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‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ पर झूठ फैला रहा था साकेत गोखले, दिल्ली पुलिस ने खोली पोल

‘सामाजिक कार्यकर्ता’ साकेत गोखले ने दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने उसे ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ नारे के साथ प्रदर्शन की अनुमति दी थी। दिल्ली पुलिस ने साकेत के दावों को खारिज कर दिया है।

नई दिल्ली के डीसीपी ने ट्विटर पर साकेत के दावों को झूठा और निराधार बताते हुए कहा, “यह स्पष्ट किया जाता है कि साकेत गोखले को 2 फरवरी 2020 की रैली की इजाजत नहीं दी गई है। सोशल मीडिया में एक कॉपी को सर्कुलेट किया जा रहा है जिसमें रैली को इजाजत देने की बात लिखी गई है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।”

साकेत गोखले का ट्वीट

बता दें कि साकेत गोखले ने इसको लेकर ट्वीट किया था। इसमें 28 जनवरी को पुलिस को लिखे एक पत्र को पोस्ट करते हुए उसने लिखा, “दिल्ली पुलिस ने मुझे  ‘देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को’ नारे के साथ रैली करने की अनुमति दी है। यह अनुमति आज मुझे तब दी गई जब मैं पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन गया। लगता है इस नारे को राज्य की अनुमति प्राप्त है।”

इसके बाद उसने दूसरे ट्वीट में एक और झूठ फैलाते हुए लिखा कि पुलिस ने उसे जानकारी दी है कि चुनावी आचार संहिता लगे होने के कारण इस नारे के साथ प्रदर्शन में ‘दिक्कत’ हो सकती है। गोखले ने लिखा है कि उससे अब आग्रह किया गया है कि वह अपना प्रदर्शन आठ फरवरी के बाद कर लें।

साकेत गोखले का दूसरा ट्वीट

साकेत के ट्वीट में आप देख सकते हैं कि उसने जो आवेदन पोस्ट किया है, वो दिल्ली पुलिस से परमिशन लेने के लिए लिखा गया था। उसने ऐसा कोई पत्र शेयर नहीं किया है, जिसमें लिखा गया हो कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें इस प्रदर्शन के लिए अनुमति दे दी है। उसके पत्र में पुलिस की एक मुहर लगी है, जिसका मतलब होता है कि पुलिस को वो आवेदन प्राप्त हुआ। ये एक सामान्य प्रक्रिया है। इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा गया है कि पुलिस ने मंजूरी दी है। इस मुहर का ये मतलब कतई नहीं होता कि रैली की परमिशन दे दी गई है।

साकेत गोखले के इस झूठे दावे के बाद कई मीडिया हाउस ने रिपोर्ट की कि दिल्ली पुलिस ने देश के गद्दारों को गोली मारो सालों के नारे के साथ रैली करने की परमिशन दे दी है। इसमें वामपंथी प्रोपेगेंडा साइट द वायर से लेकर कॉन्ग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड और फाइनेंशियल पोर्टल मनीकंट्रोल तक शामिल है। यह जानने के बाद भी कि साकेत के दावे का कोई सबूत नहीं है, द वायर ने खबर चलाई कि दिल्ली पुलिस ने अनुमति दी थी, लेकिन फिर बाद में पीछे हट गई।

शरजील तेरे सपनों को मंजिल तक पहुँचाएँगे: मुंबई में CAA विरोध के नाम पर कश्मीर की ‘आज़ादी’ के पोस्टर

“शरजील तेरे सपनों को मंजिल तक पहुँचाएँगे।”

मुंबई में शनिवार (फरवरी 1, 2020) को आयोजित क्वीर प्राइड परेड में यह नारा काफ़ी देर तक गूँजता रहा। सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों ने देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ वाली मानसिकता का परिचय दिया। मुंबई के आज़ाद मैदान में आयोजित इस रैली में सीएए विरोधियों ने ‘लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर’ हितों की बात करने का दावा करते हुए सीएए के ख़िलाफ़ अपना प्रोपेगेंडा चलाया और भ्रम फैलाया। एनआरसी और एनपीआर को लेकर भी अफवाहें फैलाई गईं।

क्वीर आज़ादी मुंबई प्राइड मार्च के लिए अगस्त क्रांति मैदान में रैली करने की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बाद सीएए विरोधियों ने मुंबई पुलिस से ‘सॉलिडेरिटी मार्च’ के लिए अनुमति ली। इसके लिए शनिवार को दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक का समय निर्धारित किया गया। इस रैली में न सिर्फ़ शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाए गए बल्कि कई बैनर-पोस्टरों के जरिए सीएए और एनआरसी का भी विरोध किया गया। विरोध तो सीएए, एनआरसी और एनपीआर का हो रहा था लेकिन नारे ‘आज़ादी’ के लग रहे थे।

एक बैनर में तो ‘कश्मीरी की आज़ादी’ की ही माँग कर डाली गई। इससे पहले मुंबई पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को ‘आज़ादी मार्च’ निकालने की अनुमति नहीं दी थी और कहा था कि इससे क़ानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश की जा सकती है। इसके बाद मीडिया ने उद्धव सरकार की आलोचना भी की थी। अब जब रैली हुई तो इसमें ‘राजीव तेरे सपनों को, रावण तेरे सपनों को, पायल तेरे सपनों को- हम मंज़िल तक पहुँचाएँगे’ जैसे भड़काऊ नारे लगाए गए।

