Home Blog Page 5504

‘मेरी ऑटो में बैठो’… लेकिन महिला ने मना कर दिया तो मो. शकील ने दिखाते हुए हस्तमैथुन शुरू कर दिया

मुंबई के रहने वाले 32-वर्षीय मोहम्मद शकील अब्दुल कादिर मेमन को मुंबई क्राइम ब्रांच ने मालवानी में एक महिला के सामने, उसे दिखाकर हस्तमैथुन करने के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया है। पेशे से ऑटो-चालक मेमन को गिरफ़्तार कल (11 सितंबर, 2019) को किया गया, और अपराध की तारीख पुलिस ने 1 सितंबर बताई है। आरोपित मलाड (पश्चिमी), मालवानी का ही निवासी बताया जा रहा है

ऑटो में न बैठने की दी ‘सज़ा’

20-वर्षीया महिला के अनुसार 1 तारीख को वह लिंक रोड स्थित चिंचोली बुंदेर बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार कर रही थी, जब आरोपित ने अपना ऑटो उसके पास रोका और उसे ऑटो में बैठने के लिए कहा। महिला के मुताबिक उसके मना करने पर आरोपित मेमन ने अपनी पैंट की ज़िप खोलकर अपना गुप्तांग निकाला और महिला को दिखाने लगा। पुलिस के मुताबिक महिला ने उन्हें बताया कि तब महिला ने अपनी माँ को फ़ोन किया और घटना के बारे में बताया, और इसके बावजूद वहाँ से चले जाने की बजाय मेमन ने वहीं हस्तमैथुन शुरू कर दिया। महिला के शोर मचाने पर वह अपना ऑटो छोड़ कर भाग खड़ा हुआ। इसके बाद महिला और उसकी माँ ने बांगुर नगर पुलिस थाने जाकर रिपोर्ट दर्ज कराई।

सीसीटीवी फुटेज बेनतीजा

पुलिस ने बताया है कि हिरासत में लेकर मेमन को बांगुर नगर पुलिस थाने के हवाले कर दिया गया है, जहाँ उस पर कानूनी कार्रवाई होगी। यूनिट 11 के पुलिस इंस्पेक्टर चिमनजी आधव ने बताया कि जब महिला ने FIR की, तब उन्होंने तफ्तीश शुरू की और पता चला कि मेमन किसी और का ऑटो शिफ्ट पर चलाता था। इलाके के सीसीटीवी फुटेज की जाँच में कुछ नहीं मिला, लेकिन मलाड, गोरेगाँव और दहिसार चेक नाका इलाकों के ऑटो वालों से पूछताछ के आधार पर मेमन की शिनाख्त हुई, उसका पता मिला और उसे पुलिस ने धर दबोचा।

एशियन एज पोर्टल ने पुलिस के हवाले से दावा किया है कि मेमन आदतन अपराधी है। इसके पहले भी कई महिलाओं के साथ ऐसा ही अभद्र व्यवहार वह कर चुका है।

‘दाढ़ी वाला ऑटो ड्राइवर मुझे देखकर हस्तमैथुन कर रहा था’: MBA कर रही 19 साल की लड़की की आपबीती

कॉन्ग्रेस के CM और डेप्यूटी CM आमने-सामने: राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आए हैं। दरअसल, इस बार उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि कई जगह कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हुई है, इसको गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसा कहते हुए पायलट का इशारा जयपुर में हुई पत्थरबाजी और अलवर के बहरोड़ जेलब्रेक कांड की तरफ था।

यहाँ उल्लेखनीय है कि पॉयलट का ये बयान उस समय आया है जब विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया एक दिन पहले ही उनकी सरकार द्वारा कानून व्यवस्था को लेकर बनाई खराब नीतियों और राज्यभर में हो रही घटनाओं पर उन्हें घेर चुके हैं। ऐसे में पॉयलट ने कहा है, “विपक्ष के नेताओं ने हो सकता है सरकार पर अपने मकसद से निशाना साधा हो, लेकिन ये सच है कि हमें अब कानून-व्यवस्था पर गंभीरता दिखानी होगी। धौलपुर और अलवर जैसी परेशान करने वाली कई घटनाएँ पिछले कुछ समय के दौरान हुई हैं। कोशिश होनी चाहिए कि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ न हों।”

हालाँकि, इसके बाद जब सचिन पायलट से जब पूछा गया कि जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद राज्य में गृह मंत्री की भूमिका में हैं, तो क्या ऐसे में पार्ट टाइम गृह मंत्री होने की वजह से कानून-व्यवस्था बिगड़ गई है, तो इस पर पॉयलट चुप रहे और उन्होंने कोई कमेंट नहीं किया। उन्होंने सिर्फ़ यही कहा कि हमें कानून-व्यवस्था को और ठीक करने पर ध्यान देना चाहिए।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है जब पॉयलट ने अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ उलट जाकर ऐसा कोई बयान दिया हो। इससे पहले भी वो अशोक गहलोत पर अपने जन्मदिन के मौक़े पर ये कहकर निशाना साध चुके हैं कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर क्या करेंगें, अगर वो लोगों के आँसू नहीं पोंछ सकते। इसके अलावा वह पहलू खान पर सरकार को घेरते हुए बयान दे चुके हैं कि सरकार ने देरी की है, मामले में जाँच टीम का गठन पहले ही हो जाना चाहिए था। इतना ही नहीं, अभी बीते मंगलवार को पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले को खाली कराने को लेकर भी सचिन पॉयलट का एक बयान सामने आया था, जिसमें उनके और गहलोत के बयान में विरोधाभास दिखा था।

