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दलित शिक्षक की कसाई वाले चाकूओं से गोद-गोद कर हत्या: रियाज, शमीम, कय्यूम सहित कई पर FIR

मध्य प्रदेश के दमोह में सोमवार (दिसंबर 28, 2020) की रात दर्जनों लोगों ने मिल कर दलित अजय मुड़ा नामक शिक्षक की हत्या कर दी। हत्या का आरोप मुस्लिम समाज के लोगों पर लगा है, जो दर्जनों की संख्या में थे। हमले में मृतक का भांजा सुजीत भी घायल हो गए। उनका इलाज जबलपुर के अस्पताल में चल रहा है। स्थानीय हिन्दू कार्यकर्ताओं ने इस हमले का आरोप कसाई समुदाय के स्थानीय मुस्लिमों पर लगाया है।

ऑपइंडिया ने इस घटना के बारे में जानने के लिए स्थानीय युवक से बात की, जिन्होंने बताया कि वो खुद लोकल स्तर पर पत्रकारिता करते हैं और इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया भी इस घटना को उस तरह से नहीं दिखा रहा है, जिससे सच्चाई सामने आए। ये घटना चैनपुर क्षेत्र में सोमवार को रात 9 बजे के आस-पास हुई। उन्होंने कहा कि वहाँ 4-5 लोग ही थे, जिन पर हमला किया गया।

उन्होंने हमें बताया, “हमला करने वालों की पूरी भीड़ थी। ये एक मॉब लिंचिंग है। ये कसाई समुदाय का इलाका है। मृतक अजय गोरक्षक भी थे। हालाँकि, वो इतने सक्रिय नहीं थे लेकिन गोरक्षा अभियान से जुड़े थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि ये हमला एकदम सुनियोजित ढंग से किया गया। चाकुओं से गोद कर निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। भाँजे को बचाने के लिए मामा आगे आ गए थे।” इस घटना को लेकर हिन्दू संगठनों में भी आक्रोश है।

मृतक अजय मुड़ा सिलैया में मिडिल स्कूल में बतौर शिक्षक पदस्थापित थे। हिन्दू संगठनों से जुड़े कई कार्यकर्ताओं ने पीड़ित के घर पहुँच कर न्याय की माँग की और सिद्धार्थ मलैया सहित भाजपा नेताओं ने भी घंटाघर पर शव रखने की माँग की, जिसे पुलिस ने अस्वीकृत कर दिया। एम्बुलेंस से शव अस्पताल चौराहा पहुँचा, जहाँ स्थानीय लोगों ने धरना दिया। मृतक के मामा द्वारिका मुड़ा की शिकायत पर FIR दर्ज कर ली गई है।

मध्य प्रदेश की इस घटना पर हमारे स्थानीय संपर्क ने ऑपइंडिया को बताया कि यहाँ के पूरे हिन्दू संगठन आक्रोशित हैं। उन्होंने कहा कि स्थिति दंगा भड़कने तक पहुँच सकती थी। उनके अनुसार प्रशासन ने मीडिया को भी रिपोर्टिंग से रोक दिया। उन्होंने बताया, “मीडिया भी यहाँ उतनी सक्रिय नहीं है। डर से वो ज्यादा कुछ लिख भी नहीं सकते। उन्होंने संभल कर ही शब्द चुने हैं।” बताया गया है कि हमलवार दो खेप में आए थे।

पुलिस ने रियाज कसाई, शमीम कसाई, मटरू कसाई, कय्यूम कसाई और बाबा कसाई सहित कई आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जो हथियारों के साथ वहाँ पहुँचे थे। भाजपा नेता सिद्धार्थ मलैया ने आरोप लगाया कि पुलिस ने अपनी FIR में आरोपितों के रूप में विजय और रवि अहिरवार का नाम लिखा है, जो मौके पर उपस्थित ही नहीं थे। एसपी हेमंत चौहान ने आश्वासन दिया है कि दोषियों पर कार्रवाई होगी, साथ ही विवेचना से उनका नाम हटा दिया जाएगा, जो इस घटना में शामिल नहीं थे।

एसपी ने कहा कि कसाई मंडी क्षेत्र में रात भर पुलिस ने दबिश दी है और तलाशी अभियान चलाया है। उन्होंने बताया कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। कोतवाली के टीआर एचआर पांडेय ने बताया कि पुलिस ने 6 नामजद सहित कई अज्ञात के खिलाफ धारा 307, 302, 323, 147, 148 और 149 के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने 7 आरोपितों की गिरफ़्तारी की बात कही है।

दमोह में शिक्षक अजय मुड़ा की हत्या पर पुलिस

हमने इस पूरे मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए दमोह कोतवाली थाने के टीआई एचआर पांडेय से संपर्क किया, जिन्होंने कहा कि न तो ये घटना सुनियोजित है और न ही इसमें कोई सांप्रदायिक एंगल है। उन्होंने सिद्धार्थ मलैया के पुलिस पर लगाए गए आरोपों पर कहा कि कुछ लोग इसे हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रंग देना चाहते हैं, जबकि गोरक्षा का गोहत्या से इस पूरी घटना का कुछ भी लेनादेना नहीं है।

पांडेय ने ऑपइंडिया से कहा, “रियाज कुरैशी और विजय अहिरवार बाजार से आ रहे थे। रात का समय था। इस दौरान वो अजय मुड़ा के घर के सामने पेशाब करने लगे। वहाँ कोई महिला खड़ी रही होंगी, जिसे उन्होंने अँधेरे के कारण देखा नहीं। मुड़ा परिवार ने इससे आपत्ति जताई और हमें सूचना मिली है कि दोनों के साथ मारपीट भी की। इसके बाद रियाज़ और विजय भाग कर पास में ही कसाई मंडी में पहुँचे।”

एचआर पांडेय ने आगे बताया कि इस घटना की सूचना दिए जाने के बाद इन दोनों के भी परिजन वहाँ पहुँच गए और उन्होंने भी मारपीट शुरू कर दी। इधर से भी मारपीट हुई। उन्होंने बताया, “दोनों तरफ से मारपीट हुई। अब एक पक्ष कसाई था तो उनके पास चाकू सहित इस तरह के अन्य हथियार भी थे। चाकू लगने से खून ज्यादा बहने लगा और इसी कारण मौत हो गई। ये अचानक हुई घटना है। पुराना कोई विवाद नहीं था। “

लड़की से बाल कटवाते हैं मोदी, गोमूत्र पीकर रामदेव बीमार: कॉन्ग्रेसी-वामपंथियों ने पूरे साल चलाया फेक न्यूज

साल 2020 को जाने में महज कुछ ही दिन बचे हैं। यह पूरा साल कोरोना वायरस को समर्पित रहा। जहाँ एक तरफ इस महामारी ने लोगों में दहशत फैला दिया, वहीं इस साल दूसरी महामारी (डिजिटल) यानी फेक न्यूज़ भी एक समस्या रही। इससे कोई भी अछूता नहीं रहा। कुछ लोगों ने उन पर यकीन किया तो कुछ ने नहीं किया।

फेक न्यूज के जरिए सोशल मीडिया पर लोगों को जम कर बरगलाने और भड़काने का काम किया गया। इसकी रोकथाम के लिए सरकार ने भी बहुत से कदम उठाए। कई बार ऐसा होता है कि किसी न किसी तरह हम सब फर्जी ख़बरों के झाँसे में आ ही जाते हैं। चलिए आपको उन 10 फेक न्यूज से रूबरू कराते हैं, जिन्हें इस पूरे साल असली समझ कर यूजर्स ने सोशल मीडिया पर जम कर शेयर किया:-

1. ट्रंप के आगे देश को बदनाम करने के लिए AAP समेत लिबरल गिरोह ने फैलाया झूठ, हुआ पर्दाफाश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप भारत दौरे पर आए थे। इस दौरान लिबरल गिरोह ने अपनी सारी युक्तियाँ लगाकर डोनॉल्ड ट्रंप के आगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के साथ देश की छवि मटियामेट करने का काम किया था। डोनॉल्ड ट्रंप के भारत दौरे से ठीक कुछ दिन पहले एक तस्वीर को सोशल मीडिया पर जमकर वायरल किया गया। इसमें यह दिखाया जा रहा था कि जिन दीवारों पर ट्रंप के स्वागत के लिए उनके पोस्टर बने हुए हैं, वहाँ तो भारतीय लोग पेशाब करके जा रहे हैं।

फर्जी तस्वीर शेयर करके भारत को बदनाम करने की कोशिश

इस तस्वीर को 38 हजार फॉलोवर्स वाली आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम की इंचार्ज एश्वरी वर्मा के साथ ही 20 हजार फॉलोवर्स वाले फिल्म निर्देशक और पत्रकार अविनाश दास ने भी शेयर किया था। हालाँकि यह तस्वीर डॉक्टर्ड (फोटोशॉप की गई) थी।

2. JNU में हमला कर रही नकाबपोश गुंडी ABVP कार्यकर्ता नहीं है, फैलाया जा रहा झूठ

5 जनवरी, 2019 को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में लाठी-डंडों से लैस वामपंथियों ने जम कर उत्पात मचाया था। इस दौरान जेएनयू कैंपस के अंदर हुई हिंसा को लेकर कई सारी भ्रामक सूचनाएँ फैलाई गई। हमले के बाद कई वीडियो सामने आए, जिसमें एक के बाद एक खतरनाक रूप से गढ़े गए प्रोपेगेंडा को देखा गया।

एबीवीपी कार्यकर्ता शाम्भवी (बाएँ), नकाबपोश गुंडी (दाएँ)

कैंपस में हुई हिंसा के एक वीडियो में नकाबपोश लोग डंडे और लोहे की रॉड लेकर मारपीट करते नजर आ रहे हैं। इसी दौरान प्रदर्शनकारी यह कहते सुने जा सकते हैं, ‘कौन हो तुम लोग? किसे डराना चाह रहे हो?… एबीवीपी वापस जाओ।’

फिर क्या था, वामपंथियों के प्रोपेगेंडा ने रफ्तार पकड़ ली तो एक ट्विटर यूजर ने आरोप लगाया कि वीडियो में नकाबपोश गुंडों में से एक लड़की एबीवीपी कार्यकर्ता थी। सोशल मीडिया पर एबीवीपी को बदनाम करने की कोशिश में संगठन की एक कार्यकर्ता और नकाबपोश में लड़की की तस्वीर की तुलना करते हुए फ़ोटो को जमकर वायरल किया गया। हालाँकि बाद में यह तस्वीर फेक निकली।

3. कोरोना से बचने के लिए अत्यधिक गोमूत्र पीकर बीमार हुए बाबा रामदेव? कट्टरपंथियों के दावे का फैक्ट-चेक

कोरोना के शुरुआती दौर में बाबा रामदेव की एक फ़ोटो वायरल की गई। इसको लेकर दावा किया गया कि अधिक मात्रा में गोमूत्र का सेवन करने के बाद योग गुरु को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। हालाँकि ऐसा कुछ भी नहीं था। यह बाबा रामदेव की पुरानी तस्वीर थी, जिसे गोमूत्र का मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया। बता दें कि यह जिहादी आतंकवादियों और इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं का मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पसंदीदा हथियार है।

बाबा रामदेव की पुरानी तस्वीरें शेयर कर फैलाया गया झूठ

4. रूस में लोगों को घर में रखने के लिए पुतिन ने सड़क पर छोड़े 500 शेर?

कोरोना वायरस को लेकर रूस की एक तस्वीर भी खासा वायरल हुई थी। जिसको अधिकतर लोगों ने सच भी माना था। दरअसल, ब्रेकिंग न्यूज़ बताते हुए रूस के सड़क पर शेर की घूमने वाली एक तस्वीर वायरल हुई थी। बताया जा रहा था कि रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिस पुतिन ने कोरोना के चलते लोगों को घर में रखने के लिए ये अनोखा तरीका निकाला। ये भी दावा किया जा रहा था कि रूस में ऐसे 500 शेर सड़कों पर खुले छोड़ दिए गए हैं। हालाँकि फैक्ट चेक में यह खबर फेक निकली।

rउस, कोरोना वायरस
इस तस्वीर को रूस का बता कर पेश किया गया, जबकि ये सच नहीं था

5. ऋषि कपूर के अंतिम क्षणों का अस्पताल वाला वीडियो वायरल, पास में खड़ा हो गाना गा रहा लड़का

ऋषि कपूर की मौत के बाद एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसे कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इस दावे के साथ प्रकाशित किया कि ये ऋषि कपूर की मौत से बस एक रात पहले का है और जिसमें उन्हें मुस्कुराते हुए और एक युवक के साथ दीवाना” के एक गाना गाते देखा गया। दी ट्रिब्यून’ मीडिया हाउस से लेकर इंडिया टुडे और एबीपी तक ने अपने-अपने चैनलों और वेबसाइट पर इसे चलाया। वहीं तमाम सोशल मीडिया यूजर ने भी इसे शेयर किया था।

Rishi Kapoor Viral Video Fact check
ऋषि कपूर के साथ रिकॉर्ड किया गया यह वीडियो उनकी मौत से पहले का है

हालाँकि ऋषि कपूर के साथ रिकॉर्ड किया गया यह वीडियो फरवरी 2020 का है, ना कि ऋषि कपूर की मौत के एक रात पहले का। यह यूट्यूब पर फरवरी 2020 को शेयर किया गया था।

6. NDTV पत्रकार ने ‘प्रियंका गाँधी के 1000 बस’ के नाम पर शेयर की कुंभ मेले के बसों की तस्वीर

फेक न्यूज़ फैलाते हुए अक्सर पकड़े जाने वाले NDTV ने एक बार फिर अपनी पहचान के मुताबिक सरकार के खिलाफ अपना एजेंडा चलाते हुए एक फोटो से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की थी, जिसमें यूपी सरकार की ओर से कॉन्ग्रेस द्वारा भेजे जाने वाली बसों की खबर को उस फोटो के साथ शेयर किया गया, जिस फोटो को हम सभी ने पिछले वर्ष प्रयागराज में लगे कुंभ मेले में सबसे लंबी बस परेड का विश्व रिकॉर्ड बनने के दौरान देखा था।

NDTV
NDTV के पत्रकार ने कॉन्ग्रेस के नाम पर शेयर की कुम्भ के बसों की फोटो

7. ‘नीच’ कॉन्ग्रेस ने लड़की के साथ मोदी की तस्वीर लगाई, लिखा ऐशो-आराम की ज़िंदगी में मस्त…

कॉन्ग्रेस ने नीच राजनीति दिखाते हुए अपने ट्विटर एकाउंट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो झूठे दावे के साथ शेयर की थी। कॉन्ग्रेस ने मोदी के साथ एक लड़की का वीडियो शेयर किया थी, जोकि उनका बाल बना रही थी। और यह साबित करने का प्रयास किया कि सरकार किसान की आवाज नहीं सुनती और ‘ऐशो-आराम की जिन्दगी में मस्त’ है। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जिस तस्वीर का इस्तेमाल किया था, वह अप्रैल 2016 में मैडम तुसाद वैक्स म्यूजियम के लिए नरेन्द्र मोदी की प्रतिमा के लिए ली गई थी।

कांग्रेस मोदी मैडम तुसाद
कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर के साथ भ्रामक दावा किया

वीडियो में इसे इस्तेमाल कर यह भ्रामक संदेश देने का काम किया गया था कि पीएम मोदी कोरोना वायरस के समय किसी आलिशान सैलून में अपने बाल बनवा रहे हैं।

8. क्या योगी आदित्यनाथ इन तस्वीरों में गैंगस्टर विकास दुबे के साथ खड़े हैं?

