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टूटे हाथ वाले मौलवी की तस्वीर का दूसरा पहलू: मदरसे के अंदर से पुलिस पर हुई थी गोलीबारी, तब लिया एक्शन

सोशल मीडिया में एक तस्वीर बड़ी तेज़ी से वायरल हो रही है। इस तस्वीर में 72 वर्षीय शिया मौलवी असद रज़ा हुसैनी के एक हाथ पर प्लास्टर चढ़ा हुआ है और शरीर पर घाव के निशान हैं। दरअसल, इस तस्वीर का संबंध 20 दिसंबर को नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हुए विरोध-प्रदर्शन से है। इस तस्वीर के लिए मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस की कार्रवाई को ‘ज़्यादती’ कहते हुए इसकी कड़ी निंदा की जा रही है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, विरोध-प्रदर्शन के दौरान केवल असद रज़ा हुसैनी ही नहीं, बल्कि उनके मदरसा-सह-अनाथालय के छात्र भी पुलिस की कार्रवाई में घायल हुए थे। उनमें से 11 को जेल भेज दिया गया। सम्पर्क करने पर, स्थानीय पुलिस ने आरोपों का खंडन किया और कहा कि वे हिंसक उपद्रवियों का पीछा करते हुए परिसर में प्रवेश किए थे।

मुज़फ़्फ़रनगर के मिनाक्षी चौक के पास 20 दिसंबर को झड़प के दौरान एक मदरसे के प्रिंसिपल और एक अनाथालय के प्रभारी हुसैनी को मदरसा के 40 छात्रों के साथ पुलिस ने कथित तौर पर हिरासत में लिया था।

एक तरफ़, मौलवी के परिवार ने ख़ुद को मीडिया से दूर कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ़ अनाथालय के कर्मचारियों ने पुलिस के ख़िलाफ़ झूठा नैरेटिव तैयार किया। मद्रास-अनाथालय में काम करने वाले एक कर्मचारी नईम ने कहा, “कम से कम 200 पुलिसकर्मियों की एक टुकड़ी ने जबरन परिसर में प्रवेश किया। उन्होंने अपने रास्ते में आने वाले सभी लोगों पर हमला किया और नाबालिग बच्चों को भी नहीं छोड़ा।”

इतना ही नहीं यह भी कहा गया कि पुलिस की टीम ने अनाथालय में मौजूद 9 वर्ष तक के नाबालिगों को लाठियों से पीटा। इनमें से कुछ के शरीर में फ्रैक्चर भी हो गया। नईम का कहना है कि हुसैनी ने हमेशा स्थानीय राजनीति से दूरी बनाए रखी, और अपना जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया। पुलिस उन्हें परिसर से बाहर घसीटा गया था, फिर एक जगह पर ले गई जहाँ उनकी पिटाई की।

लेकिन मीडिया गिरोह, एक खास वर्ग और CAA की आड़ में विरोध प्रदर्शन के नाम पर दंगा करने वालों की पोल खोल देती है पुलिस। मुज़फ़्फ़रनगर के एसपी सतपाल अंतिल ने बताया, “मीनाक्षी चौक और महावीर चौक के बीच कम से कम 50,000 लोगों की भीड़ थी, जो पुलिस पर हमला कर रही थी और हिंसा और बर्बरता में लिप्त थी। जब हमने भीड़ को रोकने की कोशिश की, तो दंगाइयों एक समूह परिसर के अंदर गया और परिसर के अंदर से हम पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद हमने परिसर में प्रवेश किया और फिर 70 लोगों को गिरफ़्तार किया।”

एसपी ने दावा किया, “प्रबंधन द्वारा पहचाने गए मदरसे के सभी छात्रों को रिहा कर दिया गया है। बाद में, प्रबंधन ने मदरसे के छात्रों को जल्द रिहा करने के लिए पुलिस की प्रशंसा की थी।”

सोशल मीडिया पर घूमती इस तस्वीर पर यूपी पुलिस ने ट्विटर के माध्यम से मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस के ख़िलाफ़ झूठी अफ़वाहों और दुर्भावनापूर्ण अभियान के बारे में लोगों को सच्चाई से अवगत कराया। पुलिस ने बताया कि 20.12.2019 को मुज़फ़्फ़रनगर की घटनाओं में पुलिस कार्रवाई के कारण कोई हताहत नहीं हुआ था। बल्कि इसके उलट, दंगाइयों ने आगजनी कर वाहनों में आग लगाई, एक हिंसक भीड़ ने पुलिस पर फायरिंग की। इसके लिए FIR दर्ज की गई। फिर पुलिस ने विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर उपद्रवियों को गिरफ़्तार किया।