‘केसरी’ का महत्व अक्षय कुमार की पगड़ी का रंग नहीं, बल्कि सारागढ़ी की याद दिलाना है

इतिहास के दो हिस्से होते हैं- भाषा और नैरेटिव तथा रूखे-सूखे तथ्य। दोनों की ही अपनी-अपनी भूमिकाएँ और महत्ताएँ हैं। लेकिन जब इतिहास किताबों और शोध-पत्रों के पन्नों से निकल कर ‘पॉपुलर कल्चर’ का हिस्सा बनना चाहता है, फिल्मों का, वो भी ‘आर्ट’ नहीं, बल्कि सौ-करोड़ी फिल्मों का विषय बनना चाहता है, तो कथानक यानी नैरेटिव का पलड़ा ज़ाहिर तौर पर भारी हो जाता है और तथ्यों की ‘technicality’ के साथ 19-20 हो ही जाता है।

लेकिन इससे न इतिहास बदलता है और न ही इतिहास पर बनी मसाला फिल्मों की महत्ता खत्म हो जाती है। वह ज़रूरी इसलिए नहीं होतीं क्योंकि उनसे ही इतिहास सीखना-पढ़ना है। यह काम नॉन-फ़िक्शन मीडिया, किताबों और ब्लॉगों, शोध-पत्रों का ही रहेगा। इन फिल्मों का काम इतिहास पढ़ाना नहीं, किसी विषय के प्रति जागरुकता पैदा करना है, उस विषय को समाज की चेतना में, उसके अंतस में लाना है। सारागढ़ी की लड़ाई के लिए ‘केसरी’ फिल्म यह काम बखूबी करती है।

आज यानी 12 सितम्बर को सारागढ़ी की बरसी है। 122 साल पहले इसी दिन 21 सिख सैनिकों और उनके खानसामे ‘दाद’ ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में 10,000 के करीब की पठान सेना को सारागढ़ी का किला जीतने से 6 घंटे के करीब रोककर रखा और आखिरी दम, आखिरी गोली, आखिरी जवान तक लड़ते रहे। उनमें सबसे कम उम्र के गुरमुख सिंह ने अपने साथियों के वीरगति को प्राप्त होने के बाद भी लड़ना जारी रखा। उन्होंने 20 के करीब पठान सैनिकों को मीनार से छिप-छिप कर मार गिराया। अंत में पठानों को उसे मारने के लिए पूरी मीनार ही जला देनी पड़ी। असैनिक ‘दाद’ ने भी जब मौत सामने देखी तो गिड़गिड़ाते हुए, जान की भीख माँगते हुए जिबह होने की बजाय लड़ना उचित समझा और 5-6 पठानों को ले बीता।

सैन्य इतिहास में इसे ‘लास्ट स्टैंड’ कहते हैं- जब जंग में गुत्थमगुत्था हुए पड़े, या होने जा रहे, दो धड़ों में से एक को यह आभास हो जाए कि उसकी जीत तो किसी भी तरह नहीं हो सकती और उस धड़े के सैनिक तय करें कि जान की भीख माँगने, जान बचाकर भागने, या कैदी/गुलाम को मिलने वाली ज़िल्लत और यातना की मौत से बेहतर लड़ते हुए मरना है; और वे इसी मौत को गले लगाने समर में कूद पड़ते हैं।

जब कोई सैनिक, कोई योद्धा ‘लास्ट स्टैंड’ लेता है, तो वह इस एक कदम से नैतिक-अनैतिक, सही-गलत से ऊपर उठ जाता है। वह किसके लिए लड़ रहा है, किस विचारधारा का है, या कोई विचारधारा है भी या नहीं- यह सब बातें उसके निर्णय के साहस के आगे गौण हो जाती हैं। इसलिए ब्रिटिश सरकार के किले की रक्षा में पठान विद्रोहियों से लड़ने वाले सारागढ़ी के सिख, महाभारत में रथ का पहिया उठाकर सात महारथियों पर पिल पड़ने वाला अभिमन्यु, लाखों फ़ारसियों से लड़ने वाले मुट्ठी-भर ग्रीक सैनिक हों, वे सभी हर राजनीति और विचारधारा के परे सम्मान के हकदार होते हैं- इसलिए कि वे कुछ ऐसा करने का साहस/दुस्साहस रखते थे, जिसका दम हर किसी में नहीं होता।

तो केसरी पर चुप क्यों रहे हम 70 साल?

इतनी लम्बी-चौड़ी भूमिका का मकसद यही सवाल पूछना है- कि जब अभिमन्यु से लेकर राजा लियोनाइडस तक के बारे में हम जानते हैं, उनकी कहानियाँ पढ़ते और सुनते हैं, तो आखिर हमने कभी हवलदार ईशर सिंह, खानसामे ‘दाद’ या सैनिक चाँद सिंह के बारे में क्यों नहीं सुना? और आज जब कोई सुना रहा है, भले ही उसका मकसद राष्ट्रवाद और सेना-समर्थक वर्तमान जनभावना का फायदा उठाकर पैसा पीटना ही क्यों न हो, तो कहानी सुनाए जाने पर ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है।