उत्तर प्रदेश में कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे द्वारा पुलिस पर किए गए हमले के बाद योगी सरकार को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर कई भ्रामक दावे किए गए थे। जिनमें से एक विकास दुबे को भाजपा नेता बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ एक तस्वीर वायरल हुई थी। इस तस्वीर में भी यह दावा किया गया कि यह वही खूॅंखार गैंगस्टर और ‘भाजपा नेता’ विकास दुबे है, जिसके कारण 02 जुलाई 2020 को कानपुर में 8 यूपी पुलिसकर्मियों की जान गई।

गैंगस्टर विकास दुबे की तस्वीरों को लेकर भ्रम फैलाया गया

जबकि वास्तविकता यह थी कि तस्वीर में दिख रहा शख्स का नाम विकास दुबे जरूर था, लेकिन वह खूनी विकास दुबे नहीं बल्कि कानपुर का एक स्थानीय बीजेपी नेता है। जिसकी तस्वीर का इस्तेमाल लोगों को बरगलाने और सीएम योगी की छवि को खराब करने के लिए किया गया था।

9. टीवी और मिक्सर ग्राइंडर के कचरे से ‘ड्रोन बॉय’ प्रताप एनएम ने बनाए 600 ड्रोन: फैक्ट चेक में खुली पोल

सोशल मीडिया पर ‘ड्रोन बॉय’ प्रताप एनएम (Drone boy Prathap NM) ‘ड्रोन वैज्ञानिक’ बताते हुए एक लड़के की तारीफों की खूब पुल बाँधे गए थे। हालाँकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत थी। वायरल फ़ोटो में प्रताप के साथ एक बेहद आधुनिक नजर आने वाला ड्रोन मौजूद था। ड्रोन के ऊपर कई जगहों पर ACSL नाम का ब्रांड लिखा था।

बता दें कि ACSL एक जापानी कंपनी है, जो मानव रहित हवाई वाहन या ड्रोन बनाती है। वास्तव में प्रताप के साथ खींचे गए ड्रोन पर ACSL का लोगो है। थोड़ा से ऑनलाइन सर्च से ही पता चलता है कि यह ACSL द्वारा बनाया गया PF-1 ड्रोन है, और यह ‘ड्रोन बॉय’ द्वारा रिसाइकिल किए गए भागों से बना ड्रोन नहीं है।

तस्वीर में एक ACSL ब्रांडेड शर्ट वाला व्यक्ति भी है, और स्टॉल की दीवार में और दीवार पर लगे टीवी पर भी ACSL का लोगो देखा जा सकता है। ये सभी इस संभावना की ओर इशारा करते हैं कि प्रताप ने किसी प्रदर्शनी में भाग लिया था, जहाँ ACSL ने अपने ड्रोन दिखाए थे, और खुद को खड़ा कर जापानी कंपनी द्वारा बनाए गए ड्रोन में से एक के साथ फोटो लिया था।

10. हिन्दू युवा वाहिनी के नेता ने बनाए गधे की लीद से मिलावटी मसाले: मीडिया की खबर का DM ने किया खंडन

हाथरस के जिलाधिकारी ने हाल ही में एक ऐसी खबर का खंडन किया, जिसमें दावा किया जा रहा था कि हिन्दू युवा वाहिनी के नेता अनूप वार्ष्णेय की मसाले बनाने वाली फैक्ट्री में गधे की लीद और भूसे से मिलावटी मसाले तैयार किए जाते थे। यह फर्जी खबर कई समाचार समूह, समाजवादी पार्टी जैसे कुछ राजनीतिक दलों और फैक्ट चेकर वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने भी सोशल मीडिया पर शेयर की थी। जोकि फेक न्यूज़ निकली।

मीडिया द्वारा फैलाई गई फेक खबर का हाथरस के जिलाधिकारी ने किया खंडन

मस्जिद में पार्टी, लड़के-लड़कियों का साथ में डांस… वीडियो वायरल होने पर फिलिस्तीन की पहली महिला DJ गिरफ्तार

फिलिस्तीन की महिला DJ समा अब्दुलहादी को गिरफ्तार कर लिया गया है। उन पर मस्जिद में कार्यक्रम करने का आरोप लगाया गया है। उन्होंने वेस्ट बैंक में जॉर्डन वैली में स्थित जेरिको के एक मस्जिद में डांस कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसके बाद ये कार्रवाई की गई है। 30 वर्षीय महिला डीजे को नबी मूसा (Nebi Mussa) मस्जिद में परफॉर्म करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, जो पारम्परिक इस्लामी कब्रिस्तान भी है।

हालाँकि, मानवाधिकार संगठनों ने उनकी गिरफ़्तारी के खिलाफ आवाज़ उठाई है। उन्हें रविवार (दिसंबर 27, 2020) को गिरफ्तार किया गया और मंगलवार को 15 दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया। पीड़ित परिजनों ने बताया कि समा अब्दुलहादी की जमानत याचिका को भी नकार दिया गया है। वो फिलिस्तीन की पहली ऐसी महिला मानी जाती हैं, जो डिस्क जॉकी (DJ) बनीं। इजरायल में उन्हें फिलिस्तीन की ‘टेक्नो क्वीन’ कहा जाता है।

उन्हें नबी मूसा में परफॉर्म करने के लिए आधिकारिक रूप से अनुमति मिली हुई थी, बावजूद इसके उन्हें गिरफ्तार किया गया। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पर्यटन मंत्रालय से अनुमति मिलने के बावजूद उनकी गिरफ़्तारी बेतुकी है। इस डांस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ था, जिसमें महिला-पुरुष साथ में डांस करते देखे जा सकते हैं। नबी मूसा सिर्फ मजहबी ही नहीं, एक पर्यटन स्थल भी है।

परिजनों का पूछना है कि जब ये स्थल इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक के लिए ठीक नहीं है तो फिर इसकी अनुमति कैसे दी गई? फिलिस्तीन के लोगों का कहना है कि युवक-युवतियों के साथ में डांस करने से मस्जिद और उसके आसपास की जगह अपवित्र हो गई है। लोगों ने इसे इस्लाम का अपमान बताया। पार्टी में भी कुछ लोग घुस गए थे और वहाँ से लोगों को बाहर निकाला। प्रधानमंत्री मोहम्मद शतायेह के निर्देश पर जाँच के लिए कमिटी का गठन किया गया है।

हालाँकि, ये पार्टी मस्जिद में नहीं हुई थी, उसके परिसर में उस स्थान पर हुई थी जहाँ पहले से ही निकाह और जन्मदिन सहित कई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते आए हैं – ऐसा समा अब्दुलहादी के बचाव पक्ष का कहना है। रामल्लाह, बेथलेहेम और जेरुसलम के कई युवा इस पार्टी में शामिल थे। फिलिस्तीन में युवाओं की जनसंख्या 30% से ज्यादा है और इजरायल से संघर्ष और इस्लामी कट्टरता के कारण उन्हें वैसे भी मौके कम मिलते हैं।

इसी वर्ष अगस्त में पाकिस्तान की अभिनेत्री सबा कमर पर सिर्फ इसीलिए ईशनिंदा का मुकदमा दायर कर दिया गया क्योंकि उन्होंने मस्जिद में एक वीडियो की शूटिंग की थी। अभिनेत्री सबा कमर और गायक बिलाल सईद सहित कई लोगों के खिलाफ लाहौर का वज़ीर खान मस्जिद की ‘पवित्रता भंग करने’ का आरोप लगाया गया था। इन दोनों ने मस्जिद के भीतर म्यूजिक वीडियो की शूटिंग की थी। इस मामले में FIR दर्ज कर के ईशनिंदा के तहत कार्रवाई की गई थी।

BJP रैली में जा रही बस पर हमला, 15 घायल: बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के बाद अब उनके छोटे भाई पर कार्रवाई

पश्चिम बंगाल के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने भाजपा (BJP) में शामिल होने के बाद नंदीग्राम में अपनी पहली रैली की, लेकिन इसमें जम कर हिंसा हुई। रैली में हिंसा का आरोप TMC के गुंडों पर लगा है। नंदीग्राम पहुँचने से 1 किलोमीटर पहले ही सोनाचुरा गाँव से आ रहे शुभेंदु अधिकारी के समर्थकों की बस पर हमला किया गया। पूर्व मंत्री ने इस हमले के बीच ‘जिहादियों’ का हाथ बताया और कहा कि इसके परिणाम ठीक नहीं होंगे।

जबकि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने जहाँ इस घटना पर चुप्पी बनाई रखी, वहीं पार्टी के कुछ नेताओं ने इसे शुभेंदु समर्थकों और विरोधियों की आपस की लड़ाई करार दिया। बस क्षतिग्रस्त हो गई है और उसमें सवार 15 भाजपा कार्यकता बुरी तरह घायल हो गए, जिनका इलाज अस्पताल में चाल रहा है। इस दौरान शुभेन्दु अधिकारी ने गरजते हुए कहा कि वो 2011 के पहले से ही जन आंदोलनों में शामिल रहे हैं और CPM के दंगाइयों से निपटे हैं।

उन्होंने कहा कि उनके पास उन जिहादियों के लिए एक संदेश है, जिन्होंने भाजपा समर्थकों की बस पर हमला किया है – “मैं इस तरह के हमलों को बर्दाश्त नहीं करूँगा।” ये हमला मंगलवार (दिसम्बर 29, 2020) को दोपहर 11:30 में हुआ। इसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने नंदीग्राम पुलिस थाने के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया। शुभेन्दु अधिकारी ने दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी की माँग करते हुए कहा कि ऐसा न होने पर वो आंदोलन करेंगे।

उन्होंने अपनी अगली रैली जनवरी 8, 2021 को तय की है। उन्होंने कहा कि जो यहाँ रैली करने की बातें करते थे, वो अचानक से गायब हो गए हैं लेकिन वो अपनी अगली रैली को संबोधित करेंगे तो उसमें 1 लाख लोग उपस्थित रहेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को रंगदार करार दिया। नंदीग्राम में ममता बनर्जी की 7 जनवरी की रैली कैंसल हो गई है। कहा जा रहा है कि कार्यक्रम के संयोजक विधायक अखिल गिरी के कोरोना पॉज़िटिव होने के कारण ये निर्णय लिया गया।

वहीं अब तृणमूल कॉन्ग्रेस ने शुभेंदु अधिकारी के भाई सौम्येन्दु पर कार्रवाई की है। उनके छोटे भाई सौम्येन्दु को काँठी म्युनिसिपेलिटी के प्रशासन के पद से हटा दिया गया। सौम्येन्दु ने बताया कि उन्हें इसकी सूचना भी नहीं दी गई। वो शाम 6 बजे तक दफ्तर में थे और घर लौटने पर उन्होंने टीवी पर देखा कि उन्हें हटा दिया गया है। TMC नेताओं का आरोप है कि वो भाजपा के लिए काम कर रहे थे। शुभेंदु के बड़े भाई और पिता भी TMC सांसद हैं।

बता दें कि वर्ष 2008 से ही प्रत्येक वर्ष 7 जनवरी के दिन नंदीग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और ग्रामवासी उन्हें याद कर शोक मनाते हैं। इस अवसर पर प्रत्येक वर्ष शुभेंदु अधिकारी भी वहाँ मौजूद रहते हैं। वर्ष 2007 में 7 जनवरी को भरत, शेख सलीम और विश्वजीत इस आंदोलन में शहीद हो गए थे। नंदीग्राम में एक रासायनिक केंद्र स्थापित करने के लिए एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के लिए भूमि अधिग्रहण करने के वामपंथी सरकार के कदम के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों में पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 11 लोग मारे गए थे।

कर्नाटक के पूर्व CM सिद्धारमैया ने स्वीकारा कि वे ‘मवेशियों का माँस’ खाते हैं, कॉन्ग्रेस स्थापना दिवस समारोह पर बयान

