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JNU केसः केजरीवाल सरकार ने नहीं दी देशद्रोह का केस चलाने की इजाजत, 19 फरवरी को होगी सुनवाई

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) देशविरोधी नारेबाजी के मामले में आज (दिसंबर 11, 2019) पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कहा कि अभी भी दिल्ली सरकार से देशद्रोह के सेक्शन पर अप्रूवल नहीं मिला है। फिलहाल मामले से जुड़ी फाइल गृह मंत्रालय के पास है। इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई 19 फरवरी तक टाल दी। 

बता दें कि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने देशद्रोह मामले में जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार को निर्देश देने से 4 दिसंबर को इनकार कर दिया था। JNU के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और और उमर खालिद के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देने के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के लिए गाइडलाइन जारी करने से इनकार किया था। पीठ ने कहा था कि यह दिल्ली सरकार पर निर्भर है कि वह मौजूदा नियमों, नीति, कानून और तथ्यों के अनुसार यह फैसला लें कि मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी दी जाए या नहीं। 

अदालत ने कहा कि याचिका में गंभीर प्रकृत्ति के आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए दिशा निर्देश देने की माँग की गई है, जिसमें बतौर आरोपित प्रभावशाली व्यक्ति शामिल हैं। इस पर अदालत ने कहा कि मौजूदा नियमों के अलावा ऐसे दिशा निर्देश जारी करने के लिए सरकार को निर्देश देने की कोई वजह नजर नहीं आती। उन्होंने कहा कि इस पर विभिन्न अदालतों ने पर्याप्त संख्या में फैसले दे रखे हैं।

गौरतलब है कि 14 जनवरी 2019 को दिल्ली पुलिस ने करीब 1200 पन्ने का आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया था। इसमें जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के सदस्य उमर खालिद को मुख्य आरोपित बनाया था। वहीं, सात अन्य आरोपितों में आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उतर गुल, रईस रसूल, बसरत अली व खालिद बशीर भट का नाम शामिल है। इसके अलावा रामा नागा, आशुतोष, शहला राशीद, डी राजा की बेटी अपराजिता राजा, रुबैना सैफी, समर खान समेत 36 छात्रों को भी आरोपित बताया गया है।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) देशविरोधी नारेबाजी के मामले में आज (दिसंबर 11, 2019) पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कहा कि अभी भी दिल्ली सरकार से देशद्रोह के सेक्शन पर अप्रूवल नहीं मिला है। फिलहाल मामले से जुड़ी फाइल गृह मंत्रालय के पास है। इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई 19 फरवरी तक टाल दी। 

‘गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़की हिंसा सुनियोजित नहीं’ – नानावती आयोग से ‘CM मोदी’ को क्लीन चिट

साल 2002 में गुजरात में हुए साम्प्रादायिक दंगों पर नानावती-मेहता आयोग की फाइनल रिपोर्ट विधानसभा में आज पेश कर दी गई। इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तत्कालीन मुख्यमंत्री) को क्लीन चिट दी गई। बता दें 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी में 59 कारसेवकों को जलाए जाने के बाद राज्य में हिंसा भड़की थी। जिसके बाद से तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई आरोप लगते रहे। लेकिन, बुधवार (दिसंबर 11, 2019) को गुजरात विधानसभा में दंगों की जाँच कर रहे नानावती आयोग की अंतिम रिपोर्ट रखी गई। जिसमें गुजरात के गृह मंत्री प्रदीप सिंह जाडेजा ने सदन में रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगे आरोप खारिज किए गए हैं।

रिपोर्ट को तत्कालीन राज्य सरकार को सौंपे जाने के पाँच साल बाद सदन के पटल पर रखा गया। नानावती-मेहता कमिशन की रिपोर्ट में कहा गया कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी जलाए जाने के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा सुनियोजित नहीं थी। इसलिए, आयोग ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी है।

1500 से अधिक पन्नों की अपनी रिपोर्ट को सदन में पेश करते हुए आयोग ने कहा कि जाँच में उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे साबित कि राज्य के किसी मंत्री ने इन हमलों के लिए उकसाया या भड़काया। कुछ जगहों पर भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस अप्रभावी रही, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मी नहीं थे या वे हथियारों से अच्छी तरह लैस नहीं थे।

इसके अलावा आयोग ने अहमदाबाद शहर में सांप्रादायिक दंगों की कुछ घटनाओं का हवाला देकर कहा कि दंगों के दौरान पुलिस ने उन्हें नियंत्रित करने में सामर्थ्य, तत्परता नहीं दिखाई, जो आवश्यक था। इसलिए आयोग ने दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ जाँच या कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।

नानावती आयोग:

  • ये आयोग साल 2002 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने साम्प्रदायिक दंगों की जांँच के लिए गठित किया था। जिनमें 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
  • इन दंगों की पृष्ठभूमि गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन की दो बोगियों में आग लगाई जाने वाली घटना थी, जिसमें 59 कारसेवक मारे गए थे।
  • 2002 के गुजरात दंगे और उस पर की गई कार्रवाई पर न्यायमूर्ति नानावती-मेहता आयोग की रिपोर्ट का पहला हिस्सा 25 सितंबर, 2009 को विधानसभा में पेश किया गया था।
  • इसके बाद आयोग ने 18 नवंबर, 2014 को तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी। लेकिन तब से यह रिपोर्ट राज्य सरकार के पास ही थी।

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पहली पत्नी की सहमति से की गई दूसरी शादी वैध नहीं हो जाती: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट में न्यायाधीश हेमंत कुमार श्रीवास्तव और न्यायाधीश प्रभात कुमार सिंह की खंडपीठ ने एक मामले पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि पहली पत्नी की रजामंदी के बावजूद भी किसी व्यक्ति को दूसरी शादी करने का अधिकार नहीं मिलता। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार ऐसी शादी वैध नहीं होती।

पटना हाईकोर्ट ने यह फैसला एक सीआरपीएफ के पूर्व असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर की अपील पर सुनाया। जिन्होंने कुछ समय पहले पहली पत्नी के साथ गुजर-बसर करने के दौरान ही सीआरपीएफ की एक महिला कॉन्स्टेबल सुनीता उपाध्याय से शादी कर ली थी।

जानकारी के अनुसार, दूसरी शादी के बाद अपीलकर्ता की पहली पत्नी रंजू सिंह ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की थी और उनपर विभागीय कार्रवाई शुरू हुई थी। जाँच सम्पन्न होने के बाद सीआरपीएफ अधिकारी वास्तविकता में पहली पत्नी के दोषी पाए गए थे और उन्हें प्रशासन के आदेशानुसार उनकी नौकरी से निकाल दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपने ऊपर सुनाए गए फैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार करने की माँग की, लेकिन फिर भी उनके ख़िलाफ़ लिए आदेशों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

अपीलकर्ता (सीआरपीएफ अधिकारी) के वकील ने इस पूरे मामले पर सुनवाई करते हुए बताया कि उनके मुवक्किल पर उनकी पहली पत्नी द्वारा लगाए आरोपों पर हुई विभागीय जाँच के दौरान ही उनकी पहली पत्नी ने एक हलफनामा भी दायर किया था, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि पूर्व सीआरपीएफ अधिकारी ने सुनीता उपाध्याय से दूसरी शादी उनकी मर्जी से की। लेकिन उस समय उस दस्तावेज को जाली बताकर दरकिनार किया गया और कहा गया कि प्रशासन ने उनके मामले में हर पहलू पर जाँच की है। इसके बाद उनपर चार्ज लगाए गए और उनपर कार्रवाई हुई।

पूरे मामले में पेश की गई दलीलों को गौर से सुनने के बाद कोर्ट ने सीआरपीएफ अधिकारी की अपील को खारिज कर दिया और कहा कि अगर ऐसा मान भी लिया जाए कि पहली पत्नी ने शिकायत कर्ता को शादी करने की अनुमति दी। तब भी ये शादी कानूनी रूप से वैध नहीं है। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम एक्ट का हवाला देकर कहा कि पहली पत्नी की रजामंदी के बावजूद भी किसी व्यक्ति को दूसरी शादी करने का अधिकार नहीं मिलता।

कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का हवाला देकर कहा कि दो हिंदुओं के बीच में विवाह तभी संपन्न माना जाएगा, जब दोनों में से किसी का कोई जीवनसाथी पति या पत्नी के रूप में उनके साथ न रहता हो।

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अरमान अंसारी ने किया 19 साल की लड़की से रेप, ठहरा गर्भ लेकिन शादी से इनकार… फिर जला कर मार डाला