आप गूगल पर ‘kesri saragarhi battle’ लिख कर सर्च करिए। अधिकाँश वेबसाइटों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नाराज़गी ही मिलेगी, कि आखिर सारागढ़ी की कहानी सुनाई ही क्यों जा रही है। जहाँ तक ऐतिहासिक सत्यता को लेकर आपत्तियाँ हैं, मैं उनसे सहमत तो नहीं हूँ, लेकिन उन्हें गलत भी नहीं मानता। सहमत इसलिए नहीं हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से यह बेवजह की नुक्ताचीनी है- पॉपुलर सिनेमा का काम केवल यह बताना है कि भाई, सारागढ़ी जैसी लड़ाई भी हुई थी, जाओ, पढ़ो, जानो; उसके आगे वे जितना सटीक हो जाएँ, अच्छी बात। लेकिन न हों तो उसी को लेकर बवाल काटने को मैं सही नहीं मानता।

लेकिन असली दिक्कत उन चुनिंदा तथ्यात्मक आलोचनाओं से नहीं है- वह तो अपने-अपने पसंद की बात है, कि किसी को ईशर सिंह की तथ्यात्मक रूप से सही खाकी पगड़ी पसंद हो सकती है, मुझे अक्षय कुमार की केसरी पग का भाव अधिक पसंद आया। असली दिक्कत उनसे है, जिन्हें इस फिल्म के बनाए जाने से ही दिक्कत है, क्योंकि इस फिल्म में हमलावर इस्लामी हैं और उनके हिसाब से इस्लामी इतिहास में जो कुछ स्याह-सा दिखे, उसे या तो दबा दो, या उस पर सफेद प्लास्टर से रंग-रोगन कर दो।

मैं यहाँ तक भी सहमत हूँ कि अगर सारागढ़ी की लड़ाई का आह्वान करने वाले मुल्ला ने किसी लड़की का सिर कलम नहीं किया था, तो नहीं दिखाया जाना चाहिए था। लेकिन इसके बहाने यह नैरेटिव चलाने की कोशिश करना गलत है कि बॉलीवुड को ऐसे विषयों के प्रति अतिरिक्त ‘संवेदनशील’ होना चाहिए, जिनमें कोई मजहब विशेष वाला नकारात्मक भूमिका में हो। मेरी सबसे ज़्यादा आपत्ति उन लोगों के मुँह खोलने से है, जो दबी-ज़बान यह पूछ रहे थे कि आखिर भगवा रंग के महिमामंडन की, समुदाय विशेष की दूसरे धर्मों से लड़ाई में दूसरे धर्म की वीरता की, (“भाजपा और राष्ट्रवादियों को फायदा पहुँचाने वाली”) फ़िल्में बनाए जाने की ज़रूरत ही क्या है।

लाख गलतियों के बाद भी खुद में गलत नहीं है फिल्म ‘केसरी’

केसरी नामक फिल्म में लाख गलतियाँ हो सकतीं हैं, लेकिन खुद में फिल्म गलत नहीं है। इसका प्रभाव गलत नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि इसने केवल राष्ट्रवादियों के ‘पक्ष में’ गलतियाँ की हैं। इसमें सैनिकों को मस्जिद बनाते हुए दिखाया गया है, जबकि उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ था। लेकिन किसी सिख को या हिन्दू को मैंने इस पर तो बात का बतंगड़ बनाते नहीं देखा! इसमें अंतिम सैनिक गुरुमुख सिंह की बीस पठान सैनिकों को गोली मारने के बाद खुद जलकर मर जाने की बहादुरी को एक कबायली नेता को पकड़ कर आत्मघाती ‘बम’ धमाका करने के उस कालखण्ड में असम्भव कारनामे से बदल दिया गया है।

हो सकता है सारागढ़ी पर हमला करने वाले पठान उतने बर्बर और जिहादी न हों जितना फिल्म में दिखाया गया है। हो सकता है वे सच में अंग्रेज़ों से अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हों और सारागढ़ी के वे 21 सिख उनके रास्ते में खड़े हों। ऐसा भी हो सकता है कि वे सैनिक कंपनी बहादुर के लिए ही मरे हों, न कि किसी अंग्रेज़ को हिंदुस्तान की ताकत दिखाने के लिए, जैसा कि इस फिल्म में दिखाया गया है। मैं इतिहास का विशेषज्ञ नहीं हूँ, और इसलिए ऐसे विषय पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता।

लेकिन पठान सही थे या सिख, यह फैसला करना न केसरी फिल्म का मकसद है, न इतिहास के सारागढ़ी पन्ने का मूल। मूल यह है कि चाहे वे सिख सैनिक अंग्रेज़ों के गुलाम सिपाही बनकर लड़ें हों, या आज़ाद सिख, चाहे उन पर हमला करने वाले पठान आज़ादी के परवाने हों, या जिहादी हमलावर, उन 22 वीरों का वह ‘लास्ट स्टैंड’ इन सब बातों से ऊपर था, इसके परे था- और इसके बारे में हमें पता होना चाहिए था।

अपने पूर्वजों के इस कारनामे के बारे में जानना हमारा हक था, जो हमें 70 साल तक राजनीतिक इशारों पर इतिहास की किताबें लिखने वालों, इतिहास का सिलेबस तय करने वालों के चलते नहीं मिला। आज जब अक्षय कुमार और अनुराग सिंह ने वह हक़ किसी न किसी कारण और माध्यम से दिया है, तो देने पर ही आपत्ति जताने वालों को पहले अपने राजनीतिक और बौद्धिक पूर्वजों के ‘उत्तराधिकारी’ के तौर पर उत्तर देना चाहिए कि 70 साल में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? उसके बाद इस पर बहस होगी कि अक्षय कुमार को केसरिया पगड़ी पहननी चाहिए थी कि नहीं।

