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‘CAA के खिलाफ प्रदर्शन में मारे गए लोग शहीद की तरह, सपा की सरकार बनी तो देंगे पेंशन’

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में मारे गए लोगों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है। अखिलेश यादव रविवार (जनवरी 5, 2019) को नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में मारे गए मोहम्मद वकील अहमद के परिजनों से मिलने पहुँचे और संवेदना व्यक्त की।

मोहम्मद वकील के परिजन से मुलाकात के बाद अखिलेश ने कहा कि यूपी में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन में जान गँवाने वाले सभी लोगों की मौत पुलिस की गोली लगने से ही हुई। उनकी पार्टी हिंसा में मारे गए सभी लोगों के परिवार को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देगी। इस बारे में ट्वीट करते हुए अखिलेश यादव लिखा, “उत्तर प्रदेश में पुलिस की गोली का शिकार हुए मृतक मोहम्मद वकील के परिजनों का दुख-दर्द बाँटकर व परिवार को 5 लाख की आर्थिक सहायता देकर हमने मदद के हाथ बढ़ाए हैं और हमेशा बढ़ाते रहेंगे।”

अखिलेश ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि बीजेपी नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में जो कैंपेन चला रही है, वह लोगों को गुमराह करने वाला है। अखिलेश ने आरोप लगाते हुए कहा कि लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान जान गँवाने वाले मोहम्मद वकील की मौत कैसे हुई, इसकी जाँच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मोहम्मद वकील किसी प्रदर्शन का हिस्सा नहीं था, ऐसे में उसकी मौत किसकी गोली से हुई इसकी जाँच होनी चाहिए।

अखिलेश यादव का कहना है कि मोहम्मद वकील के पिता और पत्नी को सरकार की तरफ से मदद और आवास दोनों दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार के एक सदस्य को नौकरी के अलावा 25 लाख रूपए की आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश विधान सभा के नेता प्रतिपक्ष और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोविंद चौधरी ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों को पेंशन देने का वादा किया है। उन्होंने कहा कि सपा की सरकार आई तो मृतकों के परिजनों को पेंशन भी दी जा सकती है। यह शहीद की तरह हैं।

अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि देश का हर इंसान नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में है। जब आधार कार्ड में सारी डिटेल्स पहले ही ली जा चुकी हैं तो एनपीआर और एनआरसी जैसी चीजों की जरूरत क्या है। अखिलेश ने कहा कि बीजेपी भी यह जानती है कि उनके द्वारा बनाया गया कानून असंवैधानिक है। 

गौरतलब है कि नागरिकता कानून के खिलाफ उत्तर प्रदेश में हिंसक प्रदर्शन हुए थे और इस दौरान हिंसा भड़कने से 19 लोगों की मौत हो गई थी। इन हिंसक प्रदर्शनों में कई पुलिसकर्मियों भी जख्मी हुए। प्रदर्शनकारियों ने इन प्रदर्शनों के दौरान सरकारी संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचाया था।

जीवन का सबसे बुरा समय था: शेफ अतुल कोचर ने बताया कि कैसे इस्लामी-वामपंथियों ने उनका जीवन नर्क बना दिया

अक्सर वामपंथी लिबरल्स, ‘दक्षिणपंथी ट्रोल्स’ द्वारा ‘ऑनलाइन उत्पीड़न’ का शिकार होने की शिकायत करते रहते हैं, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है और सच्चाई यह है कि वामपंथी-लिबरल्स गिरोह उन लोगों के जीवन और करियर को बर्बाद करने का दमखम रखता है, जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपना विचार रखते हैं। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं। हमने वामपंथी-लिबरलों द्वारा बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को एक साधारण सोशल मीडिया पोस्ट के लिए निकाल दिए जाने के कई उदाहरण देखे हैं। इस लिस्ट में एक नया नाम जुड़ा है और वो नाम है- भारतीय मूल के सेलिब्रिटी शेफ अतुल कोचर का।

बता दें कि शेफ अतुल कोचर को जून 2018 में दुबई के JW Marriott Marqui होटल से बर्खास्त कर दिया गया था। दरअसल इस्लामियों और वामपंथी लिबरलों ने एक ट्वीट के लिए उन्हें निशाना बनाया था। हालाँकि कोचर ने बिना शर्त माफी भी जारी कर दी थी, लेकिन इस्लाम परस्तों की तृप्ति के लिए यह पर्याप्त नहीं था। जब दुबई के होटल ने अतुल कोचर के साथ कॉन्ट्रैक्ट समाप्त कर लिया तब जाकर वामपंथियों के कलेजे को ठंडक मिली।

शेफ अतुल कोचर का ट्वीट

शेफ अतुल कोचर को बर्खास्त किए जाने के बाद वामपंथियों का काम खत्म हो गया। वो इसे भूलकर अपने अगले टारगेट के लिए निकल पड़े, लेकिन यह घटना कोचर के लिए काफी मुश्किल भरा समय रहा। पिछले साल अगस्त में प्रकाशित एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और उनके परिवार को उनके एक ट्वीट की वजह से मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ा था।

अतुल कोचर को इस्लामी-वामपंथियों ने कुछ विवादास्पद कहने के लिए नहीं, बल्कि एक चिर-परिचित सच्चाई बताने के लिए निशाना बनाया। दरअसल अतुल कोचर ने अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के एक ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा था, “यह देखकर दुख होता है कि आपने उन हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान नहीं किया है जो 2000 वर्षों से इस्लाम से आतंकित हैं। शेम ऑन यू।”

प्रियंका चोपड़ा द्वारा अपने हॉलीवुड टीवी शो क्वांटिको के एक एपिसोड के खिलाफ किए गए हमले के बाद माफी माँगने के एक ट्वीट के जवाब में यह ट्वीट किया था। प्रियंका के शो में दिखाया गया था कि भारतीय राष्ट्रवादियों ने पाकिस्तानी आतंकवादियों को पकड़ने के लिए मैनहट्टन में परमाणु हमला किया था। इसके बाद से प्रियंका चोपड़ा को निशाना बनाया गया था। शो में दिखाए गए इस फिक्शनल प्लॉट ने कई भारतीयों को नाराज किया, क्योंकि यह सच्चाई से कोसों दूर था और अतुल कोचर भी उन भारतीयों में से एक था जिन्होंने इस पर नाखुशी जाहिर की थी।