हैदराबाद और उन्नाव के बाद अब बिहार के बेतिया में 19 साल की एक लड़की को जिंदा जलाकर मार दिया गया। आरोपित की पहचान 25 साल के अरमान अंसारी के रूप में हुई। बताया जा रहा है कि अरमान ने घर में घुसकर युवती पर मिट्टी का तेल छिड़का और दिल दहला देने वाली इस वारदात को अंजाम दिया। जिसके बाद लड़की को अधजली हालत में पटना ले जाया जाने लगा, लेकिन अस्पताल पहुँचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया।

पुलिस के अनुसार आरोपित अरमान की गिरफ्तारी हो चुकी है। मृत पीड़िता की माँ ने बताया है कि अरमान उनकी बेटी का लंबे समय से यौन शोषण कर रहा था। जिसके कारण युवती के पेट में एक महीने का गर्भ भी था।

मीडिया रिपोर्ट्स में दोनों के बीच लव अफेयर की बातें भी सामने आ रही हैं। लेकिन पुलिस पूरे मामले की जाँच कर रही है। एसपी का कहना है कि पीड़िता ने अरमान पर शादी का झाँसा देकर यौन शोषण करने का आरोप लगाया था। पीड़िता द्वारा अरमान पर शादी का दबाव बनाया जा रहा था पर वह इनकार कर रहा था, जिसको लेकर युवती ने यह कदम उठाया था। लेकिन इसके उलट पीड़िता के यौन शोषण, बलात्कार और जला कर मार डालने की खबर भी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में पीड़िता की माँ ने बताया कि वे एक मजदूर हैं और 5 महीने पहले अपने पति को खो चुकी हैं। उनके बेटे काम की तलाश में दरभंगा और नेपाल जा चुके हैं। ऐसे में एक महीने पहले जब वह अपनी बेटी के साथ खेत में धान काट रही थीं, तभी वहाँ अरमान ने उसे गन्ने के खेत में खींच लिया और उसके साथ बलात्कार किया।

पीड़िता की माँ के मुताबिक जब उनकी बेटी ने ये बात उन्हें बताई तो उन्हें कुछ नहीं सूझा, वह खुद को बेबस समझने लगीं। इस घटना के बाद लड़की की माँ बस चाहती थीं कि अरमान उनकी बेटी से शादी कर ले। लेकिन अरमान लगातार इस बात से इंकार करता रहा। सोमवार की शाम उसी गाँव में रहने वाले युवती के जीजा जो आरोपित का चचेरा भाई भी है, उसने अरमान से शादी के लिए कहा। साथ ही उसे समझाया गया कि पीड़िता के बड़े भाई मंगलवार की सुबह पंचायत में मामला सुलझाने के लिए आएँगे।

जब मंगलवार को युवती के बड़े भाई गाँव पहुँचे तो अचानक उन्हें लड़की की चीख सुनाई दी। पास जाकर देखा तो अरमान उनकी बेटी को जला चुका था। हालाँकि, बेटी को आग की लपटों में देख परिजनों ने आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन उसे बचाने में वो नाकामयाब रहे।

युवती को पहले नरकटियागंज के सब डिविजनल अस्पताल लाया गया। बाद में उसे बेतिया के सरकारी मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। जहाँ पर उसे ड्रिप चढ़ाने के साथ ऑक्सिजन दी गई। लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि 70 प्रतिशत जलने के बाद उसकी हालत नाजुक है। इसके बाद शाम को पीड़िता को पटना पीएमसीएच रेफर किया गया। लेकिन अस्पताल तक जाते-जाते उसने एंबुलेंस में दम तोड़ दिया।

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क्या नागरिकता बिल मुसलमानों को भगाने के लिए लाया गया है?

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019, या सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल 2019 आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। जैसा कि आधुनिक भारत लगातार अपने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पढ़ता रहा है, या उसे जबरन गलत इतिहास पढ़ाया गया है, तो हर विधेयक, या निर्देश जिसमें मुसलमान शब्द का जिक्र हो, या इस्लामी देशों का नाम हो, प्रपंची वामपंथियों और छद्म-लिबरलों की लॉबी द्वारा इस तरह से दिखाया जाता है जैसे भारत के मुसलमान तो अब बैग उठाएँ और निकल लें।

हम, आप सब ने हाल के दिनों में भी इसी तरह की विचित्र बातें सुनी हैं। विचित्र इसलिए क्योंकि जब एक विधेयक बाहर से आए शरणार्थियों की बात कर रहा है, तो फिर इस देश के वो मुसलमान, जो यहाँ के नागरिक हैं, जो वोट देते हैं, ओवैसी जैसों को चुनते हैं, मुख्यमंत्री बनाते हैं, इस बिल को ले कर हंगामा क्यों कर रहे हैं? कोई औचित्य समझ में आता है आपको कि अगर भारतीय राष्ट्र पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के सताए हुए शरणार्थियों के लिए भारत में नागरिकता के लिए आवेदन की प्रक्रिया को सरल बनाने हेतु कोई प्रावधान लाता है तो यहाँ के वो मुसलमान क्यों पागल हो रहे हैं जिनका इससे कोई वास्ता नहीं?

आप यह देखिए कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बच्चे आंदोलन कर रहे हैं? ओवैसी जैसों का तो समझ में आता है कि उसको राजनीति करनी है, लेकिन ये तो कथित तौर पर पढ़े-लिखे लोग हैं, जिनको यह बात समझ में आनी चाहिए कि विधेयक से मुसलमानों का कोई लेना-देना नहीं है। हाँ, अगर ये प्रावधान होता कि भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान भेजा जा रहा है, तो इनका विरोध समझ में आता कि दो-तीन पीढ़ी से यहीं हैं, दादा-परदादा ने भारत में रहना स्वीकारा था, तो अब उन्हें इस देश से क्यों निकाला जा रहा है।

लेकिन यहाँ तो उसके उलट, विभाजन के कारण इन तीनों मुस्लिम देशों में, हर तरह के अल्पसंख्यक की क्या स्थिति है, उन लोगों को एक दूसरा मौका दिया जा रहा है कि तब तुमने भारत न आ कर गलती की थी, और हमने तुम्हें वापस न ला कर। यह एक ऐतिहासिक गलती को ठीक करने की प्रक्रिया है क्योंकि विभाजन के समय पाकिस्तान में 13% की जनसंख्या वाले हिन्दू आज की तारीख में 1% हो गए, बांग्लादेश में 22% से 8% और अफ़ग़ानिस्तान में इनकी संख्या अब कुछ सौ ही बची है। बात सिर्फ हिन्दुओं की नहीं है। जहाँ-जहाँ हुकूमत घोषित तौर पर इस्लामी है, वहाँ अल्पसंख्यकों का क्या हाल है, क्या प्रतिशत है, पता कर लीजिए।

साथ ही, भारत में बहुसंख्यक हिन्दुओं की आबादी का प्रतिशत लगातार घटा है। मुसलमानों का बढ़ा है। कश्मीर से हिन्दू गायब कर दिए गए, केरल में जनसांख्यिकी पूरी तरह से बदल गई है, और उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी कमोबेश यही हाल है। मतलब साफ है कि भारत में मुसलमानों को इस लिहाज से कोई समस्या नहीं हुई है। इसलिए उनका विलाप अनुचित तो है ही, साथ ही पुरी तरह से मजहबी उन्माद और राजनीति से प्रेरित भी है।

वामपंथियों ने जो प्रपंच गढ़ा था कि हिन्दू हमेशा प्रताड़ित ही करता है, प्रताड़ित हो ही नहीं सकती, उसका भांडाफोड़ हो रहा है। इसी देश में बहुसंख्यक होते हुए हिन्दू कभी दुर्गा विसर्जन के लिए कोर्ट की शरण लेता देखा जाता है, कभी उसके काँवड़ यात्रा पर मुसलमान पत्थरबाजी करते हैं, कभी रामनवमी के जुलूस पर मुसलमान चप्पल फेंकते हैं, कभी दुर्गा की मूर्तियों को मुसलमान और ईसाई विखंडित कर के उन्हें परेशान करते हैं, उनके मंदिरों को हजार साल पहले से भी तोड़ा जाता रहा है, और आज भी मुसलमान उसे तोड़ ही रहे हैं…