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सोमवार (दिसंबर 28, 2020) को स्वीकार किया कि उन्होंने ‘मवेशी का माँस’ (Cattle Meet) खाया और वो क्या खाते हैं क्या नहीं, यह उनका अधिकार है। कॉन्ग्रेस के स्थापना दिवस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि पार्टी के कई सहयोगी परिणाम या विवाद की आशंका के चलते कई मुद्दे पर कोई रूख नहीं अपना पाते।

सिद्धारमैया ने कहा, “मैंने एक बार विधानसभा में कहा था कि मैं मवेशी का माँस खाता हूँ। आप कौन होते हैं पूछने वाले? यह मेरा अधिकार है, भोजन को लेकर सबकी अपनी-अपनी पसंद है, आप सवाल करने वाले कौन होते हैं? आप नहीं खाते तो कोई बात नहीं मैं आपको मजबूर नहीं करुँगा। मैं खाता हूँ क्योंकि मुझे पसंद है, आप सवाल करने वाले कौन होते हैं? क्या आपको ऐसा कहने का साहस है? ”

गोहत्या रोधी विधेयक का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हमारे लोग यह मानकर चुप रह जाते हैं दूसरे लोग जो कह रहे हैं वह सही है। आपको इस तरह के भ्रम से निकलना चाहिए। गाय या भैंस की देखभाल पर हर दिन करीब 100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, किसान बूढ़ी गायों और भैंसों को कहाँ भेजेंगे।” उन्होंने सवाल किया, ‘‘उन्हें कौन रुपए देगा? किसान भी गायों की पूजा करते हैं।’’

2015 में, सिद्धारमैया ने इसी तरह की टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “मैंने आज तक गोमाँस नहीं खाया है, (लेकिन) तुम कौन हो मुझसे पूछने के लिए कि मैंने खाया है या नहीं?” हाल ही में, सिद्धारमैया, जो कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता भी होते हैं, ने अपनी टिप्पणियों के लिए खेद व्यक्त किया था कि कोडावा गोमाँस खाते हैं। इसकी काफी आलोचना हुई थी। जिसके बाद उन्होंने  खेद प्रकट करते हुए कहा था कि उनका कभी भी यह कहने का कोई इरादा नहीं था कि कोडवा गोमाँस खाते हैं। उनकी संस्कृति के प्रति उनके मन में काफी सम्मान है।

बता दें कि 9 दिसंबर को कर्नाटक राज्य में गोहत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने वाला 20 वाँ राज्य बन गया। अब जो कोई भी अवैध रूप से वध या गायों के परिवहन में लिप्त पाया जाएगा, उसे 7 साल तक की जेल की सजा दी जाएगी। दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन कर्नाटक कैबिनेट ने विधान परिषद द्वारा पारित किए जाने वाले बिल को प्रभावी करने के लिए अध्यादेश पारित किया, उस दिन कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता की टिप्पणी सामने आई।

जिंदगी बचाने के साथ अर्थव्यवस्था भी रही बड़ी चुनौती: कोरोना के खिलाफ भारत की लड़ाई की पूरी टाइमलाइन

भारत में भी कोरोना वायरस को लेकर अन्य देशों की तरह शुरू में डर का माहौल था, क्योंकि किसी को इस बारे में ज्यादा कुछ पता ही नहीं था। लेकिन, चरणबद्ध तरीके से केंद्र सरकार द्वारा किए गए प्रयासों और इसके प्रति जनता के धीरे-धीरे जागरूक होने के कारण हम सही समय पर इस वैश्विक महामारी से उबरे। अभी तक भारत में 1 करोड़ से अधिक कोरोना मामले आ चुके हैं और लगभग 97 लाख लोग स्वस्थ हो चुके हैं। यहाँ हम कोरोना के खिलाफ भारत की लड़ाई की पूरी टाइमलाइन को देखेंगे और जानेंगे कि इसकी शुरुआत से अब तक भारत इस महामारी से कैसे जूझकर उबर रहा है।

ऐसे में, आइए एक नजर इस पर डालते हैं कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में आखिर ये सब कैसे संभव हुआ, जब भारत से चार गुना कम जनसंख्या और वाले अमेरिका में इतनी तबाही मची कि वो अब भी कुल सक्रिय मामलों में नंबर एक पर बना हुआ है। वो भी तब, जब विकास और संसाधन के मामले में भारत तो दूर, वो दुनिया के किसी भी देश से आगे है। जबकि भारत अब शीर्ष 10 से लगभग बाहर हो चुका है।

जहाँ सितम्बर में भारत में प्रतिदिन लगभग 1 लाख कोरोना मामले आ रहे थे, अब ये आँकड़ा 20,000 के रेंज में पहुँच चुका है। इससे भी बड़ी बात है ज्यादा से ज्यादा लोगों का ठीक होना। यहाँ हम एयरपोर्ट्स स्क्रीनिंग से लेकर सही समय पर लगे लॉकडाउन और सरकारी की मशीनरी की सक्रियता का विश्लेषण करते हुए आपको शुरू से लेकर अब तक की कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई कैसी रही, इस बारे में बताएँगे।

कोरोना टाइमलाइन: जब भारत सरकार की सजगता का विपक्ष बना रहा था मजाक

दिसंबर 2019 के अंत में चीन ने कोरोना वायरस को लेकर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन को रिपोर्ट दी, जिसके बाद WHO ने इसके खतरों को लेकर दुनिया के अन्य देशों को अवगत कराया। जनवरी 30, 2020 को भारत में कोरोना वायरस संक्रमण का पहला केरल से मामला सामने आया। फ़रवरी 3, 2020 को ये संख्या बढ़ कर 3 हो गई। लेकिन, ये सभी चीन के वुहान से लौटे छात्र थे, जो कोरोना वायरस का हब था।

जब इसकी चर्चा हो रही है तो उससे पहले हमें एयर इंडिया के वुहान मिशन की बात करनी होगी, जहाँ से भारत के एक-एक छात्र को सुरक्षित निकाला गया। 70 सालों के इतिहास में एयर इंडिया का ये पहला ‘मेडिकल Evacuation’ था। कोरोना वायरस संक्रमण के हब से एक-दो नहीं बल्कि 647 भारतीयों को सकुशल वापस लाया गया। क्रू को होम क्वारंटाइन करने से लेकर यात्रियों को मास्क व सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों से अवगत कराने तक, हर चीज का ख्याल रखा गया।

यहाँ तक कि इन फ्लाइट्स के साथ डॉक्टर्स भी भेजे गए। इराक, जॉर्डन और कुवैत से भारतीय नागरिकों को निकाल कर वापस लाने में अहम किरदार निभाने वाले कैप्टन अमिताभ सिंह को इसकी पूरी जिम्मेदारी दी गई थी। मार्च शुरू होते-होते भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या में इजाफा होने लगा और इसमें अधिकतर विदेश से लौटे लोग थे। सऊदी अरब से लौटे एक 76 वर्षीय बुजुर्ग के रूप में भारत में कोरोना के कारण पहली मौत हुई।

वुहान से भारतीयों को वापस लाया गया: एयर इंडिया ने दिखाया पराक्रम

मार्च 4 को जो 22 मामले सामने आए, उसमें से 14 इटली से लौटे 14 सदस्यीय पर्यटन दल शामिल था। जर्मनी और इटली से लौटे एक सिख उपदेशक को ‘सुपर स्प्रेडर’ माना गया क्योंकि उसने आनंदपुर साहिब में एक कार्यक्रम अटेंड किया था और कुल 27 मामले अकेले उसके कारण आए थे। हालाँकि, भारत में कोरोना वायरस संक्रमण का सबसे बड़ा फैलाव तबलीगी जमात के रूप में आया, लेकिन उससे पहले हम भारत सरकार कि दूरदर्शिता की बात करते हैं।

जनवरी में जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस को लेकर उतनी सजगता नहीं थी, तभी भारत ने एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी। सबसे पहले चीन से आने वाले यात्रियों की कोरोना टेस्टिंग की व्यवस्था की गई। पहले तो ये 7 एयरपोर्ट्स तक ही सीमित था, लेकिन बाद में देश के 20 एयरपोर्ट्स पर ये व्यवस्था की गई। इतना सब कुछ जनवरी में ही कर लिया गया था। फरवरी में थाईलैंड और सिंगापुर सहित 9 देशों के यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग होने लगी।

फरवरी खत्म होते-होते भारत सरकार की समझ में या गया कि अब सिर्फ इससे काम नहीं चलने वाला है क्योंकि तब पूरी दुनिया में ये वायरस तेजी से पाँव पसार रहा था। हालाँकि, भारत में बाकी विपक्षी नेता तब ये कह रहे थे कि पीएम मोदी जानबूझ कर कोरोना का हौव्वा बना रहे हैं, क्योंकि वो CAA से ध्यान बँटाना चाहते हैं। उन नेताओं में ममता बनर्जी भी शामिल थीं, जिनका राज्य आज सक्रिय संक्रमितों की संख्या में शीर्ष 5 में है। ममता बनर्जी का कहना था कि दिल्ली दंगों से ध्यान भटकाने के लिए न्यूज़ चैनल्स कोरोना की खबरें दिखा रहे हैं।

मार्च शुरू होते ही भारत सरकार के 7 मंत्रालयों ने क्वारंटाइन फैसिलिटी की व्यवस्था करनी शुरू की। सरकार को पता था कि संक्रमितों के रहने और भोजन-पानी व सैनिटाइजेशन के लिए उचित जगह की व्यवस्था होनी चाहिए, इसीलिए पहले से ही प्रयास शुरू कर दिए गए। 7 मंत्रालयों ने मिल कर कंटेन्मेंट प्लान पर काम करना शुरू किया। प्रोटेक्टिव और मेडिकल मटेरियल के लिए टेक्सटाइल मंत्रालय तक को तैयार रहने को कह दिया गया।

भारत के हर राज्य में हेल्पलाइन नंबर्स सेट किए गए, ताकि कोई भी कोरोना संक्रमित होने या इसके शक होने पर सूचना दे सके। साथ ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने के लिए एक टास्क फोर्स भी बनाया गया। इस दौरान भी विपक्षी नेता लगातार शाहीन बाग और CAA पर अटके रहे, लेकिन पीएम मोदी की सक्रियता के बाद उन्होंने कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे प्रभाव को मुद्दा बनाना शुरू कर दिया।

लॉकडाउन का भी विरोध हुआ। राहुल गाँधी पूछने लगे कि बिना किसी नोटिस का लॉकडाउन क्यों लगाया गया? वो रोजमर्रा की चीजे बेचने वाले दुकानदारों और कारोबारियों की पीठ पर बन्दूक रख कर हमला करने लगे। साथ ही सरकार को उस न्याय योजना को लागू करने की सलाह देने लगे, जिसे देश की जनता ने 2019 लोकसभा चुनाव में ही नकार दिया था। वीडियो बना कर वो पैकेज की बात करने लगे। बाद में पैकेज आया तो उसमें भी खामियाँ निकाली गईं।

जनता कर्फ्यू: जब PM मोदी ने जनता को कोरोना के खिलाफ बड़ी लड़ाई के लिए तैयार किया

अब आते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कदम की, जिसकी प्रशंसा देश-विदेश में हर जगह हुई। पीएम मोदी चाहते थे कि अचानक से सरकार के कोई कड़े फैसले लेने के कारण जनता पैनिक मोड में न चली जाए, इसीलिए उन्हें कोरोना के खिलाफ खतरे से आगाह करने के लिए और इस लड़ाई से उन्हें सीधे जोड़ने के लिए उन्होंने खुद पहल की और मार्च 22, 2020 को रविवार को ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान किया

उन्होंने जनता से कहा कि वो स्वेच्छा से एक दिन घर में रहें और बाहर न निकलें। साथ ही शाम को थाली बजाने व दीपक जलाने की भी अपील की। असर ये हुआ कि बच्चों-बूढ़ों से लेकर महिलाओं तक, हर कोई कोरोना के खतरों से आगाह हो गया और पीएम मोदी की अपील पर थाली व घंटा बजा कर मेडिकल कर्मचारियों व कोरोना वॉरियर्स का धन्यवाद किया गया। मुश्किल परिस्थितियों में भी देश भर में उस दिन एक अलग ही नजारा मिलने को मिला।

प्रधानमंत्री ने कुछ यूँ किया था ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान

लेकिन, मार्च में ‘जनता कर्फ्यू’ और फिर उसके बाद सम्पूर्ण लॉकडाउन के बीच दिल्ली में तबलीगी जमात का मुख्यालय दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज संक्रमण का एक ऐसा हॉटस्पॉट बन कर उभरा, जहाँ सरकारी दिशानिर्देशों और मेडिकल सलाहों की जम कर धज्जियाँ उड़ाई गईं। मौलाना साद के नेतृत्व में वहाँ जमे 2500 लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को ताक पर रखा और कोरोना को लेकर जम कर दुष्प्रचार फैलाया।

तबलीगी जमात: कोरोना के खिलाफ लड़ाई में रोड़ा बना मरकज

दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित मरकज़ में तबलीगी जमात के कार्यक्रम में हजारों लोग शरीक हुए और इसके सदस्यों और उनके प्राइमरी संपर्कों को मिला दें तो कुल 9000 लोगों को क्वारंटाइन किया गया था। इन सबके लिए जिम्मेदार था मौलाना साद, जिसने मरकज में मुस्लिमों से कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण से लोगों को डरने की कोई जरूरत नहीं है। उसने ये भी कहा कि डॉक्टरों की सलाह भी मानने की जरूरत नहीं है।

