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ब्वॉयफ्रेंड अमानुल्लाह ने 8 साथियों संग 16 साल की लड़की से किया गैंगरेप, सभी गिरफ़्तार

टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर के अनुसार, तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले के पोलाची के बाहरी इलाक़े में 16 साल की नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोप में नौ आरोपितों को महिला पुलिस की टीम ने गिरफ़्तार किया।

ख़बर के मुताबिक़, पोलाची पुलिस ने जिन नौ आरोपितों को गिरफ़्तार किया है उनमें- ए अमानुल्लाह, मोहम्मद आशिफ़, ए मोहम्मद रफ़ीक, जे सैयद इब्राहिम, ए मोहम्मद अली, के डेविड उर्फ़ ​​सेंथिल कुमार, इरशाद बाशा, एस मोहम्मद ख़ान और एन अरुण नेहरू के नाम शामिल हैं। कथित रूप से कक्षा-10 में पढ़ने वाली नाबालिग का दो साल से बलात्कार कर रहा था। गुरुवार (4 जुलाई) को लड़की के लापता होने के बाद यह घटना सामने आई।

ख़बर के अनुसार, बलात्कार की इस घटना को तब अंजाम दिया गया जब नाबालिग अपने ब्वॉयफ्रेंड अमानुल्लाह से मिलने उसके निवास स्थान पर गई थी। पुलिस सूत्रों के अनुसार, सामूहिक बलात्कार उसके प्रेमी के निवास स्थान पर ही हुआ जहाँ वो उससे मिलने गई थी।

पुलिस ने कहा कि मुख्य आरोपी अमानुल्लाह ने उसे अपने प्यार के जाल में फँसाया और फिर बाद में अपने दोस्त के साथ मिलकर उसने सामूहिक बलात्कार की घटना को अंजाम दिया। इसके अलावा अमानुल्लाह ने नाबालिग को धमकाया था कि वो इस घटना का ज़िक्र वो किसी से न करे, वरना इसके लिए उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

पीड़िता ने पुलिस को बताया कि नौ लोगों ने मिलकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस ने इस बात की भी जानकारी दी कि घटना के बाद से प्रभु नाम का एक शख़्स वहाँ से फ़रार हो गया।

अधिकारी ने बताया कि गुरुवार को, अमानुल्लाह नाबालिग लड़की को गाँव से लेकर आया और अपने दोस्त बागवथी के साथ बलात्कार किया। जब लड़की ने उसे घर छोड़ने का अनुरोध किया, तो दोनों ने इनकार कर दिया और फिर अपने दोस्त प्रभु को बुलाया और उसने भी लड़की का बलात्कार किया। नाबालिग के रिश्तेदारों को इस घटना के बारे में तब पता चला जब वह शुक्रवार (5 जुलाई) को लौटी। घर लौटने के बाद परिजनों ने पोलाची महिला पुलिस से सम्पर्क किया।

पुलिस ने बताया कि आरोपितों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 (ए) और POCSO अधिनियम के तहत सामूहिक बलात्कार का मामला दर्ज कर लिया गया है।

पुरी रथयात्रा: लाखों की भीड़ के बीच से भी वॉलिंटियर्स ने ऐम्बूलेंस के लिए रास्ता बना पेश की मिसाल, देखें VIDEO

ओडिशा के पुरी में रथयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की काफ़ी भीड़ उमड़ती है। भक्तों की इस भीड़ में पाँव रखने की जगह बड़ी मुश्किल से बन पाती है। ऐसी तंग स्थिति में भी भक्तों ने एक ऐसी मिसाल पेश की जिसकी जितनी तारीफ़ की जाए वो कम ही होगी।

दरअसल, सोशल मीडिया पर इस रथयात्रा का एक वीडियो शेयर किया गया है। इसमें 1200 वॉलिंटियर्स द्वारा ऐम्बूलेंस के लिए ऐसा नायाब रास्ता बनाया गया जिससे रथयात्रा के दौरान वहाँ से गुज़रने वाले मरीज़ों को किसी भी तरह की तकलीफ़ का सामना ना करना पड़े।

इस वीडियो को पुरी के एसपी ने ख़ुद ट्विटर पर शेयर किया। उन्होंने लिखा, “1200 वॉलिंटियर्स, 10 संगठनों और घंटों की मेहनत के बाद रथयात्रा 2019 के दौरान ऐम्बुलेंस की सरल गतिविधि के लिए ह्युमन कॉरिडोर बनाना संभव हो पाया।”

ग़ौरतलब है कि हर साल आषाढ़ माह में भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की रथयात्रा का आयोजन किया जाता है। यह रथयात्रा उनकी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर तक पहुँचती है जहाँ अगले 9 दिनों तक उनके दर्शन करने देश-विदेश से भक्तजन आते हैं।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो काफ़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है। ट्विटर यूज़र्स ने वॉलिंटियर्स के इस अनोखे अंदाज़ की जमकर तारीफ़ की।

मानहानि मामले में केजरीवाल और सिसोदिया को कोर्ट ने जारी किया समन, ₹1 करोड़ का दावा

भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता द्वारा दायर किए गए मानहानि मामले में दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार (जुलाई 8, 2019) को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ समन जारी किया। कोर्ट ने दोनों को 16 जुलाई को पेश होने का आदेश दिया है। विपक्षी पार्टी बीजेपी के नेता विजेंद्र गुप्ता ने मानहानि मामले में केजरीवाल और सिसोदिया के उपर मानहानि का केस फाइल किया था जिस पर कोर्ट ने उन्हें समन जारी किया है। इसके साथ ही मुआवजे के तौर पर ₹1 करोड़ का दावा किया गया है।

विजेंद्र गुप्ता द्वारा ये केस 4 जून को दर्ज कराया गया था। उन्होंने कहा था कि ये आरोप ना सिर्फ झूठे हैं, बल्कि इससे उनका नाम खराब करने की भी कोशिश की जा रही है। इससे उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। केस में गुप्ता ने कहा कि वे किसी को जाने या अनजाने में भी चोट पहुँचाने के बारे में नहीं सोच सकते हैं, फिर केजरीवाल की हत्या की साजिश रचना तो बहुत दूर की बात है। गुप्ता ने आगे ये भी कहा कि ये दोनों मिलकर हमारा नाम और छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह के झूठे आरोप लगाकर वो उनकी और उनकी पार्टी की छवि खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। इस मामले पर इससे पहले 6 जुलाई को सुनवाई हुई थी।

गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि बीजेपी उनकी हत्या करवाना चाहती है। उनके (केजरीवाल) सुरक्षाकर्मी बीजेपी को रिपोर्ट करते हैं और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तरह उनके सुरक्षाकर्मी भी बीजेपी के इशारे पर उनकी हत्या कर सकते हैं। केजरीवाल के इस आरोप पर जब विजेन्द्र गुप्ता ने ट्वीट कर उनका विरोध किया, तो मनीष सिसोदिया ने पलटवार करते हुए विजेन्द्र गुप्ता पर भी केजरीवाल की हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप लगा दिया था।

इसके बाद विजेंद्र गुप्ता ने केजरीवाल और सिसोदिया को कानूनी नोटिस भेजकर उनसे माफी माँगने के लिए कहा था, लेकिन केजरीवाल और सिसोदिया दोनों में से किसी ने भी विजेंद्र द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिस का जवाब नहीं दिया। दोनों नेताओं की तरफ से किसी तरह का कोई जवाब न मिलने पर विजेंद्र गुप्ता ने कोर्ट में दोनों पर मानहानि का मुकदमा कर दिया था।

सबा नकवी और ट्रिब्यून वालो, जब से तुम पैदा हुए हिन्दुओं का इतिहास तभी से शुरू नहीं होता