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मर गए 14 और बच्चे: कोटा के जेके लोन अस्पताल में टूटे हुए हैं ख़िड़की-दरवाजे, घूमते हैं सूअर

राजस्थान के कोटा के जेकेलोन अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले 5 दिनों में यहाँ 14 और बच्चों की मौत हो गई है। जिसके बाद इस अस्पताल में एक महीने के भीतर मरने वाले बच्चों की संख्या 77 से 91 पहुँच गई है। खुद, जेके लोन के नए अधीक्षक सुरेश दुलारा ने सोमवार को इसकी जानकारी देते हुए बताया कि अस्पताल के NICU और PICU में 25 दिसंबर से 29 दिसंबर के बीच 6 नवजात समेत 14 बच्चों की मौत हुई है। उन्होंने बताया कि इससे पहले 24 दिसंबर तक 77 शिशुओं की यहाँ मौत हुई थी और इनमें से 10 शिशुओं की मौत 23 दिसंबर और 24 दिसंबर को 48 घंटे के भीतर हुई थी।

बाल रोग विभाग के प्रमुख ने इस संबंध में कहा कि वह 25 दिसंबर तक 77 शिशुओं की मौत के पीछे के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं। बाद में जिन 14 शिशुओं की मौत हुई, उनमें से 4 की मौत गंभीर निमोनिया, 1 की मौत मेनिंगोएनसेफेलाइटिस, 4 की मौत जन्मजात निमोनिया, 3 की मौत सेप्सिस और 1 की मौत सांस संबंधी बीमारी के कारण हुई।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण (NCPCR) ने भी लिया संज्ञान

गौरतलब है कि अस्पताल में नवजात बच्चों की लगातार हो रही मौत पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण (NCPCR) ने भी संज्ञान लिया है। NCPCR के अध्यक्ष ने अस्पताल में हालातों को मुआएना करने के बाद कोटा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को तलब कर राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, NCPCR के अधिकारियों ने बताया कि आयोग ने कोटा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) बीएस तंवर को 3 जनवरी तक पेश होने को कहा है। वहींं, राज्य के चिकिस्ता शिक्षा विभाग के सचिव वैभव गालरिया को भी कारण बताओ नोटस जारी कर 3 दिन के अंदर इस मामले की रिपोर्ट आयोग को सौंपने के लिए कहा गया है।

यहाँ बता दें कि NCPCR की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को बरती जा रही लापरवाही बच्चों की होतीं मौत का एक अहम कारण है। अपनी रिपोर्ट में NCPCR ने बताया है कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं, दरवाजे टूटे हुए हैं, जिस कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। इसके अलावा अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते पाए गए।

बच्चों की होती लगातार मौत पर भाजपा सख्त

राजस्थान सरकार एक ओर जहाँ इन मौतों को पिछले सालों के मुकाबले सबसे कम बताकर दरकिनार करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्षी पार्टी भाजपा ने इस पर अपना कड़ा रुख अख्तियार किया हुआ है। इसके मद्देनजर बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जाँच के लिए 4 सांसदों का एक पैनल बनाकर उन्हें 3 दिन में अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इस पैनल में लोकसभा सांसद जसकौर मीणा, लॉकेट चटर्जी, भारती पवार और राज्यसभा सांसद कांता कर्दम शामिल हैं। अब यह टीम मंगलवार को यानी आज अस्पताल का दौरा करेगी और बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा को इसकी रिपोर्ट सौंपेगी।

इसके अलावा, नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शीर्ष नेता एवं राजस्थान में भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया ने रविवार को अचानक अस्पताल का निरीक्षण कर पहले ही दावा किया है कि अस्पताल में मासूम बच्चों को साफ हवा के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। यही नहीं, बीजेपी नेता का कहना है कि अव्यवस्था के बीच गंभीर बीमारियों से जूझते इन बच्चों की देखभाल के लिए नर्स नहीं, बल्कि उनकी माँ खड़ी रहती हैं।

‘अगस्त में बच्चे मरते ही हैं’ और ‘बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं’ के बीच मीडिया की नंगी सच्चाई