उसने इस्लाम में सोशल डिस्टेंसिंग के हराम होने की भी बात कही। साथ ही डॉक्टरों की सलाहों को इस्लाम में पाबंदी की बात करते हुए न मानने की सलाह दी। मरकज में रोज इस तरह मजमा लगता था और खासकर जुमे के बाद इसी तरह की बातें की जाती थीं। पुलिस ने वहाँ से जो लैपटॉप जब्त किया, उसमें उसके 350 ऑडियो क्लिप्स मिले। यहाँ तक कि यूट्यूब पर भी ये ऑडियो और वीडियो अपलोड कर के भ्रम फैलाया जाता था। मीडिया फिर भी उसका बचाव करता रहा।

इसके अलावा सबसे खतरनाक बात ये थी कि जहाँ भी तबलीगी जमात व उसके संपर्कों को ट्रेस करने के लिए पुलिस पर कई राज्यों में मुस्लिम बहुल इलाकों में हमले हुए। यहाँ तक कि मेडिकल कर्मचारियों तक को नहीं बख्शा गया। बिहार के दरभंगा और मधुबनी और चंपारण में ऐसे हमले हुए। इंदौर के मुस्लिम बहुल इलाके में डॉक्टरों की टीम पर हमला किया गया। यूपी के मुरादाबाद में मेडिकल टीम के कई लोगों को मार-मार कर घायल कर दिया गया।

इसी तरह राँची का हिंदपीढ़ी कोरोना हॉटस्पॉट बना और वहाँ भी कुर्बान चौक पर मेडिकल टीम पर हमला हुआ। इंदौर में मुस्लिम भीड़ ने मेडिकल टीम को निशाना बनाया। इसके अलावा अजमेर दरगाह क्षेत्र का मुस्लिम बहुल मोची मोहल्ला कोरोना हॉटस्पॉट बना। जयपुर के रामगंज में रहमानिया मस्जिद वाला क्षेत्र कोरोना हॉटस्पॉट बना। ये सघन मुस्लिम बहुल इलाका था, जहाँ ओमान से एक युवक के आने के बाद स्थिति काफी बिगड़ने लगी।

तबलीगी जमात के मामले में ये सबसे बड़ी समस्या थी कि वो लोग यहाँ कार्यक्रम में उपस्थिति दर्ज करा-करा कर और मरकज में रह कर अपने-अपने मुस्लिम बहुल इलाकों में लौट गए थे। दूसरी सबसे बड़ी समस्या थी कि इनमें 1300 से भी अधिक विदेशी नागरिक थे, जो जमात का प्रचार-प्रसार करने के लिए दुनिया भर में घूमते हैं। वो विभिन्न मस्जिदों में ठहरे हुए थे। वहाँ से निकाल-निकाल कर उन्हें क्वारंटाइन करना और उनके सम्पर्क में आए लोगों को ट्रेस करना खासा मुश्किल था।

मौलाना साद को बचाने के लिए लिबरल गिरोह ने भी तमाम तिकड़म भिड़ाई। जमात ने कहा कि मौलाना के ऑडियो और वीडियो के साथ छेड़छाड़ किया है। कई पत्रकारों ने इसे हिन्दू कार्यकर्ताओं की साजिश बताया। कुछ ने तो मंदिरों में भीड़ की पुरानी तस्वीरें शेयर कर के इससे तुलना की। वैष्णो देवी में यात्रियों के कोरोना पॉजिटिव होने की फेक न्यूज़ फैलाई गई। कई विपक्षी नेताओं ने मुस्लिमों को बदनाम करने का आरोप लगाया। दिल्ली में एक ऐसा समय भी था जब 669 में 430 मामले अकेले जमातियों के थे।

भारत में कोरोना के खिलाफ लड़ाई: सही समय पर लगा लॉकडाउन, WHO ने भी की थी तारीफ

बाकी देशों और भारत के बीच कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में एक अंतर ये रहा कि लॉकडाउन काफी सही समय पर लगाया गया। जैसा कि हमने ऊपर बताया, पहले पीएम मोदी ने ‘जनता कर्फ्यू’ के जरिए इसमें जन भागीदारी सुनिश्चित कर जनता को इसके लिए तैयार और जागरूक किया। सबसे पहले तो मार्च 24 को पीएम मोदी ने राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए 21 दिनों के सम्पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया

ये बताना ज़रूरी है कि जब देश में लॉकडाउन लगाया गया, तब तक यहाँ कोरोना के खुल 500 संक्रमित मामले थे। विशेषज्ञों ने माना कि सही समय पर लॉकडाउन लगाने से कोरोना संक्रमण की वृद्धि दर में काफी कमी आई और अगर ये नहीं लगाया गया होता तो इसके मामले इससे कई गुना ज्यादा होते। पहले लॉकडाउन के ख़त्म होने के बाद सभी राज्य (व केंद्र शासित प्रदेशों) की सरकारों ने इसे बढ़ाने का सुझाव दिया।

इन सबके दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार सभी मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठकें की और उनके सुझावों को सुना, उन्हें सलाह दी। अप्रैल 14 को पीएम मोदी ने 1 मई तक लॉकडाउन बढ़ाने का ऐलान किया। मई 17 को फिर से इसे महीने की अंतिम तारीख तक बढ़ा दिया गया। इसके बाद घोषणा की गई कि अब देश धीरे-धीरे खुलने के लिए तैयार हो रहा है और इसके लिए क्रमबद्ध तरीके से दिशानिर्देश जारी किए गए।

हाँ, कई राज्यों ने जरूर इस बीच लॉकडाउन को संक्रमितों की संख्या के हिसाब से जारी रखा। महाराष्ट्र में कोरोना के मामले तेज़ी से बढ़ रहे थे। दिल्ली में भी यही हाल था। इसके बाद पुणे नया हॉटस्पॉट बन कर उभरा। जून में अनलॉक के नियमों के तहत केंद्र सरकार ने ढील देनी शुरू की। पर कन्टेनमेंट जोन्स को चिह्नित कर के वहाँ पाबंदियाँ यथावत रखी गईं। उत्तर प्रदेश में ये काम काफी मुस्तैदी के साथ किया गया, खासकर आगरा जैसे शहरों में।

लॉकडाउन में सबसे बड़ी समस्या थी – लोगों तक जरूरत के समान पहुँचाना। खासकर खाद्य पदार्थों को उन तक पहुँचाना। इसके बाद सरकार ने सभी इ-कॉमर्स वेबसाइटों के साथ बैठक की और प्रोडक्ट्स की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित की, ताकि लोगों को बाहर न निकलना पड़े। इधर खुद पीएम मोदी को लोगों से अपील करनी पड़ी कि कोरोना के फ्रंटलाइन वर्कर्स जैसे मेडिकल और सुरक्षा कर्मचारियों के साथ भेदभाव न किया जाए। पुलिस व डॉक्टरों के साथ बदसलूकी की 25 खबरें हमनें कम्पाइल कर के प्रकाशित की।

लॉकडाउन के दौरान घरेलू समाग्रियों की दुकानों, जिनसे खरीददारी के बिना लोगों का काम नहीं चल सकता था – उन्हें खुली रखने के लिए समयसीमा तय की। जनता के ‘Panic Buying’ से बचने के लिए ऐसा किया गया। सरकार ने ‘डोर टू डोर डिलीवरी सिस्टम’ की व्यवस्था की। पुलिस से कहा गया कि वो डिलीवरी एजेंट्स को न रोकें। इन सबके बीच Evacuation कार्य जारी रहा। इरान से 277 भारतीयों को रेस्क्यू किया गया।

सितम्बर 2020 में भारत ने देखा कोरोना का पीक (गूगल स्क्रीनग्रैब)

अप्रैल में WHO ने भी भारत के लॉकडाउन को ‘कड़ा और सामयिक’ बताया। संस्था ने कहा कि प्रभावी सोशल डिस्टेंसिंग नियमों, जनता तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचाने में सक्रियता और ट्रेसिंग व आइसोलेशन की समुचित व्यवस्था होने के कारण वायरस को रोकने के रास्ते में भारत निकल पड़ा है। WHO ने कहा कि कई विशाल चुनौतियों के बावजूद भारत विश्वमारी के खिलाफ इस लड़ाई में गजब की प्रतिबद्धता दिखाई है।

इन सबके बीच सितम्बर में एक ऐसा मौका भी आया जब कोरोना वायरस संक्रमण भारत में अपने चरम पर पहुँच गया, लेकिन सरकार और सरकारी संस्थाओं ने हार नहीं मानी और अपने काम में लगे रहे। जब 1 दिन में 1 लाख के करीब मामले आ रहे थे, तब टेस्टिंग की संख्या बढ़ाने पर पूरा जोर दिया गया। टेस्ट्स की संख्या बढ़ने से मरीजों और उनके सम्पर्कों को ट्रेस कर के क्वारंटाइन या होम क्वारंटाइन करने में सुविधा हुई। नतीजा ये निकला कि सितम्बर के बाद से ही संक्रमितों की संख्या वाला ग्राफ गिरने लगा।

सरकार के हर कदम की निंदा करता रहा मीडिया का एक वर्ग

भारत सरकार के इन सभी प्रयासों के बीच मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था, जो लगातार सरकार के हर कदम की आलोचना में लगा हुआ था। मीडिया के इस वर्ग ने लॉकडाउन न लगने पर सवाल उठाया कि भारत सरकार कुछ कर क्यों नहीं रही है और जब सरकार सक्रिय हुई तो उसने हर फैसले की आलोचना शुरू कर दी। ‘जनता कर्फ्यू’ को लेकर खूब मजाक किया गया और पूछा गया कि क्या थाली बजाने से कोरोना भाग जाएगा?

उसी दिन मुरादाबाद के ईदगाह मैदान में हजारों लोग सीएए और एनआरसी के खिलाफ धरना प्रदर्शन करने के लिए जुट गए। आयोजकों ने एक साजिश के तहत 21 मार्च की रात से ही मैसेज वायरल कर हजारों लोगों को इकट्ठा किया। इसके बाद सुबह जहाँ पूरा शहर कोरोना वायरस से लड़ने के लिए घरों में कैद था, वहीं ईदगाह मैदान में प्रदर्शनकारी धरने पर थे। लखनऊ स्थित घंटाघर के नीचे कई महिलाओं ने धरना देकर पीएम मोदी की इस अपील का मखौल उड़ाया। 

‘जनता कर्फ्यू’ का मजाक उड़ाते हुए लिबरल गिरोह ने कहा कि जहाँ पूरा देश कोरोना की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक उपायों में लगा हुआ है, पीएम मोदी यहाँ लोगों से थाली बजवा रहे हैं। जबकि न तो सरकार, न ही पीएम ने कभी कहा कि थाली बजाने और दिए जलाने से कोरोना भाग जाएगा। ये सब कोरोना वारियर्स के सम्मान में किया गया। जनता को सम्पूर्ण लॉकडाउन के लिए तैयार करने के लिए किया गया। उन्हें जागरूक करने के लिए, हिम्मत देने के लिए।

मीडिया ने ये भी भ्रम फैलाया कि कोरोना संक्रमण के बीच जब फलाँ देश शिक्षा को लेकर डिजिटल हो रहे हैं, भारत सरकार ऐसा कुछ नहीं कर रही। ये सब इसके बावजूद कहा गया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने पहले ही 30 से अधिक डेडिकेटेड चैनल्स सिर्फ पठन-पाठन के काम में लगाए हुए थे। पूरे कोर्स और इससे जुड़े वीडियोज को ऑनलाइन उपलब्ध कराया गया। एप के जरिए शिक्षा की व्यवस्था की गई।

छात्रों के पठन-पाठन के लिए भारत सरकार ने लगाए कई चैनल और पोर्टल

टीवी चैनलों के अलावा, कोविड-19 महामारी के बाद, एनआईओएस द्वारा स्वयं प्रभा डीटीएच चैनल पाणिणी (#27), एनआईओएस चैनल शारदा (#28) एवं एनसीईआरटी के चैनल किशोर मंच (#31), के माध्यम से केवीएस, एनवीएस और सीबीएसई तथा एनसीईआरटी के सहयोग से स्काइप के जरिए लाइव सेशन के प्रसारण की शानदार अनूठी पहल की गई। स्वयंप्रभा उनके लिए लर्निंग का एक प्रभावी टूल है, जिनके घरों में इंटरनेट की सुविधा नहीं है।

इन सबके बीच सबसे बड़ी बात थी कि गरीबों का क्या? मीडिया की तमाम आलोचनाओं के बीच सरकार ने गरीबों के लिए राशन की व्यवस्था को अपना सर्वोपरि ध्येय बनाया। अप्रैल-जून के बीच तीन महीनों में 20 करोड़ गरीब परिवारों के जनधन खातों में सीधे 31 हजार करोड़ रुपए जमा करवाए गए। इस दौरान 9 करोड़ से अधिक किसानों के बैंक खातों में 18 हजार करोड़ रुपए जमा हुए। अभी हाल ही में दिसंबर में किसानों को दूसरी क़िस्त भी मिली।

कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में गरीबों को भारत सरकार ने दी सबसे ज्यादा प्राथमिकता

80 करोड़ से ज्यादा लोगों को 3 महीने का राशन, यानी परिवार के हर सदस्य को 5 किलो गेहूँ या चावल मुफ्त दिया गया। इसके अतिरिक्त प्रति परिवार हर महीने एक किलो दाल भी मुफ्त दी गई। पीएम ने एक बार कहा भी था कि एक तरह से देखें तो, अमेरिका की कुल जनसंख्या से ढाई गुना अधिक लोगों को, ब्रिटेन की जनसंख्या से 12 गुना अधिक लोगों को, और यूरोपियन यूनियन की आबादी से लगभग दोगुने से ज्यादा लोगों को सरकार ने मुफ्त अनाज दिया।