आजकल वे लोग भी राम और रामायण के विशेषज्ञ बन गए हैं, जिन्हें शायद इससे पहले राम के अस्तित्व पर ही विश्वास नहीं था। आज कुछ पत्रकार अपने वरिष्ठता के दौर में श्रीराम के बारे में गोस्वामी तुलसीदास से भी अधिक ज्ञान होने का दिखावा कर रहे हैं। इसी क्रम में ‘ट्रिब्यून इंडिया’ के लिए लिखे गए सबा नक़वी का एक लेख भी आया है जिसमें कहा गया है कि ‘जय श्री राम’ से मर्दवाद की बू आती है लेकिन ‘जय सिया राम’ एक अच्छा नारा था। नक़वी का मानना है कि ‘जय सिया राम’ से एक स्त्रीवाद की विनीत झलक आती थी, जो अच्छा था।

नक़वी ने इसके बाद ‘जय श्री राम’ का इतिहास समझाना शुरू किया है और उसे बड़ी चालाकी से लालकृष्ण आडवाणी के मंदिर आंदोलन से जोड़ कर बात की शुरुआत की है। सबा नक़वी के खोखले इतिहास-ज्ञान की बखिया उधेड़ते हुए हम आगे बढ़ेंगे लेकिन उससे पहले जरा उनके शब्द-ज्ञान पर बात करते हैं। असल में ‘जय श्री राम’ (जो कि नक़वी के अनुसार मर्दवादी है) और ‘जय सिया राम’ (जो नक़वी के अनुसार स्त्रीवादी है) के बीच बस एक शब्द का फ़र्क़ है। एक नारे में ‘श्री’ है तो दूसरे में उसकी जगह ‘सिया’ है। शायद नक़वी को पता नहीं है कि ये दोनों शब्द इंटरचेंजेबल हैं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में और संस्कृत में लक्ष्मी को वैभव, धन और समृद्धि की देवी माना गया है। जैसा कि रामचरितमानस में वर्णन है, सीता भी लक्ष्मी की ही रूप थीं और जिस तरह भगवान विष्णु ने राम के रूप में धरती पर अवतार लिया था, लक्ष्मी ने सीता के रूप में धरती पर क़दम रखा। लक्ष्मी के कई नामों से एक नाम श्री भी है। इसीलिए ‘जय श्री राम’ कहा जाए या फिर ‘जय सिया राम’- दोनों का अर्थ एक ही निकलता है। दोनों में ही सीता और राम की जय कही गई है। सीता को ‘सिया’ कहा जाए या फिर ‘श्री’- दोनों एक ही बात है।

भगवान विष्णु के कई नामों में से एक श्रीपति भी है। रामचरितमानस के बालकाण्ड में भगवान विष्णु के बारे में कहा गया है– “दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥ ” जैसा कि आप देख सकते हैं, इस चौपाई में विष्णु को ‘श्रीपति’ कहा गया है, अर्थात श्री के पति। यहाँ श्री और लक्ष्मी पर्यायवाची हैं। ठीक इसी तरह, ‘जय श्री राम’ में भी राम से पहले श्री यानी सीता का नाम लिया गया है। स्त्री को सम्मान देते हुए सीता का नाम पहले रखा गया है और सबा नक़वी को इससे मर्दवाद की बू आ रही है। इन्होने असल में न तो कभी रामायण के पन्ने पलटे हैं, न भारत के इतिहास की जानकारी है लेकिन ज्ञान देने में ये सबसे आगे रहतीं हैं।

आख़िर जिस स्लोगन में स्त्री को सम्मान दिया गया है, उसे मर्दवाद का चेहरा बना कर पेश करने वाली नक़वी रामायण क्यों नहीं पढ़तीं? अगर पढ़तीं नहीं तो इसके बारे में लिखती ही क्यों हैं? ‘श्री’ के रूप में सीता आक्रामकता का प्रतीक हो जाती है, वही ‘सिया’ के रूप में वो अच्छी लगने लगती है। ये कैसी अजीब बात है? क्या अब सबा नक़वी और ट्रिब्यून इंडिया यह तय करेगा कि हिन्दू अपने धर्मग्रंथों में से कौन सी चीजों को आत्मसात करें, किन चीजों का प्रयोग करें और किन चीजों को नज़रअंदाज़ करें? सबा नक़वी अब बताएँगी कि शिव को ‘महादेव’ कहना है या फिर ‘भोलेनाथ’?

सबा नक़वी हिन्दुओं को (राम जिनके आराध्य हैं) और भारत को (जहाँ की धरती के कण-कण में राम हैं) को इस बात की सलाह दे रही है कि राम का नाम कैसे और किस रूप में लेना है? क्या अब हिन्दू ‘कुरान शरीफ’ पढ़ कर सीखेंगे कि सीता और राम को किन नामों से पुकारा जाए? इनके हिसाब से ‘जय श्री राम’ नया स्लोगन है और इसके नाम पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं ‘अल्लाहु अकबर’ के नाम पर हिंसा जायज है क्योंकि वह डेढ़ हज़ार वर्ष पुराना स्लोगन है।

अब सबा नक़वी के इतिहास-ज्ञान की ओर बढ़ते हैं और उससे पहले आपको बता देते हैं कि उन्होंने ‘जय श्री राम’ के इतिहास के बारे में क्या लिखा है? वह बात बाबरी मस्जिद से शुरू करती हैं। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के निर्माण की माँग करते हुए सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की थी। रास्ते में आडवाणी को तो गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन कार्यकर्ता आगे बढ़ते हुए अयोध्या पहुँचने में सफल रहे। सबा नक़वी लिखती हैं कि इसी आंदोलन के दौरान ‘जय श्री राम’ एक उत्तेजक और आक्रामक नारा बन कर उभरा। इसके बाद नक़वी ने 1998 के चुनाव प्रचार अभियान कवर करने की बात करते हुए ख़ुद की वरिष्ठता दिखाई है।

सबा नक़वी ने दावा किया है कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजेपयी ने सूरत में एक भाजपा कार्यकर्ता द्वारा ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने के बाद उसे पलट कर कहा था- “बोलते रहो जय श्री राम, और करो मत कोई काम“। इसके बाद नक़वी ने यह भी दावा किया है कि वाजपेयी भाजपा के ‘हिन्दू फर्स्ट’ वाली नीति से ख़ुश नहीं थे। ये तो रही दावों की बात। ये वही सबा नक़वी हैं, जिन्होंने एक बार दावा किया था कि ‘प्राइवेट बातचीत के दौरान’ वाजपेयी राम मंदिर आंदोलन के दौरान अपनाए गए तरीकों पर आपत्ति जताते थे। लेकिन, सबा नक़वी को यह जानना चाहिए कि वाजपेयी राम मंदिर के सबसे बड़े पैरवीकारों में से एक थे। बाबरी विध्वंस से एक दिन पहले लखनऊ में दिए गए भाषण में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था:

“वहाँ नुकीले पत्थर निकले हैं। उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो ज़मीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा। यज्ञ का आयोजन होगा तो कुछ निर्माण भी होगा। कम से कम वेदी तो बनेगी। मैं नहीं जानता कल वहाँ क्या होगा?”

आज वाजपेयी को राम मंदिर के विरोधी बताने वाली सबा नक़वी कल को ये भी कह सकती हैं कि उन्हें भगवा रंग पसंद नहीं था। इसके बाद उन्हें वाजपेयी की कविता ‘गगन में लहरता है भगवा हमारा‘ सुनानी पड़ सकती हैं। माफ़ कीजिए, लेकिन दशकों तक भाजपा को काफ़ी नजदीक से कवर करने के बाद और कई लेख, कवर स्टोरी और पुस्तक लिखने के बाद भी अगर आप इस तरह की भ्रामक बातें करती हैं तो आपके इस मक्कारी भरे पत्रकारिता करियर को धिक्कार है। जहाँ सोशल मीडिया पर वाजपेयी के सार्वजनिक भाषण, कविताएँ और इंटरव्यू पड़े हों, वहाँ उनके ‘प्राइवेट कंवर्शेसन’ का ज़िक्र कर एक अलग तरह का नैरेटिव तैयार करना असहिष्णुता गिरोह के कुप्रयासों का हिस्सा है।