आतंकियों की हिमायती, हिन्दुओं को गोमूत्र पीने वाला बताने वाली पत्रकार फुरकान ख़ान कम्पनी से बाहर

‘न्यूज़ अलर्ट एंड लाइफ (NPR)’ ने अपने उस पत्रकार को निकाल बाहर किया है, जिसने हिन्दू-विरोधी ट्वीट कर हिन्दुओं के प्रति अपनी घृणा का खुला प्रदर्शन किया था। पत्रकार फुरकान ख़ान इससे पहले भी हिन्दुओं के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात रही हैं। वह नई दिल्ली में एनपीआर की प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत थीं। एनपीआर ने कहा कि कम्पनी पत्रकार फुरकान ख़ान की ट्वीट में व्यक्त किए गए विचारों से कोई ताल्लुक नहीं रखती।

साथ ही एनपीआर ने कहा है कि फुरकान ख़ान का ट्वीट कम्पनी के नैतिक आदर्शों के ख़िलाफ़ था। कम्पनी ने कहा कि फुरकान ने इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँग ली है और एनपीआर से इस्तीफा दे दिया है। एनपीआर ने एक ईमेल के माध्यम से यह जानकारी दी है।

फुरकान ने विवादस्पद और घृणा भरे ट्वीट में लिखा था कि अगर भारतीयों ने हिंदुत्व छोड़ दिया तो उनकी अधिकतर समस्याएँ ख़त्म हो जाएँगी। साथ ही उन्होंने हिन्दुओं को गोमूत्र पीने वाला और गोबर की पूजा करने वाला बताया था। देखें ट्वीट:

फुरकान ख़ान का वो हिन्दूफ़ोबिक ट्वीट, जिसके कारण मचा बवाल

फुरकान ख़ान के इस घृणा भरे ट्वीट के ख़िलाफ़ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पास भी शिकायत दर्ज कराई गई थी।सोशल मीडिया पर लोगों ने फुरकान ख़ान के ट्वीट और पुलवामा हमले को अंजाम देने वाले आतंकी की भाषा में समानता देख कर एनपीआर से माँग करते हुए कहा कि उन्हें जल्द से जल्द कम्पनी से निकाला जाए। विरोध के बाद फुरकान ख़ान ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया था।

रंगे हाथों घृणा फैलाते हुए पकड़े जाने के बाद फुरकान ख़ान ने सफाई देते हुए कहा था कि उनका ट्वीट मज़ाकिया था। उन्होंने आलोचकों को ‘ट्रॉल्स’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि उनलोगों ने ट्वीट के सन्दर्भ को समझने में ग़लती की।

UPA काल के एविएशन स्कैम में यास्मीन कपूर गिरफ़्तार, एयर इंडिया को पहुँचा था नुक़सान

सीबीआई ने एविएशन स्कैम मामले में यास्मीन कपूर को गिरफ़्तार कर लिया है। यास्मीन जुलाई में गिरफ्तार किए गए दीपक तलकर की क़रीबी है। तलवार कॉर्पोरेट लॉबिस्ट है। यह कार्रवाई विदेशी मुद्रा विनियम अधिनियम के तहत की गई है। इस वर्ष फ़रवरी में यास्मीन को अदालत ने गिरफ़्तारी से राहत प्रदान की गई थी।

इसी स्कैम को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल से ईडी 3 दिनों तक पूछताछ कर चुकी है। एविएशन स्कैम में जो भी डील हुए हैं, वो सभी यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुए। दीपक तलवार ने एविएशन कंपनियों, अधिकारियों और नेताओं के साथ मिल कर उन्हें फायदा पहुँचाने के लिए साज़िश रची थी और लॉबिंग की थी।

कुछ विदेशी एयरलाइन्स के लिए मनमाफिक ट्रैफिक रूल्स तय किए गए थे, जिससे एयर इंडिया को ख़ासा नुकसान हुआ था। मई में अदालत ने यास्मीन कपूर से इस स्कैम के सम्बन्ध में जवाब माँगा था। ईडी ने अदालत में यास्मीन कपूर को सभी आरोपितों के कारनामों के ख़ुलासे के लिए एक अहम लिंक बताया था। स्कैम के दौरान यास्मीन को भी काफ़ी फायदे हुए और उसकी संपत्ति में भी बहुत वृद्धि हुई।

दीपक तलवार ने एयर इंडिया को नुकसान पहुँचाते हुए वर्ष 2008-09 के दौरान विदेशी विमानन कंपनियों के लिए उनकी पसंद के यातायात अधिकार व नियमों का प्रबंध किया था। जाँच से इस बात का भी खुलासा हुआ था कि इसके बदले विमानन कंपनियों ने 2008-09 में तलवार को 272 करोड़ रुपए का भुगतान किया था। इन रुपयों के कुछ हिस्से को बैंक ऑफ सिंगापुर में एम/एस एशियाफील्ड लिमिटेड नामक कंपनी में जमा करवाया गया, जो ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड में रजिस्टर्ड दीपक तलवार के स्वामित्व वाली कंपनी है।

जवानों के हाथों किसी नागरिक की मौत नहीं, 15157 सर्जरियाँ: पटरी पर लौट रही है जम्मू-कश्मीर की गाड़ी

जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने बुधवार, 11 सितंबर को एक प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए दावा किया कि घाटी और राज्य के हालात सामान्य होने की दिशा में संतोषजनक प्रगति कर रहे हैं। “हम सामान्य के बहुत करीब हैं। अगर पूरे इलाके का हिसाब लगाएँगे, तो जम्मू के 10 जिले पूरी तरह सामान्य हो गए हैं। सारे स्कूल, कॉलेज, ऑफिस खुले हैं। लेह और कारगिल भी सामान्य हैं, वहाँ कोई बंदिशें नहीं हैं।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि 90% इलाकों में कोई बंदिशें नहीं हैं और 100% टेलीफोन एक्सचेंज काम कर रहे हैं। यहाँ तक कि दो जिलों में मोबाइल सेवाएँ भी दोबारा शुरू कर दी गईं हैं

इसके अलावा डीजीपी ने सरकार-पुलिस-प्रशासन की अन्य उपलब्धियाँ भी गिनाईं, जिनमें सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए नागरिकों की संख्या का शून्य होना सबसे अहम है। इसके अलावा सभी लैंडलाइन चालू हो गए हैं और कुपवाड़ा में मोबाइल सेवाएँ भी उपलब्ध हैं।

स्वास्थ्य सेवाएं भी पूरे ज़ोर-शोर से चल रही हैं। OPD में 5,10,870 मरीजों का पंजीकरण हुआ है, और 15,157 सर्जरियाँ हुईं हैं। पेट्रोल उत्पादों और खाद्य-पदार्थों का भंडारण संतोषजनक है। 6 अगस्त से अब तक 42,600 से अधिक ट्रक सामान लेकर जम्मू-कश्मीर से आ-जा चुके हैं।

सभी बैंक और ATM काम कर रहे हैं और ₹108 करोड़ केवल जम्मू-कश्मीर बैंक से निकाले गए हैं। बाकी बैंकों के आँकड़े जारी होना बाकी है। इसके अलावा विभागीय सेवाओं, जैसे e-tendering, स्कॉलरशिप फॉर्म जमा करना, नौकरी के आवेदन के लिए हर जिले के मुख्यालय में 10 इंटरनेट किओस्क लगाए गए हैं। इनमें से हरेक किओस्क में 5 टर्मिनल लगे हैं। आम जनता और सैलानियों की सहूलियत के लिए 12 अतिरिक्त हवाई टिकट काउंटर स्थापित किए गए हैं।

डीजीपी दिलबाग सिंह ने यह भी जानकारी दी कि जहाँ इस दौरान सुरक्षा बलों और नागरिकों के टकराव में कोई नहीं मारा गया है, वहीं आतंकियों ने तीन आम लोगों की हत्या कर दी है। इसी दौरान सुरक्षा बलों ने भी दो आतंकियों को भी ढेर कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल में मारे गए लश्कर आतंकी आसिफ मकबूल भट की मौत से क्षेत्र के लोग चैन की साँस ले रहे होंगे। भट हाल ही में एक नवजात को गोलियों से ज़ख़्मी करने के मामले में ज़िम्मेदार था।

तुम्हारे पूर्वज नरक में बिलख-बिलख कर रो रहे हैं: देवदत्त ‘नालायक’ ने सवाल पूछने पर दिया घटिया जवाब

देवदत्त पटनायक एक बार फिर सोशल मीडिया पर ज़हर उगलते हुए पाए गए हैं। न सिर्फ़ ज़िंदा व्यक्तियों, बल्कि अब उन्होंने मरे हुए लोगों को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दी है। दरअसल, एक ट्विटर यूजर ने पटनायक को आइना दिखाते हुए उनके द्वारा की गई आपत्तिनजक टिप्पणियों का स्क्रीनशॉट ट्वीट किया और उनसे जवाब माँगा। ट्विटर यूजर ने लिखा कि अगर आपकी माँ आज ज़िंदा होतीं तो आपकी हरकतों के कारण अपना सिर शर्म से झुका लेतीं।

इसका जवाब देते हुए देवदत्त पटनायक ने अजीबोगरीब भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा कि उन्होंने आज ही अपनी माँ (जो मर चुकी हैं) से बात की है और वह बिलकुल खुश हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि उनके सभी पूर्वज स्वर्ग में हैं और हँसी-ख़ुशी हैं। उन्होंने ट्विटर ट्विटर यूजर को लिखा कि तुम्हारे सारे पूर्वक नरक में बिलख-बिलख कर रो रहे हैं।

ट्विटर यूजर बाला को पटनायक ने लिखा, “एक पागल प्रेमी की तरह मेरा पीछा करने के लिए धन्यवाद।” देखें ट्वीट:

सवाल पूछने वालों से लगातार दुर्व्यवहार करने और उनके ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने के लिए कुख्यात देवदत्त पटनायक को लोगों ने उनकी ताज़ा हरकत के बाद ‘देवदत्त नालायक’ और ‘देवदत्त खलनायक’ जैसे विशेषणों से नवाजा है।

हाल ही में देवदत्त ने हड़प्पा को लेकर विवादित ट्वीट्स किए थे। जब एक ट्विटर यूजर से उनसे सवाल किया तो उन्होंने अभद्रता के साथ जवाब दिया और उससे कहा, “I will check with . your mother ” यानी वो (देवदत्त) इस बात का पता उसकी माँ (मोहंती, यूजर) के साथ लगाएँगे।

देवदत्त पटनायक ट्विटर पर ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए कुख्यात हैं