बता दें कि न सिर्फ अतुल कोचर को ही वामपंथियों के ऑनलाइन बैकलेश का सामना करना पड़ा, बल्कि उनके दो स्कूल जाते बच्चे भी इसके शिकार हुए। उन्हें भी इस दौरान काफी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद अतुल कोचर ने कुछ दिनों के लिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा। उन्होंने बताया कि उनकी इस परिस्थिति का लाभ उनके बिजनेस प्रतिद्वंदियों ने भी उठाया, जो कि उन्हें बिजनेस से निकालना चाहते थे। वो लोग भी उनके खिलाफ गिरोह में शामिल हो गए थे। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह मेरे जीवन का सबसे बुरा समय था।”

अतुल कोचर ने कहा कि वह इस घटना के बाद डिप्रेशन में चले गए थे। जिससे उबरने के लिए वह और उनका परिवार कुछ समय के लिए भारत वापस आए थे। अपने इंटरव्यू के दौरान अतुल ने इस बात पर जोर डाला कि उनका ट्वीट एक मूर्खतापूर्ण गलती थी, और वास्तव में इसका मतलब वह नहीं था। 

वह यह भी कहते हैं कि उस कठिन समय के दौरान उनके मुस्लिम दोस्त उनका सबसे अधिक सपोर्ट करते थे। उन्होंने कहा कि लखनऊ के पास शाहजहाँपुर में पला-बढ़ा होने के कारण उनके कई मुस्लिम मित्र थे। साथ ही उन्होंने कहा कि अपने प्रोफेशनल करियर के दौरान उन्होंने कई अनाथ बच्चों को आर्थिक मदद देकर उनकी शिक्षा पूरी करवाई और वो सभी बच्चे मुस्लिम थे।

इस तरह के धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति होने के बावजूद, अतुल कोचर को इस्लामी-वामपंथी गिरोह ने शिकार बनाया। उन्हें सच बोलने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी, हालाँकि वह जोर देकर कहते हैं कि यह एक मूर्खतापूर्ण गलती थी और उन्हें उस संदेश को ट्वीट नहीं करना चाहिए था।

‘हिन्दुओं से आजादी’ का नारा रात के 2.15 बजे? मुंबई पुलिस की साइबर सेल ने शुरू की जाँच

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया के सामने सोमवार की आधी रात को विरोध के नाम पर जो किया गया, उस पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। कुछ का आरोप है कि वहाँ ‘हिंदुओं से आजादी’ के नारे लगे, तो कुछ का कहना है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। दोनों पक्ष अपने-अपने वीडियो शेयर कर रहे हैं। नीचे जो वीडियो है, वो सोमवार (जनवरी 6, 2019) की मध्य रात्रि 2.15 बजे की है।

बीजेपी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कहा, “मुस्लिम और वामपंथी ‘हिंदुओं से आजादी’ का नारा लगा रहे हैं लेकिन इस बार यह जामिया या जेएनयू कैंपस में नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर यह नारा लगाया है। क्या मुंबई पुलिस और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इसके खिलाफ कोई एक्शन लेंगे या चुपचाप वो भी इन गुंडों का समर्थन करेंगे?” इस पर एक ट्विटर यूजर ने प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “बग्गा भाई, किस से एक्शन की उम्मीद कर रहे हो, जिन्होंने अपना जमीर कॉन्ग्रेस के पास गिरवी रख दिया।”

बहरहाल बताया जा रहा है कि मुंबई पुलिस ने वीडियो की जाँच-पड़ताल शुरू कर दी है। इस मामले में मुंबई पुलिस साइबर सेल वीडियो की जाँच करेगी। इस बारे में बात करते हुए डीसीपी प्रणय अशोक ने कहा, “मामले की जाँच शुरू हो गई है। मुंबई पुलिस की साइबर सेल ने घटना की जाँच शुरू कर दी है।” पुलिस की जाँच के बाद ही वीडियो की सच्चाई सामने आएगी।

वैसे ‘हिंदुओं से आजादी’ का नारा पहली बार लगा हो, ऐसा नहीं है। इससे पहले भी कई बार JNU, AMU समेत कई जगहों पर हिन्दुओं से आजादी के नारे लग चुके हैं। हैरानी की बात है कि भारत में रह कर इन लोगों को हिंदुओं से ही आजादी चाहिए। वीडियो के सामने आने पर लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं और हिन्दुओं की भावना को आहत करने के लिए इनके खिलाफ ठोस कार्रवाई की माँग की गई। रोहित भारद्वाज नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि हिन्दुओं की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए इन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहिए। एक यूजर ने लिखा, “ये जेहादी नक्सल इनको आजादी नहीं हिंदुओ से दिक्कत है। ये स्टूडेंट्स नहीं हैं ये राजनीतिक पार्टियों के दलाली करने वाले गुंडे हैं।”

वहीं एक यूजर ने लिखा, “मुझे लगता है कि उमर, स्वरा, कन्हैया को क्राउड मैनेजमेंट और स्लोगन क्रिएटर्स का बिजनेस शुरू कर देना चाहिए।” नेशन फर्स्ट के एक पत्रकार ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि ये सारे देशद्रोही और अर्बन नक्सल को बदला और आजादी के अलावा और कुछ नहीं दिखता है। इनमें और पाकिस्तानी जिहादियों में कोई फर्क नहीं लगता। तो वहीं देवेंद्र पटेल नाम के एक यूजर ने लिखा कि इसका विरोध कोई कॉन्ग्रेसी, लेफ्टिस, बॉलीवुड, गद्दार, गुलाम और अनपढ़ गँवार नही करेंगे।

एक यूजर ने लिखा, “कितनी शर्म की बात है कि ये अपने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ऐसे नारे लगाते हैं। ये उस देश में हैं, जहाँ पूरी दुनिया को स्वीकार किया गया, और इसे बताने की जरूरत नहीं, ये जिससे आजादी माँग रहे, ये उन्हीं की भूमि है और हमेशा रहेगी, आप खुद सोचिए जाना कहाँ है!”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले कई स्थानों पर जिहादी हिन्दुओं को मिटाने के भी नारे लगते हैं, AMU में ये नारे भी लगे, “हिन्दुओं की कब्र खुदेगी AMU की छाती पर।”

JNU हिंसा के दो चेहरे: जानिए कौन हैं नकाबपोशों का नेतृत्व करने वाली आइशी घोष और गीता कुमारी

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JNU हमला 26/11 की तरह, गुंडों को आतंकवादी बोला जाए: ठाकरे पिता-पुत्र ने चली कॉन्ग्रेस की चाल

JNU की जिस प्रेसिडेंट का रात में फूटा माथा, दिन में वो खुद नक़ाबपोश हमलावरों के साथ थीं – Video Viral