ये इसलिए संभव होता है क्योंकि इसे कभी भी राजनीतिक रूप से न तो देखा गया, न बोला गया क्योंकि वामपंथी विचारधारा और कॉन्ग्रेस के वोटबैंक के पोषकों ने हमेशा यह कहा कि जो ज्यादा संख्या में है उस पर अत्याचार कैसे हो सकता है। ये खेल खूब खेला गया और इतना खेला गया कि कश्मीरी पंडित इसी देश में, शंकर और शारदा की धरती कश्मीर से ऐसे निकाले गए, कि आज वहाँ इंटरनेट बंद होने पर मानवाधिकारों की बात उठती है, और बेघर हुई पीढ़ी और बहुसंख्यक हिन्दू की बात भी कोई नहीं करता जैसे कि कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन ये वामपंथी इसी बात को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में बहुसंख्यक मुसलमान को इस विधेयक द्वारा बाहर रखने पर रो रहे हैं। जबकि, यहाँ उन्हीं का तर्क लगाया जा रहा है कि मुसलमान खुद को ही मजहबी तौर पर प्रताड़ित क्यों करेगा क्योंकि अमूमन वो ऐसा दूसरे मजहब और धर्म के लोगों के साथ करता है। विभाजन के समय जो गैरमुसलमान, यह नहीं देख पाए थे कि मुसलमान जहाँ बहुसंख्यक हैं, वहाँ वो अल्पसंख्यकों का क्या हाल करते हैं, वो प्यार-मुहब्बत में वहीं रुक गए, उन्हें यह विधेयक दूसरा मौका दे रहा है क्योंकि सत्तर सालों में उन्हें समझ में आ रहा है कि उनकी तेरह साल की बच्ची को मुसलमान किडनैप कर के ले जाता है, जबरन मतपरिवर्तन कराता है, निकाह कर लेता है और उसके माँ-बाप को चिट्ठी भेजता है कि उसकी बेटी का कनवर्जन इस्लाम में हो गया है।

इसलिए, यह कहना या सोचना कि हिन्दू प्रताड़ित हो ही नहीं सकता, उसे गलत ठहराने के लिए जब इस देश में ही काफी प्रमाण हैं, तो पूरे विश्व में इस्लामी हुकूमतें बहुसंख्यक होने पर अपने देश के हिन्दुओं, बौद्धों, जैनों, ईसाईयों, सिखों, पारसियों का क्या हाल करती होगी, वो समझने में ज्यादा जतन नहीं करना होगा।

क्या है यह बिल, क्यों लाया गया?

इस विधेयक से इतर विदेशी लोगों के लिए जो कानून हैं, वो दो सूरतों में उन्हें ग़ैरक़ानूनी व्यक्ति बना देते हैं। पहला यह कि आप वैध कागजों, जैसे कि वीजा ले कर, भारत आए और रहने की समय-सीमा खत्म होने के बाद भी टिके रहे। दूसरा यह कि आप किसी भी कारण से, बिना वैध कागजों के भारत में किसी भी तरह से चोरी-छुपे पहुँच गए और यहाँ के प्रशासन ने आपको पहचान लिया। ऐसे लोगों को, अभी तक के कानून के हिसाब से, धर्म-मजहब-देश आदि से परे, नागरिकता नहीं दी जा सकती थी। जिनके पास कागज हैं, वही नागरिकता ले सकते थे।

2015 में इस विधेयक के लिए सूचना जारी हुई कि 2014 की अंतिम तारीख तक, जो लोग भारत में किसी कारण से आए हैं, और उनके पास कागजात नहीं हैं, वो भी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालाँकि, इसमें 2016 से ले कर 2019 तक में कुछ बदलाव हुआ है, जिसमें विस्तार से बताया गया कि यह योग्यता ‘धार्मिक आधार पर, जिन्हें भी अविभाजित भारत से टूट कर बने देशों, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान, में पीड़ा पहुँचाई गई, उन्हें सताया गया, और लगातार उत्पीड़न के बाद उन्हें वहाँ से भागने को मजबूर किया गया, वो लोग (जिसमें हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी मतों के लोग हैं) चाहे कागज ले कर शरण माँगने आए हों, या बिना कागज के, वो नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। इससे मुसलमान बाहर हैं क्योंकि तीनों देश मुस्लिम देश हैं, और ऐसा सोचना हास्यास्पद है कि मुसलमान दूसरे मुसलमान को मजहबी तौर पर प्रताड़ित करेगा।

इसके बाद, नागरिकता के पहले के प्रावधानों को थोड़ी ढील दी गई है जहाँ, पहले नैचुरलाइजेशन के लिए, यानी भारत की संस्कृति आदि को समझने के लिए, जहाँ ग्यारह साल की समय सीमा थी कि आप इतने साल भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हों, तभी आप नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, उसे घटा कर छः साल कर दिया गया है। 2019 में इसके कुछ प्रावधानों में बदलाव लाया गया क्योंकि उत्तर-पूर्व के राज्यों में इसका विरोध हो रहा था।

उत्तर-पूर्व या नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में कई इलाके अपनी जनजातीय संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं, और सरकार भी यही चाहती है क्योंकि वहाँ किसी भी तरह से दूसरों को नागरिकता दे कर बसाने का मतलब है कि उनकी मूल संस्कृति पर एक प्रकार का हमला। इस बात को देखते हुए सरकार ने इस विधेयक से असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम और मेघालय को तो बाहर रखा ही है, साथ ही मणिपुर के भी कई हिस्सों को ‘इनर लाइन परमिट’ के अंतर्गत लाने की घोषणा की है। इनर लाइन परमिट का मतलब है कि आपको इन इलाकों में स्थानीय प्रशासन की अनुमति के बाद ही घुसने दिया जाएगा। आप पर्यटक के तौर पर बेशक जाइए, लेकिन आप वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते जिससे वहाँ की संस्कृति या जनसांख्यिकी प्रभावित होती हो।

भारत ने हमेशा से, पूरे विश्व के प्रताड़ित लोगों को शरण दी है। जिन्हें पूरे विश्व में कहीं जाने को नहीं था, वो भारत आए और उन्हें बसने की जगह दी गई। इसमें ईरान से आए पारसी हैं, तिब्बत से आए बौद्ध हैं, और तो और यहूदी तक को जब हर जगह घृणा और हमलों का शिकार होना पड़ा तो भारत ने उन्हें भी शरण दी। इस लिहाज से भी, इन तीन देशों के अल्पसंख्यकों को एक तय तरीके से यहाँ आने की विधि तैयार कर, भारत अपनी पौराणिक संस्कृति का संवहन ही कर रहा है।

जो लोग इसे हिन्दुओं को घुसाने की बात के तौर पर देख रहे हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि श्रीलंका से आए हजारों हिन्दू, या शायद लाख में हों, इस नागरिकता बिल के दायरे से अलग रखे गए हैं। वो न तो विभाजन के समय का हिस्सा थे, न ही वो धार्मिक आधार पर प्रताड़ित हो रहे हैं। वहाँ के तमिल या हिन्दू राजनैतिक कारणों से संघर्षरत हैं।

साथ ही, यह बात भी गौर करने योग्य है कि इस विधेयक के पारित होते ही इन छः धर्मों और रिलीजन के लोग स्वतः नागरिक नहीं बन जाएँगे। इस बिल से उन्हें बस एक तरीका मिलेगा, जिसके बाद हर व्यक्ति को, निश्चित तौर पर परखने के बाद ही, नागरिकता की शपथ, संविधान की शपथ के साथ दिलाई जाएगी। अगर प्रशासन को लगेगा कि कोई व्यक्ति इसके लिए अयोग्य है, या धोखाधड़ी कर के, हिन्दू का रूप धर कर, यहाँ किसी और कारण से आना चाहता है, तो उन्हें नागरिकता नहीं दी जाएगी।

बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठियों की संख्या लगभग दो करोड़ बताई जा रही है इस देश में। ये लोग किसी भी प्रताड़ना के शिकार नहीं हैं, ये पूरी तरह से वोटबैंक की राजनीति के तहत, और स्वयं के आर्थिक फायदे को देख कर यहाँ दीमक की तरह आ कर बस गए हैं। चाहे वो बांग्लादेशी मुसलमान हों, या रोहिंग्या मुसलमान, ये दीमक हैं, जिनका सफाया जरूरी है। इस बात को भी गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि रोहिंग्या मुसलमानों को यहाँ शरण नहीं दी जाएगी क्योंकि ये लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