इसके बाद लेख में एक घुमाव आता है। यह घुमाव वहीं पहुँचता है, जहाँ इसके पहुँचने की आशंका थी। झारखण्ड में एक चोर की मॉब लिंचिंग की बात की जाती है, टैक्सी ड्राइवर को जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाने की बात की जाती है और इस तरह की कुछ घटनाओं को गिना कर ‘जय श्री राम’ कितना उत्तेजक, आक्रामक और हिंसक है- इस पर प्रकाश डाला गया है। हालाँकि, सबा नक़वी ने कई ऐसी घटनाओं पर जानबूझ कर चुप्पी बनाए रखी है, जिनमें जबरन मुस्लिमों के ‘जय श्री राम’ बुलवाए जाने वाले कई आरोप ग़लत निकले। गुरुग्राम में यह आरोप ग़लत निकला। एक मौलवी का आरोप ग़लत निकला। एक अन्य मामले में तो एक मुस्लिम ने ही जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाया।

चलिए, कुछ मिनट तक सबा नक़वी के इतिहास ज्ञान को दरकिनार कर यह मान ही लेते हैं कि ‘जय श्री राम’ का जन्म आज और इसी वक़्त हुआ है। लेकिन क्या अगर यह नया स्लोगन है तो ‘अल्लाहु अकबर’ कह कर कई जानें लेने वाले आतंकी सही साबित हो जाते हैं? 2-4 शरारती तत्व अगर किसी-किसी मामले में जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवा भी रहे हैं तो इस हिसाब से ‘अल्लाहु अकबर’ को तो प्रतिबंधित ही कर देना चाहिए क्योंकि कश्मीर से लेकर लंदन तक, इस नारे का आतंकियों द्वारा प्रयोग कर कई जानें ली गईं। ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं, अगर ‘जय श्री राम’ आडवाणी की वजह से प्रचलित हुआ तो फिर 1987 में आई रामानंद सागर की ‘रामायण’में हनुमान बार-बार इसे दुहराते क्यों दिखते हैं?

क्या अब ये छद्म बुद्धिजीवी तय करेंगे कि हम सीता को किस नाम से पुकारें, राम का नाम कैसे भजें और वाजपेयी की ‘निजी बातचीत’ (जो सिर्फ़ सबा नक़वी ने देखी व सुनी है) के आधार पर उनकी कैसी इमेज बनाएँ? ‘अल्लाहु अकबर’ लाख बार मरने-कटने, ख़ून बहाने, मारने, आत्मघाती हमला करने और जिहाद छेड़ने के लिए प्रयोग किया जाए लेकिन फिर भी यह नारा पवित्र है लेकिन कुछेक शरारती तत्वों की वजह से ‘जय श्री राम’ उत्तेजक, आक्रामक, मर्दवादी और हिंसक हो जाता है? सबा नक़वी को रामायण पढ़ने की ज़रूरत है, रामकथा सुनने की ज़रूरत है और वाजपेयी की कविताएँ सुनने की ज़रूरत है।

अंत में, सबा नक़वी को गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित राम की यह स्तुति पढ़नी चाहिए, जिसकी शुरुआत कुछ यूँ होती है- “श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारुणम्।” यहाँ राम के नाम के आगे ‘श्री’ लगाया गया है, जिसका यह कतई अर्थ नहीं है कि तुलसीदास मर्दवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। ये आज से डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व लिखा गया था। लेकिन नहीं, ‘जय श्री राम’ तो 1990 में लोकप्रिय हुआ।

गढ़चिरौली नक्सली हमला: गिरफ्तार NCP नेता के कई इनामी नक्सलियों से थे सम्बन्ध

गढ़चिरौली में हुए नक्सली हमले में एक एनसीपी नेता का नाम सामने आया है। इस मामले में कुल 8 आरोपितों की गिरफ़्तारी हुई है, जिनमें से एक का नाम कैलाश रामचंदानी है। कैलाश कुछ दिनों पहले तक एनसीपी की तहसिल इकाई का अध्यक्ष था। सभी 8 आरोपितों से पुलिस द्वारा पूछताछ की गई है। एनसीपी के स्थानीय पदाधिकारियों के अनुसार, पार्टी में कैलाश की सदस्यता ख़त्म कर दी गई थी। उसे 29 जून को गिरफ्तार किया गया।

एनसीपी में पदाधिकारी रहे कैलाश को 12 जुलाई तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था। इस हमले की छानबीन राष्ट्रीय जाँच एजेंसी द्वारा की जा रही है। कैलाश के बारे में स्थानीय एनसीपी नेताओं ने यह भी कहा कि उसने मार्च में पार्टी के लिए समय न निकाल पाने की बात कहते हुए इस्तीफा दे दिया था। वह पार्टी की स्थापना के समय से ही इसका सदस्य था। ईनामी नक्सलियों किरण कुमार और नर्मदक्का की गिरफ़्तारी के बाद उनकी निशानदेही पर कैलाश को गिरफ़्तार किया गया, जिसके कई नक्सलियों से सम्बन्ध होने की बात कही जा रही है।

ज्ञात हो कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में 1 मई को हुए नक्सली हमले में 15 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह एक जबरदस्त विस्फोट था, जिसके कारण वहाँ सड़क पर गहरा गड्ढा हो गया था। इस हमले की पहले से भी आशंका थी क्योंकि ख़ुफ़िया अधिकारियों ने ऐसे किसी हमले के बारे में आगाह किया था। लेकिन, लोकसभा चुनाव शांतिपूर्वक बीत जाने के बाद सतर्कता में ढील दी गई, जिसके कारण नक्सली इस हमले को अंजाम देने में कामयाब रहे। इससे कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भाजपा विधायक भीमा मांडवी की हत्या कर दी गई थी।

‘जब भीड़ अल्लाहु-अकबर चिल्लाते हुए आगे बढ़ी तो उनसे बचने के लिए हम जहर पीने के लिए भी तैयार थे’

दिल्ली के हौज़ काज़ी में बीते दिनों सांप्रदायिक तनाव और मंदिर में तोड़-फोड़ की घटना सामने आई थी। ऑपइंडिया, स्वराज्य, ऑर्गेनाईजर और सुदर्शन टीवी को छोड़कर बाकी मीडिया हाउस ने तब तक इसे नजरअंदाज किया, जब तक कि एसएम ने इसे रिपोर्ट करने के लिए दबाव नहीं बनाया। मेरठ में दंगे भड़कने की खबर, प्रह्लादनगर से पलायन करने वाले परिवारों की खबर ने पुरानी यादें ताजा कर दी।

मैं राजधानी दिल्ली से 80 किमी दूर उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर मेरठ में पली-बढ़ी हूँ। पश्चिम यूपी के छोटे से शहर में 70-80 के दशक में लोगों की ज़िंदगी काफी नीरस रही। इस दौरान सभी लोग साल भर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों के साथ ही पले-बढ़े हैं। दंगे हमेशा मध्यम वर्गीय परिवार की मौजूदगी से दूर दूसरे तबके में होते थे।
हम हमेशा से जानते थे कि दंगे प्रायोजित होते थे और इसकी भयावहता ने हम प्रायः अछूते। मेरठ में मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के हिंदू रहते थे। हिंदुओं और दूसरे मजहब के लोगों में गहरी दोस्ती थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी। वहाँ पर उस समय ऐसी स्थिति थी कि अगर दंगे के समय कोई हिंदू, समुदाय विशेष बहुल इलाके में दूसरे मजहब के दोस्त के घर फँस जाता है, तो वो सुरक्षित रहेगा। दंगा के शांत होने के बाद माहौल को देखते हुए उसे बाहर निकाला जाएगा।

मेरी दादी ने एक उर्दू अखबार की सदस्यता ली थी। यह शेर-ओ-शायरी को जानने के लिए सामाजिक परिष्कार का संकेत था। हिंदू घरों के दर्जी दूसरे समुदाय के थे, जिनकी चूड़ीदार और शरारा बनाने की विशेषज्ञता नायाब थी। समुदाय विशेष के इलाकों में घुमावदार गलियाँ हमारे लिए भूलभुलैया जैसी थी। मोहल्ले की महिलाएँ हर सोमवार लगने वाले बाजार में बुर्का पहना करती थी, जो कि मेरठ के मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग के अल्पसंख्यकों में इतनी साधारण बात नहीं थी। इसके अलावा मुहर्रम के जुलूसों के दौरान दो मजहबों के बीच की प्रगाढ़ता देखने को मिलती थी। मगर, 1986 से 1987 के बीच इस सौहार्द ने अचानक एक अलग ही मोड़ ले लिया। दंगे अधिक तीव्र और हिंसक होते गए। यहाँ तक कि मध्यम में भी यह बीमारी फ़ैल गई।