त्यौहारों के समय में जब दशहरा और दीपावली-छठ आने वाला था, तब सरकार ने इन योजनाओं को 3 महीने के लिए फिर से बढ़ाया। जब गरीबों के लिए इतना सब कुछ किया जा रहा था, तब मीडिया का यही वर्ग अर्थव्यवस्था का रोना रोने लगा। अगर लोगों की जान बचानी थी तो अर्थव्यवस्था का इस कोरोना काल में गिरना स्वाभाविक था। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा था। लेकिन, भ्रम ऐसे फैलाया गया जैसे सिर्फ भारत में ही इसका असर हो रहा हो।

अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ पैकेज का ऐलान

इसी बीच भारत सरकार एक ऐसा इकोनॉमिक पैकेज लेकर आई, जिससे न सिर्फ अर्थव्यवस्था को नया जीवन मिला, बल्कि उद्योग-धंधों और कारोबारों को भी फिर से खड़ा होने का संबल मिला। आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत नाबार्ड के माध्यम से किसानों के लिए अतिरिक्त इमरजेंसी वर्किंग कैपिटल फंडिंग के 30,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। भारत सरकार ने कुल 20 लाख करोड़ (भारत की GDP का 10%) के इकनोमिक पैकेज का ऐलान कर न सिर्फ इसके खर्चों का हिसाब दिया, बल्कि इसकी प्रगति रिपोर्ट भी जनता के समक्ष पेश की।

यदि GDP के आँकड़ों को वार्षिक क्वॉर्टर आन क्वॉर्टर में देखा जाता है, तो भारत के प्रदर्शन में आपको सुधार दिखेगा। उदाहरण के लिए, क्वॉर्टर आन क्वॉर्टर आधार पर, पहली तिमाही में भारत की गिरावट -29.3% थी। यह संख्या दक्षिण अफ्रीका के लिए -51%, अमेरिका के लिए -31.7% और जापान के लिए -27.8% थी। इस तरह से भारत ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी तुलनात्मक रूप से बहुत बुरा प्रदर्शन नहीं किया

भारत की मृत्यु दर 31 अगस्त को 1.78% थी जबकि अमेरिका में 3.04%, यूके में 12.35%, फ्रांस में 10.09%, जापान में 1.89% और इटली में 13.18% थी। 1.70 लाख करोड़ रुपए के PMGKP (प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज) के एक हिस्से के रूप में सरकार ने मुफ्त खाद्यान्न के वितरण, महिलाओं एवं गरीब वरिष्ठ नागरिकों और किसानों को नकद भुगतान दिया गया। राज्यों द्वारा 84 लाख मीट्रिक टन अनाज उठाया गया है और साथ ही 3.5 लाख मीट्रिक टन से अधिक दालें विभिन्न राज्यों में भेजी गईं।

मनरेगा के तहत अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ, जिससे मानसून के मौसम में वापस लौट रहे प्रवासियों समेत ज्यादा काम की जरूरत को संबोधित करते हुए इससे कुल 300 करोड़ मानव दिवस का रोजगार पैदा करने में सहायता मिली। 2020-21 के लिए राज्‍यों की उधार की सीमा 3% से बढ़ाकर 5% करने का फैसला किया गया, जिससे राज्‍यों को 4.28 लाख करोड़ रुपए के अतिरिक्‍त संसाधन प्राप्त हुए।

ऐसी कठिन परिस्थिति में सार्वजनिक और निजी बैंक लोगों को कर्ज दे सकें, ये भी सरकार ने सुनिश्चित की। सितंबर 2020 तक 42,01,576 कर्जदारों को 1,63,226.49 करोड़ रुपए की अतिरिक्त ऋण राशि मंजूर की गई। महीने की शुरुआत में ही 25,01,999 कर्जदारों को 1,18,138.64 करोड़ रुपए की ऋण राशि बैंकों के माध्यम से वितरित की गई। 27.55 लाख से ज्‍यादा करदाताओं को 1,01,308 करोड़ रुपए से भी अधिक के रिफंड जारी किए गए।

PPE किट्स और सैनिटाइजर की उपलब्धता: सस्ता और सुलभ

कोरोना काल में कुछ नई चीजों के नाम आपने सुने जिनके बारे में पहले न के बराबर ही चर्चा होती है – PPE किट्स और हैंड सैनिटाइजर। भारत में कोरोना काल से पहले PPE किट्स का निर्माण लगभग शून्य था। कोविड के पहले बोतल डिस्पेंसरों/पम्पों की उत्पादन क्षमता प्रतिदिन लगभग 5 लाख थी, जबकि कोरोना काल में डिमांड 50 लाख हो गई। इसके बाद डिस्पेंसर बनाने में भारत आत्मनिर्भर बना और प्रतिदिन 40 लाख बोतल का आज उत्पादन हो रहा है।

इतना ही नहीं, इसे सर्वसुलभ कराने के लिए सरकार ने कम दाम पर भी इसे उपलब्ध कराया और सुनिश्चित किया कि निजी कम्पनियाँ भी मनमानी न करे। परिणाम ये हुए कि अप्रैल-मई 2020 के लगभग 30 रुपए मूल्य की तुलना में कीमत घटकर 5.50 रुपए हो गई। इसी तरह PPE सूट्स और मास्क के विनिर्माण में अक्टूबर तक खासी बढ़ोतरी हुई और इस दौरान घरेलू स्तर पर 6 करोड़ PPE किट्स का निर्माण किया गया।

इनमें से 2 करोड़ पीपीई सूट्स का निर्यात किया गया था। 15 करोड़ से ज्यादा एन-95 मास्क का निर्माण किया गया, जिनमें से 4 करोड़ मास्क का निर्यात किया गया था। आज देश में 1,100 से ज्यादा PPE सूट्स कंपनियाँ और 200 से ज्यादा एन-95 मास्क की कंपनियाँ निर्माण कार्य में लगी हुई है। केंद्रीय वस्र मंत्री स्मृति ईरानी ने भी कहा था कि भारत ने मात्र 60 दिन में ऐसे उद्योग को स्थापित कर दिया, जो शून्य से शुरू किया गया था।

भारत को जुलाई 2020 तक 2 करोड़ से ज्यादा PPE किट और 4 करोड़ एन-95 मास्क की जरूरत थी। भारत ने महज 60 दिनों के भीतर PPE फैब्रिक निर्माता कंपनियों का एक स्वदेशी नेटवर्क विकसित कर दिया। मई के मध्य तक, भारत ने प्रति दिन 4.5 लाख बॉडी कवरऑल और 2.5 लाख एन-95 मास्क के विनिर्माण की क्षमता विकसित कर ली थी। भारत ने अमेरिका, यूके, सेनेगल, स्लोवेनिया और यूएई को PPE का निर्यात भी किया। आज एन-95 के विनिर्माण की क्षमता 200 कंपनियों के साथ 32 लाख इकाइयों तक पहुँच गई है।

जब विपक्ष प्रवासी मजदूरों को भड़का रहा था, तब रेलवे उन्हें विशेष रेलों से घर पहुँचा रही थी

भारत में लॉकडाउन लगने के बाद सबसे बड़ा खेल शुरू हुआ मुंबई और दिल्ली में, जहाँ के मजदूरों के बीच जम कर ये भ्रम फैलाया गया कि अब उनका यहाँ कुछ नहीं हो सकता और उन्हें घर चले जाना चाहिए। दिल्ली में यहाँ तक आरोप लगे कि सरकारी बसों से मजदूरों को गाजियाबाद सीमा पर ले जाकर छोड़ दिया गया। मजदूरों को भड़काया गया, ताकि देश में अराजकता फैलाई जा सके। मुंबई के बांद्रा में इसी तरह हजारों मजदूर जुटे।

नतीजा ये हुआ कि हजारों मजदूर दिल्ली और मुंबई से पैदल ही यूपी-बिहार और झारखण्ड जैसे राज्यों के लिए निकलने लगे, जहाँ उनका घर था। इन सबके बीच सोनू सूद की खूब चर्चा हुई और बताया गया कि उन्होंने हर ट्वीट और मदद की अपील का संज्ञान लेकर काफी को घर पहुँचाया। सीरम योगी ने मुफ्त में इन मजदूरों के लिए बस, क्वारंटाइन और भोजन सेवा मुहैया कराने के साथ-साथ पुलिस को आदेश दिया कि मजदूरों के साथ कोई कड़ाई नहीं हो।

मीडिया भी चुन-चुन कर इन मजदूरों की तस्वीरें अपलोड कर के और उनकी कहानियाँ सुना कर ये बताने लगी कि कैसे सरकार का लॉकडाउन पूरी तरह फेल हो गया है और ये गरीब विरोधी है। पूरे देश में सोनू सूद ही एक मसीहा है, ऐसा प्रचारित किया जाने लगा। कहीं पुलिस ने अगर मजदूरों को रोका तो इसके वीडियो निकाल कर लाए गए। मोदी सरकार को CAA के समय जैसे मुस्लिम विरोधी बताया गया, वैसे ही अब मजदूरों का इस्तेमाल हुआ।

जबकि, इसकी असली वजह ये थी कि महाराष्ट्र और दिल्ली की सरकारें किसी अन्य राज्य के गरीब नागरिकों का भार अपने ऊपर नहीं लेना चाहती थी। ऐसे समय में सीएम खट्टर जैसे नेता भी थे, जिन्होंने बिहार के मजदूरों का ख्याल भी रखा और बिहार से रुपए भी नहीं लिए। लेकिन, AAP और MVA की सरकारें ऐसी नहीं थीं। मजदूरों के इन राज्यों से घर लौटने पर उलटा उन्होंने राहत की ही साँस ली। उनके साथ सौतेला व्यवहार किया।

लेकिन, अगर बात किसी की नहीं हुई तो भारतीय रेलवे की। इस कठिन समय में जब महामारी के वक़्त दुष्प्रचार कर के राजनीति चमकाई जा रही थी, भारतीय रेलवे ने उन लाखों मजदूरों को अपने घर वापस पहुँचाने का बीड़ा उठाया और वो भी निःशुल्क। लेकिन, किसी ने भी केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ये ये संभव कर दिखाने वाले सैकड़ों रेल कर्मचारियों की तारीफ नहीं की, जिन्होंने फ्रंटलाइन वारियर्स की तरह कार्य किया।

जून 2020 तक लगभग 60 लाख लोगों को उनके गंतव्‍य राज्‍यों तक पहुँचाने के लिए भारतीय रेलवे द्वारा 4347 से ज्‍यादा श्रमिक स्‍पेशल ट्रेने चलाई जा चुकी थीं। इसके बाद भी इन श्रमिक ट्रेनों की सेवा जारी ही रखी गई, क्योंकि राज्यों का ऐसा अनुरोध था। राज्‍यों से अनुरोध प्राप्‍त होने पर 24 घंटे के भीतर श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को उपलब्‍ध कराया जाता था। सभी राज्यों के प्रधान सचिवों को पत्र लिख कर इस बाबत बता दिया गया था।

मई 2020 के ख़त्म होने तक के आँकड़ों की बात करें तो ये शीर्ष 5 राज्य थे, जहाँ से सबसे ज्यादा ट्रेनें रवाना हुईं- गुजरात (1026 ट्रेन), महाराष्ट्र (802 ट्रेन), पंजाब (416 ट्रेन), उत्तर प्रदेश (294 ट्रेन) और बिहार (294 ट्रेन)। वहीं गंतव्य राज्यों में ट्रेनों ट्रेनों की संख्या कुछ यूँ थी – उत्तर प्रदेश (1682 ट्रेन), बिहार (1495 ट्रेन), झारखंड (197 ट्रेन), ओडिशा (187 ट्रेन), पश्चिम बंगाल (156 ट्रेन)। इनके अलावा 15 जोड़ी राजधानी जैसी ट्रेनें भी संचालित की जाती थीं।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में तकनीक बना हथियार

लॉकडाउन के बाद जब अनलॉक का फेज शुरू हुआ था, तब भी सरकार ने उन क्षेत्रों पर विशेष नजर बनाई हुई थी, जहाँ कोरोना मामलों की संख्या ज्यादा थी। उन इलाकों को ‘रेड जोन’ में रखा गया और वहाँ ज्यादा कड़ाई की गई। कई चरणों में हुए अनलॉक के दौरान कन्टेनमेंट जोन्स में सावधानी पूर्ववत ही रखी गई। सितम्बर के अंत में जब अनलॉक 4 लागू था, तब भी कन्टेनमेंट जोन्स में सिनेमा हॉल या स्विंग पूल वगैरह खोलने की अनुमति नहीं थी।

ब्लूटूथ पर आधारित किसी से संपर्क साधने, संभावित हॉटस्पॉट्स का पता लगाने और कोविड-19 के बारे में प्रासंगिक जानकारी के प्रचार-प्रसार के लिए केंद्र सरकार ने ‘आरोग्य सेतु‘ नामक एप बनाया और तकनीक को कोरोना के खिलाफ लड़ाई में अपना हथियार बनाया। पूरे देश में 16 करोड़ से अधिक लोगों ने इसे डाउनलोड किया और इसका प्रयोग किया। मई 2020 तक ही ‘आरोग्य सेतु’ 3500 से अधिक हॉटस्पॉट्स की पहचान कर चुका था।

लेकिन, मीडिया का एक हिस्सा इसे लेकर भी प्रपंच फैलाता रहा। अफवाह फैलाई गई कि सरकार व्यक्तिगत डेटा इकठ्ठा कर के इसे सार्वजनिक कर रही है। सरकार ने इसके बाद एप के सोर्स कोड को ही सार्वजनिक कर दिया, जिसके बाद कोई भी इसे देख सकता था और विशेषज्ञ सरकार की मदद भी कर सकते थे। सरकार द्वारा ऐसी पारदर्शिता दिखाने के बाद इसका विरोध करने वाले फुस्स हो गए।