जो लोग मुसलमानों को पीड़ित रूप में देख रहे हैं, और जो कॉन्ग्रेस आज दवाब बनाना चाह रही है कि आर्टिकल 14 का हनन हो रहा है, संविधान खतरे में, सेकुलर तानाबाना टूट रहा है, वो 18 दिसंबर 2003 को मनमोहन सिंह का बयान याद करें जब उन्होंने कहा था कि जब हम इन देशों के शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात करें तो हमें वहाँ के अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों को ध्यान में रखना चाहिए।

आर्टिकल 14 की बात करने वाले लोग बड़ी ही आसानी से यह भूल जाते हैं कि हर तरह का आरक्षण इस आर्टिकल के विरोध में ही दिखता है। लेकिन उसे सकारात्मक भेदभाव के रूप में देखा जाता है क्योंकि वहाँ भेदभाव की मंशा किसी की बेहतरी है, सामाजिक रूप से उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास है, न कि उन्हें उत्पीड़ित करना। उसी तरह, ‘मुसलमानों को इस बिल के दायरे से बाहर’ रखना, उनके साथ भेदभाव नहीं है। पहली बात तो यह कि मुसलमानों के देश में मुसलमानों पर, मुसलमान ही, इस्लामी मजहब के आधार पर अत्याचार कर रहे हों, ऐसा होता नहीं। दूसरी बात, अगर ऐसा होता भी है, तो वो दुनिया में दसियों देश हैं जहाँ उनके लिए शरण लेने की व्यवस्था है।

यहाँ अगर वो रास्ता खोल दिया जाए, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश का मुसलमान बखूबी जानता है कि भारत का मुसलमान किस तरह की आजादी और बेहतर जीवन और सामाजिक अवसर यहाँ पा रहा है, इसलिए वो करोड़ों की संख्या में यहाँ आएँगे। इन देशों में न तो बिजली है, न पीने का पानी ढंग से मिल रहा है, भयंकर गरीबी, कुपोषण और तमाम तरह की समस्याएँ हैं। उनके लिए भारत आना हमेशा एक बेहतर विकल्प है। इसलिए, भारत ऐसा कर नहीं सकता, क्योंकि जहाँ वहाँ से आए अल्पसंख्यकों की संख्या कुछ हजार में हैं, यहाँ पहले से ही आए मुसलमान घुसपैठिये दो करोड़ से ऊपर की तादाद में हैं।

ओवैसी और वामपंथियों का प्रपंच

अब बात आती है कि इस देश के आम मुसलमान को क्यों बहकाया जा रहा है कि उन्हें देश-निकाला मिलने वाला है, या उन्हें भगाया जाएगा? ऐसा करने वाले लोग उसी लॉबी से हैं जो हर बात में हिन्दू-मुसलमान करते हैं। ये वही दोगले हैं जिन्हें तबरेज दिखता है, लेकिन भारत यादव जैसे दसियों हिन्दुओं की मुसलमानों के हाथ हुई भीड़ हत्या नहीं दिखती। ये लोग मुसलमानों पर अत्याचार की खबरें गढ़ते हैं और पकड़े जाने पर माफी तक नहीं माँगते। याद ही होगा कि ‘जय श्री राम’ के नाम पर कितनी फर्जी खबरें फैलाई गईं थीं, और झूठ पकड़े जाने पर क्या हुआ।

दो कारणों से मुसलमानों को भड़काने की कोशिश हो रही है। पहला है कि ओवैसी जैसों को मुसलमानों का नेता बनने की फ़िक्र है और उसे मुद्दे मिल नहीं रहे। इसलिए वो हर तरह की नौटंकी कर रहा है। उसे हिन्दू-मुसलमान अगर नहीं मिलेगा, तो वो ऐसे मौके बनाएगा जहाँ लगे कि मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है। कुछ मुसलमान भी पगलाए हुए उसकी बात को मान रहे हैं।

एक मुद्दा NRC, या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर, का है जिसमें पहली बार इस देश के नागरिकों का लेखा-जोखा तैयार होगा। भारत अपने आप में उन विचित्र देशों में होगा जहाँ सरकार के पास उसके नागरिकों का कोई एक रजिस्टर नहीं है जहाँ से पता किया जा सके कि कौन किस जगह से है, क्या करता है, कब आया आदि। इसकी जरूरत इसलिए हुई क्योंकि कॉन्ग्रेस और टीएमसी समेत कई पार्टियों ने अपने राज्यों में मुसलमान वोटबैंक बढ़ा कर, चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए इस देश की सीमा और स्थानीय जनसंख्या के साथ खिलवाड़ किया। मुसलमान बाहर से ला कर बसाए गए, उन मुसलमानों ने खरगोशों की तरह बच्चे पैदा किए और आज स्थिति यह है कि बांग्लादेश उन्हें वापस लेने को तैयार नहीं, और भारत इन दीमकों को यहाँ रख नहीं सकता।

इस कारण चर्चा शुरू हुई कि इन्हें अलग किया जाए। इस कारण सरकार ने असम में एनआरसी के लिए, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर, नागिरकों और घुसपैठियों को अलग करने की प्रक्रिया शुरू की। इससे कुछ पार्टियों का वोटबैंक गायब हो जाएगा क्योंकि उन्हें बांग्लादेश वापस भेजा जाए या नहीं, ये तो आगे की बात है, पर उनके मताधिकार तो तय रूप से छीने लिए जाएँगे। बस यही कारण है कि ये लोग चिल्ला रहे हैं कि मुसलमानों का भविष्य खतरे में है।

मुसलमान तो यहाँ हर तरह से सुरक्षित है। कम से कम शिया-सुन्नी के दंगे, मस्जिदों में बम ब्लास्ट, घटिया शिक्षा और बेहतरी के अवसर से परे, भारत का मुसलमान न सिर्फ अल्पसंख्यक होने के कारण विभिन्न योजनाओं का लाभार्थी है, बल्कि उसे मुसलमान होने का वैचारिक लाभ भी हमेशा मिलता रहा है जब उनके खिलाफ हुए अपराधों पर पूरा देश उनके साथ खड़ा हो जाता है जिसमें हिन्दुओं की बहुतायत है। इसे ही गंगा-जमुनी तहजीब कहते हैं इस देश में। हालाँकि, मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर जब अपराध होते हैं, तब मुसलमानों को तो साँप सूँघ ही जाता है, गंगा-जमुनी तहजीब का भी अदरक-लहसुन हो जाता है।

खैर, एनआरसी के जरिए इन दीमक मुसलमानों को, जो भारत के नहीं हैं, बाहर करना आवश्यक है क्योंकि वो भारत के मुसलमानों का हक छीन रहे हैं। किसी के वोटबैंक में इस तरह की सेंध लग जाए, और जो पहले से ही जनाधार खोते जा रहे हों, जिनके राज्यों में विकास और राष्ट्रवाद की बात करने वाली पार्टी लगातार बेहतर कर रही हो, वो आखिर इसका विरोध नहीं करेगी, मुसलमानों को नहीं उकसाएगी, तो करेगी भी क्या!

आम मुसलमान जनता भीड़ बना कर या सोशल मीडिया पर संविधान की दुहाई देते हुए भावुक हो रही है कि मजहब के आधार पर किसी को भारत आने से रोकना नहीं चाहिए। ये लोग बहकाए गए हैं, या फिर जानबूझकर दंगे की स्थिति बना रहे हैं। ये इन्हें इकट्ठा कर के क़ानून व्यवस्था बिगाड़ने की फिराक में हैं जो कि चिंतनीय है। हाल ही में राम मंदिर पर आया फैसला ओवैसी जैसों के पैरों तले की जमीन खींच चुका है जो कि कई साल अपनी राजनीति हिन्दुओं के खिलाफ यही सब कह-कह कर चलाते रहे कि मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होने देंगे।

जबकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुसलमानों के साथ कौन सा अन्याय हुआ है? कहाँ के मुसलमान को वो नहीं मिल रहा जो हिन्दुओं को मिल रहा है? क्या कोई ऐसी योजना है, छात्रवृत्ति है, कोई कार्ड है, सिलिंडर है, बिजली है, बैंक अकाउंट है, बल्ब है, बीमा है, हॉस्पिटल है, स्कूल है, कॉलेज है, यूनिवर्सिटी है जहाँ सरकार ने कहा हो कि इसमें भारतीय मुसलमानों को नहीं रखा गया है? जहाँ तक सच्चाई की बात करें तो, पूरे देश में मुसलमानों को ले कर विशेष प्रावधान ही हैं कि जो सबको मिल रहा है, वो तो उन्हें मिले ही, उसके अलावा उनके लिए विशेष स्कूल हों, कॉलेज हों, छात्रवृत्ति हो, यूनिवर्सिटी हो, तमाम कल्याणकारी योजनाएँ हों। फिर मुसलमानों के साथ कौन सा अन्याय हो रहा है जिसकी बात ओवैसी या वामपंथी गीदड़ करते हैं?