शास्त्री नगर में एक हिंदू बहुल मध्यवर्गीय कॉलोनी में सुबह-सुबह का समय था। 1987 की गर्मी के मौसम में सुबह में अचानक से दूर-दूर तक अल्लाहु अकबर के नारे गूँजने लगे और धुएँ के काले बादल आकाश पर छा गए। इससे पहले कि हम कुछ जान पाते कि मामला क्या है, हापुड़ रोड (अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्र) के बगल में शास्त्री नगर (एक हिंदू बहुल कॉलोनी) के बाहरी इलाके में रहने वाले अधिकतर लोग अचानक से भागने लगे। कोई पैदल भाग रहा था, कोई साईकल पर, तो कोई स्कूटर पर भाग रहा था। उन्होंने कहा कि एक इस्लामी भीड़ ने उन पर हमला किया था और वो उनके घरों में जलते हुए टायर फेंक रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि हापुड़ रोड पर एक पेट्रोल पंप भी जला दिया गया।

हम लोगों ने छत पर जाकर देखा, एक भीड़ जली हुई टायर फेंकते हुए और ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए  मेन रोड की तरफ जा रही थी। मुझे याद है कि मेरे पिता, जो कि एक समर्पित कम्युनिस्ट थे, उन्होंने हॉकी स्टिक उठाकर मेरे छोटे भाई को कॉलोनी की सुरक्षा करने के लिए कहा। सुबह-सुबह आस-पास के गाँवों से दूधवाले साईकल से आ रहे थे। जब उन्होंने भीड़ को देखा, तो वो भाग गए और देशी कट्टा (बंदूकें) लेकर लौटे और हर-हर महादेव के नारों के साथ भीड़ का सामना करना शुरू कर दिया।

उस समय मेरठ की सांसद कॉन्ग्रेस की मोहसिना किदवई थीं। मेरी दादी भी एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता थीं, लेकिन वह दिल्ली में थी और हमारी मदद करने के लिए वहाँ पर कोई नहीं था। एक चाचा मदद के लिए पुलिस चौकी गए, लेकिन वहाँ जाकर पता चला कि पुलिस चौकी में पुलिस फोर्स मौजूद ही नहीं थी, सभी पुलिसकर्मियों को किसानों की रैली से निपटने के लिए दिल्ली भेजा गया था। वहाँ लाठियों के साथ कुछ ही पुलिसवाले थे।

अचानक हमें एहसास हुआ कि हम असहाय और बेहद असुरक्षित थे। हमारे पास हॉकी स्टिक्स, लाठियों और किचेन में इस्तेमाल की जाने वाली चाकू के अलावा अन्य कोई हथियार नहीं था। इस बीच गाँव वालों ने भीड़ को किसी तरह हटा दिया था। चूँकि, कॉलोनी नई थी, चारों तरफ खुला मैदान था, तो हमले हर तरफ से हो रहे थे। मैं उस आतंक, विश्वासघात और उस बेबसी वाले अनुभव को कभी नहीं भूल सकती। राजीव गाँधी पीएम थे। वह एक युवा आइकन थे। ये सब कैसे हो रहा था? पुलिस कहाँ थी? सांसद कहाँ थे? आखिर, हमें असुरक्षित क्यों छोड़ दिया गया?

ऐसा हफ्तों तक चलता रहा। कर्फ्यू लगा दिया गया। रमजान का महीना था। लोग पूरी रात घर के बाहर पहरा देते रहे। बाहरी क्षेत्रों के निवासी हमारे साथ रहने आए। देर रात तक पार्क में महिलाओं का जमघट लगा रहा और फिर सभी लोग ऊपर के घरों में सोने चले गए, जिसे सुरक्षित माना जाता था। हमने सोच लिया था कि अगर हमारी कॉलोनी खत्म हो गई, तो हम चूहे मारने वाला जहर पी लेंगे। हमने ईंटें एकत्रित कीं और इसे छत पर रखा, ताकि अगर हम पर हमला किया जाता है, तो इससे अपनी रक्षा कर सकें। रात में किसी भी तरह की भीड़ के हमले की आवाज़ सुनने पर काफी डर लगता था। उनके कुछ प्रयासों को पुलिस और हमारी अपनी चौकीदार पार्टियों ने नाकाम कर दिया था।

सुबह में पास की मस्जिद से ड्रम बजने की आवाजें आती थीं। फिर लाउडस्पीकर पर नारे लगाए जाते थे। हिंसा की धमकियों के बाद पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाते। हमें डराया जाता था कि बकरों की जगह हिंदुओं की कुर्बानी दी जाएगी। इस बीच कई अफवाहें, झूठी खबर भी फैलाई गई। किसी ने कहा कि समुदाय विशेष वाले ने चंडी माता मंदिर को तोड़ दिया। फिर उन्होंने उन हिंदू इलाकों के बारे में भी बताया, जिन पर उन लोगों ने हमला किया था और उनमें कितने लोग मारे गए थे। इस तरह की घोषणा हमें डराने के लिए, हमारे अंदर खौफ पैदा करने के लिए किया जा रहा था। हालाँकि, बाद में पुलिस ने इन सभी अफवाहों को नकार दिया।

हमारे इलाके में कुछ समुदाय विशेष के परिवार भी थे, जो कि सुरक्षित थे। हम जानते थे कि वे इस पूर्वग्रह का हिस्सा नहीं थे। लेकिन फिर एक और परेशान करने वाली घटना हुई। एक पूरी तरह से अनजान शख्स हमारे कॉलोनी में आया और दूसरे समुदाय के परिवारों के बारे में पूछा और फिर हमें उनकी सुरक्षा के खिलाफ चेतावनी दी। पुलिस ने उनके परिवारों को रात के अंधेरे में मेरठ के बाहर रिश्तेदारों के पास भेज दिया। अगले दिन फिर कई अपरिचित लोग आए, लेकिन पुलिस ने उन्हें बताया कि समुदाय विशेष के परिवार दंगों से पहले ही वहाँ से कहीं चले गए और पुलिस ने उन्हें उनका खाली घर दिखाया।

अंत में मेरठ में पीएसी तैनात कर दी गई। वे हमारे लिए हीरो थे। उन्हें तैनात करने के बाद मस्जिद खामोश हो गए। पड़ोस शांत हो गया और हम सब अपने अपने घरों में सोने लगे। अजनबी गायब हो गए और वो परिवार वापस आ गए। हमारे अंदर पुराने दोस्तों के लिए कोई कड़वाहट नहीं थी। हमें पता था कि हमने इस पागलपन का हिस्सा नहीं बनना है और वे जानते थे कि वे हमारी कॉलोनी में सुरक्षित हैं।

इंडिया टुडे पत्रिका के संस्करण में दंगों की विभीषिका को प्रकाशित किया गया था। मुझे उम्मीद थी कि हमारे दंगों को भी कवर किया जाएगा। मीडिया के साथ मेरा पहला अविश्वास तभी शुरू हुआ था। इसमें हिंदू बहुल क्षेत्रों में हुए दंगों का कोई कवरेज नहीं था। हमारे लिए पीएसी भगवान थे, लेकिन मीडिया के लिए कुछ और। फिर बाद में सब कुछ सामान्य हो गया। हमारा धोबी जो किदूसरे मजहब जा था और इस्त्री करने वाला लड़का, जो उस इलाके में रहता था, जहाँ से भीड़ आई थी, उसने हमें बताया था कि अजनबियों ने इस उन्मादी भीड़ का निर्माण किया था।