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कानून से खेलो, हिंदुत्व की कब्र खोदो… क्योंकि वे जब आएँगे सारे गुनाह दफन हो जाएँगे

बिजनौर के 22 साल के सुलेमान के पीठ पर किसने हाथ रखी होगी कि उसने कॉन्स्टेबल मोहित के पेट में गोली मार दी? मेरठ की उस गली में लौंडों को किसने इशारा किया कि वे सिटी SP अखिलेश नारायण सिंह के सामने भी देश विरोधी नारे लगाने से नहीं डरे? वह कौन है जिसके कहने पर आतंकियों की आपा लदीदा फरज़ाना और आयशा रेना को विरोध का चेहरा बनाने की साजिश रची गई ? जामिया और अलगीढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हिंदुत्व की कब्र खुदेगी’ से लेकर ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारों का हुक्म किसका था? किसकी शह पर आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को वह हिटलर कह निकल जाता है? देश के गृह मंत्री को तड़ीपार कह आपके साथ खड़े रहने की हिमाकत वह कैसे कर लेता है? आगजनी, पथराव, हिंसा का हथियार उसके हाथ कौन थमाता है? राम मंदिर में अड़ंगा डालने वाला कथित इतिहासकार संवैधानिक पद पर बैठे गवर्नर को बोलने से रोकने की ढिठाई कैसे कर लेता है?

इनके लिए न तो संविधान का कोई मतलब है और न वे इस देश के कानून को मानते हैं। उन्हें पता है कि उनके पीछे एक पूरा गिरोह है। लंपट कॉन्ग्रेसियों, नीच वामपंथियों, वहाबियों, ईसाई मिशनरियों, भीमटों का गिरोह। सीमा पार से समर्थन। ये जानते हैं कि अलग-अलग वेश, नारों और झंडों से यह गिरोह बहुसंख्यकों को छलेगा। सत्ता में लौटेगा। तब उनकी पीठ सहलाई जाएगी, हर उस मौके के लिए जब उन्होंने संविधान और कानून को ठेंगा दिखाया होगा।

झारखंड में रविवार (29 दिसंबर 2019) को हेमंत सोरेन के नेतृत्व में नई सरकार बनी। कैबिनेट का पहला फैसला था- पत्थलगड़ी में शामिल लोगों पर दर्ज FIR वापस होगा। वैसे तो पत्थलगड़ी आदिवासियों की एक प्राचीन परंपरा है। अमूमन इसके जरिए मौजा, सीमा, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी दी जाती है। वंशावली, पुरखों और शहीदों की याद में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है। लेकिन, 2017 में आदिवासियों की इस परंपरा की आड़ में देश के संविधान और कानून को चुनौती देने का सिलसिला झारखंड से शुरू हुआ था जो पड़ोसी छत्तीसगढ़ तक भी पहुॅंचा। इस दौरान हिंसा, हत्या, रेप, अपहरण जैसी घटनाएँ अंजाम दी गई। एक चुनी हुई सरकार को, देश के कानून को सीधे-सीधे चुनौती दी गई। जॉंच से यह तथ्य भी सामने आए कि इसके पीछे पूरा गिरोह, खासकर ईसाई मिशनरियॉं थी। कायदे से तो इस मामले की सुनवाई अदालतों में होनी चाहिए थी। अदालतों को तय करना चाहिए था कि जिन पर एफआईआर दर्ज हैं, वे दोषी हैं या निर्दोष। लेकिन, एक सरकार ने हिंसा के सारे सूत्रों को झटके में बेदाग कर दिया।

ऐसे में ताज्जुब नहीं होता है कि नतीजों के तुरंत बाद भावी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची के पुरुलिया रोड स्थित कार्डिनल हाउस पहुॅंचते हैं। आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो से आशीर्वाद लेते हैं। आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो खुलकर कहते हैं- हम सब भाजपा से डरे हुए थे। नई सरकार क्रिसमस गिफ्ट है। यहॉं तक कि सत्ता से भाजपा की विदाई के लिए बीते पॉंच साल से चर्चों में एक विशेष प्रेयर तक हो रहा था। एक धर्मगुरु और गैर कानूनी धर्मांतरण का धंधा चलानी वाली मिशनरीज यह सब करने और कहने की हिम्मत केवल इसलिए जुटा पाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक सरकार आएगी और उनके हर गुनाह दफ़न कर देगी।