बता दें कि शरजील इमाम फ़िलहाल दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के शिकंजे में है और उसे यूपी पुलिस द्वारा ले जाए जाने की संभावना है। शरजील से पूछताछ के दौरान कई खुलासे हुए हैं और उसकी जिहादी मानसिकता का पता लगा है। वो मस्जिदों में सीएए के ख़िलाफ़ भड़काऊ पंफलेट बाँटा करता था। उसके मोबाइल फोन, कम्प्यूटर और लैपटॉप की भी जाँच की जा रही है।

पूछताछ में शरजील ने अपने वायरल हो रहे बयानों को भी सच बताया। उसके गिरफ़्तार होने के बाद अब शाहीन बाग़ का प्रदर्शन भी कमजोर पड़ता दिख रहा है और उपद्रवी वहाँ से निकलने के लिए तरह-तरह से बहाने बनाने में जुटे हैं।

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शाहीन बाग़ के 50 दिन: मंसूबे फेल हुए तो भीड़ जुटाने के लिए उपद्रवियों ने दिया इश्तेहार

आम आदमी पार्टी (AAP) ने चुनाव आयोग को एक पत्र लिखा है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे पत्र में पार्टी ने दावा किया है कि असामाजिक तत्व कुछ राजनीतिक दलों के संरक्षण में बड़ी हिंसा की तैयारी कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने कहा कि उसे सूत्रों से पता चला है कि रविवार (फ़रवरी 2, 2020) को बड़ी हिंसा की साज़िश रची जा रही है, जिसे क़ानून-व्यवस्था को अस्त-व्यस्त किया जा सके और दिल्ली में होने वाले चुनाव की तारीख को आगे बढ़ाया जा सके।

आप ने चुनाव आयोग से दरख्वास्त की है कि वो दिल्ली पुलिस व अन्य एजेंसियों को निर्देश देकर तुरंत इस मामले की जाँच कराए, जिससे किसी भी प्रकार की आपराधिक साज़िश को रोका जा सके।

दरअसल, शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में कई इश्तेहार जारी किया है, जिसमें 2 फ़रवरी को प्रदर्शन के 50 दिन पूरे होने के मौके पर बड़ी संख्या में लोगों से जमा होने को कहा गया है। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया है कि पिछले 50 दिनों में उनके ‘लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन के दौरान उन्हें डराने-धमकाने और ख़तरे में डालने की कोशिश की गई। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उनलोगों के ख़िलाफ़ गलतबयानी करते हुए घृणा फैलाई जा रही है। इन सबके लिए शाहीन बाग़ के उपद्रवियों ने भाजपा और हिन्दू सेना को जिम्मेदार ठहराया है।

शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की विज्ञप्ति: बहानों की पोटली

प्रदर्शनकारियों ने दावा किया है कि शनिवार को एक व्यक्ति ने पिस्तौल लहराते हुए धरनास्थल पर फायरिंग की, जिससे बुजुर्ग महिलाओं व बच्चों को ख़तरा उत्पन्न हो गया है। प्रदर्शनकारियों की विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि हिन्दू सेना ने उन्हें जिहादी बताते हुए 2 फ़रवरी को उन्हें हटाने की योजना बनाई है। इस विज्ञप्ति में जामिया नगर में फायरिंग करने वाले नाबालिग का भी जिक्र किया गया है और दावा किया गया है कि हिन्दू महासभा उसे सम्मानित करेगी। दिल्ली चुनाव की बात करते हुए प्रदर्शनकारियों ने अपील की है कि 2 फ़रवरी को लोग ज्यादा से ज्यादा संख्या में जुटें और उनके प्रति मज़बूती से खड़े होने का सन्देश दें।

शाहीन बाग़ के उपद्रवियों ने अपने विरोध-प्रदर्शन को अहिंसक करार दिया। हिन्दू महासभा की धमकी, जामिया नगर फायरिंग और शाहीन बाग़ फायरिंग के नाम पर लोगों से भीड़ जुटाने की अपील की जा रही है। ये शाहीन बाग़ के उपद्रवियों की हताशा का भी परिणाम है, जिन्हें खुल कर किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन नहीं मिल रहा है और उसका सरगना शरजील इमाम देशद्रोह के आरोप में पुलिस के शिकंजे में है। ऐसे में, कहा जा रहा है कि शाहीन बाग के उपद्रवी विरोध-प्रदर्शन बंद करने का कोई न कोई बहाना ढूँढ रहे हैं।

इश्तेहारों के जरिए शाहीन बाग़ में भीड़ जुटाने का प्रयास

जामिया नगर और शाहीन बाग़ में हुई फायरिंग की घटनाओं में कोई क्षति नहीं पहुँची है। दोनों ही घटनाओं में आरोपित अकेला था और पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद उसने अपना नाम-पता सब कुछ बताया। ऐसे कई संगठन हैं जो बिना बात भी धमकियाँ देते रहते हैं, लेकिन ग्राउंड पर उनका कोई असर नहीं होता। ऐसे में इन चीजों को बहाना बना कर इश्तेहारों के जरिए भीड़ जुटाने का प्रयास बताता है कि शाहीन बाग़ के उपद्रवियों के मंसूबे फेल हो चुके हैं।

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मैं शाहीन बाग वालों की मदद करता हूँ, वे रोज मुझे फोन करते हैं: कॉन्ग्रेस उम्मीदवार

नाबालिग को घर से उठाया, गैंगरेप के बाद मर्डर: 7 दिन बाद मिली लाश, पोस्टमार्टम के लिए MP पुलिस ने माँगी रिश्वत

