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15 दिन में 2.75 लाख गाँव में लगेगी भगवान राम की प्रतिमा, इन्हीं गाँवों से 30 साल पहले राम मंदिर के लिए आई थी ईंटे

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से पहले विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने एक बड़े कार्यक्रम का बीड़ा उठाया है। विश्व हिन्दू परिषद देश के 2.75 लाख गाँवों में भगवान राम की प्रतिमा लगाएगी। ‘रामोत्सव’ नाम से चलने वाला यह कार्यक्रम 25 मार्च को शुरू होगा और 8 अप्रैल को इसका समापन होगा। साल 1989 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान इन्हीं गाँवों से अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए ईंटें आई थीं।

अयोध्या में राम मंदिर के लिए आंदोलन में VHP की भूमिका काफी सक्रिय रही है और अब निर्माण से पहले उसने एक बड़े कार्यक्रम की घोषणा की है। VHP की नज़र राम मंदिर के लिए पुजारियों पर भी है। वह मंदिर के लिए दलित पुजारी चाहती है। VHP का मानना है कि दलित पुजारी की नियुक्ति के जरिए सामाजिक समरसता का बड़ा संदेश दिया जा सकता है। VHP का यह भी कहना है कि मंदिर का निर्माण सरकार नहीं समाज के पैसों से किया जाए।

VHP चाहता है कि ट्रस्ट में राजनीतिक लोगों को शामिल न किया जाए।ख़बर के अनुसार, VHP के प्रवक्ता विनोद बंसल का कहना है कि ट्रस्ट का काम सरकार को करना है, इसमें हमारा किसी तरह से कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। यदि दलित पुजारी की नियुक्ति होती है तो उसका स्वागत है। VHP दलित पुजारियों को तैयार करने में लंबे समय से जुटा हुआ है। VHP में धर्माचार्य सम्पर्क विभाग और अर्चक पुरोहित विभाग बनाकर काफी समय से अनुसूचित वर्ग के लोगों को पूजा-पाठ के लिए प्रशिक्षित कर पुजारी बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद छोटे और बड़े मंदिरों में समारोह आयोजित करेगी, वहीं ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद भी करेगी।

बता दें कि राम मंदिर आंदोलन से दलितों को जोड़ने के लिए संघ, VHP जैसे संगठन शुरुआत से ही लगे हैं। 9 नवंबर, 1989 को जब राम मंदिर का शिलान्यास हो रहा था उस समय पहली ईंट बिहार के दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों रखवाई गई थी। इसके जरिए राम मंदिर आंदोलन के पीछे सम्पूर्ण हिन्दू समाज के खड़ा होने का संदेश दिया गया था।

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए हर परिवार से 11 रुपए और एक ईंट का योगदान देने की अपील की थी। मुख्यमंत्री योगी ने यह अपील झारखंड में चुनाव रैली के दौरान की थी। झारखंड चुनावों में बीजेपी के उम्मीदवार को वोट देने के लिए लोगों से अपील करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था,“मैं उस प्रदेश से आता हूँ जिसने भगवान राम दिया और उनके शासन की प्रणाली को रामराज्य कहा गया, एक प्रणाली जिसमें नीतियाँ गरीब, युवा, महिला और समाज के हर तबके को ध्यान में रखते हुए बगैर भेद के बनाई जाती हैं। वही कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया जा रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 9 नवबंर को इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 5 सदस्यों वाली बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाने को कहा था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था। इस फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं को भी शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया था।

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित सभी मामलों को देखने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक अलग डेस्क बनाया गया है। इस डेस्क में तीन अधिकारी होंगे। इनका नेतृत्व अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार करेंगे।

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सत्ता के लिए तीन-तिकड़म में लगी थी शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी, महाराष्ट्र में 300 किसानों ने कर ली आत्महत्या

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी के नेता सरकार बनाने के लिए गुणा-भाग करने में लगे थे उसी समय बेमौसम बरसात की मार से परेशान राज्य के 300 किसानों ने आत्महत्या कर ली। पिछले चार सालों में एक महीने में किसानों के आत्‍महत्‍या की यह सबसे अधिक संख्या है। बीते साल के नवंबर महीने से पहले वर्ष 2015 में कई मौकों पर एक महीने में किसानों की आत्‍महत्‍या का आँकड़ा 300 के पार गया था। लेकिन प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहे किसानों की आत्‍महत्‍या से बेपरवाह महाराष्‍ट्र के राजनेता जोड़-तोड़ में व्‍यस्‍त रहे।

ख़बर के अनुसार, राज्‍य में अक्‍टूबर महीने में बेमौसम की भारी बारिश के बाद आत्‍महत्‍या की घटनाओं में काफी तेजी आई। इस बारिश में किसानों की 70% खरीफ़ की फसल नष्‍ट हो गई। अंतिम बार वर्ष 2015 में राज्‍य में किसानों की आत्‍महत्‍या का आँकड़ा 300 के पार पहुँचा था। राजस्व विभाग के नवीनतम आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल अक्‍टूबर से नवंबर के बीच आत्‍महत्‍या की घटनाओं में 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अक्टूबर में 186 किसानों ने आत्महत्या की थी।

राज्य के सूखा प्रभावित मराठवाड़ा क्षेत्र में नवंबर महीने में सबसे अधिक यानी 120 आत्‍महत्‍या के मामले और विदर्भ में 112 मामले दर्ज किए गए। वहीं, विदर्भ क्षेत्र से ही किसानों के आत्‍महत्‍या की सबसे अधिक ख़बरें आती रहती हैं। किसानों की आत्‍महत्‍या में अचानक आई इस तेज़ी की वजह से जनवरी से नवंबर 2019 के बीच 11 महीने में आत्‍महत्‍या के मामलों में पिछले साल इसी अवधि के दौरान हुई घटनाओं से अधिक है।

वर्ष 2019 में कुल 2,532 आत्‍महत्‍या के मामले आए जबकि वर्ष 2018 में यह आँकड़ा 2,518 था। अनुमान के मुताबिक़ बेमौसम की बारिश से राज्‍य के एक करोड़ किसान प्रभावित हुए जो स्‍वीडन की कुल जनसंख्‍या के बराबर है। यह राज्‍य के कुल किसानों की संख्‍या का दो तिहाई है। इनमें से लगभग 44 लाख किसान मराठवाड़ा क्षेत्र के रहने वाले हैं। अब राज्‍य सरकार इन किसानों को मुआवज़ा दे रही है।

अधिकारियों ने बताया कि प्रभावितों को अब तक 6,552 करोड़ रुपए वितरित किए जा चुके हैं। महा विकास आघाडी सरकार ने भी दिसंबर 2019 में दो लाख तक के कर्ज़-माफ़ी की घोषणा की थी। इससे पहले की भाजपा नीत सरकार ने 2017 में कर्ज़-माफ़ी की घोषणा की थी जिसके कारण 44 लाख किसानों का 18,000 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ़ किया गया था।

वहीं, किसानों के हितों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि कर्ज़-माफ़ी और मुआवज़े से परे राज्य को खेती को और अधिक लाभदायक बनाने की ज़रूरत है। विदर्भ के कार्यकर्ता विजय जौंधिया ने कहा, “खेती की लागत और मज़दूरी काफ़ी बढ़ गई है। इस वजह से किसान एक ख़राब मौसम बर्दाश्‍त नहीं कर पाते। यही आत्‍महत्‍या की मुख्‍य वजह है। किसानों को उनके उत्‍पाद का और अधिक पैसा मिलना चाहिए। किसानी की अर्थव्‍यवस्‍था किसानों के ख़िलाफ़ झुकी हुई है।”

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CAA-NRC: कुछ कट्टरपंथियों के भीतर का हिन्दू घृणा वाला ज़हर इनकी सेकुलर केंचुली से बाहर रिस रहा है

कहते हैं आदमी ‘आदम’ से आया था। आदम को अंग्रेज़ी में एडम कहते हैं। इससे जुड़ी एक कहावत है ‘बाबा आदम के जमाने से’। हिन्दू लोग आदम में यकीन नहीं करते क्योंकि कोई मतलब नहीं है। उनका फंडा अलग है। आदमी आज के दौर में व्यक्ति को कहते हैं, मानव को कहते हैं। देश के लिए नागरिक की अवधारणा होती है जहाँ लोगों के पहचान मिट जाते हैं, और बस राष्ट्रीय पहचान होती है कि हम भारतीय है, जापानी हैं, चीनी हैं, अरबी हैं।

भारत एक सेकुलर देश माना जाता है। माना इसलिए जाता है क्योंकि इस शब्द विशेष को लोग सहूलियत से इस्तेमाल करते हैं। अमूमन सेकुलर का मतलब गैर हिन्दू या गैर दक्षिणपंथी होता है। आप लाख मुझे समझा लें कि ऐसा नहीं है, मैं नहीं मानूँगा क्योंकि मैं शब्दों को उनके स्वतंत्र अस्तित्व में, उन्हें अक्षरों का मेल भर नहीं मानता, बल्कि मैं मानता हूँ कि शब्दों के मायने काल, परिस्थिति, देश और संदर्भ में बदल जाते हैं।