फरवरी 2016 में जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगते हैं। इस मामले में 14 जनवरी 2019 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल 1,200 पन्नों की चार्जशीट दायर करती है। जेएनयू छात्र संघ का पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद मुख्य आरोपित है। शेहला रशीद, वामपंथी नेता डी राजा की बेटी अपराजिता, आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन सहित 36 छात्र आरोपित हैं। लेकिन, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार इस मामले में केस चलाने की इजाजत ही नहीं दे रही है। सुरक्षा की यही गारंटी कन्हैया कुमार से लेकर शेहला रशीद तक को देश भर में घूम-घूमकर प्रोपेगेंडा फैलाने की इजाजत देता है। कभी सेना के नाम पर झूठे आरोप लगाने तो कभी आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने की आजादी देता है। इन्हें पता है कि पीठ पर हाथ सहलाने के लिए गिरोह पीछे खड़ा है। मौका मिलते ही उनके दाग भी धो देगा।

महाराष्ट्र में भी अर्बन नक्सलों को क्लीनचिट देने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। महाविकास अघाड़ी की सरकार बनते ही एनसीपी विधायक जितेंद्र आव्हाड ने सुधीर धावले को जेल से रिहा करने की सिफारिश मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से की। भीमा-कोरेगाँव मामले में दर्ज मामले वापस लेने की मॉंग की। जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा का धावले मास्टरमाइंड माना जाता है। यदि आने वाले दिनों में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर धावले से लेकर सुधा भारद्वाज तक देश के किसी कोने में फिर से चुनी हुई सरकार के खिलाफ हिंसा की साजिश रचते दिखें तो चौंकिएगा मत।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हिंसा करने वालों को भी बचाने का खेल पहले दिन से ही चल रहा है। छात्रों का हवाला दे सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। प्रियंका गॉंधी सार्वजनिक तौर पर उस पुलिस को अराजक बता रही हैं जो दंगाइयों के निशाने पर थे। उस पर धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करने का आरोप लगा रही हैं।

प्रियंका गॉंधी ने ऐसे ही नहीं कह दिया कि यह भगवा आपका नहीं है। जब वे ऐसा कह रही होती हैं, तब उन्हें पता होता है कि छलना ही आपकी नियति है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब उनके सामने ही हेमंत सोरेन ने कहा था- गेरुआ पहन बहू-बेटियों की इज्जत लूटने का काम करते हैं। उनकी आँखों ने उस भीड़ में बैठकर इस बात पर आपको भी ताली पीटते देखा था। जबरन धर्मांतरण रुकवाने वाली सरकार को सत्ता से बेदखल करते भी उन्होंने आपको देखा है। वे जानती हैं जब वे लौटेंगी तो भगवा आतंकवाद गढ़कर हिंसक भीड़ का मजहब छिपा लेंगी और आप लिबरल दिखने के लिए ताली पीटते रहेंगे।

वक़्त है चेत जाने का। अपनी आवाज खुद बनने का। मीडिया के भरोसे आप बैठे नहीं रह सकते। यह मीडिया उनका ही पाला-पोसा है। यह मीडिया ‘मेरा गला दबाया’ के उनके झूठे आरोपों पर बवाल काटता है। लेकिन, आपको नहीं बताता कि झूठ बोल रही नेता की सुरक्षा में लगी लेडी अफसर के साथ बदतमीजी हुई थी। वह नहीं बताता है कि वह अधिकारी इतनी कत्वर्यनिष्ठ है कि भाई की मौत होने के बाद भी अपनी ड्यूटी निभा रही थी। यह मीडिया प्राइम टाइम में चुन-चुन कर आपको फ्रेम दिखाता है ताकि मजहबी भीड़ पीड़ित दिख सके। वह सुलेमान के यूपीएसएसी की तैयारी करने की स्टोरी बुनता है ताकि उसके हाथ का कट्टा छिप जाए।

इसलिए नहीं चेते तो 2020 भी किसी 20-20 मैच की तरह हाथ से फिसल जाएगा। वक्त ड्रेसिंग रूम में बैठकर अफसोस करने का नहीं, खुद की आवाज बनने का है।

कहानी एक अब्दुल की जिसे टीवी एंकर दंगाई बनाता है… उसकी मौत से फायदा किसको?

