उस समय “चीज़ें स्पष्ट” का सवाल कहाँ चला गया था?

शिव सेना साफ़ तौर पर सत्ता की मलाई तुरंत न छूट जाने और विचारधारा से मिलने वाले वोटों की मलाई लम्बे समय तक चाटने, दोनों के एक साथ जुगाड़ के चक्कर में ही बेहाल है। पहले ANI शिव सेना नेता अरविन्द सावंत के हवाले से विधेयक का समर्थन करने के आशय का बयान प्रकाशित करती है, जिसमें लोकसभा वाला हिंदुत्व और राष्ट्रवाद वाला ही रुख पार्टी द्वारा राज्यसभा में भी बनाए रखने की बात साफ़ तौर पर है।

लगभग उसी समय सावंत के बॉस (उद्धव) के भी ‘बॉस’ राहुल गाँधी विधेयक का समर्थन करने वालों को देशद्रोही करार देने की कोशिश करते हैं।

यह सर्वविदित है कि वैसे ही राहुल गाँधी इस बेमेल गठबंधन के खिलाफ थे, और उनकी माँ और कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी के मान जाने के कारण ही यह सम्भव भी हो पाया था। उसी के बाद शिव सेना फिर से गुलाटी मारती है, और उद्धव ठाकरे को “चीज़ें स्पष्ट नहीं” दिखने लगतीं हैं।

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