सेकुलर के नाम पर आप हिन्दुओं के देवी-देवताओं का अपमान कर सकते हैं, उनकी मूर्तियाँ तोड़ सकते हैं, मंदिरों को गिरा सकते हैं, उनके प्रतीक चिह्नों का उपहास कर सकते हैं, और न तो हिन्दू, न ही भारत का कोई कानून आपका कुछ कर पाएगा। उसे हमारे सेकुलर संविधान में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ कहा गया है। यही आज़ादी किसी भी गैर हिन्दू (या हिन्दू के अंग-प्रत्यंग) वाले मजहबों के ऊपर नहीं है। अगर आपने गलत संदर्भ में भी कुछ भी कह दिया, कुछ भी मतलब कुछ भी, तो दो-दो साल से घात लगा कर बैठा मजहबी आदमी आपको ऐसे रेत देगा कि लाश देखने वालों की आत्मा काँप जाएगी।

ये ‘सेकुलर इंसान’ वहीं तक नहीं रुकता। वो आपको कमेंट में, उसके ख़िलाफ़, उसके दंगों के ख़िलाफ़ लिखने पर, आपको याद दिलाएगा कि ‘तुझे भी काटेंगे साले कमलेश तिवारी की तरह, इंशाअल्लाह’। ऐसा मजहबी आदमी ऐसे दुष्कृत्यों को सम्मान की तरह देखता है। ऐसा ‘सेकुलर’ आतंकियों को, जिसने उसके पूर्वजों की बस्तियों को आग लगाया था, उनकी लड़कियों का बलात्कार किया था, उनके मंदिर तोड़े थे, और अंत में तलवार की नोक पर धर्मांतरण कर दिया था, बस इसलिए महान समझता है क्योंकि वो भी मुस्लिम हैं।

आज इनकी बात क्यों कर रहा हूँ?

आज इसलिए उनकी चर्चा हो रही है क्योंकि आम तौर पर जिन लोगों को पूरा भारत कवि, शायर, इतिहासकार, पत्रकार, धर्महीन वामपंथी समझता रहा, वो CAA और NRC के विरोध के नाम पर हो रहे दंगों को न सिर्फ सहमति दे रहे हैं, बल्कि उकसा रहे हैं मरना ही है तो लड़ कर मर जाओ। ये लोग अब रंगरेज के नीले रंग वाले नाँद से जितना दूर जा रहे हैं, इनका हरा रंग उतना ही बाहर आता जा रहा है।

हरे रंग में समस्या नहीं है, समस्या तब है जब तुम दिख तो हरे रहे हो, लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हो कि ‘हम तो नीले हैं।’ ये सारे कवि, शायर, पत्रकार, इतिहासकार, वामपंथन अचानक से आदमी से ‘मुस्लिम’ हो गए हैं। और सिर्फ मुस्लिम नहीं, वैसे मुस्लिम हो गए हैं जो सेकुलर होने की परिभाषा से कहीं बहुत दूर, भारत को ये बता रहे हैं कि इनके बापों ने भारत पर राज किया था, ये लिख रहे हैं कि तिलकधारियाँ नहीं चलतीं, ये कह रहे हैं कि भारत माता की जय कम्यूनल है, और ला इलाहा इल्लल्लाह बिलकुल भी कम्यूनल नहीं, ये चिल्ला रहे हैं कि मुस्लिमों के साथियों को मजहबी नारे का सम्मान करना ही होगा…

और ये सारी इस्लामी बातें किस बात के विरोध में? एक राजनैतिक कानून के विरोध में जिसका भारत के समुदाय विशेष से कोई वास्ता नहीं। तो सवाल यह है कि ये जो मुनव्वर राणा अचानक से ‘मजहबी’ हो कर ‘मरना ही मुकद्दर है तो फिर लड़ के मरेंगे’ की बात करने लगे हैं, वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? आखिर इनको दर्द किस बात का है कि ये अभिजात्य अल्फ़ाज़ में दंगाइयों को उकसा रहे हैं कि ‘लड़ के मरो’?

आखिर ‘माँ’ के नाम पर शायरी करने वाले मुनव्वर राणा किस बात से इतने दुखी हो गए कि टिक-टॉक विडियो पर “800 वर्षों तक हमने देश पर राज किया, लेकिन हमारी हड्डी में उबाल नहीं आया, लेकिन पाँच साल से तुम्हें सत्ता मिल गई है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! बहुत ज्यादे सनक में मत रहो, वरना अगर हम अपने पर आ गए तो भागने का रास्ता नहीं रहेगा…” बोलने वाले लम्पट का परिष्कृत संस्करण बन कर ‘यही वो मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था’ लिख रहे हैं?

आखिर राहत इंदौरी ‘ये तिलकधारियाँ नहीं चलती’ कह कर ‘तिलक करने वाले हिन्दुओं को इतने घृणित लहजे में क्यों ललकार रहा है? इस आदमी को क्या समस्या हो गई है जिसकी महफिलों में समुदाय विशेष से ज्यादा हिन्दू ही हुआ करते हैं? वो तिलकधारियों को मक्कार क्यों कह रहा है? आखिर एक शायर, जिसे संवेदनशील और ग़ैर राजनीतिक माना जाता है, वो किसी पार्टी और देश के प्रधानमंत्री, और उन्हें वोट देने वालों पर शब्दों की मदद से ऐसे निशाने क्यों लगा रहा है?

आख़िर फ़ैज अहमद फ़ैज के उस नज़्म को गाने की ज़रूरत आज के भारत में क्यों पड़ती है, जहाँ लगातार दो बार, पूर्ण बहुमत से चुन कर एक प्रधानमंत्री आया है, जो नज़्म एक पाकिस्तानी तानाशाह के लिए गाई गई थी? मैं क्या संदर्भ भूल जाऊँ कि तुमने मेरे चुने हुए, लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री को पहले तो तानाशाह कहा और फिर, इस्लामी शायरी से ले कर तमाम तरीक़ों में काफिरों के लिए एक अंतर्निहित, स्थायित्व लिए हुए घृणा ली हुई बातों को दोहराया जहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ का मतलब सीधा इस बात से है कि भाजपा को ‘हिन्दुओं की पार्टी’ कहा जाता है। क्या हम इतने मूर्ख हैं कि बिम्बों को न समझ सकें?

क्या हम ये कह कर तुम्हारी बात मान लें कि वो बस एक नज़्म थी, जो गाई गई IIT कानपुर में? क्या वो नज़्म किसी ने ट्विटर पर डाली थी, एक रैंडम दिन में किसी ने अपनी प्रेमिका को भेजी थी वो नज़्म, या फिर किसी तानाशाह के लिए लिखी गई और आज के दौर में गाई गई उस नज़्म में तानाशाह मोदी है, और ‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है? हम क्या इतने मूर्ख हैं कि इस्लामी शायरी के भीतर की हिन्दू घृणा के ज़हर को समझ न सकें? तुम मोदी को हिटलर से प्रतीकात्मक तौर पर तौलते रहो, तुम नाज़ियो के चिह्न से हमारा पवित्र ‘ॐ’ बना दो, नीचे ‘फक हिन्दुत्व’ लिखो, और हम ये मान लें कि ये तो विरोध का एक तरीका है, हिन्दुत्व से मतलब हिन्दुओं से नहीं राजनैतिक विचारधारा से है!

इसी नज़्म पर एक और नौटंकी जो दिखी वो यह थी कि सारे वामपंथी और हिन्दुओं से घृणा करने वाले एक फर्जी खबर बना कर फैलाने लगे कि IIT कानपुर ने इस बात की जाँच पर एक कमिटी बिठा दी है कि ‘ये नज्म हिन्दू विरोधी है या नहीं’। जबकि सच्चाई इससे अलग यह है कि कमिटी इस बात की जाँच करेगी कि जो आयोजन हुआ वो संस्थान के नियमों के हिसाब से हुआ या नहीं, उसके बाद सोशल मीडिया पर जो बातें कही गईं, वो सही थीं, या गलत। लेकिन इरफान हबीब जैसे लोग अपना एजेंडा ठेलने से बाज नहीं आए।

जो खुद को वामपंथन कहती है। जिस वामपंथ में धर्म-मजहब की कोई पहचान है ही नहीं, वो शेहला रशीद, मुस्लिमों के मजहबी उन्मादी नारों की बात करते हुए कहती है कि अगर आप उनसे शर्मिंदा हैं तो आप हमारे सहयोगी नहीं हैं। अगर आपको इन नारों से दिक्कत है, तो आप भी समस्या का ही हिस्सा हैं। और जनाब इनके वो मजहबी नारे क्या हैं? वो नारे हैं: हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर, तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह…

ये हैं वो नारे जो एक मजहबहीन वामपंथन ‘नॉन-नेगोशिएबल मानती है। और आप फिर सोचेंगे कि एक राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन में ‘मजहबी नारों की क्या ज़रूरत है’ तो आपको जवाब नहीं मिलेगा। शेहला रशीद यह मान कर चल रही है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही सेकुलरिज्म तेल लेने चला गया था। ये बात और है कि जब इनका सेकुलरिज्म तेल ले कर वापस लौटा तो पहले जामिया में आग लगाई, फिर सीलमपुर में पेट्रोल बम फेंका, फिर लखनऊ के परिवर्तन चौक में आग लगाई, फिर बंगाल में ट्रेन फूँक दिया, बिजनौर में आग लगाई, मेरठ और अलीगढ़ को लहका दिया। वाकई, सेकुलरिज्म तेल तो बार-बार लेने गया है मोदी के आने के बाद, खास कर समुदाय विशेष का सेकुलरिज्म जहाँ वामपंथन भी खुल कर मुस्लिम हुई जा रही है!