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने जेएनयू में हुई हिंसा पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस पूरे वाकये को 26/11 मुंबई हमले की तरह बताया है। उद्धव का कहना है कि रविवार (कल) को जो कुछ हुआ, वह कुछ ऐसा था, जिसे हम 26/11 के बाद देख रहे हैं। सभी को पता होना चाहिए कि नकाब के पीछे कौन थे। आज के युवाओं को विश्वास में लेने की जरूरत है। युवा आज आत्मविश्वास खो रहा है।

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मीडिया से बात करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा, “देश के छात्रों में भय का माहौल है। हम सभी को एक साथ आने की जरूरत है और छात्रों में आत्मविश्वास पैदा किए जाने की जरूरत है।”

गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने भी इस पर अपना बयान दिया है और नकाबपोशों को आतंकवादी कहने की वकालत की है। उन्होंने कहा कि इन हमलों की वजह से देश की छवि पूरी दुनिया में खराब हो रही है। इन गुंडों को आंतकवादी कहना चाहिए, क्योंकि वे भी मुँह छिपाकर ही आते हैं। इस पर तय समय के अंदर कार्रवाई होनी चाहिए, वरना विदेश के छात्र यहाँ पढ़ने नहीं आएँगे।

इधर, महाराष्ट्र के लोक निर्माण और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक चव्हाण ने भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया दी और उद्धव ठाकरे से मिलता-जुलता बयान दिया। अशोक चव्हाण ने कहा कि 26/11 को जो हुआ था, वो आतंकवाद था। लेकिन जेएनयू में जो हुआ, वो आतंकित करने की कोशिश थी। उनके अनुसार 26/11 के आतंकवादी बाहर से आए थे और कल वाले यहाँ के रहने वाले हैं और आतंक फैला रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि इस घटना के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं ने मोदी सरकार पर हमला बोलने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बयान दिया हैं। सोनिया गाँधी ने अपने एक बयान में कहा, “भारत के युवाओं और छात्रों की आवाज हर दिन दबाई जा रही है। भारत के युवाओं पर भयावह एवं अप्रत्याशित ढंग से हिंसा की गई और ऐसे करने वाले गुंडों को सत्तारूढ़ मोदी सरकार की ओर से उकसाया गया है। यह हिंसा निंदनीय और अस्वीकार्य है।”

सोनिया गाँधी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, “पूरे भारत में शैक्षणिक परिसरों और कॉलेजों पर भाजपा सरकार से सहयोग पाने वाले तत्व एवं पुलिस रोजाना हमले कर रही है। हम इसकी निंदा करते हैं और स्वतंत्र न्यायिक जाँच की माँग करते हैं।”

वहीं, इस मामले पर राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने कहा कि जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों पर हुआ कायराना हमला सुनियोजित था। हिंसा का इस्तेमाल करने का मतलब लोकतांत्रिक मूल्यों को दबाने का प्रयास करना है। लेकिन वे इसमें कभी सफल नहीं हो पाएँगे। इस बीच, राकांपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री जितेंद्र आव्हाण मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर जेएनयू हिंसा के विरोध में जारी प्रदर्शन में शामिल हुए।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 का ऐलान: 8 को मतदान, 11 फरवरी को घोषित होंगे नतीजे

दिल्ली में विधानसभा चुनाव 2020 का बिगुल आज (जनवरी 6, 2020) बज गया। भारतीय निर्वाचन आयोग ने दिल्ली विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान करते हुए राष्ट्रीय राजधानी में आचार संहिता लागू की। चुनाव आयोग के ऐलान के अनुसार, आगामी 8 फरवरी को मतदान होगा और 11 फरवरी को नतीजे घोषित होंगे।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने बताया कि चुनाव सिंगल फेज में होगा और इसके लिए 14 जनवरी को नोटिफिकेशन जारी होगा। नॉमिनेशन की अंतिम तिथि 21 जनवरी होगी और नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि 24 जनवरी रखी गई है।

गौरतलब है कि वर्तमान दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल 22 फरवरी को खत्म होगा। पिछले विधानसभा में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने 70 सीटों में से 67 सीटें अपने हिस्से में दर्ज की थीं। इस बार दिल्ली में 13,750 पोलिंग बूथ पर करीब 1.46 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

चुनाव आयोग की ओर से सुनील अरोड़ा ने बताया कि स्थिति पर निगरानी रखने के लिए मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर बनाए गए हैं। इस बार 2,689 जगहों पर कुल 13,750 मतदान केंद्र होंगे। इसके अतिरिक्त बुजुर्गों के लिए भी आयोग ने खास इंतजाम किए हैं, जिससे उनको वोट डालने में आसानी हो।

पूरी चुनाव की प्रक्रिया संपन्न कराने के लिए 90 हजार कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी। साथ ही
दिल्ली विधानसभा चुनाव में पोलिंग स्टेशन पर मोबाइल फोन के लिए लॉकर की सुविधा प्रदान की जाएगी और सी-विजिल ऐप के जरिए आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी शिकायतों को दर्ज कराया जा सकेगा।

बता दें कि साल 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिली थीं। भाजपा ने 3 सीटें जीती थीं, वहीं कॉन्ग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। 2015 में चुनाव आयोग ने 12 जनवरी को दिल्ली चुनाव की घोषणा की थी और 7 फरवरी को मतदान हुआ था जिसका 10 फरवरी को नतीजा आया था।

JNU की जिस प्रेसिडेंट का रात में फूटा माथा, दिन में वो खुद नक़ाबपोश हमलावरों के साथ थीं – Video Viral

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) अभी चर्चा में है। वहाँ कैंपस में नकाबपोशों के द्वारा हिंसा की गई है। आरोप-प्रत्यारोप वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों एक-दूसरे पर लगा रहे हैं। हिंसा छोटी-मोटी नहीं बल्कि भयानक स्तर की – यह आप वहाँ से आए वीडियो और फोटो देखकर समझ सकते हैं। इसी हिंसा का शिकार JNUSU (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन) की अध्यक्ष आइशी घोष भी हुईं। उनका सर फटा, खून से लथपथ उनका चेहरा वायरल हुआ। चूँकि आइशी घोष वामपंथ से हैं, तो जाहिर सी बात है कि आरोप दक्षिणपंथी ABVP पर लगाया गया। खबरें भी बनीं, वायरल भी हुई।

यह पूरा प्रकरण कल यानी 5 जनवरी को देर रात हुआ। लेकिन सुबह होते-होते यानी 6 जनवरी को JNU में हिंसा किसने की, हिंसा को कौन प्रभावित कर रहा था – इसका दूसरा पहलू भी सामने आ गया। जो आरोप ABVP पर लगा कर उसे गुंडा तत्व बताया जा रहा था, दो वीडियो ने इस आरोप की हवा निकाल दी। लेकिन वीडियो में दिख रहे उजाले और मास्क पहने लड़के-लड़कियों को समझने के लिए आपको 5 जनवरी को हुई हिंसा से दो दिन पहले हुए घटनाक्रम को समझना होगा।