अर्थव्यवस्था के ऊपर लोगों की जान बचाने को दी गई तरजीह

जहाँ तक भारत की GDP की बात है, पीएम मोदी खुद कई बार कह चुके हैं कि सरकार ने लोगों की जान बचाने को आर्थिक विकास से ज्यादा प्राथमिकता दी। कोरोना संक्रमण से पहले ही पूरी दुनिया में मंदी का माहौल था और भारत भी इससे अछूता नहीं था। परिणाम ये हुआ कि जनवरी-मार्च के बीच भारत की GDP 3.1% रही, जबकि पिछले साल इसी अवधि में अर्थव्यवस्था 5.2% की गति से बढ़ी थी। वहीं अगर जनवरी-जून तक के आँकड़ों की बात करें तो GDP में पिछले वर्ष के मुकाबले 23.9% की गिरावट आई।

ये सब कुछ उद्योग-धंधों और फैक्ट्रियों के बंद रहने के कारण हुआ। लॉकडाउन का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ना ही था। आँकड़े देखें तो सबसे बड़ी गिरावट मैन्युफैक्चरिंग (39.3%) और कंस्ट्रक्शन (50.3%) में देखने को मिली। ये दोनों ही कार्य अधिकतर मानव संसाधन और परिवहन पर निर्भर हैं, जबकि ये दोनों ही लॉकडाउन के दौरान उपलब्ध नहीं थे। लेकिन, विशेषज्ञों ने ये भी माना कि अनलॉक के बाद भारत की अर्थव्यवस्था V ग्राफिकल आकर में आगे बढ़ी।

वहीं Moody ने भी भारत की अर्थव्यवस्था में संकुचन की जो उम्मीद जताई थी, उसमें सुधार किया। अंतरराष्ट्रीय संस्था ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था 2020 में 8.9% संकुचित होगी, जबकि पहले यही 9.6% संकुचन की आशंका जता रही थी। इतना ही नहीं, 2021 में भारत की अर्थव्यवस्था अब 8.6% ऊपर जाएगी, ऐसा संस्था ने अनुमान लगाया है। जबकि पहले उसने मात्र 8.1% ऊपर जाने की बात कही थी।

संस्था का कहना है कि सितम्बर के बाद जिस तरह से भारत में संक्रमण के मामले कम होते गए और चीजें धीरे-धीरे खुलती चली गईं, उससे अर्थव्यवस्था ने सकारात्मक रूप से रफ़्तार पकड़ी। संस्था ने कहा है कि अगला वर्ष वैक्सीन की उपलब्धता और सफलता पर निर्भर होगा। लेकिन, इन सबके बावजूद मीडिया का एक बड़ा वर्ग ये चिल्लाता रहा कि भारत की GDP सरकार की कमियों के कारण नीचे जा रही है। ऐसे दिखाया गया जैसे सिर्फ यहीं ऐसा हो रहा हो।

इन सबके बीच राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना मामलों का जिक्र करना आवश्यक है, जहाँ दो-दो बार केंद्र सरकार को चीजें संभालने के लिए मोर्चा बुलंद करना पड़ा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रोज-रोज बैठ कर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते रहे, मीडिया में लगातार छाए रहे और इधर कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ते रहे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद जमीन पर उतरे, तब जाकर कहीं दिल्ली में कोरोना के मामले कम होने शुरू हुए।

दिल्ली में कोरोना टाइमलाइन: जब अमित शाह ने राजधानी में बिगड़ती स्थिति को संभाला

जून 2020 में अमित शाह ने दिल्ली सीएम समेत गृह मंत्रालय और दिल्ली सरकार के अधिकारियों के साथ बैठक कर संक्रमण को नियंत्रित करने की रूपरेखा पर चर्चा की। त्वरित रूप से दिल्ली सरकार को 500 रेल कोच मुहैया कराए, जिनका इस्तेमाल आइसोलेशन और क्वारंटाइन वार्ड्स के रूप में किया गया। इनकी उपलब्धता के साथ ही राजधानी में मरीजों के लिए 8000 अतिरिक्त बेड्स की व्यवस्था हो गई और ये सब केंद्र की पहल पर हुआ।

कॉन्टैक्ट मैपिंग के लिए दिल्ली के सारे कन्टेनमेंट जोन्स में हाउस टू हाउस सर्वे किए गए और एक सप्ताह के भीतर इसकी सर्वे रिपोर्ट तैयार कर के भेजी गई। जून 2020 के मध्य में हुई इस बैठक के अगले 2 दिनों में ही टेस्टिंग की दर दोगुनी कर दी गई और उसके अगले सप्ताह में ये तिगुनी हो गई। AIIMS के एक डॉक्टरों का पैनल बनाया गया, जिसने निचले स्तर तक जाकर कोरोना के खिलाफ लड़ाई को लेकर सलाह दी।

अमित शाह ने अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए और उन पर नजर रखने के लिए CCTV कैमरे लगवाए। 500 ऑक्सीजन सिलिंडर, 440 वेंटिलेटर्स, 10,000 ऑक्सी-मीटर्स और बड़ी संख्या में एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई। मृतकों का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ किए जाने का निर्देश दिया गया। अन्य राज्यों से अच्छा तालमेल हो, इसीलिए यूपी के अधिकारियों के साथ बैठक हुई। सबकी जिम्मेदारी तय की गई।

ये वो समय था जब दिल्ली में कोरोना की आड़ में प्राइवेट अस्पतालों ने मरीजों को लूटना शुरू कर दिया था लेकिन अमित शाह ने टेस्टिंग और ट्रीटमेंट के लिए शुक्ल फिक्स किया। साथ ही नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल के नेतृत्व में एक टीम बनाई गई, जिसने सुनिश्चित किया कि दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में 60% बेड्स कम दर पर उपलब्ध हों। सभी अस्पतालों की समीक्षा हुई। NCC और NSS कैडेट्स की मदद ली गई।

आइए, आँकड़ों के जरिए देखते हैं कि कैसे दिल्ली में अमित शाह के मोर्चा संभालने के बाद से सुधार हुआ। मार्च 25 से जून 14 तक (82 दिनों में) वहाँ मात्र 2,41,000 टेस्ट्स हुए थे, जबकि इसके अगले 11 दिनों में 1,75,141 टेस्ट्स हुए। इसीलिए, अगर कोरोना के मामले ज्यादा टेस्टिंग के कारण पकड़ में आए भी तो उन्हें आइसोलेट किया गया। वहीं जहाँ पहले एक टेस्ट के लिए 5000 रुपए लगते थे, वहीं ये शुल्क इसके बाद 2400 रुपए हो गया।

जून 14 तक पूरी दिल्ली में मरीजों के लिए 9937 बेड्स उपलब्ध थे, जबकि अगले 16 दिनों में जून 30 तक इनकी संख्या बढ़ कर 30,000 हो गई। DRDO ने 250 ICU के साथ 1000 बेड्स का अस्पताल बना कर तैयार कर दिया, जिसका पूरा प्रबंधन सशस्त्र बलों के मेडिकल प्रोफेशनल्स ने संभाला। इसी तरह राधा स्वामी आश्रम में ITBP द्वारा 10,000 बेड्स का अस्पताल तैयार किया गया। ये सब 15 दिनों के भीतर ही हो गया था।

दिल्ली में अमित शाह के सक्रिय होने के बाद कुछ यूँ बदले आँकड़े

वहीं दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में आइसोलेशन बेड, बिना वेंटीलेटर के बेड और वेंटिलेटर बेड का चार्ज क्रमशः 24000-25000, 34000-43000 और 44000-54000 रुपए था। अमित शाह ने मोर्चा संभालने के बाद से ये शुल्क क्रमशः 8000-10000, 13000-15000 और 15000-18000 रुपए हो गया। सबसे बड़ी बात कि इसी शुल्क में PPE किट्स और दवाएँ भी शामिल थीं, जिनके लिए पहले अतिरिक्त चार्ज देना होता था।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई: दुनिया के मुकाबले भारत ने किया बेहतर प्रदर्शन

पूरे देश में केंद्र सरकार के प्रयासों का नतीजा ये हुआ कि आधा 2020 ख़त्म होने पर जहाँ दुनिया भर में कोरोना की मृत्यु दर (प्रति 10 लाख जनसंख्या) 63.2 थी, भारत में ये मात्र 11 थी। ये आँकड़े अमेरिका में 383, ब्रिटेन में 637, 259 और रूस में 60 था। वहीं दुनिया भर में जहाँ प्रति 10 लाख 1250 लोग संक्रमित थे, भारत में ये आँकड़ा महज 357 था। दुनिया के मुकाबले भारत का प्रदर्शन बेहतर होता चला गया।

बाकी देशों में तो स्थिति और भी भयावह थी। अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील और रूस में ये दर क्रमशः 7569, 4537, 5802 और 4254 था। उस समय तक 4594 ट्रेनों से 63 लाख प्रवासी मजदूरों को घर पहुँचाया जा चुका था। परिवहन के अन्य साधनों को मिला दें तो कुल 1.20 करोड़ लोगों ने आवागमन किया। एक तरफ जहाँ आर्थिक सुधार और आत्मनिर्भर भारत की पटकथा लिखी जा रही थी, दूसरी तरफ गरीबों को मदद दी जा रही थी।

इन सबका परिणाम ये हुआ कि नवंबर आते-आते भारत में कुल कोरोना पॉजिटिव मामलों का 6.97% ही सक्रिय रह गया। सार्वजनिक और निजी अस्पतालों में इलाज के लिए गुणवत्ता का मानक स्थापित करने के कारण भी मामलों में गिरावट आई। भारत में प्रति मिलियन मामले दुनिया में सबसे कम हो गए, जो 1 नवंबर तक 5930 था। उस समय तक भारत की प्रति मिलियन जनसंख्या में मौत दुनिया में सबसे कम 88 पर पहुँच गई।

इन सबके दौरान जहाँ दिल्ली में केंद्र के हस्तक्षेप के बाद स्थिति सुधरी, महाराष्ट्र में ये बिगड़ती ही चली गई। पुणे एक ऐसा हॉटस्पॉट बन कर उभरा, जहाँ सक्रिय मामलों की संख्या अब तक पौने 4 लाख के आँकड़े के पास पहुँच गई है। इनमें से 15 हजार मामले अब भी सक्रिय हैं। कुछ यही हाल मुंबई का रहा। वहाँ कोरोना के मामलों की संख्या 3 लाख के पास पहुँच गई। इसी तरह ठाणे में ये आँकड़ा ढाई लाख है।

कोरोना टाइमलाइन: महाराष्ट्र में स्थिति बिगड़ी, फेल हुआ वामपंथियों का केरल मॉडल

इस तरह से देश भर में कोरोना के जितने भी मामले आए, उनमें से 19% अकेले महाराष्ट्र में रहे। इसी तरह से वामपंथियों ने ‘केरल मॉडल’ का हंगामा मचाया। केरल सरकार से केंद्र व पूरे देश को सीख लेने की सलाह दी गई। ‘गोमूत्र जोक्स’ के साथ केरल की सरकार को वैज्ञानिक ढंग से काम करते हुए प्रदर्शित किया गया। जबकि सच्चाई ये है कि केरल के प्रदर्शन सबसे बेकार में से एक रहा और मात्र साढ़े 3 करोड़ की जनसंख्या वाले इस राज्य में कोरोना के साढ़े 7 लाख मामले सामने आ चुके हैं।

जब इससे पाँच गुना से भी अधिक जनसंख्या वाले राज्य में कोरोना के इससे 2 लाख मामले कम आए। आज सक्रिय कोरोना मामलों की संख्या में केरल पूरे देश के राज्यों में शीर्ष पर बैठा हुआ है और यहाँ 65,000 से भी अधिक केसेज हैं। इसके बाद 59,000 मामलों के साथ महाराष्ट्र का नंबर आता है। उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर ज़रूर है, लेकिन यहाँ कोरोना के सक्रिय मामलों की संख्या मात्र 15,000 ही बची हुई है।

इस तरह शीर्ष 5 सक्रिय मामलों वाले राज्यों (केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़) में से 4 ऐसे राज्य हैं, जहाँ भाजपा के विपक्षी दलों की सरकारें हैं। एक उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है, लेकिन वहाँ देश की सबसे बड़ी आबादी रही है और तुलनात्मक रूप से आँकड़े सकारात्मक हैं। इन सबके बावजूद मोदी सरकार पर निशाना साधने वाले उद्धव, विजयन और ममता जैसे मुख्यमंत्रियों की आलोचना नहीं करते।

मध्यम वर्ग को सरकार ने दी सहूलियत

आखिर ये संभव कैसे हुआ कि भारत आज कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में शीर्ष 10 देशों की सूची से लगभग बाहर हो गया है? इसका कारण था कि मोदी सरकार ने स्वास्थ्य और आर्थिक, दोनों ही मोर्चों पर इससे लड़ाई लड़ी। गरीबों का ख्याल रखा गया। शुरू में ही तेल मंत्रालय ने घोषणा कर दी कि 5 कईलोग गैस सिलिंडर का प्रयोग करने वाले परिवार 8 बार मुफ्त में गैस भरवा सकेंगे। 14.2 किलो वालों के लिए 3 बार ये सुविधा दी गई।

बाद में इन सुविधाओं की अवधि को आगे भी बढ़ाया गया। 8.3 करोड़ महिलाओं को 3 महीने के लिए ‘उज्ज्वला योजना’ के तहत गैस सिलिंडर मुफ्त में दिए गए। सेल्फ-हेल्प ग्रुप की महिलाओं के लिए कोलैटरल फ्री लोन की रकम दोगुनी बढ़ा कर 20 लाख रुपए कर दी गई। रेहड़ी-पटरी वालों के बिजनेस फिर से शुरू करने के लिए उन्हें 10,000 रुपए दिए गए। इससे गरीबों को नई शुरुआत करने में मदद मिली।