शशि थरूर ने लम्बे समय के बाद कुछ ढंग की बात कही कि मुस्लिमों को समझना चाहिए कि CAA/NRC के प्रदर्शन में ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ जैसे नारों की जगह नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह को लाया जा रहा है। ये बात कई मुस्लिमों को नहीं पची क्योंकि उनके लिए हर प्रदर्शन विशुद्ध रूप से मजहबी है क्योंकि उनके लिए पहचान का मतलब भारतीयता, नागरिकता और सामान्य बातों से परे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है, उम्माह है, कौम है।

स्वयं को पत्रकार कहने वाली आरफ़ा खानम ने कुछ समय पहले ट्वीट किया था कि ‘हाँ, भारत माता की जय एक साम्प्रदायिक नारा है’, उसने आज पत्रकारिता को ढोंग त्यागते हुए, खुल कर सामने आ कर कहा कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, इंशाअल्लाह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक, इस्लामी कट्टरपंथी नारे नहीं हैं। इन सारे नारों को या तो आप सीधा ‘शब्दों को झुंड’ के रूप में देख सकते हैं, या फिर आप इन्हें संदर्भ में देखेंगे।

‘भारत माता की जय’ कहने से हम किसी देवी की पूजा नहीं करते, हम अपनी मातृभूमि की जय-जयकार करते हैं। यहाँ किसी का मुस्लिम होना तब तक प्रभावित नहीं होता जब तक वो इस भाव से जय-जयकार न करे जहाँ वो यह मानने लगे कि ‘अल्लाह के अलावा भी कोई है जिसे वो पूजनीय मानता है’। दूसरी बात, साम्प्रदायिक मानने के लिए किसी भी बात में नकारात्मकता आवश्यक है, वहाँ शाब्दिक या और तरह की हिंसा होनी चाहिए, मंशा होनी चाहिए नीचा दिखाने की।

मुझे नहीं लगता कि ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए कोई किसी को नीचा दिखाना चाहता है, या किसी भी प्रकार के हिंसक भाव रखता है। लेकिन, उसके उलट एक राजनैतिक कानून के विरोध में, जब हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, फक हिन्दुत्व आदि के साथ-साथ, उसी समय-काल में, उन्हीं परिस्थितियों में, उसी संदर्भ में जब ‘नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर’ गूँजता है, तो वो विशुद्ध मजहबी उन्माद है क्योंकि ये नारा तुम सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और एक दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए लगा रहे होते हो। तुम ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहो, कोई समस्या नहीं, लेकिन ये सिर्फ मजहबी जमावड़े में बोलो, राजनैतिक में घुसाओगे तो हमें याद आएगा कि तुम्हारा लक्ष्य तो गजवा-ए-हिन्द और ख़िलाफ़त तक का है।

सेकुलर होने का ढोंग, मुस्लिम होना और मुस्लिम होने का घमंड करना

इन लोगों की ही तरह दसियों मुस्लिम ऐसे मिलेंगे आपको जो बिना इस कानून को पढ़े, बिना ये जाने कि NRC के ड्राफ्ट तक अभी बाहर नहीं आया है, इन दंगाइयों को अपनी सहमति ये कह कर दे रहे हैं कि मुस्लिमों के अस्तित्व पर संकट आ गया है। सामने से पूछे जाने पर ये बार-बार यह भी कह रहे हैं कि आम लोगों को सरकार समझाने में असफल रही है, जबकि सत्य यह है कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन यही लोग आम लोगों में डर भरते जा रहे हैं।

मुनव्वर राणा की, राहत इंदौरी की, इरफान हबीब की, शेहला रशीद की, आरफा खानम की और उन हजारों दंगाई मुस्लिमों की समस्या CAA या NRC नहीं है। इनकी समस्या यह है कि इनके भीतर का घमंड, एक विशेष होने का भाव जो पिछली सरकारों ने इनमें गहरे भर दिया था, वो अचानक से छिन-सा गया है। वो, जिनके मजहब के लोगों के आतंकी होने पर, 22 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी, रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिए जाते थे, उनकी बात की अब कोई वैल्यू नहीं रही।

वो जो यह चिल्लाते थे कि ‘तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निगलेगा’, आज दंगा करने के बाद योगी सरकार को अपने समुदाय द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे लौटा रहे हैं। वो, जो मजहब की आड़ में भारत का झंडा, राष्ट्रीय गीत और जय बोलने से कतराते थे, आज, भले ही दंगा करने और आग लगाने के लिए ही सही, भीड़ में तिरंगा लिए घूम रहे हैं। इनके घमंड के गुब्बारे में जो हवा भरी जाती रही थी, उसमें इस सरकार ने पहले तो हवा भरना बंद किया, और दूसरे चरण में पिन मारना भी शुरू कर दिया है, तो फटे गुब्बारे से कुछ आवाज तो आएगी ही।

वो, जो सोचते थे कि कश्मीर से पंडितों के भगा देने के बाद, कश्मीर को अलग देश बना लेंगे और उसी चक्कर में कश्मीर को नक्शे पर भी न पहचान सकने वाले मुस्लिम भी खुश हो जाते थे, आज परेशान हैं कि कश्मीर में अब भारत का संविधान लागू है, और उसका झंडा भी तिरंगा है। वो, जो सोचते थे कि संविधान से ऊपर कोई मजहबी पर्सनल लॉ बोर्ड है, तीन तलाक के ग़ैर क़ानूनी करार दे दिए जाने से इसे मजहब पर हुए हमले के रूप में देख रहे हैं।

वो, जिन्होंने सोचा था कि इरफान हबीब जैसा चिरकुट उपन्यासकार, अपने चेलों को कोर्ट में भेज कर, भारत को यह समझा देगा कि भारत का इतिहास मुस्लिम आतंकवादी बाबर के आने के बाद से ही शुरू होता है, वो राम मंदिर के गगनचुम्बी शिखरध्वज को कैसे देख पाएँगे? वो, जो सोचते हैं कि बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देने वाले आतंकी रोहिंग्या और बांग्लादेश से भारत में घुसे घुसपैठियों को भारत में इसलिए जगह मिल जानी चाहिए क्योंकि वो उनके उम्माह का हिस्सा हैं, उनके हकूक हैं, उन्हें भारतीय नागरिकों के रजिस्टर बनने से तो समस्या होनी ही है।

इसीलिए, केंचुली उतार कर ये पूरा विरोध अब ‘हम बनाम वो’ का हो गया है। इस पूरे विरोध का लहजा ‘मुस्लिम बनाम काफिर’ का हो चुका है। वो खुल कर कह रहे हैं कि ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, वो चिल्ला कर जामिया की गलियों में कह रहे हैं कि उन्हें ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ चाहिए। वो दिन के उजाले में दीवारों पर हमें ‘कैलाश जाओ’ लिख कर बता रहे हैं। वो एक राजनैतिक प्रदर्शन में हजारों की भीड़ जुटाते हैं और पूछते हैं कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और आवाज आती है ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’। वो ख़िलाफ़त 2.0 के ख्वाब AMU की दीवारों पर लिख रहे हैं और हिन्दुत्व, यानी हिन्दुओं से जुड़ी हर बात, विचार, पूजा, व्यक्ति, ग्रंथ आदि की कब्र खोदने की बातें कर रहे हैं।

और हिन्दू आज भी पॉलिटिकली करेक्ट होना चाह रहा है। वो ये मान रहा है कि ये लोग भटके हुए, गुमराह लोग हैं, इनके नारों का कोई मतलब नहीं, ये तो बस ऐसे ही है। ये लड़ाई अब खुले में सुनाई पड़ रही है। अब दिख रहा है कि इनका लक्ष्य कोई कानून या संविधान नहीं, इनकी आँखें शिथिल हो कर ‘गजवा-ए-हिन्द’ का आस देख रही है, और दाहिने-बाएँ इन्हें कुछ नहीं दिख रहा। ये नारे सीढ़ियाँ हैं, ये वो चरण है प्रयोग का जहाँ देखा जा रहा है कि पूरे भारत का मुस्लिम बाहर आ सकता है क्या?