देवदत्त सिर्फ यहीं तक नहीं रुके। पूरे थ्रेड को देखेंगे तो आप पाएँगे कि उन्होंने लोगों के माँ-बाप से लेकर हर दूसरे विचार रखने वालों को मूर्ख तक की संज्ञा दे डाली। देवदत्त ने किसी के माँ-बाप को कोसा तो किसी की पैदाइश तक पर शक कर डाला।

30 साल बाद यासीन मलिक के ख़िलाफ़ ट्रायल शुरू: वायुसेना के 4 जवानों की आतंकियों ने कर दी थी हत्या

जम्मू स्थित टाडा कोर्ट ने अलगाववादी यासीन मलिक के ख़िलाफ़ ट्रायल शुरू कर दिया है। मामला 1990 का है, जब भारतीय वायुसेना के 4 निहत्थे जवानों की हत्या कर दी गई थी। इनमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना भी शामिल थे।इस घटना के 30 साल बाद ट्रायल शुरू किया गया है, जिससे वीरगति को प्राप्त जवानों के परिजनों की न्याय की आस फिर से जगी है। टाडा कोर्ट ने तिहाड़ जेल में बंद यासीन मलिक को पेश करने का भी आदेश दिया है।

Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act (TADA) कोर्ट इस मामले में 1 अक्टूबर को सुनवाई करेगी। आरोप है कि जिन आतंकियों ने जवानों की हत्या की थी, वे यासीन मलिक द्वारा संचालित आतंकी संगठन के सदस्य थे। यह घटना जनवरी 25, 1990 को हुई थी। गोलीबारी की इस घटना में टाडा कोर्ट ने यासीन मालिक सहित 4 आरोपितों को पेश होने का आदेश दिया है।

1990 में इस मामले में सीबीआई ने टाडा कोर्ट के समक्ष 2 चार्जशीट दायर की थी। 1995 में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने ट्रायल पर रोक लगा दी थी। यासीन मलिक टेरर फंडिंग के मामले में भी आरोपित है और फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है। उसे पुलवामा हमले के बाद गिरफ़्तार किया गया था।

भारतीय वायुसेना के जवानों की हत्या तब की गई जब उनके पास कोई भी हथियार नहीं था और वे एयरपोर्ट जाने के लिए बस का इन्तजार कर रहे थे। वहाँ भारतीय वायुसेना के 14 जवान थे। तभी अचानक से एक मारुति जिप्सी और एक बाइक से 5 आतंकी वहाँ पहुँचे और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उन्होंने एके-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जवानों के अलावा 2 कश्मीरी महिलाओं की भी हत्या कर दी गई, जो बस का इंतजार कर रही थीं। आतंकियों ने ख़ून से लथपथ जवानों के सामने डांस करते हुए जिहादी नारे भी लगाए थे।

पश्चिम बंगाल: मुहर्रम के जुलूस में जम कर लहराई गईं बंदूकें, 8 साल के बच्चे को लगी गोली

पश्चिम बंगाल के मालदा में मुहर्रम जुलूस के दौरान समुदाय विशेष के लोगों ने खुलेआम बंदूकें लहराईं। वीडियो में देखा जा सकता है कि दूसरे समुदाय के लोग सड़क पर जुलूस लेकर नाचते-गाते और नारा लगाते चल रहे हैं। इनमें से अधिकतर युवा थे और सरेआम बंदूकें लहरा रहे थे। जहाँ ये सब हो रहा था, वहाँ एक हाई स्कूल भी था। देखें वीडियो:

भाजपा के जॉइंट जनरल सेक्रेट्री सुरेंद्र जैन ने मालदा के मुहर्रम जुलूस का वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा कि समुदाय विशेष की हर हिंसा, त्योहार में शांति संदेश मिलता है चाहे वो दहशत पैदा करने के लिए हो। उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पूछा है कि शांतिपूर्ण ढंग से की गई रामनवमी, हनुमान जयंती, दुर्गापूजा से वह क्यों आतंकित होती हैं?

विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि इस तरह की ख़बरें ‘सेक्युलर मीडिया’ द्वारा नहीं दिखाई जाती हैं और न ही कोई ‘सेक्युलर नेता’ इस तरह की वीडियो पर आपत्ति जताता है। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुप्पी पर भी सवाल खड़े किए।

उधर, मालदा में ही एक 8 वर्षीय बच्चे को मुहर्रम के जुलूस के दौरान गोली लग गई, जिससे वह बुरी तरह घायल हो गया। रतुआ थाना के अंतर्गत आने वाले हाजीपुर गाँव में यह बच्चा मुहर्रम का जुलूस देख रहा था। जुलूस में शामिल कई लोग फायरिंग भी कर रहे थे। 2 गोली बच्चे को आकर लग गई। वह तुरंत ज़मीन पर गिर पड़ा। एक गोली उसके पैर में लगी और दूसरी छाती के पास से गुजर गई।

‘न्यायपालिका बिकी हुई है’: वामपंथी गिरोह का अगला नैरेटिव क्योंकि इनके बाप-दादा फँस रहे हैं

“तुम सोचते हो कि हमारी लड़ाई साल भर की है, दस साल की है या फिर बीस, पचास या सौ साल की है, जबकि हमारी लड़ाई तब तक की है, जब तक हमारी जीत नहीं हो जाती।”