JNU में हिंसा की शुरुआत होती है 3 जनवरी से। लेकिन यह मेनस्ट्रीम मीडिया में खबर बनकर आती नहीं है। आती भी है तो छिटपुट घटना के तौर पर। दरअसल उस दिन छात्रों के एक नक़ाबपोश ग्रुप ने दोपहर के क़रीब 1 बजे सूचना प्रणाली केंद्र में जबरन घुसकर लाइट बंद कर दी थी, पूरे टेक्निकल स्टाफ़ को बाहर खदेड़ दिया था और सर्वर बंद कर दिया। ये सब इसलिए किया गया था ताकि जो छात्र (पढ़ने वाले, आंदोलन से जिनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं) अपने सेमेस्टर एग्जाम के लिए रजिस्ट्रेशन करवा रहे थे, उनको रोका जाए, उन्हें जबरन अपने आंदोलन से जोड़ा जाए। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह दिखाया जाए कि सभी छात्र आंदोलन में एकसाथ हैं। वामपंथी छात्रसंघ का यह हंगामा सफल भी हुआ और छात्रों का रजिस्ट्रेशन प्रोसेस उस दिन बुरी तरह से प्रभावित हो गया, उसे बंद करना पड़ा।

इस खबर को आप डिटल में यहाँ पढ़ सकते हैं : JNU में नक़ाबपोश छात्रों ने लाइट बंद कर किया हंगामा: टेक्निकल स्टाफ को किया बाहर, रजिस्ट्रेशन में डाला व्यवधान

4 जनवरी को माहौल गर्म था लेकिन कुछ हुआ नहीं। फिर 5 जनवरी को क्यों भड़क गई बात? इसके पीछे वजह टेक्निकल है। 5 जनवरी यानी रविवार को रजिस्ट्रेशन का आखिरी दिन था। एबीवीपी से जुड़े छात्रों के अलावा भी जो पढ़ाई-लिखाई का प्रक्रिया से जुड़े रहना चाहते थे, वो रजिस्ट्रेशन के लिए गए थे। मगर लेफ्ट विंग के छात्रों ने सर्वर रूम को लॉक कर दिया और वाई-फाई काट दिया। जिसकी वजह से उनका रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया। बात इतने पर भी खत्म नहीं हुई। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन में आ रही समस्या को देखते हुए कुछ छात्र-छात्राएँ मैनुअल रजिस्ट्रेशन करवा रहे थे। अब वामपंथियों को लगने लगा कि आंदोलन उनके हाथ से फिसलता जा रहा है। अगर छात्र ही उनके साथ नहीं होंगे तो फिर काहे की छात्र राजनीति! बस उन्होंने मैनुअल रजिस्ट्रेशन करवा रहे छात्र-छात्राओं के साथ मारपीट शुरू कर दी। और यह सब हुआ दिन के उजाले में। जबकि नेशनल मीडिया में JNU बवाल की खबर आती है शाम से। वीडियो, फोटो शेयर किए जाते हैं रात वाले।

आइशी घोष (बाएँ लाल घेरे में, दाएँ घायल)

रात में जितना भी बवाल होता है, जितनों को चोट लगती है – सबका आरोप ABVP के ऊपर मढ़ दिया जाता है। PM मोदी से लेकर अमित शाह तक को आतंकवादी बता दिया जाता है। और खुद JNUSU प्रेसिडेंट के सर फटी तस्वीर से नैरेटिव फिट भी बैठ रहा था वामपंथियों का… लेकिन ट्विस्ट आता है सोशल मीडिया के जरिए 6 जनवरी को – 2 वीडियो के जरिए। दोनों दिन के उजाले वाले वीडियो। एक में भीड़ द्वारा छात्र-छात्राओं को पीटा जाना, दूसरे में मास्क पहने या मुँह ढँकी भीड़ के साथ खुद JNUSU प्रेसिडेंट का होना। JNU प्रशासन ने भी जो बयान जारी किया, उसमें भी कहा गया कि विरोध-प्रदर्शन कर रहे छात्रों द्वारा नए सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने गए छात्रों को रोकने की कोशिश की गई, उनके साथ मारपीट की गई।

लेकिन, सोशल मीडिया के युग में सच्चाई अधिक दिनों तक छिप नहीं पाती। ऐसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ। दरअसल, ट्विटर पर अभिजीत अय्यर मित्रा ने एक वीडियो क्लिप शेयर की, जो सूर्यास्त के पहले शाम 5:37 बजे की है। इस क्लिप में आइशी को ख़ुद उन्हीं नक़ाबपोश छात्रों के समूह के साथ देखा गया। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि वो न सिर्फ़ उन नक़ाबपोशों के साथ थीं बल्कि वो उन छात्रों को डायरेक्शन भी दे रही थीं।

वामपंथियों की करतूत का पर्दाफ़ाश करते इस इसी वीडियो को फ़िल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने भी शेयर किया और लिखा कि ख़ुद वामपंथी गिरोह रजिस्ट्रेशन करने देना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने छात्रों के साथ मारपीट की, वाई-फाई कनेक्शन काट दिया और फिर वापस अपने हॉस्टल में आ गए।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि JNUSU की प्रेसिडेंट एक तरफ़ तो पूरे प्रकरण के लिए ABVP को दोषी ठहराने में जुटी रहीं, वहीं दूसरी तरफ़ उनकी पोल इस बात पर खुल जाती है कि अगर ऐसा है तो फिर वो ख़ुद मास्क लगाए गुंडों के साथ क्या कर रही थीं?