अभी आँकने का मौका है कि जब महत्वपूर्ण जगहों पर बैठे मुस्लिम, एक पहचान पा चुके मुस्लिम, वैसे मुस्लिम जो वैचारिक स्तर पर नेतृत्व दे सकते हैं, उनके खुल कर बाहर आने पर कितने मुस्लिम उनकी बातें मानेंगे। इसीलिए, आज पढ़ा-लिखा, कॉलेज जाता मुस्लिम भी NRC के आए बिना ही कह रहा है कि उसके कागज तो बाढ़ में बह गए, 90 साल की बुजुर्ग असमा कह रही है कि दसवीं फेल मोदी अपने सात पुश्तों के नाम गिनाए। जब आम आदमी गृहमंत्री की अपील को सीधे कह दे कि वो तो झूठ बोल रहा है, एक चुनी हुई सरकार के सासंदों द्वारा पारित कानून को यह कह कर नकार दे कि सासंद तो बस 300 ही हैं, हम तो हजारों में हैं, तब आप समझ जाइए रंग उतरा ही नहीं, रंग दिखाया जा रहा है कि पहचानो, हम कौन हैं!

मजहबी नारे, इतिहास के आतंकियों के शासक होने के दिन, और हिन्दुओं से घृणा की बातें खुल कर हो रही हैं। बाकी का काम मीडिया गिरोह सक्रिय हो कर कर ही रहा है जहाँ बीस दिन की नवजात बच्ची को विरोध-प्रदर्शन की नायिका के रूप में भुनाया जा रहा है। अचानक से भीम-मीम में इसलिए दरार पड़ती दिख रही है कि भीम वालों को मजहबी नारे अनुचित लगते हैं। अब भीम सोच रहा है कि मीम वाले तो उनको पागल बना रहे हैं, इनका एजेंडा तो कुछ और ही है। बाकी का काम इस उम्मीद ने कर दिया जहाँ शेहला रशीद कहती है कि अगर तुम हमारे साथ हो तो आरक्षण में हमें भी हिस्सा दे दो!

भीम वाला आज भी जोगेंद्र नाथ मंडल को नहीं जानता कि मीम के झंडाबरदारों ने उनका क्या हश्र किया था। भीम वालों की लड़ाई राजनैतिक है, वो अपने हक के लिए बार-बार उठते रहे हैं। उनकी लड़ाई शोषण से है, बराबरी की है, और अब अचानक से उनसे कहा जा रहा कि ‘बोलो भाई तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और भीम वाला सोच में पड़ जाता है कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कैसे बोल दे!

आप भी इस मजहबी उन्माद को समझिए। आप भी यह समझिए कि सेकुलर होने का मतलब मुस्लिमों के लिए अलग है, हिन्दुओं के लिए अलग। एक सेकुलरिज्म की आड़ में आपके देवी-देवता का उपहास करता है, और आप हैं कि ईद की सेवइयाँ खाने के लिए पागल हुए जा रहे हैं। हिन्दुओं के लिए सेकुलर होने का मतलब है ‘सहना’। इसलिए, वो आज भी इन मजहबी उन्मादियों को आग लगाता देख रहा है और यह मान कर चल रहा है कि ये आग उसके घर तक नहीं पहुँचेगी।

यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके ‘जय श्री राम’ नारे को आतंकी नारा बना कर एक महीने में कम से कम दस बार झूठ बोला गया ताकि उसके धर्म को बदनाम किया जा सके। यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके दसियों भाइयों को कट्टरपंथियों की भीड़ ने लिंच किया है। हिन्दू यह भी भूल जाता है कि सैकड़ों साल पहले भी उसके मंदिर तोड़े जाते थे, आज भी हौज काजी समेत कई जगहों पर वही हो रहा है। हिन्दुओं को यह भी याद नहीं कि उनके काँवड़ यात्रा पर इस साल सावन के महीने में कितने जगहों पर पत्थरबाजी हुई है।

कट्टरपंथियों के बीच की हस्तियाँ अब मुस्लिम बन कर ही सामने आ रही हैं। उनके लिए इस्लाम ही एकमात्र पहचान है। उन्हें राजनैतिक विरोध प्रदर्शन में ‘नारा ए तकबीर’ और ‘हिन्दुओं से आजादी’ कहने में कोई समस्या नहीं दिख रही। मैं चाहता हूँ कि हिन्दू इस बात को बस दूर से देखे, दिमाग में बिठाए और अकेले में जा कर सोचे कि ये ‘सेकुलर’ शब्द जो है, उसका मतलब आखिर होता क्या है।

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NRC का असर: घर लौटने लगे घुसपैठिए, बांग्लादेश ने माना 2 महीने में 445 भारत से वापस आए

पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने की कल्पना से ही विपक्षी दल क्यों घबराए हुए हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है। असल में इससे उनके पाले-पोसे एक वोट बैंक के दूर जाने का खतरा है। असम में इसे लागू करने का असर भी दिखने लगा है। बांग्लादेश ने खुद माना है कि एनआरसी लागू किए जाने के बाद दो महीने में उसके 445 नागरिक घर लौटे हैं।

बांग्लादेशी अर्धसैनिक बल के प्रमुख ने गुरुवार (2 जनवरी) को कहा कि भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के प्रकाशन के बाद बीते दो महीनों में 445 बांग्लादेशी नागरिक वापस आए हैं। बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के महानिदेशक मेजर जनरल मोहम्मद शफीनुल इस्लाम ने एक प्रेस वार्ता के दौरान इन आँकड़ों का ख़ुलासा किया। उन्होंने बताया:

“भारत और बांग्लादेश से अवैध सीमा पार करने के लिए 2019 में लगभग 1,000 लोगों को गिरफ़्तार किया गया, जिनमें से 445 लोग नवंबर और दिसंबर में घर लौट आए थे।”

उन्होंने बताया कि स्थानीय प्रतिनिधियों द्वारा उनकी पहचान सत्यापित किए जाने के बाद, BGB को यह पता चला कि सभी घुसपैठिए बांग्लादेशी हैं। इस्लाम ने कहा कि इनके खिलाफ 253 मामले दर्ज किए गए हैं। सभी पर गैरकानूनी रूप से सीमा पार करने का मामला दर्ज किया गया है। प्रारंभिक जाँच में पाया गया है कि इनमें से कम से कम तीन मानव तस्कर थे।

पिछले हफ्ते इस्लाम ने भारत का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने कहा था कि NRC का मुद्दा पूरी तरह से भारत का “आंतरिक मामला” है और दोनों देशों की सीमा की रक्षा करने वाली सेनाओं के बीच सहयोग बहुत अच्छा है। उन्होंने कहा कि BGB अपने शासनादेश के अनुसार अवैध सीमा पार रोकने के अपने काम को जारी रखेगा। इस्लाम के नेतृत्व में BGB का प्रतिनिधिमंडल, सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ डीजी-स्तरीय सीमा वार्ता के लिए भारत के द्विपक्षीय दौरे पर आया था।

यह वार्ता 26-29 दिसंबर को हुई थी। इस दौरान सीमा पार से तस्करी और अपराधियों और अन्य लोगों की गतिविधियों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हुई थी। एक सवाल के जवाब में, इस्लाम ने कहा, “सम्मेलन में (NRC) पर कोई चर्चा नहीं हुई थी।”

उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में आयोजित पाँच दिवसीय वार्ता के दौरान, BGB ने माँग की कि BSF को बांग्लादेशियों की मोर्चे पर हत्या को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए क्योंकि 2019 में आकस्मिक आँकड़े तेज़ी से बढ़े हैं।

BGB प्रमुख ने कहा, “2019 में सीमा पर मृतकों की संख्या पिछले चार वर्षों में सबसे अधिक थी। हमारी गणना के अनुसार, ऐसी अप्रत्याशित मौतों की संख्या 35 थी।” डीजी स्तर की वार्ता के समापन के बाद नई दिल्ली में पिछले महीने BSF द्वारा जारी एक बयान में कहा गया:

“सीमाओं पर बांग्लादेशी नागरिकों की मौत के संबंध में BGB की चिंता पर, उन्हें यह सूचित किया गया कि सीमाओं पर BSF कर्मियों द्वारा एक गैर-घातक हथियार नीति का कड़ाई से पालन किया जाता है। फायरिंग का सहारा केवल आत्मरक्षा में लिया जाता है, जब BSF के गश्ती दल को घेरा जाता है और ‘दाह’ (तेज धार वाले हथियार) आदि से हमला किया जाता है। यह निर्दिष्ट किया गया था कि BSF राष्ट्रीयता के आधार पर अपराधियों के बीच भेदभाव नहीं करता है।”