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के गृह जिले छिंदवाड़ा में नाबालिग आदिवासी लड़की की बलात्कार के बाद हत्या का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शव जंगल से बरामद किया गया। मृतका के परिजनों का कहना है कि पोस्टमार्टम के लिए पुलिस ने उनसे रिश्वत की मॉंग की।

परिजनों के मुताबिक 18 जनवरी को बदमाशों ने लड़की को उसके घर से अगवा कर लिया। 25 जनवरी को उसका सड़ा गला शव जंगल में मिला। मृतका पांढुर्णा क्षेत्र के पाटई गाँव की रहने वाली थी। परिजनों के अनुसार पोस्टमार्टम करवाने के लिए पुलिस ने ₹5000 की रिश्वत मॉंगी। परिजनों ने पैसे नहीं दिए तो उन्हें शव ले जाने को कहा। पुलिस ने शव ले जाने के लिए वाहन देने के बदले में भी 1 हजार की रिश्वत माँग की।

जानकारी के मुताबिक नाबालिग के माता-पिता 18 जनवरी को खाना खाने के बाद खेत में सिंचाई करने के लिए चले गए थे। नाबालिग घर में अकेली थी और उसकी दादी दूसरे कमरे में सो रही थी। तभी रात के 11 बजे आरोपित लड़की को उठाकर जंगल में ले गए और उसकी हत्या कर दी। शव को छोड़कर आरोपित वहाँ से फरार हो गए। परिजनों ने इसकी शिकायत पुलिस से की, लेकिन स्थानीय पुलिस ने उनकी कोई मदद नहीं की। इसके बाद वो शनिवार (फरवरी 1, 2020) को शिकायत लेकर छिंदवाड़ा के एसपी के पास पहुँचे और घटना की जानकारी देते हुए आरोपितों के लिए फाँसी की सजा की माँग की।

बीजेपी नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना पर आक्रोश व्यक्त करते हुए एक के बाद एक लगातार तीन ट्वीट किए। उन्होंने अपने पहले ट्वीट में लिखा, “नरपिशाचों के हौसले इतने बुलंद हैं कि मुख्यमंत्री कमलनाथ जी के क्षेत्र पांढुर्णा के पाटई गाँव से 17 साल की बेटी को उठा ले गए। बलात्कार के बाद नृशंस हत्याकर जंगल में फेंक दिया। बेटी की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलेगी, जब तक अपराधियों को फाँसी के फँदे पर नहीं लटका दिया जाता है।”

दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा, “पांढुर्णा के पाटई गाँव की बेटी की आत्मा की शांति और परिजनों को यह गहन पीड़ा सहन करने की शक्ति देने की प्रार्थना करता हूँ। बेटी के सम्मान और जीवन से खेलने वाले नराधामों को उनके किये की सज़ा दिलाए बिना चैन से नहीं बैठूँगा।”

उन्होंने अपने तीसरे ट्वीट में इस घटना को निर्भया गैंगरेप से बड़ी घटना बताते हुए लिखा, “यह निर्भया कांड से ज़्यादा बड़ी घटना है। यह निकृष्टता की पराकाष्ठा है, क्रूरता की परिसीमा है। अभी भोपाल के मनुआभान टेकरी की दिवंगत पीड़िता को न्याय नहीं मिला, एक के बाद एक प्रदेश में ऐसी घटनाएँ हो रही हैं और सरकार चैन की नींद सो रही है। सरकार कब तक अपनी अकर्मण्यता का परिचय देगी?”

वहीं लावाघोंघरी थाना प्रभारी कौशल सूर्या का कहना है कि मृतका के परिजनों ने लड़की के लापता होने के बाद शिकायत नहीं कराई थी। उन्हें इसकी जानकारी 25 जनवरी को हुई। उन्होंने कहा कि अब तक दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है। दो युवकों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। जल्द ही पूरे मामले का खुलासा किया जाएगा।

नई दुनिया के छिंदवाड़ा संस्करण में 2 फरवरी 2020 को प्रकाशित खबर

नई दुनिया के मुताबिक कौशल सूर्या ने बताया कि नाबालिग के विजय और महेंद्र नाम के युवकों से प्रेम संबंध थे। विजय और महेंद्र 18 जनवरी को पीड़िता को उठाकर जंगल ले गए और फिर वहाँ पर हुई कहासुनी के बाद दोनों आरोपितों ने नाबालिग की गला घोंटकर हत्या कर दी और फरार हो गए। बताया जा रहा है कि दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और फिर न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया। पुलिस आगे की जाँच कर रही है।

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लखनऊ के हजरतगंज में विश्व हिंदू महासभा के अध्यक्ष की हत्या, सिर में गोली मार बाइक सवार फरार

लखनऊ में एक बार फिर से हिंदूवादी नेता को निशाना बनाया गया है। विश्व हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रंजीत बच्चन की बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी। बीते साल लखनऊ में ही हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई थी। रंजीत बच्चन की हत्या तब की गई, जब वे हजरतगंज इलाक़े में सुबह की सैर के लिए निकले थे।

रंजीत बच्चन की हत्या रविवार (फरवरी 2, 2020) को तब हुई, जब वो मॉर्निंग वाक के लिए निकले थे। पुलिस ने डेड बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है। बाइक पर सवार अपराधियों ने बच्चन के सिर में गोली मारी। घटनास्थल पर पहुँची पुलिस जाँच में लगी हुई है। मौके पर पुलिस कमिश्नर सहित कई कई बड़े अधिकारी मौजूद हैं। ये घटना सुबह साढ़े 6 बजे के क़रीब हुई। जब रंजीत बच्चन के सिर पर गोली मारी गई, तब वो ग्लोब पार्क से निकल रहे थे।

मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले रंजीत बच्चन हजरतगंज इलाके की ओसीआर बिल्डिंग के बी ब्लॉक में रहते थे। इस घटना में उनके भाई भी घायल हो गए हैं। उनके हाथ में गोली लगी है। उनका इलाज ट्रामा सेंटर में किया जा रहा है। जहाँ ये घटना हुई है वह यूपी की राजधानी के व्यस्ततम इलाक़ों में से एक है। ताबड़तोड़ गोलीबारी से शहर में दहशत का माहौल पैदा हो गया है। लोगों का ये भी कहना है कि हिंदूवादी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है।

अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि रंजीत बच्चन के सिर में कितनी गोलियाँ लगी हैं। वो अपने संगठन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी करते थे। अपराधी उन्हें मार कर मौके से फरार हो गए। बता दें कि पिछले साल हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई थी। उन पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किया गया था और गोली भी मारी गई थी।

कमलेश तिवारी मर्डर: 2 पर हत्या और 11 पर साजिश रचने का चलेगा मामला, तनवीर अब भी फरार

कमलेश तिवारी मर्डर: मौलाना कैफ़ी को बेल, मुस्लिम संगठन ने खड़ी कर दी थी वकीलों की फौज

कमलेश तिवारी मर्डर: रईस ने 72 कट्टरपंथियों का बनाया था ग्रुप, आसिम ने हत्यारे से पूछा था- तुमसे हो पाएगा?

बुर्का पहन भड़का रहा था AMU का छात्र नेता सज्जाद, पुलिस पहुँची तो महिलाओं के बीच छिपा, फिर भाग गया

अलीगढ़ के शाहजमाल में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध में कई दिनों से प्रदर्शन चल रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज पर वहाँ भी महिलाओं को बिठा दिया गया है, ताकि मीडिया का अटेंशन पाया जा सके। ये विरोध-प्रदर्शन करीब पाँच दिनों से जारी है। शनिवार (फ़रवरी 1,2020) की शाम प्रदर्शनकारी महिलाएँ तिरंगे का टेंट बना कर उसके नीचे धरना देने को अड़ गईं। हालाँकि, पुलिस ने समय रहते उनकी इस चाल को नाकामयाब कर दिया, क्योंकि इससे शांति-व्यवस्था भंग होने की आशंका थी।

इस दौरान महिलाओं व पुलिस के बीच तीखी झड़प भी हुई। पुलिस ने टेंट को जब्त कर लिया और महिलाओं को शांति के साथ प्रदर्शन करने की सलाह दी। प्रदर्शनकारी महिलाओं ने पुलिस को घेरने की भी चेष्टा की। इससे पहले शुक्रवार को धरनास्थल पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष सज्जाद सुभान पहुँच गया। इस दौरान सज्जाद ने बुर्का पहन कर महिलाओं के प्रदर्शन में शिरकत की। सज्जाद ने टेंट लगाने और माइक फिट करने में प्रदर्शनकारियों की मदद की।

इसके बाद सज्जाद ने वहाँ भाषण देना शुरू कर दिया। पुलिस ने जब सज्जाद को रोका तो वो महिलाओं के बीच पहुँच कर बुर्के में प्रदर्शन करने लगा। प्रदर्शन के दौरान ही सज्जाद अपनी फेसबुक पेज पर लाइव हो गया और उसने वहाँ उपस्थित प्रदर्शनकारी महिलाओं को उकसाना शुरू कर दिया। वो वहाँ उपस्थित लोगों को भड़का रहा था। स्थिति बिगड़ती देख जब पुलिस उसे गिरफ़्तार करने पहुँची तो वो साथियों सहित भाग खड़ा हुआ। पुलिस ने इस प्रदर्शन को लेकर 600 अज्ञात के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है।

शुक्रवार की देर रात वहाँ छात्र नेता सलमान इम्तियाज भी आ धमका। बाद में वो भी पुलिस के डर से भाग खड़ा हुआ। जब बुरका वाले वीडियो को लेकर सज्जाद से सवाल किया गया तो उसने कहा कि ये वीडियो उसका नहीं है, किसी और का है। धरणास्थल पर महिलाएँ नमाज भी पढ़ रही हैं। आसपास उनके घर के पुरुष खड़े रहते हैं, जो उन्हें निर्देशित करते हैं।

इससे पहले सज्जाद ने शरजील इमाम का भी बचाव किया था। राजद्रोह के आरोपित शरजील को सज्जाद ने राष्ट्रवादी बताया था। कश्मीरी छात्र नेता सज्जाद ने पुलवामा आतंकी हमले के समय पूछा था कि कहीं इसके पीछे अपनी ही एजेंसियों का तो हाथ नहीं? उसने आतंकियों के समर्थन में ट्वीट करने वाले छात्र वसीम बिलाल का भी बचाव किया था।

हम उस कौम से हैं कि अग़र बर्बाद करने पर आए तो छोड़ेंगे नहीं: AMU का पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष फ़ैजुल हसन

गोरखपुर का डॉ. कफील खान मुंबई से गिरफ्तार, AMU में दिया था भड़काऊ भाषण

गणतंत्र दिवस पर रोड़ जाम करने वाले 600 AMU छात्रों के ख़िलाफ अलीगढ़ पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा

IIT बॉम्बे को JNU बनाने की साजिश की पोल खोल: ग्रोवर और कश्यप जैसों के सहयोग से हावी होता गिरोह