सच तो यह है कि JNU में यह सब एक ऐसी साज़िश के तहत किया गया जिसका मक़सद ABVP को बदनाम कर उसे हिंसात्मक दिखाना है और लोगों के बीच भाजपा के छात्र संगठन के लिए ज़हर घोलना है। छात्रों को रजिस्ट्रेशन न करने देने की धमकी और विश्वविद्यालय में उत्पात मचाने के पीछे एक सोची-समझी चाल थी, जिसके पासे ख़ुद वामपंथियों ने ही फेंके थे।

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प्रशासन ने बताई JNU में हमलावरों की ‘पहचान’: विपक्ष जबरदस्ती ठहरा रहा सरकार को जिम्मेदार

जेएनयू में सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन को लेकर हुए विवाद ने रविवार (जनवरी 5, 2019) को एक भयंकर रूप ले लिया। यहाँ छात्रों/युवाओं के एक समूह ने कल शाम हॉस्टल परिसर में घुसकर काफी तोड़फोड़ और मारपीट की। हालाँकि, पूरे प्रकरण के लिए विश्वविद्यालय ने अपनी ओर से जारी बयान में उन लोगों को स्पष्ट तौर पर जिम्मेदार बताया, जो कुछ समय पहले तक फीस बढ़ोतरी का विरोध कर रहे थे और अब सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन रोकने के लिए 3 जनवरी से ही हिंसक हो गए थे। लेकिन, फिर भी सोशल मीडिया पर लगातार वामपंथी गिरोह द्वारा एबीवीपी को जिम्मेदार ठहराया गया । और, मौक़ा देखकर अपनी-अपनी राजनीति साधने के लिए विपक्ष भी सरकार को सवालों को घेरे में लेता रहा।

विश्वविद्यालय का बयान

पूरे प्रकरण पर विश्वविद्यालय द्वारा जारी बयान में स्पष्ट बताया गया कि पंजीकरण की प्रक्रिया 1 जनवरी तक बड़े आराम से चल रही थी। लेकिन 3 जनवरी को छात्रों का एक समूह नकाब पहनकर CIS के परिसर में घुसा और टेक्निकल स्टॉफ को रूम से निकालकर, वहाँ तोड़फोड़ की। जिससे इंटरनेट सेवा बाधित हो गईं। इस संबंध में स्टाफ ने छात्रों की पहचान कर उनके ख़िलाफ़ पुलिस शिकायत करवाई।

प्रेस नोट का पहला पन्ना

इसके बाद 4 जनवरी को सर्वर ठीक करके प्रक्रिया दोबारा चालू हुई। जिसके बाद हजारों बच्चों ने बढ़ी फीस के साथ सुबह-सुबह ही अपना रजिस्ट्रेशन करवा दिया। लेकिन 3 तारीख की तरह 4 जनवरी को भी दोपहर 1 बजे कुछ छात्र दोबारा परिसर में सर्वर बंद करने के लिए घुसे। जहाँ उन्होंने पहले पॉवर सप्लॉई बंद की, तारों को तोड़ा और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया बाधित करने के लिए फिर से सर्वर बंद कर गए। इस घटना के बाद दोबारा पुलिस में शिकायत दर्ज हुई।

प्रेस नोट का दूसरा पन्ना

बयान के मुताबिक, इस दौरान इन प्रदर्शनकारियों ने कुछ छात्रों और शिक्षकों को परिसर में प्रवेश करने से भी रोका। साथ ही गैर प्रदर्शनकारी छात्रों के स्कूल बिल्डिंग में घुसते हुए उनसे मारपीट भी की।

यही छात्र 5 जनवरी को करीब 4:30 बजे प्रशासनिक विभाग से होते हुए उन छात्रों के कमरों की ओर चल पड़े, जो फीस बढ़ौतरी के पक्ष में थे, और अगले सेमेस्टर के लिए बढ़ी हुई फीस के साथ अपना रजिस्ट्रेशन कर रहे थे। विश्वविद्यालय द्वारा जारी बयान के अनुसार पेरियार हॉस्टल में इन छात्रों ने डंडों और रॉड से मारपीट की।

हालाँकि इस बीच पुलिस को पूरे मामले पर जानकारी दी गई। लेकिन पुलिस के घटनास्थल पर पहुँचने से पहले ही ये छात्रों का समूह अपना उत्पात मचा चुका था। कई शांत छात्रों को उनके कमरों में घुसकर मारा गया था और कई शिक्षकों पर भी हमले हुए थे। सुरक्षाकर्मियों के भी इस हमले में घायल होने की खबर है।

बता दें, अभी कुछ ही हफ्ते पहले जेएनयू में उत्पाती छात्रों ने वीसी पर भी जानलेवा हमला किया था। लेकिन उस समय पुलिस की मदद से कुलपति अपनी जान बचाकर भागने में सफल हुए थे।

3 जनवरी से सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन करने वाले आखिर कौन?

गौरतलब है कि जेएनयू में पहले से ही फीस हाइक के मामले ने तूल पकड़ा हुआ था। ऐसे में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ जामिया में हुई हिंसा के बाद जेएनयू का माहौल और गर्माया गया।

लेफ्ट हर तरह से इन मुद्दों पर अपना विरोध दर्ज करवाते हुए अपने पक्ष में भीड़ इकट्ठा करने की जुगत में था। कहा जा रहा है इसी कड़ी में लेफ्ट चाहता था कि विश्वविद्यालय के अन्य छात्र भी सेमेस्टर एग्जाम न दें और न ही अपनी रजिस्ट्रेशन फीस जमा करवाएँ। लेकिन जब अन्य छात्रों ने इनके बहकावे में आने से मना कर दिया, तो इन्होंने हिंसक रास्ता अपनाया। एबीवीपी के मुताबिक लेफ्ट के कारण ही ये पूरा मामला शुरू हुआ। जिन्होंने नए सेमेस्टर में छात्रों का रजिस्ट्रेशन बाधित करने के लिए सर्वर रूम जाकर बंद किया। ताकि इंटरनेट बंद हो जाए और छात्र रजिस्ट्रेशन न कर पाएँ।

विपक्ष के सवाल

रविवार की शाम जेएनयू में हुई शर्मनाक घटना पर कई नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तक ने पहले के जेएनयू पर अपने अनुभव साझा किए। लेकिन इसी बीच कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जेएनयू में हुई हिंसा पर निराशा जाहिर की और कहा कि यह उस डर को दिखाती है जो ‘हमारे देश को नियंत्रित कर रही फासीवादी ताकतों को ‘छात्रों से लगता है।

कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी भी हमले की खबर सुन फौरन जेएनयू परिसर में हुई हिंसा में घायल छात्रों से मुलाकात करने के लिए दिल्ली के एम्स पहुँचीं। उन्होंने ट्वीट किया, अब मोदी-शाह के गुंडे हमारे विश्वविद्यालयों में उपद्रव कर रहे हैं, हमारे बच्चों में भय फैला रहे हैं, जिन्हें बेहतर भविष्य की तैयारियों में लगे होना चाहिए… इस जख्मों को बढ़ाते हुए भाजपा नेता मीडिया में ऐसा दिखा रहे हैं कि जेएनयू में हिंसा करने वाले उनके गुंडे नहीं थे।

वहीं, स्वराज अभियान के प्रमुख योगेंद्र यादव पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर के बाहर रविवार को कथित तौर पर हमला किया गया। यादव ने कहा कि वहाँ गुंडागर्दी को रोकने के लिए कोई नहीं था और उन्हें मीडिया से बात नहीं करने दिया गया।