कर्मचारियों को ‘Employees’ Provident Fund (EPF)’ से अगले 3 महीने की सैलरी एक साथ उठाने की सुविधा प्रदान की गई। इस पर से सर्विस चार्ज भी हटा लिया गया। 2.82 करोड़ बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए 1400 करोड़ रुपए का सोशल अस्सिस्टेंस प्रोग्राम शुरू में ही तैयार कर लिया गया था। इनकम टैक्स पे करने के लिए समयसीमा आगे बढ़ाई गई। इसमें देरी होने पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क को 12% से 9% किया गया।

‘बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स फंड’ के तहत 2 करोड़ कंस्ट्रक्शन वर्करों को 3066 करोड़ रुपए की सहायता दी गई। 20 करोड़ जन-धन खातों में 500 रुपए डाले गए, जिसमें 9930 करोड़ रुपए खर्च हुए। 3 महीने तक ये धनराशि मिलती रही। महिलाओं के खातों में रुपए डाले गए। स्वास्थ्य कर्मचारियों को 50 लाख के एमडीकल इन्शुरन्स की सुविधा दी गई। ये सब तभी हो गया था, जब कोरोना के मामले 10,000 भी नहीं थे।

PM Cares फण्ड: कॉन्ग्रेस रोती रही, सरकार ने दिया पाई-पाई का हिसाब

इतना सब कुछ अप्रैल की शुरुआत में ही कर लिया गया था। पारदर्शिता बनाए रखने के लिए पीएम केयर्स फण्ड की स्थापना की गई, जिसके खिलाफ दुष्प्रचार के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने हर हथकंडा अपनाया, क्योंकि इसमें पीएम रिलीफ फण्ड की तरह कॉन्ग्रेस के किसी नेता को ट्रस्टी नहीं बनाया गया था। पीएम केयर्स फण्ड में लोगों ने जम कर योगदान दिया। PMO ने भी देश की जनता को इसके खर्च के पाई-पाई का हिसाब दिया

आरोप लगे कि यूपीए के वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) राजीव गाँधी फाउंडेशन को पैसे दान कर रहा था और सार्वजनिक धन परिवार के खातों में डाइवर्ट कर दिया गया था। सवाल उठे कि PMNRF का पैसा संकट के समय लोगों की मदद के लिए होता है लेकिन यूपीए के दौर में राजीव गाँधी फाउंडेशन को पैसे दान कर रहा था। फाउंडेशन को चीन से भी 3 बार वित्तीय सहायता मिली थी।

पीएम केयर्स (प्राइम मिनिस्‍टर्स सिटीजन असिस्‍टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशन्‍स) फंड ट्रस्‍ट ने कोविड-19 के खिलाफ जंग के लिए मई 2020 के मध्य में 3100 करोड़ रूपए का आवंटन किया गया। इसमें से 2000 करोड़ रुपए की धनराशि वेंटिलेटर्स की खरीद के लिए निश्चित की गई। 1000 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग प्रवासी कामगारों की देखरेख के लिए किया गया। उन्हें विभिन्न योजनाओं का लाभ दिया गया।

इन सबके अलावा 100 करोड़ रुपए की राशि वैक्‍सीन के विकास में सहायता के लिए दी गई। हाल ही में हमने देखा कि किस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद जाकर तीनों जगह लैब्स में बन रही कोरोना वैक्सीन के बारे में जाना और स्थिति की समीक्षा की। वहाँ के अधिकारियों तक ने भी कहा कि प्रधानमंत्री को पूरी प्रक्रिया की अच्छी समझ है और उन्हें हर बारीकी की जानकारी भी है।

पीएम केयर्स फण्ड से कुल 50000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स की खरीद की गई। ध्यान दीजिए कि पिछले 70 वर्षों में 48,000 वेंटिलेटर्स ही थे। इन वेंटिलेटर्स को राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा संचालित अस्पतालों में फिट किया गया। प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के निरीक्षण में वैक्सीन के लिए जारी की गई धनराशि का उपयोग किया गया। भारतीय शैक्षिक समुदाय, युवाओं के स्टार्टअप्स और बड़े उद्योगों, सभी को वैक्सीन निर्माण के लिए प्रेरित किया गया।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सभी देशों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चला भारत

इन सबके दौरान भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद में भी हाथ पीछे नहीं खींचे। यहाँ तक कि फरवरी में चीन को भी 15 टन मास्क और ग्लव्स सहित अन्य मेडिकल उपकरणों की मदद की गई। इनमें 1 लाख मास्क्स, 5 लाख ग्लव्स, 75 इन्फ्यूजन पम्प्स और 30 इंटरनल फीडिंग पम्प्स शामिल थे। SAARC देशों की मदद के लिए भारत ने 74 करोड़ रुपए दिए और उन्हें कोरोना के खिलाफ लड़ाई में चर्चा की। सलाहों का आदान-प्रदान हुआ।

कुवैत में 15 डॉक्टरों की टीम भेजी गई। इसके बाद भारत ने 108 देशों में 8.5 करोड़ हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन टेबलेट्स, और 50 करोड़ पेरासिटामोल टेबलेट्स की खेप भेजी। मालदीव्स, मॉरीशस, मडागास्कर और कैमरून जैसे देशों में INS केसरी के माध्यम से मदद की खेप पहुँचाई गई। गल्फ देशों की भी मदद की गई। भारत ने हर देश के साथ समन्वय बना कर जाना कि वो कोरोना से कैसे लड़ रहे हैं और कौन सी तकनीक अपना रहे हैं।

सबसे बड़ी बात तो ये कि भारत की जनता के साथ सीधे संवाद करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी राष्ट्र को सम्बोधित कर के तो कभी ‘मन की बात’ के जरिए लगातार जागरूकता फैलाने का काम जारी रखा और लोगों को सतर्कता और सावधानी से जुड़ी एक-एक बात समझाई। उन्होंने सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए राष्ट्र को सम्बोधित किया। किसी भी राष्ट्राध्यक्ष ने इतनी सक्रियता नहीं दिखाई।

हाँ, इस दौरान सरकार ने विकास कार्यों को ठप्प नहीं होने दिया। वाराणसी से लेकर गुजरात और मध्य प्रदेश से लेकर पूर्वोत्तर तक लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर विकास कार्य होते रहे और पीएम मोदी इन परियोजनाओं के उद्घाटन व शिलान्यास में व्यस्त रहे। अपने हर भाषण में उन्होंने जनता को कोरोना को लेकर जागरूक किया। इसी दौरान सादगी के साथ राम मंदिर का भूमिपूजन भी हुआ, जिसमें पीएम मोदी भी शरीक हुए। जनता ने टीवी पर ये कार्यक्रम देखा।

सरकार इस दौरान पूरी पारदर्शिता बरतते हुए आँकड़ों को भी जारी करती रही। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रधान सचिव नियमित रूप से प्रतिदिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संक्रमण के आँकड़ों और इससे निपटने के लिए होने वाले उपायों की जानकारी देते रहे। सरकारी वेबसाइटों पर आँकड़े लगातार अपडेट किए जाते रहे। विपक्ष शाहीन बाग़ से शुरू होकर हाथरस तक, अराजकता में ही मशगूल रहा। सरकार काम करती रही।

S02E07: 2015 में मंडी के खिलाफ, ’20 में वही सही है बकैत? | Ravish u-turns on mandi, adhatiyas

अप्रैल 2015 में मंडी, आढ़तिया किसान के शोषक थे, अब पोषक हैं! जेनरेटर चुराने वाले किसानों पर चुप… 1500 टावर को क्षति पहुँचाने वालों पर चुप…

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दूसरी शादी की बात पर बंधक बना कर पीटते थे पिता-भाई: कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री पर बेटी का आरोप, महिला आयोग ने छुड़ाया

दिल्ली महिला आयोग ने कॉन्ग्रेस शासन के दौरान दिल्ली सरकार में मंत्री रहे राजकुमार चौहान की बेटी को पश्चिम विहार स्थित उसके मायके से सकुशल मुक्त कराकर शेल्टर होम भेज दिया है। पीड़िता ने महिला आयोग में शिकायत कर अपने पिता और भाई पर बंधक बनाकर मारपीट करने का आरोप लगाया है। महिला आयोग ने इस बाबत कोई मामला नहीं दर्ज करने पर दिल्ली पुलिस को एक नोटिस जारी किया और एक जनवरी तक सारी जानकारी मुहैया करने का निर्देश दिया है।

महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने बताया कि शीला दीक्षित सरकार में मंत्री रहे और चार बार के विधायक राजकुमार चौहान की बेटी ने एक पत्र के जरिए अपनी शिकायत दिल्ली सरकार को दी। जिसमें उसने आरोप लगाया गया कि उसे उसके पिता मायके में बंधक बनाकर रखे हुए है और उससे मारपीट की जाती है। पत्र में पीड़िता ने उसे मुक्त कराने की गुहार लगाई थी। शिकायत पर संज्ञान लेकर आयोग की टीम गठित की गई। टीम सोमवार (दिसंबर 28, 2020) रात दिल्ली पुलिस को लेकर पश्चिम विहार के उक्त पते पर दबिश दी। 

टीम से मुलाकात के दौरान पीड़िता ने टीम को बताया कि उसकी शादी साल 1999 में हुई थी। उसकी दो बेटियाँ हैं। पति के साथ मतभेद के चलते पिछले दस साल से वह मायके में रह रही हैं। उसका पति के साथ चंडीगढ़ में तलाक का मामला चल रहा है। पीड़िता का आरोप है कि उसके पति ने दूसरी महिला से शादी कर ली। जब उसने शादी करने की कोशिश की तो पिता और भाई ने राजनीतिक छवि खराब होने के डर से ऐसा नहीं करने दिया। 

उसके पिता उसे घर में बंधक बनाकर रखे हैं। पिता और भाई उसके साथ मारपीट करते हैं। पीड़िता की छोटी बेटी ने भी मारपीट की बात की पुष्टि की। बच्ची ने बताया कि आज से 2 साल पहले माँ के साथ बुरी तरह मारपीट हुई थी, जिसकी वजह से उनके सिर से खून भी निकला था।

आयोग की टीम पीड़िता व उसकी बेटियों को पुलिस स्टेशन ले गई। जहाँ उनकी काउंसलिंग की गई। पीड़िता ने लिखित में दिया कि वह पिता के साथ नहीं रहना चाहती और उनके खिलाफ कार्रवाई चाहती है। कानूनी प्रक्रिया के बाद पीड़िता को शेल्टर होम भेज दिया गया। पुलिस ने इस मामले में कोई शिकायत दर्ज नहीं की है और सिर्फ डेली डायरी में एंट्री की है। जिस पर महिला आयोग ने नाराजगी जाहिर करते हुए पुलिस को नोटिस भेजा है। आयोग ने पीड़िता और उसके बच्चों के सुरक्षा इंतजाम की भी माँगी है।   

‘जय श्रीराम’ के बैनर पर FIR, सोशल मीडिया पर CM की आलोचना से गई नौकरी: 2020 में राज्य सरकारों की तानाशाही

2020 में कई ऐसे मौके सामने आए जब यह देखने को मिला कि अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का प्रयास किया गया। नागरिकों के अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को ताक पर रख कर राज्य सरकारों ने तानाशाही के तमाम उदाहरण पेश किए। राज्य सरकारों के कार्रवाई से यह स्पष्ट हो गया कि वह आलोचना झेलने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी और जिसने भी ऐसा करने का प्रयास किया, उसके खिलाफ मानहानि या फिर FIR दर्ज किए गए। कुछ लोगों को तो अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। आज हम आपको 2020 की ऐसी ही टॉप 10 खबरों से रुबरु करवाते हैं।

1. फेसबुक पर CM पिनराई विजयन की आलोचना पड़ी भारी: एयरपोर्ट कर्मचारी को धोना पड़ा नौकरी से हाथ

केरल के कन्नूर इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (KIAL) के एक स्टाफ मेंबर केएल रमेश को फेसबुक पोस्ट के कमेंट सेक्शन में केरल के सीएम पिनराई विजयन के खिलाफ आलोचनात्मक टिप्पणी करने के बाद नौकरी से निकाल दिया गया। दरअसल रमेश ने 20 नवंबर को पद्मनाभस्वामी मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संबंध में अपने फेसबुक पोस्ट पर केरल के सीएम और राज्य सरकार की आलोचना की थी। 

उनके फेसबुक पोस्ट के खिलाफ कई ‘शिकायतें’ सामने आई। जिसके बाद KIAL ने मामले का संज्ञान लिया और अधिकारियों ने जाँच का आदेश दिया था। रमेश को पोस्ट के लिए कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया, जिसे कथित तौर पर अनुशासनात्मक मानदंडों का उल्लंघन माना गया था। बता दें कि सीएम पिनाराई विजयन भी KIAL के अध्यक्ष हैं।

2. केरल में ‘जय श्री राम’ और छत्रपति शिवाजी का बैनर लगाने पर बीजेपी कार्यकर्ताओं पर केस दर्ज

केरल की पुलिस ने 17 दिसंबर 2020 को तमाम भाजपा कार्यकर्ताओं पर एक विशालकाय बैनर फहराने के लिए मामला दर्ज कर लिया। यह बैनर पलक्कड़ म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की इमारत पर फहराया गया था और इस बैनर पर ‘जय श्रीराम’ लिखा हुआ था। यह घटना केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में हुई भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद हुई थी।  