सत्य यही है कि बिना मुसलमानों को भड़काए कि देखो तुम्हें भगाने की तैयारी हो रही है, इनकी राजनीति चलेगी नहीं। साथ ही, इस तरह की बातें करके, कॉलेज में जाने वाले नए विद्यार्थियों को, जो कि पहली बार वोट देंगे, उन्हें यह बताया जा रहा है कि वर्तमान सरकार मानवीय मूल्यों के खिलाफ है। टिकटॉक पर विडियो बनाने वाली और फेसबुक पर सेल्फी लगा कर वैचारिक क्रांति में चे ग्वेरा का टीशर्ट पहन कर रेबेल होने वाली यह कॉलेजिया जनता वास्तविकता से बहुत दूर सोशल मीडिया पर सुनी-सुनाई बात लिखने लगती है। इसकी परिणति ध्रुव राठी जैसे गटरछाप लौंडों के ट्वीट पर होती है कि भारत के विभाजन की बात सावरकर ने सबसे पहले की थी। न सिर्फ वो बात गलत है, बल्कि यह सोचना भी कि अगर सावरकर ने बात कह भी दी हो, तो क्या गाँधी और नेहरू ने सावरकर की बात मान कर विभाजन स्वीकारा?

रामचंद्र गुहा से ले कर सारे लोग, इतिहास को बर्बाद करने के बाद अब विभाजन का जिम्मा भी दक्षिणपंथियों के माथे डालना चाह रहे हैं। बताया जा रहा है कि विभाजन मजहबी कारणों से नहीं हुआ। आप इनकी दोगलई देखिए कि ये किस स्तर पर चले जाते हैं। और ये इसलिए वहाँ जाते हैं क्योंकि हमने और आपने इनके झूठों पर सच्चाई का तमाचा मारना शुरू तक नहीं किया है।

संविधान और सेकुलर शब्द की दुहाई देने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए, सत्तर के दशक में जबरन घुसाए इस शब्द की संविधान निर्माताओं ने आवश्यकता नहीं समझी थी। ये किसकी शह पर घुसाया गया था? इसकी जरूरत क्या थी? जरूरत इसलिए थी कि इसे आधार बना कर हिन्दुओं को लगातार अत्याचारी के रूप में दिखाया जाए और जैसे ही कोई कुछ बोले, ‘सेकुलर’ तमाचा लगा दिया जाए। सेकुलर का अर्थ तब भी वही था, आज भी वही है: हिन्दुओं से घृणा करने वाला। हिन्दूविरोधी मानसिकता वालों ने इस शब्द का हर दिन मोलेस्टेशन किया है, इसके कपड़े उतारे हैं और दिन के उजाले में इस शब्द का मानमर्दन हुआ है।

हिन्दू तो स्वभाविक तौर पर सेकुलर होता है इसलिए मूल रूप में संविधान में उसे रखने की जरूरत नहीं पड़ी। आपको क्या लगता है कि इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के यहाँ ठहरने के बाद भी राजेन्द्र प्रसाद या अंबेदकर समेत तमाम बुद्धिजीवियों और राजनेताओं को इसका विचार नहीं आया होगा कि हिन्दू बहुल देश में इतने भिन्न मतों के लोग अल्पसंख्यक हैं, तो उनके लिए अलग शब्द जोड़ा जाए? न तो भारत का संविधान उसे हिन्दू राष्ट्र लिख पाया, न ही सेकुलर।

वो इसलिए क्योंकि इसकी राजनीति से परे, हिन्दुओं के मूलभूत स्वभाव, सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वसमावेशी होने की हजारों सालों की परंपरा के लिए यह अकल्पनीय है कि यह जनसंख्या कभी भी, किसी को भी प्रताड़ित करेगी या अपने बहुसंख्यक होने का लाभ उठाएगी। एक देश ऐसा हो जहाँ हिन्दुओं ने हमला बोल कर, पूरी आबादी को हिन्दू बनाया हो? एक उदाहरण ले आइए जहाँ तेरह साल की गैरहिन्दू बच्ची को किडनैप करके, जबरन हिन्दू बना कर, उससे शादी की जाती हो? लेकिन मुसलमान देशों में हिन्दुओं के साथ ऐसा होना आम है।

किसी भी मुस्लिम राष्ट्र में किसी भी तरह का अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है, वहीं भारत जैसे हिन्दू-बहुल राष्ट्र में अपने हर त्योहार पर, अपने आराध्य की जन्मभूमि को ले कर, अपनी देवियों के प्रतिमा विसर्जन पर, अपने जयकारे और अभिवादन के शब्दों पर, अपने मंदिरों पर हर दिन, कहीं न कहीं मुसलमानों का अत्याचार झेलना पड़ रहा है। मुहर्रम है तो बंगाल में दुर्गा विसर्जन की तारीख अलग कर दी जाती है! बाबरी मस्जिद टूटने पर चिल्लाते हैं कि अरे तुमने हमारे मस्जिद में मूर्ति रख दी, लेकिन कितनी आसानी से भूल जाते हैं कि उन्होंने तो पूरी की पूरी मस्जिद ही मंदिर के ऊपर रख दी! हर दुर्गा पूजा में मुसलमानों द्वारा मूर्तियाँ तोड़ने और विसर्जन पर पत्थरबाजी की खबरें आम हैं।

इसलिए, मुसलमान कहीं सताया जा रहा है, यह मानना बेमानी है। मुसलमान किसी मुसलमान राष्ट्र में प्रताड़ित किया जा रहा है, यह सुनना हास्यास्पद है। मुसलमानों के लिए विश्व के आधे राष्ट्र के दरवाजे खुले हुए हैं। जब सारी आस्था एक ही दिशा में जाकर परिपूर्ण हो रही है, तो फिर नागरिकता के लिए ऐसे देश में क्यों आना जहाँ के मुसलमान कह रहे हैं कि यहाँ हिन्दू सता रहे हैं! कायदे से इमरान खान को अपने यहाँ भी एक विधेयक लाना चाहिए जहाँ भारत के मुसलमानों के पास ऐसा विकल्प हो कि अगर उन्हें यहाँ प्रताड़ित किया जा रहा है तो वो पाकिस्तान आ सकते हैं। साथ ही, परेशान हिन्दुओं के लिए भी इमरान खान को प्रावधान करना चाहिए कि वो भी पाकिस्तान आ सकते हैं। और हाँ, इमरान को सबसे पहले पाकिस्तान को सेकुलर घोषित कर देना चाहिए ताकि हमारे वामपंथी कीड़े रेंगते हुए वहाँ पहुँच सकें।

नागरिकता विधेयक पर ही BJP को मिली दोबारा सत्ता, बिना घोषणापत्र पढ़े ही शेखर गुप्ता फैला रहे झूठ-भ्रम

‘5 लाख बंगाली हिंदुओं को मिलेगी नागरिकता’ – जिन्हें NRC से मिली थी निराशा, CAB ने जगाई आशा!

जिसने किया भारत पर सबसे पहला हमला, उसी संग नेहरू ने किया समझौता: इसी कारण बनी CAB

नागरिकता विधेयक पर वामपंथी फैला रहे प्रपंच, ये रहे आपके कुछ सवालों के जवाब

नागरिकता विधेयक पर ही BJP को मिली दोबारा सत्ता, बिना घोषणापत्र पढ़े ही शेखर गुप्ता फैला रहे झूठ-भ्रम

लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) पास होने के साथ ही लिबरल गिरोह में खलबली मच गई। इस गिरोह ने बिल के खिलाफ जनता को बरगलाने के लिए कई बेतुके और कुतर्क दिए। वामपंथी गिरोह ने अपने आधारहीन और बेतुके तर्क में दावा किया कि यह बिल भारत के संविधान के खिलाफ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ के खिलाफ है। साथ ही उन लोगों ने इसे ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ बिल भी करार दिया। इनमें से कई तर्क ऐसे हैं, जिसे गिरोह द्वारा बार-बार दोहराया गया।