अरविंद केजरीवाल ने घटना पर स्तब्धता जताते हुए कहा कि अगर विश्वविद्यालयों के अंदर ही छात्र सुरक्षित नहीं रहेंगे तो देश प्रगति कैसे करेगा।  मुख्यमंत्री के ट्वीट के कुछ ही समय बाद बैजल ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि उन्होंने पुलिस को कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया है।

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने हिंसा के लिए एबीवीपी को जिम्मेदार ठहराया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जेएनयू में छात्रों और शिक्षकों पर हमले की निंदा की और इसे लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया। 

‘जामिया में पुलिस क्यों घुसी’ से लेकर ‘JNU में पुलिस क्यों नहीं गई’ तक: गिरोह विशेष का दोहरा रवैया

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वामपंथी गुंडों के हमले में कई छात्र घायल हुए। कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है कि क़रीब 500 की संख्या में नकाबपोश उपद्रवियों ने एबीवीपी के छात्रों को निशाना बनाया। हॉस्टल के कमरे को तोड़ कर छात्रों को निकाल कर पीटा गया। हालाँकि, कई सेलेब्रिटीज व वामपंथी गिरोह के सदस्यों ने उलटा एबीवीपी पर ही हिंसा का आरोप लगाया लेकिन उनकी पोल खोली गई। जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आइशा घोष हिंसक भीड़ का नेतृत्व करती हुई देखी गईं। जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी को नकाबपोशों के साथ हमले की साज़िश रचते हुए देखा गया।

सारे वीडियो, फोटो व वामपंथी गैंग के व्हाट्सप्प चैट सामने आने के बाद लगातार उनकी पोल खुलती चली गई। हाल ही में तिहाड़ से लौटे कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने बयान दिया है कि जेएनयू में हिंसा के समय पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने पूछा कि जब हिंसा हो रही थी, तब पुलिस कहाँ थी? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि उन्हें नकाबपोशों को देख कर 26/11 मुंबई हमले की याद आ गई। स्वरा भास्कर ने वीडियो बना कर लोगों को जेएनयू गेट पर पहुँचने को कहा कर पुलिस पर उदासीनता बरतने का आरोप लगाया।

याद कीजिए, ये वही लोग हैं जो कुछ दिनों पहले कह रहे थे कि जामिया में पुलिस क्यों घुसी? ये वही लोग हैं, जिन्होंने ये स्वीकार किया था कि जामिया हिंसा में ‘बाहरी लोग’ शामिल थे लेकिन जब उन्हीं ‘बाहरी लोगों’ से निपटने के लिए पुलिस कैम्पस में घुसी तो इन्हीं लोगों ने पुलिस का आत्मवश्वास गिराने के लिए उसकी निंदा की। ये वही लोग हैं, जिन्होंने जामिया कैम्पस में 700 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड मिलने की बात पर चुप्पी साध ली थी। ये वही गैंग है, जो चीख-चीख कर कह रहा था कि उपद्रवी जो भी करें, पुलिस को संयम बरतना चाहिए। आज वो पुलिस को क्यों खोज रहे हैं?

क्या पुलिस इन वामपंथियों के बयान का इंतज़ार करेगी, तब कार्रवाई करेगी? कहाँ जाना है और कहाँ नहीं जाना है, ये वरिष्ठ अधिकारियों की जगह आराम से बैठे स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप और पी चिदंबरम तय करेंगे क्या? कॉन्ग्रेस ने अपने आधिकारिक हैंडल से ट्वीट कर के पूछा कि दिल्ली पुलिस क्या कर रही थी? या वही लोग हैं, जो जामिया हिंसा के वक़्त पुलिस की उलटी-सीधी फेक तस्वीरें वायरल करके दावा कर रहे थे कि पुलिस ही आगजनी और दंगे कर रही है। क्या इनलोगों के पास पुलिस से सवाल पूछने का हक़ बचा है?

जब जामिया में पुलिस घुसती है तो ये पुलिस की निंदा करते हैं। जब जेएनयू में पुलिस नहीं जाती है, तो भी ये पुलिस की निंदा करते हैं। ऐसा दिल्ली पुलिस के साथ इसीलिए किया जाता है, क्योंकि वो गृह मंत्रालय के अंदर आती है। अमित शाह गृहमंत्री हैं और केंद्र में भाजपा की सरकार है, इसीलिए दिल्ली पुलिस को बार-बार निशाना बनाया जाता है। हिंसा की ख़बरें सामने आने के बाद जब दिल्ली पुलिस जेएनयू कैम्पस में गई, तब उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया। दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ वामपंथी छात्रों ने नारेबाजी की। क्या इसीलिए वो पुलिस को बुलाना चाहते थे?

पुलिस को घेर कर नारेबाजी करने वाले वामपंथी छात्रों के आका पूछ रहे हैं कि पुलिस क्या कर रही थी? जब यही पुलिस जामिया में सीसीटीवी फुटेज लेने जाती है ताकि निष्पक्ष जाँच हो सके, तो यही छात्र फुटेज नहीं लेने देते। जामिया प्रशासन भी सीसीटीवी फुटेज नहीं देता। पुलिस अपना काम सुचारु रूप से करें, उसके लिए उसका सहयोग करना पड़ता है। पुलिस की दिन-रात निंदा करने वालों को कोई हक़ नहीं है ये कहने का कि पुलिस जेएनयू में क्यों नहीं घुसी। और जब घुस कर पुलिस ने फ्लैग मार्च किया, तो उन्हीं छात्रों ने पुलिस के साथ बदतमीजी की।

कल को दिल्ली पुलिस जाँच करेगी, कार्रवाई करेगी और वामपंथी गुंडों के नाम सामने आते ही मीडिया उनके घर भागेगा। मीडिया ये दिखाने में व्यस्त हो जाएगा कि फलाँ आरोपित के तो माँ-बाप ही ग़रीब हैं, वो भला शॉल में पत्थर छिपा कर छात्रों पर हमला कैसे कर सकता है? आरोपितों के टूटे-फूटे घरों को दिखाया जाएगा, लड़कियों पर हमला करने वाला पढ़ाई में कितना तेज़ था, ये दिखाया जाएगा। तब भी पुलिस की निंदा होगी। वही लोग करेंगे, जो आज पूछ रहे हैं कि पुलिस कहाँ है?