इस उन्माद, मजहबी नारों के पीछे साजिश गहरी… क्योंकि CAA से न जयंती का लेना है और न जोया का देना

कत्लेआम और 1 लाख हिन्दुओं को घर से भगाने वाले का समर्थन: जामिया की Shero और बरखा दत्त की हकीकत

पहली बार J&K में देश भर के लोगों के लिए निकली वैकेंसी, जानिए नौकरी के लिए कैसे करें आवेदन

जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन के बाद देश को दो नए केंद्र शासित प्रदेश मिले। जम्मू कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा भी नहीं रहा। ऐसा अनुछेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने से संभव हो सका। इसका सबसे बड़ा फायदा ये होने वाला है कि अब देश भर के लोग जम्मू कश्मीर में विभिन्न नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते हैं। राज्य में 33 नॉन-गजटेड पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। ख़ास बात ये है कि पहले की तरह अब सिर्फ़ जम्मू कश्मीर के ही लोग इसके पात्र नहीं हैं बल्कि पूरे भारत से कोई भी आवेदन कर सकता है।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद ये पहली बार है, जब जम्मू कश्मीर में वैकेंसी निकली है। पहले इन पदों पर पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य के ‘स्थायी निवासी’ ही बहाल किए जाते थे। स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट और ड्राइवर सहित कई पदों पर वैकेंसी निकली है। आवेदक विभिन्न पदों के लिए अलग-अलग आवेदन भी कर सकते हैं। वहीं जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए जो पद आरक्षित हैं, उन्हें ‘स्थायी निवासियों’ के लिए रखा गया है।

कुल 33 पदों में से 17 ‘ओपन मेरिट’ कैटेगरी में आते हैं। अर्थात, इन 17 पदों पर जम्मू कश्मीर के बाहर के लोग (भारत के अन्य हिस्सों के लोग) भी आवेदन कर सकते हैं। हालाँकि, भाजपा की स्थानीय यूनिट ने दिल्ली आलाकमान से कहा है कि स्थानीय लोगों को नौकरियों में कुछ ख़ास छूट दी जाए। जम्मू कश्मीर भाजपा का कहना है कि जिन लोगों ने राज्य में 15-20 वर्षों तक निवास किया हो, उन्हें ही ‘स्थायी निवासी’ की पात्रता दी जाए। पार्टी का कहना है केंद्र सरकार सिर्फ़ एससी, एसटी और ओबीसी के लिए ही नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर के सभी नागरिकों के लिए आरक्षण की घोषणा करे।

जम्मू कश्मीर और लद्दाख के लोगों को स्थानीय मुख्य डिस्ट्रिक्ट जज को आवेदन देना होगा। जबकि, दोनों केंद्र शासित प्रदेशों के बाहर के लोगों को इन आवेदनों को जम्मू हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को सबमिट करना होगा। आवेदन की आखिरी तारीख दिसंबर 31, 2019 है। भर्ती से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं। इस नोटिफिकेशन में भी आपको इसकी पूरी जानकारी मिल जाएगा।

CAA दंगा: नाबालिग बता कर बचना चाह रहा था सीमापुरी हिंसा का आरोपित, जाँच के बाद कोर्ट में खुली पोल

सीमापुरी हिंसा मामले में ख़ुद को नाबालिग बता कर बच निकलने की कोशिश करने वाले व्यक्ति को कोर्ट से तगड़ा झटका मिला है। आरोपित के Ossification जाँच के बाद पता चला है कि वो नाबालिग नहीं है। इस प्रक्रिया के तहत हड्डियों के सेल्स की जाँच की जाती है, जिससे व्यक्ति की उम्र का अंदाज़ा लग जाता है। इस जाँच में पता चला है कि वो व्यक्ति नाबालिग नहीं है। इस जाँच रिपोर्ट को सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को अदालत में पेश किया गया। नाबालिग होने के आधार पर आरोपित ने जमानत की माँग की थी। फ़िलहाल 6 जनवरी तक सुनवाई स्थगित कर दी गई है।

अदालत ने आरोपित को नाबालिग नहीं माना है। अब उसकी जमानत याचिका पर अगली तारीख पर बालिग़ मान कर सुनवाई की जाएगी। इससे पहले उसे बाकि आरोपितों से अलग रखने का निर्देश दिया गया था क्योंकि उसने ख़ुद को नाबालिग बताया था। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के सीमापुरी में हुई हिंसा को लेकर अदालत ने 11 आरोपितों को पुलिस कस्टडी में भेजा था। इन सभी लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर आगजनी, हिंसा और दंगे किए थे।