आईआईटी बॉम्बे में इन दिनों एक खेल चल रहा है। एक ऐसा खेल, जिसके तहत उन छात्रों का ब्रेनवाश किया जा रहा है, जो राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते। राजनीति से दूर रहने वाले प्रोफेसरों को बरगला कर उनका हस्ताक्षर ले लिया जा रहा है और उसे आईआईटी बॉम्बे का विचार बना कर पेश किया जा रहा है। मीडिया भी इसे हाथोंहाथ ले रही है। प्रोफेसरों और छात्रों का एक गुट लगातार संस्थान की छवि बदनाम करने में लगा हुआ है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि वहाँ के कुछ छात्रों से ही बातचीत के दौरान ऑपइंडिया को ये बातें पता चली हैं।

ऑपइंडिया ने आईआईटी बॉम्बे के एक छात्र से बातचीत की, जिसने नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर सीएए और एनआरसी विरोध के नाम पर मुट्ठी भर प्रोफेसरों के प्रपंच को जाहिर किया। छात्र ने बताया कि चंद प्रोफेसरों ने ऐसे कई प्रोफेसरों को चुना, जिन्हें राजनीति से ख़ास मतलब नहीं। उन्हें बरगला कर वामपंथी प्रोफेसरों ने उनका हस्ताक्षर ले लिया। प्रोफेसरों से कहा गया कि वो हिंसा के विरोध में हस्ताक्षर करा रहे हैं। बाद में इसे सीएए और एनआरसी विरोधी बता कर पेश कर दिया गया।

उक्त छात्र ने बताया कि शाहीन बाग़ में शुरू हुए प्रदर्शन के बाद आईआईटी बॉम्बे के सोशियोलॉजी विभाग के छात्र केंद्र सरकार के विरोध में ज्यादा सक्रिय रहे। चूँकि इस विभाग में छात्रों के एडमिशन को लेकर प्रोफेसर ही इंटरव्यू लेते हैं, वामपंथी प्रोफेसरों की दया से यहाँ जेएनयू के छात्रों का एडमिशन हुआ है। ऑपइंडिया से बात करते हुए छात्र ने आरोप लगाया कि वामपंथी विचारधारा वाले छात्रों को उक्त विभाग में भरा जा रहा है। एमफिल और पीएचडी वालो कोर्स के लिए ऐसा किया जा रहा है। इन कोर्सेज के लिए अंतिम निर्णय प्रोफेसरों को ही लेना होता है।

‘आंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल’: इस फेसबुक पेज का नाम बदल कर ‘आईआईटी बॉम्बे फॉर जस्टिस’ कर दिया गया

सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ ‘सोम बिल्डिंग (स्कूल ऑफ मैनेजमेंट)’ में 25 जनवरी को विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। वहाँ विरोध प्रदर्शन के लिए ‘डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर (DSW)’ से अनुमति लेनी होती है। यहाँ छात्रों और प्रोफेसरों ने मिल कर एक ‘आंबेडकर-फुले-पेरियार स्टडी सर्कल’ समूह बनाया और इसके बैनर तले विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। डीन से अनुमति न मिलने के बावजूद अनाधिकारिक रूप से विरोध-प्रदर्शन किया गया। इससे आईआईटी के अन्य छात्रों को काफ़ी परेशानी होने लगी। मुश्किल से 40-50 छात्र और 10-12 प्रोफेसरों ने आए दिन कैम्पस में उपद्रव शुरू कर दिया और अन्य छात्रों को दिक्कतें होने लगी।

इसके बाद छात्रों ने उपद्रवी छात्रों व प्रोफेसरों के ख़िलाफ़ संस्थान के प्रशासन से शिकायत की। एक और गौर करने वाली बात ये है कि यही मुट्ठी भर प्रोफेसर और छात्र ख़ुद को आईआईटी बॉम्बे का प्रतिनिधि बताते हैं। वामपंथी प्रोफेसर और छात्रों ने ‘हमें चाहिए आज़ादी’ के नारे लगाए। शिकायत के बाद डायरेक्टर ने प्रोफेसरों और छात्रों से बातचीत कर उन्हें समझाया। डायरेक्टर ने सलाह दी कि आईआईटी बॉम्बे तकनीकी क्षेत्र में देश का नंबर 1 संस्थान है, इसीलिए इसे राजनीति से दूर रखा जाए। साथ ही उपद्रवी छात्रों व प्रोफेसरों को उन छात्रों को परेशान न करने को कहा, जो इन सबसे कोई मतलब नहीं रखते।

वामपंथी प्रोफेसर और छात्र डायरेक्टर की इस सलाह के बाद भड़क गए। वो पूछने लगे कि अगर राजनीतिक वाद-विवाद नहीं होगा तो फिर यहाँ पॉलिसी डिपार्टमेंट होने का औचित्य क्या है? वामपंथियों से तंग आकर कुछ अन्य प्रोफेसरों व छात्रों ने 25 जनवरी को डीन से अनुमति लेकर सीएए के समर्थन में रैली निकाली। इसके बाद वामपंथी गुट ने एक लम्बे तिरंगे झंडे के साथ रैली की। मामला गणतंत्र दिवस के दिन बिगड़ गया। हॉस्टल 12, 13 व 14 जनवरी को वामपंथियों के गुट ने ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ वाले वरुण ग्रोवर को चीफ गेस्ट बना कर इन्वाइट किया। साथ ही एक विरोध-प्रदर्शन रैली निकालने की योजना बनाई।

चंद छात्रों व प्रोफेसरों ने मीडिया के सामने ख़ुद को घोषित किया आईआईटी बॉम्बे का प्रतिनिधि