ये ध्येय वाक्य एक आतंकी विचारधारा का भी है, इज़रायल वालों का भी है और लगता है कि भारत को बर्बाद करने पर तुले वामपंथियों और लिबरपंथियों के गिरोह का भी है। मतलब इससे नहीं है कि इनके हर झूठ को आप पहले से कम समय में पकड़ लें, मतलब इससे है कि ये प्रलाप करते रहेंगे, अजेंडाबाजी चलती रहेगी, प्रोपगेंडा का प्रपंच चलता रहेगा… एक के बाद एक… आप तर्क करेंगे, ये पिछले झूठ को भुला कर नए झूठ गढ़ लेंगे।

उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ एक भीड़ द्वारा किए गए सामाजिक अपराध को मज़हबी बता कर चुनावों के परिणाम को प्रभावित करने से लेकर आठ साल की बच्ची के बलात्कार और हत्या को हिन्दू और हिन्दुस्तान से जोड़ कर पूरे विश्व में एक धर्म और राष्ट्र की छवि सिर्फ इसलिए धूमिल करने की कोशिश हुई क्योंकि सत्ता के केंद्र में विरोधी विचारधारा के लोग हैं।

चर्चों में किसी चोर ने आग लगाई, या शराबी ने कुछ तोड़ा और वामपंथी चर्चा का विषय बना कि हिन्दू अल्पसंख्यकों को जीने नहीं दे रहे। कथित चोर तबरेज की मृत्यु हृदयाघात से हुई और बवाल काटा गया कि ‘जय श्री राम’ न बोलने पर उसे मार दिया गया। इसमें दोमत नहीं कि हत्या का कारण पिटाई है, लेकिन पिटाई का कारण उसका समुदाय विशेष से होना नहीं, कथित तौर पर एक चोर होना था। लेकिन 2018 से अब तक 22 हिन्दुओं की समुदाय विशेष द्वारा की गई मज़हबी हत्या पर एक चुप्पी दिखती है।

इनकी संगठनात्मक क्षमता, डिजिटल से लेकर सड़कों तक देखते ही बनती है कि गौरी लंकेश की हत्या के आधे घंटे के भीतर हत्यारे का राइट विंगर होना पता चल जाता है इन्हें और ज़िम्मेदारी सीधे मोदी की, लेकिन राजदेव रंजन सरीखे बाईस और पत्रकारों की हत्या पर एक ट्वीट तक नहीं जाता।

पहले ये खुले सांड की तरह हर खेत में घुस जाते थे, कोई पकड़ने वाला नहीं था और सत्ता में बैठा सत्ताधीश इनकी बातों से आनंद पाता था क्योंकि अगर कुछ घटना हुई तो आसानी से उस विचारधारा पर थोप दो जो तुम्हें चैलेंज करती हो, और अगर वही सत्ता में रहे तब तो कह दो कि हर चीज पर तो इन्हीं का नियंत्रण है, तो ये मनमानी कर रहे हैं, अपराधियों को संरक्षण प्राप्त है। चित मैं जीता, पट तू हारा…

न्यायपालिका पर हमले की शुरुआत

‌अब आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि न्यायालयों के फ़ैसलों पर सवाल उठेंगे, ये कहा जाएगा कि सब कुछ मैनेज हो गया है। चूँकि लोकतंत्र की हत्या का गन्ना पेड़ कर उसकी सिट्ठी निकाल चुके मीडिया के एंकरों, नेताओं और चिरकुट विचारधारा के समर्थकों के लिए सत्ता में बैठी विचारधारा सशक्त ही होती जा रही है, और लोग उसे प्रो-इनकम्बेन्सी के आधार पर सहमति दे रहे हैं, तो न्यायपालिका, जिस पर हर नागरिक का विश्वास है, उसे ही डीलेजिटिमाइज यानी बिका हुआ, नकारा, खोखला जैसा साबित करने पर आ गए हैं।

आप देखिए कि रवीश कुमार मनीला में अवार्ड ले रहे हैं और उनकी स्पीच पोलिटिकल से भी आगे निकल कर एक टुच्ची विरोधी पार्टी के नेता जैसी हो जाती है जिसका एक ही मकसद होता है सामने वाले की छवि खराब करना। रवीश कुमार बहुत ही सामान्य तरीके से बता देते हैं कि जुडिशरी मैनेज हो गई है, नागरिकों के शत्रु के तौर पर कार्य कर रही है।

ऐसा कहने के पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है? जबकि मनीला तो छोड़िए अमेरिका भी अब उस स्थिति में नहीं है कि प्रतिबंधों का धमकी दे कर भारत सरकार पर दबाव बना कर किसी को बचा ले या भगा दे। भोपाल गैस कांड वाले एंडरसन की याद तो सबको होगी ही। फिर ऐसे मंचों पर क्यो रो रहे हैं लोग? प्रणय रॉय, अर्बन नक्सलियों की गिरफ़्तारी, चिदम्बरम से लेकर सोनिया तक कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं तो जरूरी है कि जहाँ से सजा मिलने की उम्मीद हो, उस संस्था को ही भ्रष्ट कह दिया जाए।

इसलिए अगला चरण न्यायपालिका पर हमले का है। अपने गिरोह के चोरों और नेताओं को सजा से या पब्लिक परसेप्शन से, उनकी छवि को सही रखने के लिए इन्हें न्यायालय पर, सरकारी संस्थाओं पर हमला बोलना ही होगा। ये जानते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया तो लम्बी चलेगी लेकिन लोगों की नज़रों में इनके तारणहारों की, चरणपादुका चटवाने वालों की, इन्हें ज़िंदा रखनेवालों की इमेज तो खराब हो जाएगी, और आज के दौर में जब पार्टी पहले से ही अपनी छवि बर्बाद कर चुकी हो, तो और आरोपों का सही साबित होते जाना, उनकी राजनैतिक करियर के लिए बिलकुल गलत होगा। अतः, रास्ता एक ही है कि ‘जुडिशरी कुछ लोगों के इशारे पर चल रही है’ कहते हुए माहौल बनाया जाए।