सीमापुरी केस में आरोपितों पर धारा 307 (हत्या का प्रयास) का मामला भी लगाया गया है, इसीलिए इसे गंभीर मानते हुए कोर्ट ने आरोपितों को जमानत देने से इनकार कर दिया था। सीमापुरी में हुई हिंसा में एडिशनल डीसीपी रोहित राजबीर सिंह पर हमला किया गया था, जिसके बाद वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। ये वारदात शुक्रवार (दिसंबर 27, 2019) को हुई थी। हिंसा होने के बाद उस दिन शाम से ही क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया था। पुलिस ने फ्लैग मार्च कर के स्थिति को सम्भाला था।

पूरे नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में विभिन्न शांति समितियों और दोनों समुदायों के प्रबुद्ध जनों से बातचीत कर स्थिति को सम्भाला गया था। सीएए विरोधियों ने न सिर्फ़ सीमापुरी, बल्कि दरियागंज में भी पुलिस पर हमला कर दिया था।

दरियागंज में भी काफ़ी हिंसा भड़क गई थी। वहाँ से पुलिस ने 15 आरोपितों को गिरफ़्तार किया था, जिन्होंने पुलिस पर पत्थरबाजी की थी और आगजनी की थी। इस मामले में 9 आरोपितों ने जमानत याचिका दाखिल की थी, जिसका दिल्ली पुलिस ने विरोध किया था। दिल्ली पुलिस ने बताया है कि उसके पास 19 गवाह हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी आरोपित पुलिस के ख़िलाफ़ हुई हिंसा में संलग्न थे और मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद थे। दिसंबर 23 को मजिस्ट्रेट द्वारा बेल दिए जाने से इनकार करने के बाद सभी आरोपित सेशन कोर्ट पहुँचे थे। एक आरोपित ने ख़ुद को कोर्ट में नाबालिग बताया था लेकिन पुलिस को उसने अपनी उम्र 23 साल बताई थी।

BREAKING: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर में लगी आग, दमकल विभाग की 9 गाड़ियाँ मौके पर मौजूद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवासीय परिसर में आग लगने की ख़बर आई है। प्रधानमंत्री का आवास लोक कल्याण मार्ग में स्थित है। मौके पर 9 दमकल गाड़ियाँ मौजूद हैं। अभी तक आग लगने के पीछे के कारणों का पता नहीं चल सका है। सेंट्रल दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में स्थित लोक कल्याण मार्ग को पहले रेस कोर्स रोड के नाम से जाना जाता था। अभी तक किसी के फँसे होने ये कुछ नुक़सान होने की सूचना नहीं है।

ख़बर है कि जैसे ही आग लगी, तुरंत फायर अलार्म बज गया। इसके बाद अग्निशमन विभाग एक्टिव हो गया और दमकलकर्मियों के दस्ते वहाँ पहुँच गए। खबर आ रही है कि इलेक्ट्रिक यूनिट के कारण आग लगी।

राजस्थान के किसानों पर टूटा पाकिस्तानी टिड्डियों का कहर: CM गहलोत ने कहा- मोदी जिम्मेदार

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जब धनाऊ, रामगढ़ और सांचौर के किसानों के साथ बातचीत की तो वो सभी रो पड़े। किसानों की आँखों में आँसू छलक गए। मुख्यमंत्री गहलोत के सामने ही किसानों ने सरकार की नाकामी बखान कर दी। पाकिस्तान से आए टिड्डियों ने इन किसानों की फ़सल को भारी क्षति पहुँचाई है। सरकार का ‘टिड्डी नियंत्रण दल’ भी पूरी तरह विफल साबित हुआ है। किसानों ने कहा कि टिड्डियों के हमले के कारण वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनके घर में खाने के लिए रोटी तक नहीं बचा है।

हालाँकि, मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि सरकार सहायता करेगी लेकिन टिड्डियों के नियंत्रण में विफल रहने वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अभी तक एक भी किसान को मुआवजा भी नहीं दिया है। किसानों ने बताया कि उन्होंने पिछले 5 सालों में जितनी कमाई थी, उससे ज्यादा मात्र 1 साल में बर्बाद हो गया। जैसलमेर, बाड़मेर और सिरोही में पाकिस्तान से आए टिड्डियों ने भारी तबाही मचाई है। कर्जमाफी का वादा पूरा न किए जाने से किसान पहले से ही बेहाल है। कॉन्ग्रेस ने चुनावों से पहले कर्जमाफी का वादा किया था लेकिन किसी भी राज्य में उसकी सरकार ने अब तक कर्जमाफी नहीं की है।