एक साज़िश के तहत ‘आंबेडकर-फूले-पेरियार स्टडी सर्कल’ के फेसबुक पेज का नाम बदल कर ‘जस्टिस फॉर आईआईटी बॉम्बे’ कर दिया गया। गणतंत्र दिवस के दिन संस्थान ने बाहरी व्यक्ति के कैम्पस में प्रवेश पर बैन लगा दिया। आशंका थी कि बाहरी लोग माहौल खराब कर सकते हैं। वरुण ग्रोवर की भी एंट्री रोक दी है। इसके बाद वामपंथी प्रोफेसरों की बीवियों व महिला वामपंथी प्रोफेसरों ने वरुण ग्रोवर को अपना गेस्ट बना कर अंदर एंट्री करा दी। इसके बाद कई वामपंथी छात्र पोस्टर-बैनर और डफली लेकर विरोध-प्रदर्शन करने लगे। इन छात्रों ने ‘लड़ कर लेंगे आज़ादी’ जैसे नारे भी लगाए।

अन्य छात्रों को फिर से परेशानी हुई। परेशान छात्र नारेबाजी व उपद्रव के कारण न तो पढ़ाई कर पा रहे थे और न ही ठीक से मेस में बैठ कर खाना खा पा रहे थे। उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड्स से इसकी शिकायत की लेकिन रसूखदार वामपंथी प्रोफेसरों के आगे गार्ड्स की एक न चली। अंत में हार कर छात्रों ने इसकी शिकायत पुलिस से की। पुलिस ने आकर वरुण ग्रोवर को कैम्पस से बाहर निकाला और हिरासत में भी लिया। तब जाकर उस दिन मामला शांत हुआ। वामपंथी छात्र घूम-घूम कर नुक्कड़ नाटक भी कर रहे थे और अपने ही संस्थान पर निशाना साध रहे थे।

इसके बाद आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने एक नोटिस जारी कर किसी भी प्रकार की असामाजिक व देशद्रोही गतिविधि में शामिल न होने को कहा। बावजूद इसके शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाए गए। शरजील इमाम ने असम को भारत से अलग-थलग कर के टुकड़े करने की धमकी दी थी और लोगों को भड़काया था। डीएसडब्ल्यू ने छात्रों को स्पष्ट कर दिया कि शरजील इमाम का मामला देशद्रोह से जुड़ा है, इसीलिए इस मामले में उसका समर्थन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद रवीश कुमार व वामपंथी मीडिया ने डीएसडब्ल्यू को ‘तानाशाह’ करार दिया।

आईआईटी बॉम्बे ने छात्रों को दी शांति रखने की सलाह तो भड़की वामपंथी मीडिया

शरजील इमाम व उसके समर्थकों को बचाने के लिए रवीश कुमार ने भी अपने ‘प्राइम टाइम’ में कई फ़र्ज़ी दलीलें दी। आईआईटी बॉम्बे के छात्र ने ऑपइंडिया को बताया कि कैम्पस में हॉस्टल जनरल सेक्रेटरी का चुनाव होना है, जहाँ वामपंथियों को बिठाने का प्रयास किया जा रहा है। राजनीतिक रुझान न रखने वाले छात्रों को बरगलाया जा रहा है और उनका ब्रेनवाश किया जा रहा है। यहाँ इस सवाल का कोई तुक नहीं बनता कि आईआईटी में पढ़ने व पढ़ाने वाले को बरगलाया नहीं जा सकता, क्योंकि उनका ब्रेनवाश करने वाले भी से हैं और सारे दाँव-पेंच आजमा रहे हैं।

बिजनेस समिट में अनुराग कश्यप स्पीकर के तौर पर भाग लेंगे: एजेंडा साफ़ है

आईआईटी बॉम्बे के ई-सेल ने कॉलेज बिजनेस फेस्ट में अनुराग कश्यप जैसे गालीबाज को बुलावा भेजा है, जो हर बात में पीएम मोदी व गृह मंत्री अमित शाह को गालियाँ बकते हैं। हालाँकि, एंटरप्रेन्योरशिप समिट के नाम पर उन्हें क्यों बुलाया जा रहा है, ये वामपंथियों का एजेंडा स्पष्ट दिखता है।

देश विरोधी गतिविधियों से दूर रहें: IIT बॉम्बे का सर्कुलर, यहीं से पढ़ा है शाहीन बाग का मास्टरमाइंड शरजील

IIT Bombay ने निकाली तिरंगा यात्रा, वामपंथी शरजील के समर्थन में पोस्टर बनाने में रहे व्यस्त

IIT-B के छात्र नागरिकता विधेयक के पक्ष में, वामपंथी फैकल्टी के डर से नहीं आ रहे सामने

हास्य-व्यंग्य: रवीश की बजट विश्लेषण स्क्रिप्ट हुई लीक! अजीत भारती का वीडियो | Satire- Ravish Kumar Budget 2020 script

बजट आ चुका है और स्टूडियो में चर्चा हो रही है। रात में प्राइम टाइम भी होगा जब बजट पर विश्लेषण होगा। हमारे पास रवीश कुमार के बजट की लीक हुई स्क्रिप्ट आ गई है जिसे हमने इस बार न्यूज़लौंडी के झबरा कुत्ते से सुँघवा कर सत्यापित किया है। 

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बजट 2020: रवीश कुमार का विश्लेषण, प्राइम टाइम से पहले लगा हमारे हाथ… हें हें हें