इतना ही नहीं सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने पिछले साल मेघालय में भारत-बांग्लादेश सीमा से 10,000 से अधिक गायें ज़ब्त की गई हैं। एक अधिकारी ने गुरुवार को यह जानकारी दी। इन मवेशियों की क़ीमत 16.86 करोड़ रुपए आँकी गई।

ख़बर के अनुसार, BSF ने 2019 में वैध दस्तावेज़ों के बिना देश में प्रवेश करने के लिए कुल 176 विदेशियों (अवैध) को गिरफ़्तार भी किया। BSF के एक प्रवक्ता ने बताया, “पिछले साल 31 दिसंबर तक मेघालय में BSF ने 10239 मवेशियों को ज़ब्त किया, जिनकी क़ीमत 16.86 करोड़ रुपए आँकी गई।”

BSF के एक प्रवक्ता ने कहा कि पिछले एक साल के दौरान गायों की लगातार ज़ब्ती से सीमा पर पशु तस्करी के प्रयास में भारी वृद्धि के संकेत मिले हैं। उन्होंने बताया कि मवेशियों को हाथ-पाँव और मुँह बाँधकर अधिकतर उन्हें ट्रकों में ले जाया जाता था।

अधिकारी ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि राज्य पुलिस के साथ संयुक्त अभियान में BSF के जवानों ने 2019 में 3,665 की सँख्या में याबा टैबलेट नाम की प्रतिबंधित नशीली दवा भी बरामद की। उन्होंने कहा कि BSF ने पिछले एक वर्ष के दौरान शून्य रेखा से 20 लाख रुपए नकद भी ज़ब्त किए। उन्होंने बताया कि एक बांग्लादेशी के पास से 1 लाख रुपए मूल्य के नकली भारतीय नोट भी ज़ब्त किए गए।

पिछले दिनों बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने एनआरसी को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए कहा था, ‘हम बांग्लादेशी नागरिकों को वापस आने की अनुमति देंगे, क्योंकि उनके पास अपने देश में प्रवेश करने का अधिकार है।’ उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश-भारत के संबंध सामान्य और काफी अच्छे हैं और इस पर एनआरसी से कोई असर नहीं पड़ेगा।

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अयोध्या में राम मंदिर: 370 हटाने के अहम किरदार ज्ञानेश कुमार को मोदी सरकार ने दी जिम्मेदारी

बीते महीने झारखंड चुनाव के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि अयोध्या में चार महीने के भीतर भव्य राम मंदिर बनेगा। अब केंद्र सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित सभी मामलों को देखने के लिए गृह मंत्रालय में एक अलग डेस्क बनाया गया है। इस डेस्क में तीन अधिकारी होंगे। इनका नेतृत्व अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार करेंगे। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के फैसले में भी कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 9 नवबंर को इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 5 सदस्यों वाली बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाने को कहा था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था। इस फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं को भी शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया था।

ऐसे में ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में अलग डेस्क बनाने का मोदी सरकार का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस फैसले से जुड़े सभी मामलों को अब यही डेस्क देखेगी। कुमार गृह मंत्रालय की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से जुड़े विभाग के भी प्रमुख रहे हैं। आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म किए जाने और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बॉंटने के मोदी सरकार के फैसले में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इस बीच, कई मीडिया रिपोर्ट्स ऐसी आई हैं जिनमें दावा किया गया है कि मस्जिद के लिए योगी सरकार ने जमीन का चुनाव कर लिया है और इससे संबंधित प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी भेज दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय में 1990 के दशक से लेकर 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों तक भी अयोध्या को लेकर एक अलग विभाग था। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पेश होने के बाद इसे समाप्त कर दिया गया था।

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गोडसे से सावरकर के थे शारीरिक संबंध: RSS पर कॉन्ग्रेस का नया प्रोपेगेंडा

वामपंथी गिरोह के चंगुल में फँसकर वैचारिक दिवालिएपन की शिकार कॉन्ग्रेस के कैसे दिन आ गए हैं कि अब किसी भी हद तक जाकर झूठ और अफवाह फ़ैलाने में लग गई है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, ताजा मामला मध्य प्रदेश के भोपाल में कॉन्ग्रेस द्वारा चलाए जा रहे अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस सेवा दल के प्रशिक्षण शिविर में कथित रूप से ‘वीर सावरकर’ नाम की पुस्तिका का वितरण किया गया है। इस पुस्तिका में बीजेपी पर निशाना साधने के लिए सावरकर को टारगेट करते हुए उनके आसपास की कई घटनाओं, सवालों और विवादों का जिक्र है।

विनायक दामोदर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर कॉन्ग्रेस द्वारा जारी की गई विवादित पुस्तिका में दावा किया गया है, “महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के साथ हिंदू महासभा के सह-संस्थापक का शारीरिक संबंध था।”


साभार -India Today

रिपोर्ट के अनुसार, डोमिनिक लैपिएरे और लैरी कॉलिन्स की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में उल्लेखित एक घटना का उल्लेख करते हुए, कॉन्ग्रेस द्वारा जारी बुकलेट में कहा गया है, ” ब्रह्मचर्य धारण करने से पहले, नाथूराम गोडसे के एक ही शारीरिक संबंध का ब्यौरा मिलता है। यह समलैंगिक संबंध था। उनका पार्टनर था उनका राजनैतिक गुरू वीर सावरकर।”

आरएसएस और वीर सावरकर पर कॉन्ग्रेस द्वारा जारी पुस्तिका में कॉन्ग्रेस ने हिंदू महासभा के सह-संस्थापक से संबंधित कुछ सवाल-जवाब में जिन विषयों को चुना है और जिन वाक्यांशों का जिक्र किया है वे आने वाले समय में नए विवादों को जन्म देंगे।

विवादित पुस्तिका में एक सवाल है, “क्या सावरकर ने हिंदुओं को अल्पसंख्यक महिलाओं के बलात्कार के लिए प्रोत्साहित किया?’ और प्रश्न का उत्तर, जैसा कि कॉन्ग्रेस की पुस्तिका में बताया गया है, ‘हाँ’ है।

साभार -India Today

इस पुस्तिका में दावा यह भी है कि सावरकर ने 12 साल की उम्र में एक मस्जिद पर पथराव किया था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस द्वारा वितरित पुस्तिका में आरएसएस को “नाजी और फासीवादी” संगठन के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही बताया गया है कि उसने इसकी प्रेरणा हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद से ली है।

कॉन्ग्रेस के इस प्रपंच का कारण भी आप समझ गए होंगे। यह जानबूझकर उस गिरोह को भड़काने की साजिश है जो आज NRC के विरोध के नाम पर सड़क पर है। हिंसा पर अमादा है। यह पुस्तिका भी आरएसएस और सावरकर को बदनाम करने तथा समुदाय विशेष को भड़काने की कॉन्ग्रेस के चिरपरिचित अंदाज का एक हिस्सा है।

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नए साल पर सबसे ज्यादा किलकारियाँ भारत में गूँजी, फिर नरगिस के मरने की परवाह क्यों करें गहलोत

इस साल 6 साल में सबसे कम बच्चों की मौत हुई है। बीते सालों में 1500, 1300 तक बच्चे मरे हैं। इस साल 900 की ही मौत हुई है। हर रोज अस्पतालों में मौतें होती ही रहती है। इसमें कोई नई बात नहीं है।
-अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान, 28 दिसंबर 2019

भाजपा प्रधानमंत्री कार्यालय के इशारे पर कोटा में बच्चों की मौत को लेकर सियासत कर रही। इसकी आड़ में वह CAA का विरोध छिपाना चाहती है। 2015, 2016, 2017 में जब भाजपा की सरकार थी तब भी बच्चे मरे थे।
-रघु शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री, राजस्थान, 01 जनवरी 2020

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पूरे देश में जो माहौल बना हुआ है, उससे ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। मैं पहले ही कह चुका हूॅं इस साल शिशुओं की मौत के आँकड़ों में पिछले कुछ सालों की तुलना में काफी कमी आई है।
-अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान, 02 जनवरी 2020

ये चुनिंदा बयान हैं उनके जिनकी कोटा के जेके लोन अस्पताल में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत के मामले में सीधे-सीधे जवाबदेही बनती है। एक का राज्य का मुखिया होने के नाते तो दूसरे की उस महकमे का मुखिया होने के नाते जिसके अधीन यह सरकारी अस्पताल आता है। लेकिन, यदि तारीखों का फर्क छोड़ दें तो इन बयानों में आपको कोई अंतर दिखता है? वही असंवेदनशीलता और वैसा ही कुतर्क। एक ही संदेश बच्चे मरते हैं तो मरें, हमें फर्क नहीं पड़ता। हम नंबर गिना देंगे और बता देंगे कि पहली वाली सरकार में इससे ज्यादा मरे थे।