पुलिस तो जेएनयू में लगे देशद्रोही नारों की जाँच भी कर रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि दिल्ली सरकार उन छात्रों को बचाने में लगी हुई है, जिन्होंने देश के टुकड़े करने के नारे लगाए। जिन्होंने आतंकी अफजल गुरु के पक्ष में नारे लगाए। शाह ने पूछा कि केजरीवाल सरकार उन्हें क्यों बचा रही है? क्या दिल्ली सरकार दिल्ली पुलिस के काम में बाधा नहीं पहुँचा रही? यही अरविन्द केजरीवाल का ये बयान आता है कि पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए। पुलिस कैसे कार्रवाई करेगी जब सरकार उसके काम में टाँग अड़ाएगी? अंत में हर हाल में पुलिस की फिर से निंदा की जाएगी।

दिल्ली पुलिस के सामने पत्रकारों के साथ बदतमीजी की गई। ‘आजतक’ के कैमरामैन के साथ धक्का-मुक्की की गई। ‘रिपब्लिक’ के पत्रकार के साथ मारपीट की गई। जब ये सब हुआ, तब पुलिस भी वहीं पर मौजूद थी। छात्रों को आगे कर के वामपंथी अपने एजेंडा चला रहे हैं, ऐसे में दिल्ली पुलिस क्या करेगी? पुलिस के साथ सहयोग नहीं किया जा रहा। बाहर वामपंथी नेता व सेलेब्रिटी पुलिस की निंदा कर रहे हैं, कैम्पस के अंदर वामपंथी छात्र पुलिस के साथ बदतमीजी कर रहे हैं। ऐसे में ठाकरे, केजरीवाल, स्वरा, चिदंबरम और कश्यप के बयान महज प्रोपेगंडा भर हैं।

जिस तरह से एक एबीवीपी की छात्रा की वेशभूषा में वामपंथियों ने हमले किए, जिससे ये प्रतीत हो कि एबीवीपी ही हिंसा कर रहे हैं- इससे पता चलता है कि साज़िश गहरी थी। हो सकता है कि फिर से पुलिस को सीसीटीवी फुटेज की जाँच करने में बाधा पहुँचाई जाए। ऐसा फिर से हो सकता है कि वामपंथी आरोपितों के गिरफ़्तार होते ही उनके घर-परिवार जाकर मीडिया दिखाए कि वो निर्दोष हैं। इसीलिए, दिल्ली पुलिस को बेवजह इन सबमें फँसाया जा रहा है। ये ‘अमित शाह की पुलिस’ है, इसीलिए इसे बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

आमिर हमजा खान जामिया मेट्रो स्टेशन पर पिस्टल और 5 जिंदा कारतूस के साथ पकड़ा गया

विभिन्न प्रदर्शनों और घटनाओं को लेकर पूरी दिल्ली इस वक्त हाई अलर्ट पर है। इस बीच जामिया के पास एक शख्स पिस्टल के साथ गिरफ्तार हुआ है। शख्स को जामिया मेट्रो स्टेशन से गिरफ्तार किया गया है। दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया मेट्रो स्टेशन से 34 वर्षीय आमिर हमजा खान नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बताया कि आमिर दिल्ली के जाकिर नगर का रहने वाला है। उसे सीआईएसएफ द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया मेट्रो स्टेशन के फ्रिस्किंग पॉइंट पर एक पिस्टल और 5 जिंदा कारतूस के साथ गिरफ्तार किया गया है। आगे की तफ्तीश जारी है।

बता दें कि रविवार (जनवरी 5, 2019) को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई हिंसा में जामिया मिलिया इस्लामिया से भी लोगों के आने की बात सामने आ रही है। बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने भी कहा कि वो जेएनयू के कुछ छात्रों से मिली थी। जिसमें से कई छात्रों ने उन्हें बताया कि कुछ लोग जामिया से भी जेएनयू आए थे। जेएनयू हिंसा में जामिया कनेक्शन की बात सामने आने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया मेट्रो स्टेशन पर हथियारों से लैस युवक का इस तरह से गिरफ्तार होना बहुत कुछ संकेत देता है। हालाँकि फिलहाल इस पर कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है। पुलिस की जाँच के बाद ही चीजें स्पष्ट होकर आएँगी। 

बता दें कि रविवार को मास्क पहने गुंडों ने हॉस्टल में जम कर पत्थरबाजी भी की। उन्होंने छात्रों के साथ-साथ गार्डों को भी निशाना बनाया। मीनाक्षी लेखी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्होंने कुछ लड़कियों से बात की है। छात्राओं ने उन्हें बताया कि वो लोग मैनुअली रजिस्ट्रेशन करवाने जा रहे थीं तो उनके हिप और प्राइवेट पार्ट्स पर लाठी-डंडों से हमला किया गया। इतना ही नहीं, कई छात्राओं को बाथरूम में ले जाकर उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया। इसके साथ ही जेएनयू कैम्पस में दिल्ली पुलिस के फ्लैग मार्च करने के दौरान ‘दिल्ली पुलिस, गो बैक’ के नारे भी लगे।

JNU हिंसा का इंटरनेशनल कनेक्शन, घायल छात्रा ने खोली पोल: शॉल में पत्थर छिपाए दंगाइयों ने मचाया आतंक

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वामपंथियों ने जो 8 घंटे का आतंक मचाया, उसके बारे में काफ़ी बातें निकल कर सामने आ रही हैं। अब इस पूरी साज़िश का इंटरनेशनल कनेक्शन निकल कर सामने आ रहा है। जहाँ मीडिया का एक बड़ा वर्ग वामपंथी दंगाइयों की इस करतूत को छिपाने में लगा हुआ है, ऑपइंडिया ने कुछ प्रत्यक्षदर्शियों से बातें की, जिन्होंने आँखों-देखी सुनाई। इस पूरे घटनाक्रम के पीड़ित लोगों से बात करने के बाद ये स्पष्ट हो जाता है कि जेएनयू में अध्ययन, अकादमिक कैलेण्डर और पठन-पाठन के कार्यों को रोकने के लिए ऐसा किया गया। पीड़ितों में एक नाम वेलेंटिना ब्रह्मा का भी है।

वेलेंटिना जेएनयू की छात्रा हैं, जो वामपंथियों के आतंक का शिकार बनीं। उन्हें काफ़ी चोटें आई हैं और उनके साथ बदतमीजी भी की गई। कई घटों तक चले उस भयावह दौर से गुजरीं वेलेंटिना ने ऑपइंडिया से बातें करते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि इस वारदात की शुरुआत रविवार (जनवरी 5, 2020) को ही हो गई थी, जब वामपंथी छात्रों ने रजिस्ट्रेशन के लिए गए छात्रों पर हमला किया। दरअसल, वामपंथी छात्र नहीं चाहते थे कि कोई भी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा ले। इसीलिए, उन्होंने वहाँ मौजूद बाकी छात्रों पर हमला बोल दिया। उस दौरान उनके हाथों में डंडे थे।