यह आखिरी बड़ा दंगा मेरठ में हमने देखा था। लेकिन परेशान करने वाले सवाल आज भी बने हुए हैं। भीड़ का वह कौन सा हिस्सा था? पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे मस्जिदों से क्यों लगाए गए? कोई पुलिस फोर्स वहाँ क्यों नहीं था? उन्हें दिल्ली क्यों भेजा गया? हिन्दू कॉलोनियों में दूसरे समुदाय के परिवारों के ऊपर हिंसा करने वाले अनजान लोग कौन थे? जब मैं मंदिरों के तोड़-फोड़ और इस्लामी भीड़ की अराजकता और दंगे की खबरें देखती हूँ, तो दिल्ली से 80 किमी दूर मेरठ दंगे से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो जाती हैं, जिस दंगे के आतंक का सामना हमने 1987 में किया था।

2019 आ गया है। दिल्ली इस तरह की घटनाओं से बुरी तरह से प्रभावित है। किसे दोषी ठहराया जाए? वोट बैंक की राजनीति? आज भी अविश्वास का भाव बना रहता है। तो क्या हौज़ काज़ी, मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर, हरियाणा, सूरत, पश्चिम बंगाल और अन्य ऐसी जगहों पर हिंदू परिवारों को उनके साथ रहना चाहिए, जहाँ समुदाय विशेष की आबादी काफी है और जहाँ अब सड़कों पर उन्मादी और अराजक भीड़ निकल रही है। ये मॉब क्यों इस तरह से हमला कर रही है? क्या पुलिस लाचार है, इसलिए? आखिर, अचानक हुई इन घटनाओं के पीछे की असली कहानी क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी सत्ता में हैं। मैं भारत में आतंक के ऐसे पलों से छुटकारा पाना चाहती हूँ। क्या कभी मेरा यह सपना पूरा होगा? आखिर कब तक अमन और शांति से रहने के लिए भी ज़द्दोज़हद करनी होगी। आखिर कौन देगा इसका जवाब?

(यह लेख मूल रूप से लेखिका के ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है। जिसका अनुवाद रचना कुमारी ने किया है।)

‘बड़े का गोश (गोश्त) खाओ, कलेजी खाओ… गरमी-गरम चीजें खाएँगे तो फिर ज्यादा बच्चे तो…’

अभिनेता अजाज़ खान ने यूट्यूब पर वीडियो जारी कर अभिनेत्री पायल रोहतगी पर हमला बोला है। ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ अभिनेत्री के तौर पर चर्चित पायल रोहतगी को सम्बोधित करते हुए इस वीडियो में उन्होंने पायल को नसीहत दी कि वह ‘औरतों जैसी’ ही बातें करें। उन्होंने साथ ही यह भी धमकी दी कि इंशाल्लाह एक दिन ‘ज़ुल्म सहता मुस्लिम’ जब ‘फटेगा’ तो पूरी दुनिया अल्लाह को मानने लगेगी।

शुरू में पायल निशाने पर, बाद में गियर बदला

शुरू में अजाज़ केवल पायल रोहतगी को निशाने पर लेकर चल रहे थे। उन्होंने दावा किया कि अपने दोस्त और पहलवान संग्राम सिंह की पत्नी होने के नाते वह पायल की बहुत इज़्ज़त करते थे और उन्होंने वॉइस नोट भेजकर पायल को कई बार यह समझाने की कोशिश की कि वह (पायल) समुदाय विशेष के खिलाफ बोलना छोड़ दें। लेकिन चूँकि पायल रोहतगी की गतिविधियों पर कोई अंतर नहीं पड़ा है, इसलिए अब वह पायल को भाभी नहीं बोलेंगे।

https://www.youtube.com/watch?v=ZlufqVJcF7U

उन्होंने पायल रोहतगी को ‘सी-ग्रेड की एक मानी हुई एक्ट्रेस’ कहा। वह इस बात से भी खासे नाराज़ दिखे कि पायल रोहतगी ने शबाना आज़मी को ‘वेश्या’ कहा। हालाँकि सच्चाई यह है कि पायल रोहतगी ने खुद शबाना आज़मी को ‘वेश्या’ नहीं कहा था बल्कि दावा किया था कि जब शबाना आज़मी के मज़हब के ही एक कट्टरपंथी मौलवी ने उन्हें (शबाना को) यह अपशब्द कहा था। पायल रोहतगी ने इसी वाकये को याद दिलाकर शबाना आज़मी को पहले इस्लामी समाज में सुधार करने की नसीहत दी थी।

इसके बाद अजाज़ ने इस पर भी सवाल उठाए कि आखिर एक औरत होकर पायल रोहतगी अयोध्या के रामजन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर बनाने की बात कैसे कर सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अब “मोदी प्रधानमंत्री बन गया, बन गया… अब क्या ज़रूरत है ये सब (राम मंदिर?) करने की?” उन्होंने रोहतगी को “औरतों जैसी बात (??)” करने की भी नसीहत दी।

उन्होंने पायल रोहतगी से यह भी कहा, “मैं जानता हूँ आप अहमदाबाद से हैं, और आपके काफी ‘अच्छे-अच्छे’ मुस्लिम लड़के ‘दोस्त’ भी रहे हैं उन्होंने कुरान का ज़िक्र कर ये भी कहा कि कुरान के अनुसार “इंशाल्लाह” पूरी दुनिया मुस्लिम हो जाएगी। उन्होंने धमकी दी कि जिस दिन ‘ज़ुल्म सहता’ मुस्लिम ‘ज्वालामुखी की तरह फटेगा’ उस दिन पूरी दुनिया कलमा पढ़ेगी।

‘अजाज़ सलमान की सस्ती कॉपी’

पायल रोहतगी ने भी यूट्यूब पर ही एक वीडियो जारी कर अजाज़ पर पलटवार किया है। उन्होंने कटाक्ष किया कि खुद को सलमान खान समझने वाले अजाज़ खुद उनकी (पायल की) फिल्म में साइड-रोल कर चुके हैं, और सलमान खान की सस्ती कॉपी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अजाज़ ड्रग्स और महिलाओं से दुर्व्यवहार (मोलेस्टेशन) के मामलों में गिरफ्तार हो चुके हैं, और अजाज़ को ‘फ्रस्ट्रेटेड इंडियन मुस्लिम’ कहा।

पायल ने अजाज़ को चेतावनी दी कि शबाना आज़मी मामले में पायल अपनी बात को गलत तरीके से पेश करने के लिए, misquote करने के लिए अजाज़ के खिलाफ पुलिस में भी जाने का अधिकार रखती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह उन भारतीय मुस्लिमों से प्यार करती हैं, जो भारत से प्यार करते हैं। उन्होंने अजाज़ खान को ‘जिहादी’ भी कहा, और चेतावनी दी कि अगर अजाज़ ने उन्हें (पायल को) एक बार और misquote किया तो वह उनके खिलाफ पुलिस में जाएँगी।

‘तबरेज के बदले’ पर हसनैन का नफरत फैलाने वाला TikTok वीडियो, Zee Music ने कर दी छुट्टी

टिकटॉक ऐप इन दिनों युवाओं में सबसे पॉपुलर ऐप है। लेकिन आज इस ऐप का प्रयोग घृणा, नफ़रत और यहाँ तक की कुछ बिगड़े युवा माहौल बिगाड़ने और भड़काने के लिए भी कर रहे हैं। वैसे आमतौर पर शहर से लेकर गाँव कस्बों तक फिल्मी डायलॉग्स और गानों के जरिए अपनी कला का प्रदर्शन इस प्लैटफॉर्म का उद्देश्य रहा है। और अधिकांश ने इसका इसी कार्य में उपयोग भी किया है, लेकिन, कुछ लोगों ने इसके जरिए अपनी ओछी मानसिकता का भी प्रमाण दिया है। मामला क्या है इसकी चर्चा आगे है।

हाल ही में इस प्लैटफॉर्म पर एक वीडियो डाली गई, जिसमें कुछ लड़कों ने तबरेज की मौत के बदले वाले संदेश को जस्टिफाई करने की कोशिश की। इस वीडियो में हसनैन खान नाम का लड़का अपने अन्य चार दोस्तों के साथ मिलकर धमकी भरे शब्दों में ज़हर उगल रहा है, “मार तो दिया तुमने उस बेकसूर तबरेज अंसारी को… लेकिन जब कल उसकी औलाद बदला ले…तो ये मत कहना हर मुस्लिम आतंकवादी होता है।”