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार की बच्चों की जिंदगी से ज्यादा मोह​ब्बतें नंबर से दिखती है। सो, यूनिसेफ के कुछ आँकड़ों पर गौर कर लें। इसके अनुसार साल के पहले दिन यानी एक जनवरी 2020 को सबसे अधिक बच्चे भारत में पैदा हुए। इस दिन भारत में कम से कम 67,385 बच्चे पैदा हुए। इसी दिन चीन में 46,299, पाकिस्तान में 16,787 बच्चों ने जन्म लिया। 26,039 बच्चों की पैदाइश के साथ इस मामले में नाइजीरिया तीसरे और 13,020 नवजातों के साथ इंडोनेशिया पॉंचवें पायदान पर रहा।

यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक हेनरिटा फोर ने कहा, “नव वर्ष और नए दशक की शुरुआत न सिर्फ भविष्य की हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने का एक अवसर है, बल्कि हमारे बाद इस दुनिया में आने वाले का भी भविष्य है। प्रत्येक 1 जनवरी हमें उन संभावनाओं की याद दिलाती है।” यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, “दुनिया में ऐसे लाखों बच्चे है जिनके लिए ये दिन शुभ नहीं है। 2018 में जन्म के पहले महीने में 25 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हो गई। इनमें से एक तिहाई की मौत जन्म के पहले दिन हुई।”

जाहिर है कल को गहलोत इन आँकड़ों का हवाला देकर कह सकते हैं कि इनके आगे कोटा में मरने वाले मासूमों की संख्या तो कुछ भी नहीं। जिस दिन यूनिसेफ ने अपने आँकड़े पेश किए उस दिन तो कोटा के जेके लोन अस्पताल में ‘बस’ 5 बच्चे ही मरे थे। उसके पहले के 7 दिनों 22 मरे थे। गहलोत बताएँगे कि 25 दिसंबर को 1, 26 को 3, 27 को 2, 28 को 6, 29 को 1, 30 को 4 और 31 को 5 बच्चे की मौत हुई। फिर आपसे पूछेंगे कि 25 लाख नवजातों की मौत के सामने ये क्या मायने रखते हैं?

जेके लोन अस्पताल में दम तोड़ने वाले नवजातों में 3 दिन की रेखा, 2 दिन की कांता से लेकर 1 दिन की नरगिस तक है। 28 दिसंबर की रात जब चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव ने 5 घंटे समीक्षा बैठक की तो उसी दौरान 4 बच्चे भी मर गए। लेकिन, गहलोत सरकार को इन तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ता।

उसे जेके लोन अस्पताल पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की रिपोर्ट से भी फर्क नहीं पड़ता। यह​ रिपोर्ट कहती है कि अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही बच्चों की मौत का एक अहम कारण है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं। दरवाजे टूटे हुए हैं। इसके कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते रहते हैं। राजस्थान पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार जेके लोन ही नहीं कोटा के अन्य सरकारी अस्पतालों का भी ऐसा ही हाल है। अराजकता का आलम यह है कि जेके लोन अस्पताल के वार्ड में लगाने के लिए पिछले सप्ताह 27 हीटर खरीदे गए। लेकिन, ये हीटर कहॉं गए यह अस्पताल के अधीक्षक तक को मालूम नहीं है।

लेकिन गहलोत जानते हैं कि उनसे सवाल नहीं पूछे जाएँगे। न असंवेदनशीलता के लिए, न ध्वस्त स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए और न सरकारी अस्पतालों में फैली बदइंतजामी को लेकर। इसलिए वे तथ्यों की परवाह नहीं करते। उन्हें मालूम है कि राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है। वे जानते हैं कि गोरखपुर और मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत पर चीखने वाली मीडिया और लिबरल गैंग को नरगिस के मॉं-बाप की सिसकी सुनाई नहीं देगी। रेखा और कांता तो खैर हिंदू नाम हैं। उनके माँ-बाप का रूदन तो वैसे भी वामपंथियों, कॉन्ग्रेसियों और मीडिया गिरोह को सुनाई पड़ना नहीं है।

शाहीन बाग़ की आवारा भीड़ पर बावली हुई जा रही मीडिया की नज़र में कोटा के बच्चों की जान सस्ती

कोटा में बच्चों की मौत पर प्रियंका गाँधी ‘बेनकाब’: UP में राजनीति व राजस्थान में चुप्पी पर मायावती ने साधा निशाना

‘अगस्त में बच्चे मरते ही हैं’ और ‘बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं’ के बीच मीडिया की नंगी सच्चाई

फ़रहान अख्तर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज: CAA के विरोध-प्रदर्शन के दौरान भारत का ग़लत नक़्शा किया था पोस्ट

फ़रहान अख्तर के ख़िलाफ़ भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट करने के लिए मामले में गोवा पुलिस के साइबर क्राइम विभाग में शिक़ायत दर्ज की गई है। यह घटना उस समय की है जब फ़रहान ने मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ नागरिकों से विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी। ग़लत नक़्शे में कश्मीर को भारत से बाहर रखा गया था। यह शिक़ायत गोवा क्रॉनिकल्स (Goa Chronicles) के संस्थापक और प्रधान संपादक सेवियो रोड्रिग्स (Savio Rodrigues) द्वारा दर्ज कराई गई है।

ख़बर के अनुसार, अपनी शिक़ायत में, रोड्रिग्स ने लिखा,

“जैसा कि हम सभी जानते हैं कि फ़रहान अख्तर CAA के बारे में कुछ नहीं जानते थे और सिर्फ़ लोगों को CAA के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए उकसा रहे थे, इस दौरान वो कई मीडिया चैनल्स और उनके कैमरों में कैप्चर हो गए थे। अधिक परेशान करने वाली बात यह है कि इस विरोध के लिए लोगों को आमंत्रित करते समय उन्होंने भारत के ग़लत नक़्शे वाले पोस्टर का इस्तेमाल किया। यहाँ इस बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि उनके द्वारा उपयोग किए गए मानचित्र का उपयोग अधिकतर कश्मीरी अलगाववादियों द्वारा किया जाता है जो कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते हैं।”

रोड्रिग्स ने फ़रहान अख्तर के इस अपराध को ग़ैर-ज़िम्मेदाराना करार देते हुए उनके ख़िलाफ़ तत्काल प्रभाव से कड़ी कार्रवाई करने की माँग की है। रोड्रिग्स ने पुलिस से मामले का संज्ञान लेने और क़ानून के अनुसार पर्याप्त कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। अपनी शिक़ायत में, उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि जावेद अख़्तर के बेटे फ़रहान ने भले ही इस मामले पर माफ़ी माँग ली हो, लेकिन उन्होंने अब तक अपने प्रोफ़ाइल से भारत के उस ग़लत नक़्शे को नहीं हटाया।

उन्होंने कहा, “इस बात को 14 दिन से अधिक का समय हो गया है और भारत का ग़लत नक़्शा अभी भी उनके (फ़रहान) ट्विटर हैंडल पर दिख रहा है। ऐसा होना न केवल ग़ैर-क़ानूनी है, बल्कि देश के ख़िलाफ़ एक गंभीर अपराध भी है।”

बता दें कि भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट करने वाले फ़रहान अख्तर पहले शख़्स नहीं हैं, उनके अलावा कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी ऐसा किया था, जब उन्होंने ‘भारत बचाओ रैली’ की एक तस्वीर अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर की थी, जिसमें भारत का ग़लत नक़्शा दिख रहा था। थरूर का यह पोस्ट उनकी टाइमलाइन पर सात घंटे तक बना रहा, लेकिन उसके बाद जब उन्हें ट्रोल किया गया तो उन्होंने अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया। लेकिन सोशल मीडिया के आज के युग में यूज़र्स की पैनी नज़र से कहाँ कुछ बच पाता है, बस उन्हें भी घेर लिया गया था।

CAA और NRC पर फरहान गैंग के हर झूठ का पर्दाफाश: साज़िश का जवाब देने के लिए जानिए सच्चाई

पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का नहीं? शशि थरूर ने भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट कर तो यही संदेश दिया!