मीडिया गिरोह से जुड़े कुछ लोगों ने और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर विधेयक का विरोध करने वाले वामपंथी तबके ने सोशल मीडिया पर लोगों में खूब भ्रम फैलाने की कोशिश की। अलग-अलग तर्क देकर इसके ख़िलाफ़ लोगों को बरगलाया गया। इसमें द प्रिंट के फाउंडर और वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता का नाम भी शामिल रहा। हालाँकि वो अपने समुदाय द्वारा बार-बार दोहराए जा रहे इस तर्क से तंग आ चुके थे। इसलिए उन्होंने कुछ नया करने का सोचा और वो एक नए तर्क के साथ जनता को बरगलाने के लिए सामने आए। मगर इस तर्क से उन्होंने एक बार फिर से अपनी नासमझी और बेवकूफी का परिचय दे दिया।  

द प्रिंट के शेखर गुप्ता ने CAB को लेकर ’50 WordEdit’ नाम से एक ट्वीट किया। ’50 WordEdit’ कुछ नहीं, बस अपनी बात को 50 शब्दों में समेटेने का द प्रिंट वालों का एक ‘नायाब’ आइडिया है। 50 शब्द में पत्रकारिता के ये तथाकथित झंडाबरदार कह कर निकल लेंगे, आप उसके आगे-पीछे सोचते रहिए। इसी ’50 WordEdit’ में इन्होंने दावा किया कि नागरिकता संशोधन विधेयक वह नहीं है, जिसके लिए भाजपा को वोट दिया गया था। उन्होंने लिखा कि इस बिल के माध्यम से मोदी सरकार बिना मतलब के बँटवारे की बात को लाने की कोशिश कर रही है। जबकि भारत 1947 के बाद से काफी आगे बढ़ चुका है। बीजेपी इस बिल को लाकर 2019 में विचारों का दिवालियापन दिखा रही है। उन्होंने आगे कहा कि भले ही यह बिल संसद से पारित हो जाए, लेकिन यह वह नहीं है जिसके लिए बीजेपी को वोट दिया गया था।

यानी कि शेखर गुप्ता का कहना है कि बीजेपी को नागरिकता संशोधन विधेयक के लिए वोट नहीं किया गया था। शेखर का यह भी कहना है कि जनता इस विधेयक को कानून बनाने के लिए मोदी सरकार को सत्ता में लेकर नहीं आई थी। मगर बेहद अफसोस की बाद है कि शेखर गुप्ता खुद तो सच्चाई से अनजान हैं ही, साथ ही देश की जनता के भीतर भी भ्रम पैदा कर रहे हैं। उनकी बातें सच्चाई से कोसों दूर हैं। यह उनके जैसे वरिष्ठ पत्रकार के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। खैर, अब वो पत्रकार रहे भी नहीं शायद!

बीजेपी घोषणापत्र, 2019

बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि भाजपा पड़ोसी देशों से धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के व्यक्तियों को उत्पीड़न से बचाने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही पार्टी पूर्वोत्तर की स्थानीय संस्कृति एवं रीति रिवाज का संरक्षण करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें यह भी कहा गया था कि पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के चलते आए हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म को लोगों को CAB के तहत भारतीय नागरिकता दी जाएगी।

गृह मंत्री अमित शाह ने भी नागरिकता संशोधन विधेयक को ऐतिहासिक करार देते हुए सोमवार को कहा कि यह भाजपा के घोषणापत्र का हिस्सा रहा है तथा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के 130 करोड़ लोगों ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाकर इसकी मंजूरी दी है।

2019 के घोषणापत्र में बीजेपी ने साफ तौर पर नागरिकता संशोधन विधेयक को कानून बनाने की बात कही थी और जनता ने भी 300 से अधिक सांसदों को लोकसभा भेजकर यह साबित कर दिया था कि वह भी इस कानून के पक्ष में है और चाहती है कि कानून बने। तभी उसने भारी मतों से मोदी सरकार को वापस से सत्ता दिया। शेखर गुप्ता, अगर आप लोकतंत्र मानते हैं और लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं तो आपको जनता के फैसले को समझना और स्वीकार करना चाहिए। एक बात और, जनता मूर्ख नहीं है, जिसे आप बरगला रहे हैं। उन्होंने सोच-समझकर वोट दिया है और मोदी सरकार जनता के उसी भरोसे और अपने वादे को पूरा कर रही है।

हालाँकि शेखर गुप्ता इससे पहले भी मोदी सरकार के खिलाफ झूठ बोल चुके हैं। बता दें कि मोदी सरकार की ऐतिहासिक जीत से पहले देश में मौजूद समुदाय विशेष के पत्रकार अपने लेखों के जरिए इस बात को साबित करने में जुटे थे कि मोदी सरकार की हर नीति, योजना और प्रयास आम लोगों के ख़िलाफ़ है। लेकिन जब प्रचंड बहुमत के साथ मोदी सरकार सत्ता में वापस लौटी तो शेखर गुप्ता ने एक चर्चा ‘How India Voted’ में स्वीकारा कि चुनाव से पहले पत्रकारों ने मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की सफलता को नजरअंदाज किया था।

शेखर गुप्ता के The Print का रिपोर्टिंग के नाम पर फर्जीवाड़ा, लेखक ने अपने शब्दों के साथ खिलवाड़ पर लताड़ा

हाँ हमने झूठ बोला, मोदी की योजनाओं की सफलता की अनदेखी की: गुप्ता जी का छलका दर्द

कुमारस्वामी थे CM, टेप में अहमद पटेल का नाम, लेकिन शेखर गुप्ता की नज़र में येदियुरप्पा दोषी

‘मेरा बेटा तो अस्पताल में था’: उन्नाव रेप-हत्याकांड में बेटे को बचाने के लिए बाप का फर्जीवाड़ा, डॉक्टर ने खोली पोल

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में रेप पीड़िता पर केरोसिन डालकर आग लगाने वालों में एक नाम शुभम त्रिवेदी है। लगभग एक महीने पहले त्रिवेदी की ओर से उसकी बेगुनाही साबित करने के लिए कोर्ट में कुछ दस्तावेज जमा किए गए थे। इन कागजी दस्तावेजों में दावा किया गया था कि रेप वाले दिन वो घटनास्थल पर नहीं, बल्कि स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती था। कोर्ट में दस्तावेज जमा कराना मतलब खुद को इस जघन्य कांड में निर्दोष बताने की कोशिश करना। लेकिन दाँव उल्टा पड़ गया। हुआ यह कि मामले की पूरी जाँच के दौरान ये दस्तावेज फर्जी निकले।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार सुमेरपुर स्वास्थ्य केंद्र के अधिकारियों ने उनसे बातचीत में इस तथ्य की पुष्टि की है कि त्रिवेदी ने जिस मेडिकल रजिस्ट्रेशन स्लिप को कोर्ट में जमा कराया, वो फर्जी है। उनके मुताबिक घटना वाली तारीख पर उनके अस्पताल में उस नाम का कोई भी मरीज भर्ती ही नहीं हुआ था और इस बात को का दावा वह पूरे विश्वास के साथ करते हैं। इतना ही नहीं, स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों का कहना है कि जो पर्ची आरोपित ने जमा करवाई है, वो ओपीडी की है। लेकिन वहाँ पर भी इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं आया। इसके अलावा कोर्ट में जमा करवाई स्लिप पर पीएचसी स्टैंप के साथ हुए हस्ताक्षर उन दोनों मेडिकल अफसरों में से किसी के नहीं हैं, जो पिछले साल दिसंबर में यहाँ पोस्टेड थे।

रजिस्ट्रेशन स्लिप में यह दर्शाया गया कि आरोपित (शुभम त्रिवेदी) गत वर्ष यानी 10 दिसंबर 2018 को पीएचसी में भर्ती हुआ था और 5 दिन बाद यानी 15 दिसंबर 2018 को उसे वहाँ से डिस्चार्ज किया गया। जबकि पीड़िता की शिकायत के अनुसार शुभम ने अपने दोस्त शिवम के साथ मिलकर उसका 12 दिसंबर 2018 को बलात्कार किया। जिसके संबंध में कोर्ट के आदेश के बाद इस साल 5 मार्च को एफआईआर दर्ज हुई। और पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। लेकिन 30 नवम्बर को इन्हें बेल मिल गई और इन्होंने 5 दिसंबर को बलात्कार पीड़िता को उस समय जिंदा जला दिया, जब वह मुक़दमे की तारीख पर रायबरेली के लिए ट्रेन पकड़ने जा रही थीं।