हसनैन के अकॉउंट पर डाली गई यह टिकटॉक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई, जिसके बाद हसनैन को ट्रॉल किया जाने लगा। हालाँकि, हसनैन ने अब अपने अकाउंट से इस वीडियो को डिलीट कर दिया है, लेकिन फिर भी कुछ अन्य टिकटॉक यूजर्स ऐसे वीडियो बनाते दिख रहे हैं। जिसमें एक नाम मिस्टर फैजू नाम के टिकटॉक ‘सेलिब्रिटी’ का भी है।

हसनैन द्वारा बनाई गई ऐसी वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस पर मुंबई पुलिस और जी म्यूजिक कंपनी का ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की और वे उसमें सफल भी हुए।

दरअसल, हसनैन द्वारा बनाई गई इस वीडियो में फैजू भी था, जिसने जी म्यूजिक कंपनी के साथ मिलकर एक पंजाबी एल्बम ‘तेरे बिन किवे’ की थी। जिसके कारण लोग जी म्यूजिक कंपनी को भी सवालों के घेरे में ले रहे थे। हसनैन के टिकटॉक वीडियो का मालूम चलते ही कंपनी ने अपने प्लैटफॉर्म से उसका म्यूजिक वीडियो हटा दिया और उस यूजर को बाकायदा शुक्रिया कहा जिसने उन्हें टैग करके इसपर ध्यान केंद्रित करवाया था। जी म्यूजिक ने अपने ट्वीट में स्पष्ट किया है कि अब ये लोग जी म्यूजिक के को-आर्टिस्ट नहीं हैं।

हसनैन के टिकटॉक पर 12.6 मीलियन फॉलोवर्स हैं और उसकी वीडियो को एक दिन में मीलियन लोगों द्वारा देखा जाता है। इसी तरह फैजू नाम के यूजर के टिकटॉक पर 24.1 मिलियन यूजर हैं, जिसके कारण वह टिकटॉक सेलेब्रिटी माना जाता है। ऐसे में इन लोगों की इस तरह के वीडियो को हल्के में लेना बहुत गलत है। क्योंकि मिलियन की तादाद में फॉलोवर बनाकर ये लोग ‘बदले’ जैसे संदेश को एक ब्रॉड प्लैटफॉर्म पर वायरल कर रहे हैं, बिना ये सोचे, कि इसका असर टिकटॉक के लिए पागल युवाओं की मानसिकता पर क्या पड़ेगा?

मंदिर पर हमला, शिवलिंग पर पेशाब, मूर्तियों को तोड़ना, पत्थरबाजी: ये ‘डरे हुए लोग’ चाहते क्या हैं?

कुछ घटनाएँ जो बीते दिनों में हुई हैं वो हमें इस्लामी आक्रांताओं के उस दौर को याद दिलाती हैं जब लुटेरों, बलात्कारियों और आतंकियों की एक भीड़ सीमा लाँघते आती थी, मंदिरों को तोड़ती थी, मूर्तियों को तहस-नहस करती थी, पुस्तकालयों में आग लगाती थी, तलवार की नोक पर मज़हब की शपथ दिला कर इस्लाम कबूल करवाती थी, और अपने आतंक की छाप छोड़ कर चली जाती थी।

दौर बदल चुका है लेकिन कुछ लोगों में वही आतंकी प्रवृत्ति अभी भी है। आज भी कश्मीर से लेकर सूरत तक इस्लामी भीड़ पत्थरबाजी करती है। लगातार, एक के बाद एक जगहों से मंदिरों के तोड़ने की ख़बरें आ रही हैं। हाल ही में बुलंदशहर में शिवलिंग पर एक कट्टरपंथी ने पेशाब कर दिया। उससे पहले दिल्ली में दुर्गा मंदिर में न सिर्फ़ मंदिर पर पत्थरबाजी हुई, बल्कि मूर्तियाँ विखंडित की गईं, और वहाँ भी मंदिर में पेशाब करने की ख़बर आई। साथ ही, सिर्फ़ जून के महीने में कम से कम दस जगहों पर मंदिरों पर हमले की घटनाएँ सामने आई हैं।

तीन जून को हरियाणा के खड़ा गाँव वीर बहादुर सिंह वैरागी की मूर्ति तोड़ दी गई और किशोरदास मंदिर पर हमला किया गया। बिजनौर के सबदलपुर गाँव में पहले चामुण्डा देवी मंदिर में उत्पात की घटना सामने आई, उसके कुछ घंटों बाद पीपलसना गाँव के शिव मंदिर की मूर्तियाँ विखंडित की गईं। पुलिस अपराधियों की तलाश में है। हरियाणा के मित्रोल गाँव के तुलसी कुंडम मंदिर में हनुमान जी और गणेश जी की मूर्तियों पर अज्ञात लोगों ने पत्थर फेंके। ये घटना एक और दो जून के बीच की रात की है।

राजस्थान के दौसा ज़िले में बिनावाला गाँव के स्थानीय मंदिर के भगवान हनुमान और महादेव की मूर्तियों पर हमले की घटना ख़बरों में आई। उत्तर प्रदेश के खतोली गाँव में इसी महीने मूसा नाम के एक दुसरे समुदाय के नवयुवक ने भगवान हनुमान की मूर्ति तोड़ने की कोशिश की लेकिन वो उसके आगे लगे शीशे को तोड़ने के बाद पकड़ लिया गया। उसने वहाँ पूजा कर रहे लोगों को गालियाँ भी दी।

जून के पहले सप्ताह में पीलीभीत के रोहन्या गाँव में इस्लामी भीड़ ने मंदिर में लाउडस्पीकर के बजने को लेकर तोड़-फोड़ की। इन लोगों ने न सिर्फ़ लाउडस्पीकर तोड़ा, बल्कि मंदिर की मूर्तियाँ तक साथ लेकर चले गए। जून के आखिरी सप्ताह में, मेरठ के घसौली गाँव में एक दलित को इस्लामी भीड़ ने इसलिए पीट दिया क्योंकि उसने मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाए, जो कि मस्जिद से थोड़ी ही दूरी पर था। इसके बाद इस भीड़ ने मंदिर पर हमला किया, पत्थरबाजी की और धारदार हथियारों का भी इस्तेमाल किया जिससे आधा दर्जन हिन्दू घायल हुए।

जून के दूसरे सप्ताह में तमिलनाडु के त्रिचि पुलिस द्वारा मुजीबुर रहमान को तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में देवी की हज़ार साल पुरानी मूर्तियों के साथ अश्लील तस्वीरें लगाने के लिए गिरफ्तार किया। हाल ही में इसी राज्य के तिरुवरुर ज़िले के पेरियानायकी अम्मन मंदिर की 25 मूर्तियों को तोड़ दिया गया। पुलिस ने पाँच नाबालिगों को गिरफ्तार किया है।

गत सप्ताह, इरशाद ने बुलंदशहर के जहांगीराबाद इलाके के महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर पेशाब कर दिया। दिल्ली के हौज़ क़ाज़ी में दुर्गा मंदिर में क्या हुआ ये सबको पता ही है कि कैसे ‘हिन्दुओं ने एक युवक को ‘जय श्री राम’ न कहने पर मार डाला’ कह कर भीड़ जुटाई गई और मंदिर पर धावा बोल दिया। तरीका, वही फेवरेट- पत्थरबाजी, नारा-ए-तदबीर और भीड़ द्वारा मंदिर में घुस कर मूर्तियों को तोड़ देना। मतलब, इन्हें जब बहाना भी नहीं मिलता तो, ये ख़ुद ही अफ़वाह फैला कर बहाना पैदा कर लेते हैं।

बात सिर्फ़ भारत की ही नहीं है, इंग्लैंड में भी गत माह की 10 और 19 तारीख को वालसॉल के फोर्ड स्ट्रीट में गुजरातियों के कल्चरल सेंटर और ‘श्री राम मंदिर’ के बाहर एक अपराधी ने तीन मूर्तियाँ तोड़ दी। वहाँ की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तीन महीने में यह तीसरी ऐसी घटना है और हिन्दुओं का कहना है कि चूँकि वो प्रशासन से अपनी बात हो-हल्ला करते हुए नहीं कहते, उसका फ़ायदा उठाया जा रहा है।