‘सेक्युलर’ नशे में फरहान अख्तर ने किया ट्वीट, लोगों ने उड़ाई खिल्ली

CAA पर कॉन्ग्रेस में फूट, मुस्लिमों को गुमराह करने का आरोप लगा 4 बड़े नेताओं ने दिया इस्तीफा

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) को लेकर कॉन्ग्रेस के भीतर का मतभेद भी सामने आने लगा है। पार्टी स्टैंड के विरोध में गोवा के चार नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। इन्होंने पार्टी पर अल्पसंख्यकों खासकर, समुदाय विशेष को बरगलाने का आरोप लगाया है।

इस्तीफा देने वाले नेताओं में पणजी कॉन्ग्रेस ब्लॉक समिति के अध्यक्ष प्रसाद अमोनकर, उत्तर गोवा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ प्रमुख जावेद शेख, ब्लॉक समिति सचिव दिनेश कुबल और नेता शिवराज तारकर शामिल हैं। पार्टी से इस्तीफा देने के बाद इन्होंने कहा कि वे सीएए का समर्थन करते हैं।

पत्रकारों से बात करते हुए अमोनकर ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी नागरिकता कानून पर जनता को, खासकर समुदाय विशेष को बरगलाने का काम कर रही हैं। वे सीएए और एनआरसी पर पार्टी के गलत रुख का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष में होने का मतलब यह नहीं होता कि सरकार के हर काम का विरोध किया जाना चाहिए। नागरिकता संशोधन कानून का स्वागत किया जाना चाहिए।

अमोनकर के अनुसार कॉन्ग्रेस को लोगों को बरगलाना और राजनैतिक फायदा पाने के लिए अल्पसंख्यकों के मन में डर भरने का काम बंद कर देना चाहिए।

कॉन्ग्रेस नेता ने बताया कि पिछले हफ्ते नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ गोवा में आयोजित कार्यक्रम का वे सभी हिस्सा थे। लेकिन, वहाँ उन्होंने नेताओं के भाषण सुनकर महसूस किया कि वे अल्पसंख्यकों के दिमाग में डर भरना चाहते हैं। यह सरासर गलत है।

उनके अनुसार, गोवा एक शांतिपूर्ण राज्य है और कॉन्ग्रेस यहाँ अल्पसंख्यकों को भड़काने का प्रयास कर रही है। सरकार ने नागरिकता कानून को संवैधानिक प्रक्रिया के बाद पास किया है और वे केवल उन शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रयास कर रही है, जिनका सदियों से भारतीय संस्कृति से संबंध रहा है।

अमोनकर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सीएए में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात है। बावजूद इसके, इन देशों के बहुसंख्यक आबादी भी भारतीय नागरिकता के लिए अप्लाई कर सकती है। इसके लिए काफी लंबे समय से प्रावधान है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस अलग-अलग राज्यों में अपनी राजनीति साधने के लिए मोदी सरकार द्वारा लाए नए कानून को असंवैधानिक करार दे रही हैं। साथ ही विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होकर इसके प्रति जनता तो भड़काने का काम कर रही है। दिल्ली सहित कई जगहों पर हिंसा में उसके नेता नामजद भी हुए हैं।

…16 साल पुराना मनमोहन सिंह का वो वीडियो, CAA पर भ्रम फैलाने से पहले कॉन्ग्रेस को देखना चाहिए

CAA पर नेहरू का हवाला कॉन्ग्रेस को नहीं आया रास, केरल के गवर्नर को न्योता देकर कहा- अब मत आना

CAA: दंगाइयों के आकाओं को जनरल रावत ने फटकारा, CPI व कॉन्ग्रेस ने बताया असंवैधानिक बयान

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ‘वामपंथी’ वीसी हांगलू ने दिया इस्तीफा: यौन शोषण, भ्रष्टाचार के थे गंभीर आरोप

पिछले चार सालों से विवादों में घिरा रहा इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय को कई विवादों से तब मुक्ति मिली जब यौन शोषण, अश्लील चैट, नियुक्तियों में धाँधली से लेकर वित्तीय अनियमितता जैसे कई आरोपों से घिरे कुलपति प्रोफेसर रतन लाल हांगलू ने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। वामपंथी विचारधारा के पोषक प्रोफेसर रतन लाल हांगलू ने 30 दिसंबर 2015 को इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का कार्यभार ग्रहण किया था और सबसे ज्यादा विवादित वीसी के रूप विख्यात हो चुके हांगलू ने 30 दिसंबर 2019 को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया। उनके साथ ही चार अन्य विश्विद्यालय के अधिकारियों ने अपना इस्तीफ़ा भी सौंप दिया। और आज इस पूरे प्रकरण से कहीं न कहीं ताल्लुक रखने वाले और कुलपति द्वारा नियुक्त हॉस्टल के वार्डनों ने भी अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया। कुलपति के इस्तीफे को रमेश पोखरियाल निशंक ने मंजूर करते हुए राष्ट्रपति के पास फाइल भेज दी है।

कुलपति के अलावा इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के जिन चार अन्य अधिकारियों ने इस्तीफ़ा सौंपा उनमें रजिस्ट्रार प्रोफेसर एनके शुक्ला, चीफ प्रॉक्टर प्रोफेसर रामसेवक दुबे, जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टर चितरंजन कुमार और वित्त अधिकारी डॉ सुनील कांत मिश्रा शामिल हैं। इन चारों अधिकारियों ने अपना इस्तीफा कुलपति प्रोफेसर रतन लाल हांगलू को भेजा था। इसके आलावा हॉस्टल के वार्डनों ने भी अपना इस्तीफ़ा कुलपति को भेज दिया है।

बता दें कि कथित रूप से घोर वामपंथी प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू का कुलपति के रूप में पूरा कार्यकाल विवादित और शिक्षण का माहौल ख़राब करने वाला रहा था। इस पूरे प्रकरण पर ऑपइंडिया ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों से बातचीत की। छात्रों ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा, “इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लिए आज ख़ुशी का दिन है l क्योंकि पिछले चार वर्षों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र कुलपति प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू के अदूरदर्शी कार्यशैली से प्रताड़ित थेl इनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने का मतलब निष्कासन और निलंबन होता थाl नियमों के विरुद्ध जा कर कार्य करना इनकी आदत थी l इनके खिलाफ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय में सैकड़ों शिकायत की गई थीl और पिछले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे प्रकाश जावडेकर जी ने इसपर कार्यवाही करने का तीन बार आश्वाशन भी दिया थाl पिछली शिकायतों को ध्यान में रखते हुए नए शिक्षा मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक जी ने पदभार ग्रहण करते ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाँच होने तक शिक्षक भर्ती पर रोक लगा दिया थाl”

चार साल के कार्यकाल में कई आरोपों से घिरे रहे कुलपति हांगलू

कुलपति पिछले चार वर्षों के दौरान अलग-अलग वजहों से लगातार विवादों में बने रहे। जिसके कारण विश्वविद्यालय में लगातार कई आन्दोलन भी हुए।

हांगलू पर ये हैं मुख्य आरोप:

  • गैर-कानूनी नियुक्तियाँ करना जैसे ओएसडी और स्पोर्ट्स ट्रेनर, जबकि ये पद विश्वविद्यालय में है ही नहीं।
  • वित्तीय अनियमितताएँ जिनमें अपनी सुरक्षा पर 10 लाख का मासिक खर्च और वीसी के घर की मरम्मत के लिए 70 लाख खर्च करना।
  • शैक्षिक अनियमितताएँ जैसे यूनिवर्सिटी के अंडरग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और रिसर्च प्रोगाम्स के लिए प्रवेश परीक्षा में अनियमितता।
  • कैंपस में खराब माहौल जैसे असुरक्षा की भावना। साथ ही छात्राओं का उत्पीड़न जैसे कई गंभीर मामले हैं।  

इसके अलावा हांगलू पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ का आरोप भी लगा था। उनके कई विवादित और अश्लील चैट भी ऑपइंडिया के पास हैं जिसमें वो उनके निजी अंगों पर कमेंट करते और उन्हें नौकरी का प्रलोभन देकर अनुचित लाभ उठाने की बात कह रहे हैं। इसके अलावा उन पर एक महिला मित्र के साथ उनके कथित अंतरंग बातचीत का ऑडियो वायरल होने के बाद भी उन पर कई अन्य आरोप लगे थे। जिससे उनकी मानसिकता और छात्राओं के उत्पीड़न की बात को और मजबूती मिलती है। इसके आलावा भी वहाँ के छात्र-छात्राओं ने उनपर कई अन्य आरोप भी लगाए। छात्रों ने बताया कि रतन लाल हांगलू के कार्यकाल में विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ लगभग 300 के आसपास मुक़दमे हो गए, और माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना के कारण कुलपति को इलाहबाद हाई कोर्ट ने फटकार भी लगाई थी l कश्मीर के सन्दर्भ में इनके विवादित बोल और सेना पर असभ्य टिप्पणी के कारण इनका छात्रों के एक धड़े ने पोस्टर जारी कर इनका विरोध तो जताया ही था, साथ ही साथ जिला न्यायालय प्रयागराज में एक मुकदमा भी दाखिल किया थाl