गहलोत सरकार अभी भी जाँच कराने और रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई किए जाने की बातें कर रही है। मुख्यमंत्री ने ‘टिड्डी नियंत्रण दल’ के साथ बैठक के बाद कहा कि जिन किसानों ने बीमा करा रखा है, उन्हें बीमा कम्पनी से मुआवजा दिलाया जाएगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी माना कि टिड्डियाँ पूरी की पूरी फसल चट कर गई हैं। हालाँकि, उन्होंने इसके लिए मोदी सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। सीएम गहलोत ने कहा कि अगर केंद्र पाकिस्तान से संवाद कर के टिड्डी नियंत्रण का उपाय करता तो ऐसी नौबत आती ही नहीं।

राजस्थान के खेतों में इस साल सबसे पहले जुलाई में टिड्डियों ने हमला किया था। इसके बाद से लगातार टिड्डियों का हमला बढ़ गया और किसान बर्बाद होते चले गए। किसानों का कहना है कि अब तक सरकार ने उनकी मदद नहीं की है। उधर मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

आर्टिकल 370 हटने के बाद हिरासत में लिए गए 5 कश्मीरी नेता हुए रिहा, हालातों में सुधार

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्क्रिय हो जाने के बाद सुरक्षा लिहाज से गिरफ्तार किए गए 5 और नेताओं को आज लगभग 5 महीने बाद रिहा कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिहा किए गए नेताओं में पीडीपी के 2 पूर्व विधायक जहूर मीर और यासिर रेशी, नेशनल कॉन्फ्रेंस के 2 पूर्व विधायक इश्फाक जब्बार, गुलाब नबी और 1 कॉन्ग्रेस विधायक बशीर मीर शामिल हैं।

बता दें इन पाँचों नेताओं को 370 हटाए जाने के बाद हिरासत में लिया गया था। इनसे पहले 25 नवंबर को पीडीपी के दिलावर मीर और डेमोक्रैटिक पार्टी नैशनलिस्ट के गुलाम हसन मीर को रिहा किया जा चुका है।

उल्लेखनीय है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती अभी भी हिरासत में हैं। केंद्र ने उनकी रिहाई के लिए कोई निश्चित तारीख नहीं बताई।

बता दें, जम्मू-कश्मीर में जैसे-जैसे स्थिति सामन्य हो रही है, प्रशासन भी ढिलाई बरतने लगा है। जिन नेताओं को संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया था कि वे मौक़े का फायदा उठाकर लोगों को भड़का सकते हैं, उन्हें अब राज्य में शांति देखकर छोड़ा जा रहा है।

इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होने पर कानून व्यवस्था के लिए तैनात अर्द्धसैनिक बलों की 52 और कंपनियाँ रविवार को कश्मीर घाटी से वापस भेज दी गईं। जिससे पहले 24 दिसंबर को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में 5 अगस्त के बाद बने हालात की समीक्षा की गई थी। बैठक में तत्काल प्रभाव से केंद्रीय सशस्त्र बलों की 72 कंपनियों को घाटी से हटाने का फैसला किया गया था। इसमें सीआरपीएफ की 24, बीएसएफ की 12, आईटीबीपी की 12, सीआईएसएफ की 12 और एसएसबी की 12 कंपनियां शामिल थीं।

ट्रेन में स्टंट करते हुए टक्कर लगने से दिलशान की मौत: रेल मंत्रालय ने Video जारी कर दी चेतावनी

पिछले कुछ समय में टिकटॉक के आ जाने के बाद से अलग-अलग तरह की वीडियो बनाने के लिए सड़कों पर लोग तरह-तरह के स्टंट करते नजर आते हैं। इसी कारण कई बार वो जोखिम उठा लेते हैं और पल भर की गलती से ही अपनी जान गवा बैठते हैं। इसी कड़ी में आज रेल मंत्रालय ने एक वीडियो शेयर की है। जिसमें मुंबई की एक लोकल ट्रेन में एक युवक को स्टंट करते दिखाया गया है और जिसमें देखते ही देखते उस युवक की एक खंभे से टकराकर मौत हो गई।