बजट आ चुका है और स्टूडियो में चर्चा हो रही है। रात में प्राइम टाइम भी होगा जब बजट पर विश्लेषण होगा। हमारे पास रवीश कुमार के बजट की लीक हुई स्क्रिप्ट आ गई है जिसे हमने इस बार न्यूज़लौंडी के झबरा कुत्ते से सुँघवा कर सत्यापित किया है। पेश है स्क्रिप्ट के मूल अंश:

देखिए, बजट किस दिन आया है, दिन है शनिवार, जो कि एक छुट्टी का दिन माना जाता है। बात यह नहीं कि ये छुट्टी का दिन है, गौर करने वाली बात यह है कि यह दिन हनुमान जी का है, इसीलिए उनको और उनके भक्तों को खुश करने के लिए बजट को लाल रंग के थैले में पेश किया जाता है। लाल रंग से याद आया…

लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

अब आपने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को बजट पेश करने के दौरान देखा होगा, जोकि आज पीली साड़ी में थीं। अब इस साड़ी का रंग पीला ही क्यों था? यह कोई सामान्य बात नहीं इसके पीछे भी भक्तों को खुश करने की मंशा नज़र आती है, क्योंकि पीला रंग विष्णु भगवान का प्रतीक है। असल में बात यह कि देश में सांप्रदायिकता का ज़हर घोलने की कोशिश की जा रही है।

अब बात करें बजट की तो करोड़ों रुपए का बजट पेश कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि इस बजट के बाद देश की जनता एकदम से अमीर हो जाएगी, लेकिन हकीक़त यह है कि जितना फायदा और सपने बजट के पेश करने के दौरान दिखाए जाते हैं, उतना कुछ है नहीं, क्योंकि अगर हम कैलकुलेटर से नापें तो पता चलता है कि 78000 रुपए सालाना बचत, 216 रुपए प्रतिदिन, 9 रुपए प्रति घंटे और 15 पैसे प्रति मिनट का फायदा हो रहा है। ये बहुत कम है।

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जहाँ सामान्य तौर पर बजट के दौरान सेंसेक्स ऊपर जाता है, इससे वैसे आम जनता का ज्यादा कोई मतलब नहीं, लेकिन अग़र सेंसेक्स 1 अंक भी नीचे जाता है तो आप समझिए कि ये ग़रीब की थाली से रोटी छीन रहा है। हालाँकि मुझे ये बजट ज्यादा समझ नहीं आता, लेकिन एक बात साफ़ है कि इस बजट से सीधे तौर पर अंबानी और अडानी बंधुओं को फायदा पहुँचाया गया है।

वहीं इस बजट में आने वाले वेलेंटाइन-डे को लेकर कुछ नहीं बोला गया, जिससे साफ है कि युवाओं की अनदेखी की गई है। वह भी ऐसे समय में कि जब देश का बेरोजगार युवा प्रेम जाल में फँसकर भटक रहा है या फ़िर बंदूक उठा रहा है। अब आप देखिए कि ये बजट ऐसे माहौल में लाया गया, जब पूरे देश में, और खास तौर पर शाहीन बाग में, सीएए और एनआरसी के खिलाफ जमकर विरोध हो रहा है, तो क्यों न मान लिया जाए कि ये कहीं न कहीं शाहीन बाग से मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए लाया गया है? क्योंकि आज पूरे दिन मीडिया शाहीन बाग की कवरेज और जनता के जरूरी मुद्दों को छोड़कर सिर्फ बजट पर ही चर्चा करती रही और एक दिन में ही वह रामभक्त अचानक से गायब हो जाता है, जिसने देश में आतंक फैलाने की कोशिश की हो।

कहने के लिए बजट में 85,000 करोड़ एससी/एसटी, ओबीसी के लिए दिया जाता है, लेकिन क्या इससे ग़रीब की भूख मिट पाएगी? क्या हम गरीब को अमीर बना पाएँगे? शिक्षा के लिए एक लाख करोड़ दिए जाने की घोषणा की जाती है। 94 (हज़ार करोड़) से 99 (हज़ार करोड़) हो गए, लेकिन अभी तक 2020 तक नहीं पहुँच पाए। हर साल युवाओं को उच्च शिक्षा का झुनझुना दे दिया जाता है। बच्चे IIT के विरोध में हैं, यूनिवर्सिटी सीएए के विरोध-प्रदर्शनों में जल रहे हैं। ऐसे समय में उच्च शिक्षा के लिए लाखों-करोड़ों रुपए के बजट पास करने का कोई मतलब नहीं हैं, क्या फायदा ऐसे पैसे का। भले ही वित्तमंत्री के रूप में आप सफल हो सकते हैं, लेकिन सभ्य समाज के रूप में हम हार गए हैं।

अगर बात करें डिफेंस की तो हम करोड़ों-अरबों रुपए देश की जनता का खर्च कर राफेल ले रहे हैं। जब लड़ाई किसी से होती नहीं, तो देश में इतने मँहगे जहाजों और हथियारों के लाने का क्या फायदा? इससे अच्छा है कि कागज के जहाज ही बनाकर उसे सजा के रख दिया जाए। अब पीछे की ओर देखिए, पिछले सालों में कितने युद्ध हुए। कोई हुआ है तो ज़रा एक भी वाीडियो दिखाइए।