यौन उत्पीड़न पर महिला आयोग में भी हुई थी शिकायत

कुलपति और एक महिला के बीच अन्तरंग बातचीत का ऑडियों व्हाट्सअप पर वायरल होने के बाद एवं महिलाओं कथित यौन उत्पीड़न मामले की शिकायत राष्ट्रीय महिला आयोग से की गई थी। आयोग ने कुलपति हांगलू ऐसा न करने पर चेतावनी भी दी थी कि यदि वह नहीं पहुँचते हैं तो पुलिस के जरिए समन भेजकर उन्हें बुलवाया जाएगा। छात्रों ने बताया कि इस दौरान वह विदेश यात्रा पर होते हुए भी सीधे दिल्ली स्थित महिला आयोग के कार्यालय पहुँचे थे। जहाँ तीन घंटे तक वह आयोग के सवालों से घिरे रहे। इस दौरान विश्वविद्यालय की छात्राएँ भी कुलपति के बर्खास्तगी की माँग को लेकर आंदोलन करती रहीं थी।

कुलपति हांगलू का विवादों से है पुराना नाता

छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया कि इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार 30 दिसंबर 2015 को ग्रहण करने से पहले प्रो. रतन लाल हांगलू पश्चिम बंगाल के कल्याणी विश्वविद्यालय में कुलपति थे। वहाँ भी उन पर ऐसे ही महिला उत्पीड़न समेत कई संगीन आरोप लगे थे। छात्रों ने बताया कि वहाँ की एक महिला ने तो उनका इलाहाबाद तक पीछा किया था और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच उनकी काली करतूत की पोल खोल डाली थी। महिला ने सार्वजनिक मंच पर आरोप लगाया था कि रतन लाल हांगलू ने कल्याणी विश्वविद्यालय में कुलपति रहते हुए उनकी बेटी का उत्पीड़न किया था।

छात्रों का कहना है, “कुलपति के अदूरदर्शी और अराजक रवैए के खिलाफ ना सिर्फ छात्र आंदोलित थे बल्कि शिक्षक और कर्मचारी समूह भी कई कई बार आंदोलित हुए। और ऐसे आन्दोलनों में मुख्य भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों को कुलपति ने अन्य वामपंथी गिरोह की तरह ही अपने व्यक्तिगत अभिमान पर चोट समझ कर कार्यवाही करने से कोई गुरेज नहीं किया था। इनके इन्हीं कारगुजारियों पर संज्ञान लेने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अलग-अलग जाँच समिति भेज कर स्थिति का पुनरावलोकन किया और जाँच में कुलपति के कार्य शैली से असंतुष्ट हुआl”

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा भेजी गई जाँच कमिटी के चेयरमेन प्रोफ़ेसर देसी राजू थे, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के लगातार गिरते हुए हालातों की ओर इशारा करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में अगर यही परिस्थितियाँ रही तो एक दिन यह बर्बाद हो जाएगाl इसमें इस बात का भी जिक्र था कि विश्वविद्यालय में अभी हाल के दिनों में महिला सुरक्षा की वीभत्स स्थिति की शिकायत के बाद राष्ट्रिय महिला आयोग ने गंभीर टिप्पणियाँ की थी। और कुलपति प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू से तीन घंटे तक जिरह किया और उनके जबाबों से असंतुष्ट रही।

छात्रों का कहना है कि हांगलू के चार वर्षों के कार्यकाल में विश्वविद्यालय NIRF की रैंकिंग में 200 के बाहर चला गया है। विश्वविद्यालय के इस दुर्गति से विश्वविद्यालय से जुड़े दुनियाँ भर के लोग आहत थे। छात्रों ने इस ओर विशेष रूप से ध्यान दिलाया कि वामपंथ का नेक्सस कितना तगड़ा है कि तमाम आरोपों और सबूतों के बाद भी एक वामपंथी दूसरे वामपंथी को बचाने की पूरी कोशिश करता है। छात्रों का कहना है कि तमाम आरोपों के बाद भी अभी कुछ दिनों पहले ही कुलपति हंगलू क्लीन चिट लेकर दिल्ली से प्रयागराज आए थे। लेकिन पिछले दो दिनों में कुछ ऐसा छात्रों के अथक प्रयास और सबूतों से कुछ ऐसा हुआ कि कुलपति महोदय की पोल पुनः खुल गई और भारी दबाव में उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया।

छात्रों ने बताया कि आज की इस इस जीत के सूत्रधार इलाहबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की एकता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी छात्रसभा और NSUI ने गंभीर वैचारिक मतभेदों को भुला कर एकजुटता के साथ संघर्ष किया। कुलपति के खिलाफ मामला इतना संगीन था और बहुसंख्यक छात्र एकजुट कि सभी छात्र संगठनों को एक साथ आना पड़ा सिवाय आजादी के फर्जी विमर्शों का नारा लगाने वाले वामपंथी गिरोह और उनके छात्र संगठन ही थे जो इस अभूतपूर्व आन्दोलन के लिए कभी खुल कर सामने नहीं आए।

यहाँ आप एक पैटर्न देख सकते हैं कथित रूप से महिला अधिकारों के झंडाबरदार ही अक्सर महिलाओं के उत्पीड़न में आरोपित पाए जाते हैं और इलाहाबाद मामले में भी आरोपित कथित वामपंथी हांगलू थे तो भला वामपंथी छात्र संगठन कैसे वामपंथ के अतियों और जहर के खिलाफ आवाज उठाए। विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा कि चार साल की इस लड़ाई के बाद मिली जीत ने वामपंथ की जड़ों और उनके झूठे आदर्शों पर कुठाराघात किया है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए छात्रों ने बताया कि भाजपा सरकार के इस महत्वपूर्ण कदम के बाद एक बार फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आम छात्रों के साथ-साथ राष्ट्रवादी छात्रों में सरकार के प्रति भरोसा बढ़ेगा। हालाँकि, इस बात से कोई इंकार नहीं है कि समाजवादी छात्र सभा और NSUI के छात्रों ने भी इस आन्दोलन में अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन इस आन्दोलन को राष्ट्रवादी छात्रों ने ही शुरू किया था। और धीरे-धीरे छात्रों का आंदोलन बन जाने के कारण यह आन्दोलन सब का हो गया और सभी छात्र संगठनों (वामपंथियों को छोड़कर) ने अपनी बराबर की भूमिका निभाई। यह इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्रों की सबसे बड़ी जीत हैl छात्रों ने बताया कि कुलपति हांगलू के इस्तीफे पर मुहर देश के उन महत्वाकांक्षी कुलपतियों को भी एक सीख है जो खुद को बहुत ताकतवर समझते हैं और अपने वामपंथी गिरोह के बल पर हर तरह के गलत काम करने के बावजूद भी साफ़ बच निकलने की उम्मीद पाले रहते हैं।

साथ ही छात्रों का यह भी कहना है आने वाले दिनों में भाजपा की सरकार को यह सोचना चाहिए कि किस तरह से वामपंथी गिरोह विश्विद्यालयों में अपनी जड़ें इतनी गहराई तक जमा चुके हैं कि आज कई विश्वविद्यालय देश विरोधी गतिविधियों के अड्डे बन चुके हैं। जाधवपुर और JNU विशेष रूप से और वहाँ के पढ़े हुए लोग और प्रोफ़ेसर जहाँ भी किसी भी रूप में जाएँ उस परिसर का माहौल ख़राब करने और देश विरोधी एजेंडा चलाने से पीछे नहीं हटते। सरकार को चाहिए कि विश्वविद्यालय को राजनीति या देशविरोधी गतिविधियों का अड्डा न बनने दें।

चलते-चलते आपको BHU में हाल ही में हुए आंदोलन की याद भी दिला दूँ जहाँ वामपंथी गिरोह की वजह से ही संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय का मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम और महज संस्कृत भाषा का मुद्दा बन गया था। वहाँ भी इस पूरे विवाद की जड़ में कुलपति राकेश भटनागर थे जो JNU के प्रोफ़ेसर थे। हिन्दू धर्म और मालवीय जी के आदर्शों से उनका नाता इतना छिछला है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति मालवीय भवन में जाने से भी कतराते हैं। वहाँ भी वामपंथी छात्र संगठन कथित रूप से वामपंथी कुलपति के समर्थन में और फिरोज खान के ‘धर्म विज्ञान’ पढ़ाने के समर्थन थे और जो लड़ रहे थे वो सनातन धर्म को जीने वाले छात्र थे। अंततः देश ने उनके मुद्दे को समझा और उन्हें जीत मिली। इलाहाबाद में भी मीडिया गिरोह और वामपंथी धड़े ने छात्रों का साथ नहीं दिया। फिर भी छात्र सालों लड़े और आज वामपंथी और देशविरोधी विचारधारा के पोषक कुलपति के इस्तीफे के साथ प्रयागराज के इलाहाबाद विश्वविद्यालय को उनसे मुक्ति मिली। अब आने वाले समय में छात्रों को उम्मीद है कि जो भी विश्वविद्यालय की बागडोर थामने आएगा वह ज़रूर न सिर्फ विश्वविद्यालय को बल्कि छात्रों को विज़न देकर राष्ट्रहित में अपना योगदान देने के लिए आगे ले जाएगा।

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