लेकिन माहौल बनाने से क्या होगा? माहौल बनाने का सबसे बड़ा फायदा होता है कि लोग उन्मादी होते जाते हैं। उनके पास हर दिन एक नई बात आती है जिससे उन्हें विश्वास दिलाया जाता है कि सरकार उनके ऊपर नकेल कस रही है, विरोधियों का दमन कर रही है, झूठे केस में फँसा रही है, और तो और सरकार साक्ष्य पैदा कर रही है। इससे पार्टी समर्थक तो छोड़िए, जो ग़ैर राजनीतिक व्यक्ति है, वो भी सोचने लगते हैं कि सही में लोकतंत्र का हर स्तंभ ख़तरे में है या खोखला किया जा रहा है। अगर वो हर रोज यही सुनेगा कि पार्टी सत्ता में है, विरोधी पर केस बनाया, फिर एजेंसियों को कहा कि घर से जलील कर के उठाओ, फिर जज को मैनेज कर के कहा कि इसे बेल मत दो, फिर झूठे सबूत ले आओ और उस आधार पर सजा दिलवा दो।

ऐसा एक बार हो तो आप कहेंगे कि मीडिया वाले कुछ भी दिखाते हैं, लेकिन जब राफ़ेल में ‘जाँच कराने में क्या जाता है’ हर दिन आपको कहा जाए तो आप मानने लगते हैं कि हाँ, जाँच करा ही लो। जबकि जाँच हुई और कोर्ट ने कहा सब ठीक है, फिर भी नहीं माने और कहते हैं कि एक क्लासिफाइड डाक्यूमेंट को, जो संवेदनशील जानकारियों से भरी हुई है, पब्लिक कर दिया जाए ताकि लोगों को पता लगे कि सरकार जो पैसा खर्च कर रही है, उसमें कितने मिसाइल आ रहे हैं और वो कैसे काम करते हैं। जबकि यही एंकर और विरोधी नेता यह भूल जाते हैं कि इस सरकार को प्रतिनिधि के तौर पर इसी जनता ने भेजा है।

इसलिए जब माहौल तैयार हो जाएगा तो नवंबर में राम मंदिर के फ़ैसले के बाद दंगे की स्थिति को हवा देने में सहूलियत होगी कि कथित अल्पसंख्यकों को देश की न्यायपालिका ने भी धोखा दे दिया, सारे जज संघी हो गए है। ये उस स्थिति की तैयारी है जहाँ पूरे देश के हर उन्मादी को उकसाने के प्रयत्न हो रहे हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि अगर फ़ैसला तुम्हारे पक्ष में है तब तो ठीक है लेकिन अगर विरोध में गया तब सारा सिस्टम बिक चुका है, इस देश में तो अब तुम्हारी सुनने वाला कोई है ही नहीं।

अतः, न्यायपालिका और जज इस गिरोह का अगला निशाना हैं। पहले भी इन्होंने न्यायपालिका को धता बताते हुए उसके ख़िलाफ़ बोला है। जस्टिस लोया की मौत को उसका परिवार भूल गया लेकिन ये किसी भी तरह बताना चाहते हैं कि किसी ने उन्हें मरवा दिया। साबित कुछ न भी हो, कोई बात नहीं, लेकिन लोगों के मन में शंका का बीज छोड़ देना भी सफलता ही है।

ये गिरोह चालाक है। ये हर बात के झूठे साबित होने के बाद भी उसे अभिव्यक्ति के नाम पर बोलता जाता है। इससे पढ़ने वाला, सुनने वाला अपने अवचेतन में रखता जाता है। उस क्षण में भले ही वो उस बात को नकार दे, लेकिन एक आदमी बार-बार, नए झूठ फेंकता रहे, आप सुनते रहें, तो उसका असर होने लगता है। फिर आप बोलने लगते हैं कि ‘यार जाँच करवाने में क्या जाता है’, फिर आप कहने लगते हैं कि ‘इतनी बार बोल रहा है, कुछ को सच होगा’। जबकि इस गिरोह की यही विशेषता है कि इनका जहर बिना मिलावट का होता है, ये अपने नैरेटिव में सत्य की मात्रा शून्य रखते हैं।

यासीन मलिक पर मुकदमा खुल चुका है, 84 के दंगों पर दोबारा केस खुला है, नेशनल हेराल्ड केस है, चिदंबरम हैं, अगस्ता-वेस्टलैंड है, रामजन्मभूमि है, एनडीटीवी का प्रणय रॉय है, क्विंट का राघव बहल है, 370 का मामला सुप्रीम कोर्ट ने देखने का वादा किया है, अर्बन नक्सलियों पर मामले चल रहे हैं…

इस सरकार ने इन चोरों, डकैतों, दंगाइयों, हत्यारों और देश को तोड़ने की मंशा रखने वालों पर खौलता हुआ पानी डाला है और वो भी एक साथ, हर तरफ से। इनकी चमड़ी मोटी है, इसमें दोराय नहीं लेकिन सरकार के पास खौलता हुआ पानी बहुत ज्यादा है, क्योंकि सरकार सौर ऊर्जा में भी बहुत निवेश कर रही है और नदियों के पानी पर बाँध भी बनाए जा रहे हैं।