ये बस पिछले चालीस दिनों की कुछ घटनाएँ आपके सामने हैं जिनमें से कई मामले में समुदाय विशेष के नाम वालों की करतूतें हैं, और बाकियों में ये लोग अज्ञात हैं जिसकी तलाश पुलिस कर रही है। आप इन सभी में एक पैटर्न देख सकते हैं कि ये लोग मूर्तियाँ तोड़ते हैं, पत्थरबाजी करते हैं, और भीड़ का रूप लेकर मंदिरों में पूजा करने वालों को डराते हैं।

हाल ही में देहरादून में एक घटना के विरोध में कुछ हिन्दू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन हेतु, अनुमति के साथ, रैली निकाली तो उस रैली पर आरी, पेंचकस, चाकुओं और डंडों से इनामुल्ला बिल्डिंग में मौजूद इस्लामी भीड़ द्वारा हमला किया गया। इसी के उलट, गुजरात के सूरत में झारखंड के कथित तौर पर चोर कहे जा रहे तबरेज़ की कथित भीड़ हत्या पर प्रशासनिक अनुमति न मिलने के बावजूद, इस्लामी भीड़ नमाज़ के बाद मस्जिद से निकलती है, और नारेबाजी करते हुए अराजकता फैलाती है। पुलिस जब उन्हें रोकना चाहती है तो क्या होता है? वही पुराना पैटर्न- पत्थरबाजी। पुलिस पर हमला किया जाता है, पाँच पुलिसकर्मी घायल होते हैं, उनकी गाड़ियों को ‘शांतिप्रिय’ भीड़ आग के हवाले कर देती है।

ये सब तो वो मामले हैं जिनके बारे में रिपोर्ट बनी हैं। वरना, ऐसे कई मामले होते हैं जब इस तरह की बात होती है और स्थानीय पुलिस दोनों समुदायों को बिठा कर समझा देती है। किसको कितना समझ में आता है, वो बात और है, लेकिन मुद्दा तो यह है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर से अजान देने वालों को मंदिर में दो बार भजन बजाने से आपत्ति कैसे हो जाती है? ये किस तरह की सोच है कि तुम्हारे लाउडस्पीकर से आती आवाज़ इलाके का हर कान, चाहे या न चाहे सुनेगा ही, लेकिन दूसरे समुदाय ने भजन बजाया तो तुम मंदिर में घुस कर मूर्ति उखाड़ कर ले जाते हो!

मूर्तिभंजक तो इस्लामी लुटेरे शुरू से रहे हैं। लेकिन जब हज़ार सालों में लूटपाट छोड़ने के बाद, सभ्य समाज में रहते हुए, जिन्हें हर जगह के बहुसंख्यक ने बसने दिया, इनकी भीड़ दोबारा उसी बर्बर मोड में क्यों जाना चाहती है? आज के दौर में पत्थरबाजी और आगजनी कर के ये भीड़ क्या साबित करना चाहती है? नमाज पढ़ने के बाद कुछ जगहों के शांतिप्रिय हाथ में पत्थर लिए क्यों घूमते हैं? और ये जो ‘वो अच्छे मुस्लिम नहीं हैं’ वाला भद्दा मजाक इनके मज़हबी नुमाइंदे करते हैं, वो कब तक ऐसी वाहियात लाइन बोल कर इन आतंकी वारदातों को इग्नोर करते रहेंगे?

ये सब बहुत क्यूट लगता है जब आप एक कथित चोर, जिसका बाप भी चोर था, उसकी भीड़ द्वारा की गई पिटाई और कुछ दिन के बाद हुई मौत पर जुलूस निकालते हुए एक पाँच साल के बच्चे के हाथ में बैनर थमा देते हैं जिस पर खराब हिन्दी में यह लिखा होता है कि ‘हम मोहब्बत से कलमा पढ़ा कर गले लगा लेते हैं, और तुम ज़बरदस्ती जय श्री राम कहला कर क़त्ल कर देते हो। क्या यही है हिन्दू धर्म? स्टॉप भगवा टेरर।’

इस बच्चे को पता भी नहीं कि इसे कट्टर बनाने की तैयारी हो चुकी है

अरे भाई, पहली बात तो ये है कि हमें नहीं पढ़ना तुम्हारा मोहब्बत वाला कलमा। वो अपने पास रखो, आपस में पढ़ो ताकि तुम्हें और तुम्हारे पूरे समुदाय को मोहब्बत शब्द का अर्थ समझ में आए और यह भी कि गले मिल कर प्रेम से रहने का सही अर्थ यह नहीं कि भीड़ बना कर मंदिरों पर हमला करो। दूसरी बात, एक अपराध का सामान्यीकरण करना बंद करो वरना हर ऐसे तबरेज़ पर दस हिन्दू नाम गिना दिए जाएँगे। तुम्हारी आतंकी बमबारी से पूरी दुनिया और मज़हबी उन्माद से पूरा बंगाल दहल रहा है।

तुम ऐसे छोटे बच्चों का इस्तेमाल करना बंद करो। क्या सिखा रहे हो उसे? वो मानने लगे कि ‘भगवा आतंक’ है। फिर तो उसे यह भी बताते होगे कि ये जो मंदिरों पर उसके भाई-बापों की भीड़ हमला करती है वो इस्लामी आतंक है। फिर तो तुम उसके हाथ में यह बैनर भी देते होगे जहाँ वो यह समझ सके कि ‘जय श्री राम’ कह कर किसी को पीटने और ‘अल्लाहु अकबर’ चिल्लाते हुए सैकड़ों की जान ले लेने में बहुत ज्यादा अंतर है। अगर भगवा वाला ही तुम्हारे लिए आंतक है, तो उस बच्चे को इस्लामी आतंक समझाने के लिए तो नए शब्द बनाने पड़ेंगे! कम से कम बच्चों को तो अपने फ़रेब और अजेंडे से दूर रखो।

जब बात नैरेटिव बनाने की ही है, जहाँ ‘हिन्दू टेरर’ के नाम पर एक चुनाव लड़ा गया, असहिष्णुता के डिबेट से दूसरा, ‘डरा हुआ मुस्लिम‘ से तीसरा, वहीं अब सारे नुस्खे असफल होने पर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष को ऐसे रिपोर्ट किया जा रहा है जैसे लोग बाजारों में बम बाँध कर ‘अल्लाहु अकबर’ की जगह यही बोल कर फट रहे हैं।

आप गौर से देखिए कि किस तरह के पैरेलल बनाए जा रहे हैं। पूरी दुनिया इस्लामी आतंक से परेशान है, और कॉन्ग्रेस तथा वामियों के कामपंथी तंत्र ने क्या टर्म बनाया! भगवा आतंक। इससे पहले इस्लामी आतंक, आतंक का कोई मज़हब नहीं होता और हर कट्टरपंथी द्वारा किया दंगा, हत्या, मारपीट, आगजनी ‘समुदाय विशेष’ के नाम पर छुपाया जाता रहा। असहिष्णुता यह है कि तुम जानबूझकर गाय काटते हो, जबकि वो ग़ैरक़ानूनी है, असंवैधानिक है और हिन्दुओं की पूज्या है। ये भड़काने के लिए काटी जाती है।

लेकिन, जब गौतस्करों को कुछ लोग रोकते हैं, तो उसे असहिष्णु कहा जाता है। हाँ, इसमें हत्याएँ भी हुई हैं लेकिन हत्या तो उन पुलिस वालों की भी हुई हैं जिन पर ये गौतस्कर ट्रक चढ़ा कर भाग निकले। उन पुलिस वालों की जान का क्या? लेकिन असहिष्णु कौन है! हिन्दू! दुर्गा विसर्जन से लेकर रामनवमी के जुलूसों पर पत्थरबाजी कौन करता है? तिरंगा यात्रा के जुलूस पर कासगंज के चंदन को गोली कौन मारता है? जी, यही है वो डरा हुआ ‘शांतिप्रिय’ जिसके हाथ डर से इतने जोर से काँपते हैं कि वो कहीं बम, कहीं पत्थर, कहीं गोली, कहीं रॉड चला बैठता है। क्योंकि वो बहुत डरा हुआ है।