पीड़िता को अधजली हालत में कानपुर के अस्पताल भर्ती करवाया गया, लेकिन हालत नाजुक होने के कारण उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया गया। वो 90 फीसदी जल चुकी थीं। घटना के 2 दिन बाद ही पीड़िता जिंदगी की जंग हार गईं। उन्नाव पीड़िता की मृत्यु पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि घटना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, बालिका की मौत अत्यंत दुखद है। उन्होंने पीड़िता के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि सभी अपराधी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और उन्हें फास्ट ट्रैक कोर्ट में ले जाकर कड़ी सजा दिलाई जाएगी। हिन्दुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में इस मामले के सभी आरोपित शिवम त्रिवेदी, शुभम त्रिवेदी, उमेश बाजपेई, राजकिशोर और हरिशंकर की तस्वीर भी प्रकाशित की थी।

गौरतलब है कि पीड़िता को 5 दिसंबर को केरोसिन डालकर जलाने वालों में एक नाम शुभम के पिता हरिशंकर का भी है। इसी हरिशंकर ने अपने बेटे को बचाने के लिए हाई कोर्ट में अस्पताल वाली फर्जी पर्ची जमा करवाई। साथ ही माँग की कि गैंगरेप की वारदात से उसके बेटे का नाम आरोपितों की सूची से हटा दिया जाए। बता दें कि ये पहला झूठ नहीं था, जिसे हरिशंकर ने अपने बेटे को बचाने के लिए बोला। इससे पहले भी जाँच अधिकारियों के सामने वो दावा कर चुका था कि उसका बेटा घटना वाले दिन लखनऊ में परीक्षा देने गया था। लेकिन जब उससे उसका एडमिट कार्ड या कोई दूसरा सबूत पेश करने को कहा गया, तो इसमें वो असफल रहा और कुछ दिन बाद नई तरकीब निकालकर हाईकोर्ट में अस्पताल की पर्ची जमा करवा दी।

उन्नाव रेप पीड़िता के ऊपर केरोसिन तेल डालकर जिंदा जलाकर मारने वाले हैवानों के चेहरे आए सामने
‘हैदराबाद के जैसा दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी जाए…’ – उन्नाव में जला कर मार दी गई बेटी के पिता का छलका दर्द
…एक और ‘प्रीति रेड्डी’, उन्नाव में गैंगरेप पीड़िता पर लाठी-डंडे-चाकू से वार, केरोसिन डाल जलाया ज़िंदा
समाज एनकाउंटर पर जश्न मनाता है, तो उसका कारण है: उन्नाव की बेटी भी कल मर गई

गैंगरेप के बाद हत्या कर शव को पेड़ से लटकाया: जाहिद, नसीम, ताहिर समेत 6 के खिलाफ FIR

राजस्थान के भरतपुर जिले के कांमा थाना क्षेत्र में सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को एक पेड़ से एक विवाहिता का शव लटका पाया गया। पेड़ से शव का लटका होना मतलब आत्महत्या का मामला… लेकिन इस मामले में पेंच है। जिस विवाहिता का शव पेड़ से लटका मिला, उनके पिताजी की ओर से मंगलवार (दिसंबर 10, 2019) को 6 आरोपितों के खिलाफ अपहरण, सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला दर्ज कराया गया है।

थानाध्यक्ष धर्मेश दायमा ने बताया कि 26 वर्षीय विवाहिता का शव सोमवार को रोशियाका गाँव के जंगल में नीम के पेड़ से लटका पाया गया था। ग्रामीणों की सूचना पर शव को पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ मेडिकल बोर्ड से पोस्टमॉर्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। धर्मेश दयमा ने बताया कि FIR के आधार पर 6 आरोपितों की पहचान – जाहिद, नसीम, ताहिर, अमर सिंह, बन्नो और बालू के रूप में की गई है। इन 6 आरोपितों के खिलाफ सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला दर्ज किया गया। फिलहाल किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। लेकिन पुलिस द्वारा आरोपितों की तलाशी की जा रही है।

पुलिस ने बताया कि 26 वर्षीय मृतक पीड़िता के पिता ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 8 दिसम्बर की रात करीब 11 बजे उनकी विवाहिता पुत्री शौच के लिए घर से बाहर गई थीं। पीड़िता के पिता का आरोप है कि जाहिद, नसीर और ताहिर ने हथियार के बल पर उनका अपहरण कर लिया। फिर इसके बाद आरोपितों ने मूसेपुर गाँव के जंगल में अपने अन्य साथियों अमर सिंह, बन्नू और बालू जाटव के साथ मिलकर उनका सामूहिक बलात्कार किया और उनके गहने भी छीन लिए।

इस घिनौनी वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपितों ने उनकी हत्या कर दी। इसके बाद वे लाश को रोशियाका गाँव के जंगल में ले गए और गले में कपड़ा बाँधकर लाश को पेड़ से लटका दिया। थानाध्यक्ष धर्मेश दायमा ने बताया कि मृत पीड़िता के पति ट्रक चालक हैं और घटना के समय वह मौजूद नहीं थे। वो गुवाहाटी गए हुए हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने मामला दर्ज करके आरोपितों की तलाशी शुरू कर दी है।

राजस्थान में अपराध का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। हर आए दिन दुष्कर्म और हत्या की खबरें सामने आती रहती हैं। राज्य में अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और लड़कियों को परेशान कर रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही राजस्थान के जोधपुर में एक छात्रा ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से जान बचाने की गुहार लगाई थी। सीएम की जनसुवाई में पहुॅंची छात्रा अपनी पीड़ा बताते हुए रो पड़ी। उसने गुहार लगाई थी- “मुख्यमंत्री जी मुझे बचा लो…दरिंदे मुझे जिंदा जला देंगे।”

मुख्यमंत्री को पीड़ित छात्रा ने बताया था कि कुछ लड़के उन्हें करीब 2 महीने से लगातार परेशान कर रहे हैं। आरोपितों ने खुद के नंबर वाले व्हाट्सअप पर उनकी (पीड़ित लड़की की) फोटो की डीपी लगा रखी है। साथ में स्टेटस में लिख रखा है, “मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं होगी।” आरोपित ने पीड़िता को जिंदा जलाने की धमकी भी दी थी।

नाबालिग से दूसरी बार गैंगरेप: आरोपित अल्ताफ, सरफराज, इरशाद, सौयब पलवल से फरार

गैंगरेप पीड़िता की अर्ध-नग्न लाश: टूटी उंगलियाँ, आँखें बाहर निकली हुईं – शाबोद्दीन, शेख बाबू, मकदूम ने कबूला जुर्म

5 लड़कियों का गैंगरेप करने वाले पादरी अल्फांसो समेत 6 को उम्रकैद… लेकिन NGO मामले में बरी

अरबाज ने प्रेमजाल में फँसाया, फिर 3 दोस्तों के साथ किया गैंगरेप: कैमूर में लोगों ने जला डाला आरोपित का घर

‘5 लाख बंगाली हिंदुओं को मिलेगी नागरिकता’ – जिन्हें NRC से मिली थी निराशा, CAB ने जगाई आशा!

अगर आज यानी बुधवार (दिसंबर 11, 2019) को राज्यसभा में बिना किसी अड़ंगे के नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB, कैब) पास हो जाता है, तो बांग्लादेश से आए 5 लाख से ज्यादा बंगाली हिंदू जिन्हें एनआरसी की अंतिम सूची में जगह नहीं मिल पाई थी, उन्हें नागरिकता मिल जाएगी

इस संबंध में असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने भी मंगलवार को अपना बयान जारी किया है। उन्होंने बताया है कि इन लोगों को पहले आवेदन करना होगा। जिसके बाद इन्हें नागरिकता देने से पहले इनके आवेदन की जाँच होगी और फिर तय प्रक्रिया को पूरा करके अगले विधानसभा चुनाव (2021) से पहले इन्हें नागरिकता दी जाएगी

गौरतलब है कि 31 अगस्त को आई एनआरसी की अंतिम सूची में 19 लाख लोगों को जगह नहीं मिल पाई थी। लेकिन कैब के पास हो जाने के बाद 5 लाख लोगों की नागरिकता सुनिश्चित होगी और बाकी बचे 13 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता के लिए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में संपर्क करना होगा। बता दें इन शेष 13 लाख लोगों में 7 लाख समुदाय विशेष के लोग हैं।

शर्मा ने विधेयक पर बात करते हुए कहा कि कैब कार्यकर्ताओं के हिसाब से एनआरसी में 5,04,800 बंगाली हिंदुओं को रिजेक्ट किया गया था, जिनमें से 3 से 4 लाख लोग संशोधित कानून के अंतर्गत नागरिकता के लिए आवेदन करेंगे। इसके अतिरिक्त, चूँकि इन लोगों में 1 लाख बंगाली हिंदू ऐसे भी हैं, जिन्होंने एनआरसी के लिए आवेदन ही नहीं किया था। इसलिए इन लोगों की कुल संख्या को 5 लाख समझकर चला जा रहा है।