रेलवे मिनिस्ट्री द्वारा ट्वीट की गई वीडियो के साथ बताया गया कि इस वीडियो में दिलशान नाम का युवक मुंबई की लोकल ट्रेन (Mumbai Local Train) के बाहर लटक कर स्टंट कर रहा था। तभी रास्ते में आए खंभे से टकराया और उसकी मौके मृत्यु हो गई। रेल मंत्रालय के मुताबिक यह घटना 26 दिसंबर को घटी।

रेल मंत्रालय ने अपने ट्वीटर हैंडल से इस वीडियो को जारी करते हुए चेतावनी दी कि इस तरह के स्टंट (Stunt) करना गैरकानूनी हैं और ये जानलेवा साबित हो सकते हैं। रेलवे ने कहा है कि अपनी सुरक्षा की अवहेलना करके ट्रेन के बाहर लटकना, चलती ट्रेन में चढ़ना, हादसे को बुलावा हो सकता है।

गौरतलब है कि ये पहली घटना नहीं है, इससे पहले अक्टूबर में वडाला रेलवे पुलिस ने एक युवक को चलती ट्रेन में खतरनाक स्टंट दिखाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के कोरबा में जिले में भी एक शख्स और उसके दोस्त को टिक-टॉक वीडियो के चक्कर में सीआरपीएफ ने गिरफ्तार किया था। इनपर आरोप था कि ये लड़के चलती ट्रेन में स्टंट करते हुए वीडियो बना रहे थे।

वहीं, इसी वर्ष जुलाई में बिहार के 18 साल के इस युवक के लिए टिकटॉक वीडियो बनाना जानलेवा साबित हुआ था। जहाँ वीडियो बनाने में मशगूल युवक को यह तक पता नहीं चला कि ट्रेन एकदम करीब आ गई है और जब तक वह संभलता, तब तक ट्रेन के झटके से उसकी मौके पर ही उसकी मौत हो गई।

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जाँँच से पहले कार्रवाई क्यों? CAA हिंसा पर ‘दंगाइयों’ के समर्थन में आईं प्रियंका गांधी

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर दंगा करने उतरे दंगाइयों का समर्थन करते हुए कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने आज योगी सरकार पर निशाना साधा। लखनऊ के कॉन्ग्रेस मुख्यालय में सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को प्रियंका गाँधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार, प्रशासन और पुलिस द्वारा कई जगह अराजकता फैली है। जिसके मद्देनजर उन्होंने (कॉन्ग्रेस) राज्यपाल को पत्र भी लिखा है। प्रियंका का मानना है कि प्रदेश में कार्रवाई के नाम पर उठाए गए कदमों का कोई लीगल आधार नहीं है। उनका कहना है कि प्रदेश की इस वक्त पुलिस केवल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बदला’ लेने वाले बयान पर काम कर रही है।

कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इस मौक़े पर उपद्रवियों पर हो रही कार्रवाई के ख़िलाफ़ बोला, “हिंसा किसने शुरू की, इसकी जाँच होनी चाहिए, क्योंकि कौन जानता है कि आगजनी किसने शुरू की। आप बिना जाँच के कैसे कार्रवाई कर सकते हैं? पहले यह पता करें कि हिंसा किसने शुरू की?”

गौरतलब है कि बीते दिनों यूपी में हिंसा के दौरान सड़कों पर उतरे दंगाईयों के ख़िलाफ़ यूपी सरकार, प्रशासन और पुलिस ने सख्ती बरतते हुए एक्शन लेना शुरू किया था। इस प्रक्रिया के लिए प्रशासन ने पर्याप्त रूप से सबूत जुटाकर, दंगाइयों के घर नोटिस भेजकर अपना काम किया था।

लेकिन, फिर भी आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कॉन्ग्रेस महासचिव को सुनकर लगा कि वो भाजपा का विरोध करने की आड़ में भूल चुकी हैं कि कानूनी कार्रवाई प्रदर्शनकारियों पर नहीं हो रही, बल्कि दंगाईयों पर हो रही है। उन दंगाइयों पर जिन्होंने सड़कों पर पत्थरबाजी की, पुलिस पर गोली चलाई और सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट किया।

बता दें प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीजीपी ओपी सिंह इस मामले के संबंध में पहले ही कह चुके हैं कि वे इस हिंसा में किसी भी निर्दोष को हाथ नहीं लगाएँगे, लेकिन जिन्होंने हिंसा की है, उन्हें किसी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा। जिन्होंने प्रदेश में सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया है, उसकी भरपाई उनकी संपत्ति से की जाएगी। साथ ही कानूनी रूप से दंड भी मिलेगा।