फिर नया पैरेलल गढ़ा जा रहा है ‘जय श्री राम’ का। इसे वही स्पिन दिया जा रहा है, जो इस्लामी आतंकी आईसिस से लेकर भारत की कई गलियों, चौराहों पर ‘नारा-ए-तदबीर’ के बाद गुनगुनाते हुए कभी बम तो कभी पत्थर फेंकते हैं। ‘जय श्री राम’ बुलवा कर अभी तक सिर्फ़ पीटने की ख़बरें आई हैं, जो कि अक्षम्य है, ग़लत हैं, ग़ैरक़ानूनी हैं। तबरेज़ भले ही चोर रहा हो, लेकिन किसी भीड़ को न तो उसे पीटने की ज़रूरत है, न ही ‘जय श्री राम’ कहलवाने की।

लेकिन, इसे इतना तूल देना कि ऐसा लगे कि हर हिन्दू, हर ‘शांतिप्रिय’ को राह चलते पीट रहा है, और उससे जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवा रहा है, ग़लत है और ग़ैरज़रूरी भी। हमें इन घटनाओं पर उसी तरह से पुलिस पर विश्वास दिखाना चाहिए जैसे हम ‘नारा-ए-तदबीर’ कह कर दुर्गा मंदिर पर हमला करती भीड़ पर दिखाने को कहते हैं। जबकि दोनों में एक और लाख का फ़र्क़ है, फिर भी हिन्दुओं ने इतनी सहिष्णुता हमेशा दिखाई है।

यही कारण है लोग पक चुके हैं मीडिया की दोगली रिपोर्टिंग से। बुद्धिजीवियों को उनके वाल पर, टाइमलाइन पर और कमेंट पर गालियाँ पड़ रही हैं क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में हर गाँव के टूटते मंदिर की वीडियो नाम-पते के साथ सेकेंडों में उपलब्ध हो जाती है। सूचना पर नियंत्रण, मीडिया का गेटकीपर अब अप्रासंगिक हो चुका है क्योंकि समय अब ड्रोनों का है। अब सूचना का एडिटर की आइडियोलॉजी या संस्थान के मुखिया के राजनैतिक झुकाव से कोई लेना-देना नहीं है, वो कहीं से भी अपने कच्चे स्वरूप में, बिना किसी ट्रीटमेंट के टपक जाती है।

इससे मुखौटे उतर रहे हैं। आप ध्यान दीजिए तो अब आपको वो अपराध भी दिखेंगे जो आप कभी सुनते ही नहीं थे। आपको वो शब्द सुनाई देंगे जिनके पर्याय के रूप में समुदाय विशेष कह कर उनकी विशेषताओं को हमेशा यही गेटकीपर और एडिटर छुपा लिया करता था। इनकी दबंगई, दंगाई प्रवृत्ति और घृणाजन्य अपराधों की रेल निकल रही है। ये डरे हुए तो बिलकुल नहीं हैं। ये मिनटों में अपनी दंगाई भीड़ जुटाने की क्षमता, अपने प्रागैतिहासिक काल के हथियारों और टिकटॉक से लेकर मीडिया स्टूडियो, अकादमिक संस्थानों और सत्ता के गलियारों में बैठे वैचारिक आतंकियों की शह पर विश्वास रखते हैं।

लेकिन, ये बंद होना चाहिए और ये बंद होगा। भारत ने अपनी अस्मिता, क्षेत्र, संसाधन, धन और संस्कृति तक पर वृहद स्तर के हमले झेले हैं। इन महलों का स्वरूप बदलता है लेकिन रेसिपी वही है। छोटे स्तर पर भीड़ जुटा कर, मूर्ति तोड़ कर, पत्थरबाजी करके पायलट प्रोजेक्ट किया जाता है ताकि देखा जाए कि हिन्दू कितना सोया है, कितना जगा हुआ है। छोटी मूर्ति टूटने पर अगर हिन्दू नहीं बोलता, विसर्जन के जुलूस पर ईंट फेंके जाने पर वो नहीं बोलता, रामनवमी के जुलूस पर चप्पल फेंके जाने पर वह नहीं बोलता तो, यह भीड़ एक क़दम और आगे बढ़ाती है।

तब यह भीड़ बड़े मंदिर तोड़ती है, तब यह भीड़ बड़े स्तर पर दंगे करती है, तब यह भीड़ शिवलिंग पर पेशाब कर देती है। इस भीड़ को पायलट प्रोजेक्ट के ही स्तर पर रोकना जरूरी है वरना गाय छोड़ कर मंदिरों को लूटने वाले तो इस देश ने बहुत देखे हैं।

चीखते रहे दरोगा लेकिन कार से 5Km तक घसीटता रहा युसूफ, ATM ठगी रैकेट का है सदस्य

अलीगढ़ में क़ानून व्यवस्था को धता बताते हुए एक कार चालक ने दरोगा को ही घसीट डाला। इस दौरान दरोगा की जान पर भी ख़तरा आ गया। दरअसल, टप्पल थाना के दरोगा एटीएम से रुपए चुराने वाले बदमाशों को पकड़ने निकले थे। इस दौरान थाने के सामने ही गुंडों ने उनके ऊपर गाड़ी चढ़ाने का प्रयास किया। दरोगा किसी तरह बचते हुए कार से लटक गए, जिसके बाद बदमाश उन्हें चलती कार में पूरे 5 किलोमीटर तक घसीटते चले गए। बाद में एक पशु के कार के सामने आने के बाद कार धीमी हुई, तब दरोगा किसी तरह कार से उतरने में कामयाब हुए।

इस दौरान पुलिस भी उक्त गाड़ी का पीछा करती रही और जैसे ही दरोगा कार से छूटने में सफल हुए, पुलिस ने बदमाश को धर दबोचा। हालाँकि, पुलिस की घेराबंदी के बावजूद चालक का साथी भागने में सफल हो गया लेकिन चालक युसूफ को गिरफ़्तार कर लिया गया। नूरपुर निवासी युसूफ के पिता का नाम नजीब है। पुलिस अन्य बदमाशों की अभी तलाश कर रही है। यह घटना रविवार (जुलाई 7, 2019) की है, जब दरोगा जितेंद्र सिंह तेवतिया एटीएम से रुपए उड़ाने वाले बदमाशों के आने की सूचना मिलने के बाद उनकी तलाश में निकले थे।

इस दौरान उन्होंने सामने से आ रही रिटीज़ कार को रोकने का प्रयास किया, लेकिन बेख़ौफ़ कार चालक ने भागने की कोशिश में दरोगा के ऊपर ही कार चढ़ाने का प्रयास किया। इसके बाद दरोगा ने किसी तरह ख़ुद को संभाला और कार का बोनट पकड़ कर लटकने में कामयाब रहे। इस घटना को देख तलाशी ले रहे अन्य पुलिसकर्मियों ने भी उक्त कार का पीछा किया।

इसके बाद पुलिस ने घेराबंदी कर चालक युसूफ को दबोचा और कार को जब्त कर लिया। चालक के ख़िलाफ़ जानलेवा हमला करने का मामला दर्ज किया गया है। उससे पुलिस पूछताछ कर रही है। जब ये सब चल रहा था, तब क्षेत्र में दरोगा के अपहरण की अफवाह उड़ गई, जिसके बाद अधिकारियों तक के होश उड़ गए। हालाँकि, दरोगा के लौटने और चालक के दबोचे जाने के बाद प्रशासन ने चैन की साँस ली। आरोपित युसूफ एटीएम से रुपए उड़ाने वाले गिरोह का सदस्य निकला। वह भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बनाता था।

युसूफ के ख़िलाफ़ आगरा के थाने में भी मामला दर्ज है और उसके आपराधिक इतिहास की छानबीन की जा रही है। दरोगा जितेंद्र की इलाक़े में तारीफ हो रही है क्योंकि कार के मिट्टी के टीले में जा घुसने के बाद वह दूर जा गिरे थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बदमाश को पकड़ने में कामयाबी पाई।