पलक्कड़ म्युनिसिपल सचिव बालाराम द्वारा की गई शिकायत के बाद पुलिस ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर मामला दर्ज किया था। शिकायत के दौरान सचिव ने यह भी कहा कि इस घटना के ज़रिए सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश हुई थी। बुधवार (16 दिसंबर 2020) को तमाम भाजपा कार्यकर्ता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की इमारत के सामने केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत का जश्न मना रहे थे। इस दौरान मौके पर भाजपा समर्थित नारे भी लगाए गए।

3. उद्धव ठाकरे को धृतराष्ट्र और उनके बेटे को पेंगुइन कहने पर फेसबुक यूजर के खिलाफ कार्रवाई

एक फेसबुक यूजर द्वारा महाराष्ट्र के सीएम की तुलना धृतराष्ट्र से और अदित्य ठाकरे को पेंगुइन कहने पर 10 लाख रुपए के मानहानि का मुकदमा ठोका गया। महाराष्ट्र सरकार की आलोचना करने वाले अपने फेसबुक पोस्ट की वजह से मुंबई के कमाठीपुरा के रहने वाले बालकृष्ण दीकोंडा (Balakrishna Deekonda) मुसीबत में पड़ गए। मुख्यमंत्री और राज्य सरकार ने उन्हें सीएम और उनकी सरकार की प्रतिष्ठा को खराब करने का आरोप लगाते हुए एक वैधानिक नोटिस भेजा। मुंबई स्थित अधिवक्ता प्रकाश यू सुतार के माध्यम से भेजे गए नोटिस में दीकोंडा के कई पोस्ट को कोट करते हुए कहा गया था कि इनमें सीएम और सरकार के लिए बदनाम करने वाले और अपमानजनक बयान हैं।

4. आदित्य ठाकरे को ‘बेबी पेंग्विन’ और उद्धव को कहा औरंगजेब: नागपुर के युवक पर FIR दर्ज

इसी तरह मुंबई पुलिस ने ट्विटर पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी, उनके बेटे और पर्यटन मंत्री आदित्य ठाकरे को ‘बेबी पेंग्विन’ और ऊर्जा मंत्री नितिन राउत के खिलाफ भद्दे पोस्ट करने के लिए समित ठक्कर नाम के एक युवक के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

शिकायत के अनुसार, तीस वर्षीय आरोपित नागपुर निवासी समित ठक्कर ने जून 01, जून 30 और जुलाई 01 को ठाकरे और राउत के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक पोस्ट किए थे। ऐसे ही एक ट्वीट में समित ठक्कर ने उद्धव ठाकरे को औरंगज़ेब और आदित्य ठाकरे को ‘बेबी पेंग्विन’ कहा था।

वीपी रोड पुलिस ने गत सोमवार को समित ठक्कर पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत मानहानिकर लेख लिखने और अश्लील लेख प्रसारित करने, ड्रॉइंग या फिर किसी अन्य तरह से अपमानित करने पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया।

5. उद्धव ठाकरे की आलोचना करने पर महाराष्ट्र पुलिस ने किया ट्विटर यूजर को गिरफ्तार

एक और मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करने पर सुनैना होले नाम की एक ट्विटर यूजर को गिरफ्तार कर लिया। सुनैना के खिलाफ़ शिवसेना की यूथ विंग के नेता रोहन चव्हाण ने नालासोपारा के तुलिंज थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।

अपनी शिकायत में चव्हाण ने कहा था कि सुनैना ने ट्विटर पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक पोस्ट किया। शिकायत में सुनैना के रियल अकॉउंट के अलावा @NidarNaari अकाउंट का उल्लेख किया गया। उन्होंने बताया कि सुनैना बैकअप अकॉउंट के रूप में इसे चलाती हैं। चव्हाण ने शिकायत में कहा कि सुनैना ने अपने बेहद आक्रामक पोस्ट के जरिए शिवसेना प्रमुख और उनके बेटे की छवि को सोशल मीडिया पर बिगाड़ने का प्रयास किया।

6. मुंबई पुलिस ने दर्ज की Republic TV के 1000 मीडियाकर्मियों के खिलाफ FIR

मुंबई पुलिस को कथित रूप से बदनाम करने के आरोप में अक्टूबर 23, 2020 को समाचार चैनल Republic TV के 4 पत्रकारों समेत चैनल के लगभग सभी मीडियाकर्मियों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। Republic TV मीडिया नेटवर्क ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इतिहास में पहली बार किसी न्यूज़ चैनल के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हुई है।

एक अधिकारी ने कहा था कि शहर के एनएम जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में शहर पुलिस आयुक्त के खिलाफ ‘विद्रोह’ के बारे में चैनल द्वारा चलाई गई एक रिपोर्ट से संबंधित था।

अधिकारी ने कहा था कि FIR पुलिस की धारा 3 (1) के तहत दायर की गई है। इसमें एंकर और डिप्टी न्यूज एडिटर शिवानी गुप्ता, एंकर और सीनियर एसोसिएट एडिटर सागरिका मित्रा, डिप्टी एडिटर शवन सेन और कार्यकारी संपादक निरंजन नारायणस्वामी का नाम था।

रिपब्लिक चैनल का कहना था कि चैनल की पूरी एडिटोरियल टीम के खिलाफ FIR दर्ज की गई, जिसका मतलब था कि करीब 1000 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। रिपब्लिक टीवी ने इसे ‘मीडिया अधिकारों पर हमला’ करार देते हुए कहा था कि चैनल बदले की भावना से की जा रही कार्रवाई के खिलाफ हर ‘मजबूत रणनीति’ से लड़ेगा, मुंबई पुलिस आयुक्त संविधान और कानून से ऊपर नहीं है।

7. मुंबई पुलिस ने अर्णब, उनकी पत्नी व बेटे पर भी दर्ज की FIR, पुलिस को पीटने का लगाया आरोप

मुंबई पुलिस ने बुधवार (नवंबर 4, 2020) शाम को रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी और उनकी पत्‍नी, बेटे और दो अन्‍य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। उन्‍होंने गिरफ्तार करने गए पुलिस अधिकारियों के सामने विरोध दर्ज कराया था। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 353, 504, 506 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

इस एफआईआर में कहा गया था कि जब पुलिस की टीम अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार करने उनके घर पहुँची तो उस दौरान उन्होंने महिला पुलिस अधिकारी सुजाता तानवडे से मारपीट की। जबकि सामने आए वीडियो में स्पष्ट दिख रहा था कि अर्णब के साथ मुंबई पुलिस द्वारा धक्का-मुक्की और मारपीट की गई।

8. सुशांत सिंह मामले में ‘बड़ा खुलासा’ करने पर मुंबई पुलिस ने वकील विभोर आनंद को किया गिरफ्तार

सुशांत सिंह राजपूत मामले में न्याय माँग रहे वकील विभोर आनंद को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। सोशल मीडिया रिपोर्ट्स और वकील विभोर आनंद के समर्थकों के अनुसार, 15 अक्टूबर 2020 की दोपहर मुंबई पुलिस साइबर सेल ने उन्हें दिल्ली से गिरफ्तार किया। इसके बाद रात के लगभग 8 बजे मुंबई पुलिस साइबर सेल के अधिकारी उन्हें फ्लाइट से मुंबई लेकर गए थे।

इससे पहले मुंबई की सिविल कोर्ट ने विभोर आनंद समेत कई लोगों को सुशांत सिंह मामले में अरबाज़ खान का नाम शामिल करने से मना किया था। अदालत की तरफ से यह प्रतिक्रिया ठीक उस वक्त आई थी, जब अरबाज़ खान ने सुशांत सिंह राजपूत मामले में अपना नाम घसीटे जाने पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। इसके अलावा अभिनेता ने यह भी कहा था कि इस मामले में सोशल मीडिया पर उन्हें लेकर कोई टिप्पणी या विचार नहीं साझा किए। 

9. किसान चौपाल से कॉन्ग्रेस भड़की, राजस्थान में 800 पर FIR

किसानों के हित में तीनों कृषि कानूनों का विरोध करने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस की राज्य सरकारें किसानों के खिलाफ ही मामले दर्ज करवाए। राजस्थान में भाजपा की चौपाल में जुटे सैकड़ों किसानों पर FIR दर्ज की गई। राजस्थान में भाजपा ने तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे दुष्प्रचार को रोकने के लिए कई चौपाल के आयोजन का कार्यक्रम बनाया था, जिसमें किसानों को इन कानूनों के फायदे गिनाए जाने थे।

राजस्थान की पुलिस ने भाजपा नेता भूपेंद्र यादव समेत उन 800 किसानों के खिलाफ FIR दर्ज की थी, जो चौपाल में शामिल हुए थे। पुलिस ने इन सभी के खिलाफ मामला दर्ज करने के लिए महामारी एक्ट का सहारा लिया। डेढ़ दर्जन भाजपा नेताओं के साथ-साथ चौपाल में उपस्थित किसानों के खिलाफ FIR दर्ज किया गया। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी ने इस घटना की निंदा करते हुए पूछा था कि क्या राजस्थान में कॉन्ग्रेस के राज में कोई लोकतंत्र बचा भी है?

10. सिलीगुड़ी में BJP कार्यकर्ता की हत्या के बाद बंगाल पुलिस ने भाजपा नेताओं पर ही कर दी कार्रवाई

पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में दिसंबर 7, 2020 को हुई हिंसा में भाजपा कार्यकर्ता की मौत के बाद राज्य पुलिस ने भाजपा के ही कई दिग्गज नेताओं के ख़िलाफ़ मुकदमा दायर कर दिया। पुलिस ने बंगाल में भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय और राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष समेत कई नेताओं का नाम एफआईआर में शामिल किया था। 

ये पूरा मुकदमा IPC की गैर जमानती धाराओं के तहत दर्ज हुआ था। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि आरोपितों ने सरकारी मुलाजिमों पर हमला बोला। पुलिस द्वारा लगाई बैरिकेडिंग को तोड़ा और प्रदर्शन के दौरान आगजनी और पत्थरबाजी की। पुलिस द्वारा एफआईआर में नाम लिखे जाने के बाद राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष ने इसे राज्य सरकार का अंत कहा।

तुम्हारा हाल भी कमलेश तिवारी जैसा होगा: कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव को पाकिस्तान के नम्बर से मिली जान से मारने की धमकी

मशहूर कॉमेडियन और उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद के प्रमुख राजू श्रीवास्तव को जान से मारने की धमकी मिली है। राजू श्रीवास्तव ने एक वीडियो शेयर करते हुए बताया है कि उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं कि उनका हाल कमलेश तिवारी जैसा कर दिया जाएगा। हास्य कलाकार ने कहा कि उन्हें और उनके सहयोगियों, अजीत सक्सेना और गरवित नारंग को भी धमकी भरे फोन आ रहे हैं।

वीडियो में राजू श्रीवास्तव कह रहे हैं, “जब देश पर कोई भी आक्रमण करता है, चाहे वो चीन हो या पाकिस्तान, आपकी तरह मैं भी गुस्से में आ जाता हूँ। मेरा सारा आक्रोश मेरी कॉमेडी में निकलता है और इस तरह से मैं देश के दुश्मनों को अपनी कॉमेडी के जरिए लताड़ता हूँ, गालियाँ देता हूँ। हर हिंदुस्तानी का फर्ज है कि अपने देश के साथ खड़ा हो, इंडियन आर्मी को अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करे। मेरी कॉमेडी ही मेरा हथियार है लेकिन ऐसा करने पर मुझे पाकिस्तान की ओर से धमकी भरे कॉल आ रहे हैं।”

राजू श्रीवास्तव ने इस मामले को गंभीरता से लेने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से संपर्क किया है। राजू श्रीवास्तव ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि कुछ अज्ञात लोग उन्हें डराने और परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं। हास्य अभिनेता ने वीडियो में बताया कि फोन पर उन्हें कहा जा रहा है कि उनके बच्चों को मार दिया जाएगा और उनका हाल कमलेश तिवारी जैसा होगा।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष 18 अक्‍टूबर, 2019 को नाका थाना क्षेत्र में हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी की उनके घर में हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में कई मौलवियों के नाम सामने आए थे। इसके बाद यूपी पुलिस और गुजरात एटीएस की कार्रवाई में कई लोग गिरफ़्तार किए गए थे। मुख्य आरोपित अशफ़ाक़ और मोईनुद्दीन ने स्वीकार किया था कि पैगम्बर मुहम्मद पर दिए गए बयान के कारण उन्होंने हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की बेरहमी से हत्या कर दी। इस मामले में बरेली के मौलाना सैयद कैफ़ी अली का नाम भी सामने आया था। उसने हत्यारोपितों की मदद की थी और उन्हें संरक्षण दिया था।

राजू श्रीवास्‍तव के साथ यह पहला मामला नहीं है। बीते वर्ष मई में उनसे रंगदारी माँगी गई थी। एक वीडियो द‍िखाकर उन्‍हें ब्‍लैकमेल कर रंगदारी माँगी गई थी जिसकी शिकायत उन्‍होंने यूपी के डीजीपी से की थी। लखनऊ की हजरतगंज पुलिस ने मामला दर्ज कर रंगदारी मामले में एक शख्स को गिरफ्तार किया था।

सात साल पहले भी मिली थी धमकी

7 साल पहले भी मुंबई में राजू श्रीवास्तव को पाकिस्तान के कराची और दुबई से फोन कॉल पर जान से मारने की धमकी दी जा चुकी है। इसे लेकर उन्होंने महाराष्ट्र में एफआईआर दर्ज कराई थी। बता दें कि राजू श्रीवास्‍तव इन दिनों नोएडा में बनने वाली फ‍िल्‍मसिटी को लेकर चर्चा में हैं। वह कई बार यूपी की फ‍िल्‍मसिटी के मामले में दुबई गैंग पर निशाना साध चुके हैं।