वेलेंटिना ने बताया कि जब वो दोपहर को रजिस्ट्रेशन कराने पहुँचीं तो वहाँ दोनों गुट के लोग खड़े थे। एबीवीपी के छात्र व अन्य छात्र रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा लेने गए थे, वहीं वामपंथी उन्हें रोक रहे थे। वेलेंटिना ने बताया कि जब वो वहाँ खड़ी थीं, तभी वामपंथी छात्रों का एक बड़ा दल आया और उन्होंने रजिस्ट्रेशन के लिए आए छात्रों पर हमला बोल दिया। उस भीड़ में शामिल एक छात्रा ने वेलेंटिना पर हमला बोल दिया। उसके हाथ में डंडा था। उसने वेलेंटिना को थप्पड़ मारा और उनके साथ बदतमीजी की। उसने वेलेंटिना के साथ धक्का-मुक्की भी की। जब वेलेंटिना ने उसे ऐसा करने से मना किया तो उसने उन्हें पीटना शुरू कर दिया।

इसके बाद कुछ अन्य छात्र आए, जिन्होंने किसी तरह वेलेंटिना को दंगाई छात्रा के चंगुल से निकाला और उन्हें पेरियार हॉस्टल लेकर गए। वामपंथी गुंडों से बचने के लिए वेलेंटिना और उनके साथ के अन्य छात्र-छात्राओं ने बचने के लिए एक कमरे में पनाह ली। तभी अचानक से 30 वामपंथी छात्रों ने उस कमरे के दरवाजे को तोड़ना शुरू कर दिया। उन सभी ने मास्क पहन रखी थी। उनके हाथों में डंडे थे। वेलेंटिना ने बताया कि दरवाजा न खोलने पर उपद्रवियों ने दरवाजे को तोड़ डाला। हॉस्टल रूम के दरवाजे को तोड़ कर छात्रों पर हमला बोल दिया गया।

उनमें से कुछ उपद्रवियों ने शॉल ओढ़ रखी थी, जिसके अंदर उन्होंने पत्थर छिपा रखे थे। डंडों और पत्थरों से छात्रों पर हमला बोल दिया गया। एबीवीपी के छात्र नेता मनीष को उपद्रवियों ने पीटना शुरू कर दिया। वेलेंटिना ने एक अन्य साथी छात्रा के साथ वहाँ से निकलने का प्रयास किया। एक छात्र को उपद्रवियों ने डंडे से इतना मारा कि वो बिस्तर से नीचे गिर गया। वेलेंटिना एक साथी छात्रा और 2 अन्य छात्रों के साथ पिछले दरवाजे से भागने की कोशिश की। वहाँ भी उपद्रवियों ने पीड़ित छात्रों पर डंडे से हमला किया। वेलेंटिना ने बताया कि वहाँ हॉस्टल प्रशासन के लोग और कुछ पुलिसकर्मी भी थे लेकिन किसी ने भी बचाने का प्रयास नहीं किया। वारदात के बारे में वेलेंटिना ने आगे बताया:

“हॉस्टल प्रशासन के लोगों ने हमसे छिपने को कहा। उपद्रवी शॉल में से पत्थर निकाल कर छात्रों की पिटाई कर रहे थे। कुल 30 लोग हमारे कमरे में घुसे थे। क़रीब 50 लोग बाहर मौजूद थे। मेस में भी छात्रों की पिटाई की गई। उपद्रवियों की कुल संख्या 200 के क़रीब थी। मेरे हाथ पर वार किया गया। मेरी पीठ पर चोटें आई हैं। कई अन्य जगहों पर भी एबीवीपी उपद्रवी छात्रों की पिटाई कर रहे थे। कई छात्र-छात्राओं के परिजन भी तनाव में हैं। हमारी साथी शाम्भावी के परिजन भी आकर उन्हें ले गए। शाम्भवी को भी काफ़ी चोटें आई हैं। एबीवीपी के छात्रों के कमरे में घुस कर उन्हें बेरहमी से पीटा गया।”

इस दौरान वेलेंटिना ने कुछ ऐसी जानकारियाँ भी दी, जो इस साज़िश के गहरे होने का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि एबीवीपी से सहानुभूति रखने वाले कुछ लोगों ने ‘Unity Against Left’ नामक एक व्हाट्सप्प ग्रुप बनाया था। उस ग्रुप के ‘इनवाइट लिंक’ का इस्तेमाल कर के कुछ वामपंथी छात्र उसमें घुस गए और उन्होंने उस लिंक को चारों तरफ़ फैला दिया। उस लिंक का इस्तेमाल कर के अंतरराष्ट्रीय फोन नंबर से लोग उस ग्रुप में जुड़ने लगे। कैंपस में मार-पिटाई के दौरान एबीवीपी के कई छात्रों का फोन गिर गया था। अधिकतर के पास इंटरनेट ही नहीं था। वाईफाई नहीं चल रहा था। सभी छिपे हुए थे।

वेलेंटिना ने बताया कि इन सबके कारण उन्हें पता ही नहीं चला कि उस व्हाट्सप्प ग्रुप में क्या चल रहा है। उस ग्रुप में इंटरनेशनल नंबर से घुसे लोगों ने ऐसी बातचीत की, जिससे पता चले कि ये सारी लड़ाई एबीवीपी ने शुरू की थी और उन्होंने ही हिंसा की। अब सवाल ये उठता है कि अंतरराष्ट्रीय नंबर से ग्रुप में घुसने वाले कौन लोग थे? एबीपीबी के छात्रों का नंबर चारों तरफ फैला दिया गया। वेलेंटिना ने बताया उन्हें व उनके साथियों को विभिन्न फोन नंबरों से कॉल कर के धमकाया जा रहा है। उन्हें गालियाँ दी जा रही हैं। वामपंथियों ने ऐसा दिखाया कि ये एबीवीपी का ग्रुप है और वही लोग हिंसा कर रहे हैं।

वेलेंटिना ने जो भी बताया, उससे कई सवाल पैदा होते हैं। पहला सवाल, जब रजिस्ट्रेशन के समय ही वामपंथी दंगाइयों ने हिंसा शुरू कर दी थी, तब जेएनयू प्रशासन ने पुलिस को ख़बर क्यों नहीं कि ये स्थिति को नियंत्रित क्यों नहीं किया? जब हॉस्टल में घुस कर एबीवीपी के छात्रों को पीटा जा रहा था, तब हॉस्टल प्रशासन व गार्ड्स ने उन्हें बचाया क्यों नहीं? घटों तक चले इस आतंक के तांडव के दौरान जेएनयू ने पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी? इंटरनेशनल नंबर से एबीवीपी से जुड़े ग्रुप में कौन लोग घुस गए? वो कौन लोग हैं, जो छात्र-छात्राओं को धमकियाँ और गालियाँ दे रहे हैं?