राज्य के वित्त मंत्री ने इस बातचीत में स्पष्ट किया है कि राज्य के कामरुप और होजई जिले में करीब 60,000 बंगाली हिंदू हैं, जिनकी संख्या अन्य जिलों से ज्यादा है। बता दें कि होजई वही जिला है, जहाँ रह रहे 60,000 मुस्लिमों को एनआरसी से बाहर निकाला गया था। जबकि दारंग वो जिला है, जहाँ सबसे अधिक तादाद में मुस्लिमों को NRC की सूची में जगह नहीं मिली थी। वहीं, चारादिऊ, दिमा हसाओ, हामरेन, मजूली जिले से किसी मुस्लिम को सूची से बाहर नहीं किया गया था। बता दें कि चारादिऊ में बंगाली अप्रवासियों की संख्या 2000 के करीब है, दिमा हसाऊ में 1500, हामरेन में 1000 और मजूली में 300।

इस विधेयक पर अपनी राय रखते हुए वित्त मंत्री ने एक ट्वीट भी किया और कहा कि इतिहास में नेहरू द्वारा की गई एक बड़ी भूल इस बिल के माध्यम से सुधरेगी।

गौरतलब है कि लोकसभा में कैब के पास हो जाने के बाद उस पल को ऐतिहासिक क्षण बताते हुए असम के मुख्यमंत्री सरबनंदा सोनोवाल ने इस संबंध में सोमवार को बताया कि उन्होंने 2 लाख बंगाली हिंदुओ की एक लिस्ट जारी की है। इस लिस्ट में वो लोग शामिल हैं, जो फिलहाल राज्य के 34 जिलों में रह रहे हैं और नागरिकता के लिए योग्य हैं।

अपने ट्वीट में कैब की बात करते हुए उन्होंने उसके मूल उद्देश्य को स्पष्ट किया और लिखा कि ये न केवल 3 देशों से आए 6 अल्पसंख्यक समुदाय को राहत पहुँचाएगा बल्कि संवैधानिक रूप से असम के लोगों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। इस कदम के लिए सोनोवाल ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री को धन्यवाद भी अदा किया है औऱ कहा है कि अपने वादे के प्रति प्रतिबद्धता और सबको साथ लेकर अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आभार।

बता दें कि असम मुख्यमंत्री द्वारा कैब को समर्थन दिए जाने पर उनके राज्य के कुछ लोग उनसे बेहद नाराज हैं। आसु (ऑल असम स्टुडेंट यूनियन) के राष्ट्रीय सचिव लुरिनज्योति गोगोई ने कहा है कि इस बार जदयू, शिवसेना, बीजेदी से ज्यादा उन्हें उनके अपने मुख्यमंत्री ने शर्मिंदा किया है। क्योंकि वे और उनके पार्टी नेता कैब के समर्थन में जाकर असम के लोगों के विरुद्ध जा रहे हैं।

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लोकसभा में सोमवार को पास हुए नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) का अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में विरोध शुरू हो गया है। देर शाम खुद को छात्र कहने वाले उन्मादियों के समूह ने कैंपस में सभा की, जिसमें कैब को मुस्लिम विरोधी करार दिया गया। बाद में छात्रों ने नागरिकता संशोधन विधेयक की प्रतियाँ फूँकीं और ‘हिंदुत्व मुर्दाबाद’ के नारे भी लगाए। इस उन्मादियों ने कहा कि यह कानून संविधान के खिलाफ है। यह बाबा साहब डॉ आंबेडकर की सोच के खिलाफ है। गाँधी, नेहरू, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजगुरू, फूले, मौलाना आज़ाद, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल की सोच के खिलाफ है।

मंगलवार (दिसंबर 10, 2019) को छात्रों ने मौलाना आजाद लाइब्रेरी से लेकर यूनिवर्सिटी सर्किल तक बिल के विरोध में पीएम मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मशाल जुलूस निकाला। विश्वविद्यालय के सभी छात्र लाइब्रेरी के पीछे कैंटीन पर इकट्ठा हुए और इसके बाद हाथों में मशाल लेकर, बिल की प्रतियाँ जलाते हुए जुलूस को आगे बढ़ाया। छात्रों द्वारा निकाले गए मशाल जुलूस के दौरान हंगामा और नारेबाजी करने से माहौल बिगड़ गया। हालात को संभालने पहुँची पुलिस से छात्रों ने धक्का-मुक्की और अभद्रता की। इस मामले में थाना सिविल लाइंस पुलिस ने दो पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों सहित 20 नामजद और 700 अज्ञात पर मुकदमा दर्ज किया गया है।

इस मौके पर पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष सलमान इम्तियाज ने कहा, “यह मशाल जलूस नागरिकता बिल के विरोध में निकाला गया है। हमारी अपील है कि राज्य सभा में सांसद इस बिल का समर्थन नहीं करें। सलमान ने कहा कि यह बिल केवल मुस्लिमों के लिए ही नहीं बल्कि हिंदु समुदाय और हिंदुस्तानी संस्कृति के लिए भी खतरा है।” 

वहीं पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष फैजुल हसन का कहना है कि अब उन मुस्लिमों को जरूर सोचना चाहिए, जो इस बिल के खिलाफ बोलना तो छोड़िए, बल्कि जो लोग थोड़ी बहुत आवाज उठा रहे हैं, उनका मजाक बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह बिल आपकी (मजहब की) शनाख्त तक को खत्म करने के लिए बनाया जा रहा है। आप इसको मजाक उड़ाकर उन सबका हौसला तोड़ रहे हैं, जो दूसरे मजहब के होकर खुलेआम हमारी लड़ाई लड़ रहे हैं। देश में शांति थी लेकिन भाजपा सरकार देश में गृह युद्ध कराना चाहती है।

उन्होंने कहा कि अब आंदोलन करने का वक्त आ गया है। इस अवसर पर जैद शेरवानी, हमजा नोमान, जावेद, मसूद, अहमद मुस्तफा, असलम, अशरफ आदि सैकड़ों छात्र मौजूद थे। बता दें कि आमतौर से कैंपस में जुलूस और मार्च के बाद छात्र किसी जिम्मेदार अधिकारी या व्यक्ति को ज्ञापन देकर अपनी बात सरकार तक पहुँचाते हैं। लेकिन मंगलवार की रात कोई ज्ञापन नहीं दिया गया। उनका कहना था कि ज्ञापन से कुछ नहीं होता।

वहीं मुस्लिम यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष व राष्ट्रवादी नेता मोहम्मद आमिर रशीद ने इस बिल के पास होने पर खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों से आए हुए मुस्लिम शरणार्थी हमारे देश में रहकर सबसे ज्यादा नुकसान देश के मुस्लिमों का ही कर रहे थे। देश के मुस्लिमों को बिल से डरने की जरूरत नहीं। देश का मुस्लिम राष्ट्रवादी है। इसके साथ ही आमिर ने ओवैसी को सलाह देते हुए कहा कि दूसरे जिन्ना बनने की कोशिश न करें। जितना मुस्लिम हमारे देश में सुरक्षित है उतना तो इस्लामिक मुल्कों में भी नहीं।

इसके साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता विशाल देशभक्त और सांसद सतीश गौतम के प्रवक्ता संदीप चाणक्य ने भी एएमयू में किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर कहा कि यह सिर्फ अराजकता फैलाना चाहते हैं। विशाल ने कहा कि एएमयू में जो मुस्लिम नागरिक संशोधन बिल का विरोध कर रहे है उन्हें सिर्फ देश मे अराजकता फैलाने से मतलब है क्योंकि इस बिल में मुस्लिमों के हितों को कोई क्षति नहीं पहुँचाई गई है।

संदीप चाणक्य का कहना है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहाँ अराजक तत्वों का जमावड़ा आम बात है। यह चिंता का विषय है। जहाँ एक ओर पूरे देश में नागरिकता संशोधन बिल के लोकसभा में पास होने पर हर्ष का माहौल है। वहीं एएमयू में मातम मनाया जा रहा है। साथ ही एएमयू का प्रॉक्टर विभाग का भी कहना है कि हिंदुत्व विरोधी नारेबाजी से साबित हो गया कि देश विरोधी ताकतें पनप रही हैं। बिल के मुताबिक यहाँ रहने वाले किसी भी मूल नागरिक को इस बिल से कोई हानि नहीं है। उसके बाद भी इनका अनर्गल प्रलाप देश हित में नहीं है।

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