अब बात करते हैं बजट से जुड़े लोकप्रिय मुद्दों पर जिन पर चर्चा हुई ही नहीं! लोगों के बीच के मुद्दों से ध्यान हटाया गया, जबरदस्ती के टैक्स और पैसे की बातें हुईं। पहला मुद्दा जो ध्यान में आता है कि उच्च क्वालिटी वीड आदि पदार्थों के लिए बजट में कोई राहत नहीं दी गई है, जिसका सेवन वामपंथी युवाओं के साथ-साथ फ़िल्म स्टार भी करते हैं। इससे साफ़ है कि बजट में वामपंथी युवाओं की अनदेखी की गई है। वहीं दूसरी तरफ, घोड़े की सूखी लीद, जिसका सेवन अनुराग करते हैं, कुणाल करते हैं, यहाँ तक कि स्वयं मैं भी करता हूँ, उस पर बढ़े हुए आयात शुल्क पर कोई चर्चा नहीं हुई। दरअसल ये आम लीद नहीं, ये मंगोलियाई घोड़े की नस्ल है, जिसके पूर्वजों का मिलन चंगेज खान के घोड़े से हुआ करता था। इसलिए ये लीद उच्च गुणवत्ता वाली मानी जाती है।

इस बजट में वामपंथी ट्रोलों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया गया है। ये इतनी चिंता का विषय है कि कोई भी आज कल आकर पेल देता है। यहाँ तक कि मेरे सोशल मीडिया हैंडल पर कोई कुछ भी कहकर चला जाता है। खैर, इस बजट में व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी (वामपंथी कैंपस, लिबरलगंज) के लिए लगातार छठे साल भी फंड में कमी की गई है। जबकि दक्षिणपंथी कैंपस को लगातार बजट में पैसा दिया जा रहा है। वो अब राष्ट्रीय मीम योजना के तहत लाभ ले रहे हैं। वो भी कागज दिखाकर!

अब बात करते हैं कागज की, तो ध्यान देने वाली बात यह कि पूरे साल सरकार और मीडिया ने कागज दिखाने पर चर्चा की, लेकिन सरकार ने कागज पर टैक्स कम नहीं किया। कागज को लेकर सरकार गंभीर होती तो जरूर इस पर टैक्स कम करती, लेकिन ऐसा लगता है कि ‘कागज नहीं दिखाएँगे’ वालों से अब सरकार डर गई है।

वहीं दूसरी तरफ, ‘दो रुपया दे दो ना कामरेड, बीयर पीना है’ (तगड़ी तलब याचनामिश्रित स्वर में पैसा माँगते हुए) इस योजना पर टैक्स छूट नहीं की गई है। इससे पता चलता है कि जेएनयू को नजरअंदाज किया गया है, जहाँ एक नहीं बल्कि सैकड़ों छात्र-छात्राएँ इस योजना का लाभ उठा रहे हैं।

गमछों पर लगातार बढ़ते दामों और तेज़ी से बढ़ता सड़क निर्माण, तो कहीं रेल मार्ग बनाने की घोषणा की जा रही है। मतलब साफ है कि पत्थर कहीं भी देखने को नहीं मिलना चाहिए। इन घोषणाओं के बाद सवाल यह खड़ा होता है कि जब आते-जाते रास्तों में पत्थर ही नहीं होगा, तो एक ‘मास्क मैन’ अपने गुस्से का इजहार कैसे कर पाएगा। यह अभिव्यक्ति की आज़ादी को छीनने जैसा है।

दो फिल्मों से गंजेपन की समस्या पर ध्यानाकर्षण के बावजूद, इस बजट में बालों पर सरकार ने कुछ नहीं बोला है। ट्रांसप्लांट पर वित्तमंत्री ने चुप्पी साधी है। वह भी ऐसे समय में कि अब एक आदमी झबरा है तो दूसरा टकला। वहीं पंचर के पुराने ट्यूब पर भी कोई राहत नहीं दी गई है, जिसके पैसों से सॉल्ट न्यूज़ चुटकुलों की फैक्टचेकिंग करता है।

बजट पर हमने आम लोगों की भी राय ली। हमने फरजील इमाम से बजट पर बात करने की कोशिश की, उन्होंने बताया, “हमें क्या, हमारा तो PFI से फण्ड आता है।” हमने एकतरफा से भी बात की, उन्होंने कहा, “फोटोशॉप पर बजट में चर्चा के अभाव से वो दुखी हैं।” फिर हमने कुछ मीडिया वालों से भी बात की, जिसमें द स्क्विंट, द लायर, सॉल्ट न्यूज़, न्यूज़लौंडी प्रमुख रूप से शामिल हैं। अब इन्होंने एक लाइन में ऐसी बात कही, “हमें क्या साहब हमें तो वेटिकन से फंड मिल ही रहा है।”

फिर हमने जन्नत में पहुँचे आतंकियों से बात करने की कोशिश की, जिसमें जाकिर मूसा, बुरहान बानी आदि नाम शामिल थे, जिन्होंने कहा, “हमें क्या, हम तो आतंकवादी हैं। हम तो 72 हूरों के साथ जन्नत की सैर कर रहे हैं।” भले ही उन्होंने अपने आप को आतंकवादी कहा, लेकिन आज भी कई चैनल उनको आतंकवादी नहीं मानते।

इस मुद्दे पर अनंत सिह से हमारे रिपोर्टर क्रोधित मिश्रा ने बात की और उनके मुँह में माइक डालकर जवाब लेने की कोशिश की, जिससे आजिज आकर अनंत सिंह ने कहा, “&*^% का बजट है!”

अंत में बात यही कि मैं इस बजट को सांप्रदायिक मानता हूँ। यकीन मानिए आज इस बजट के दौरान गाँधी जी होते तो इसे पास नहीं होने देते। अब क्या बजट तो हर साल आता है-जाता है, लेकिन देश में अल्पसंख्यक के मुद्दे पर सभी चुप्पी साध लेते हैं। अंत में सवाल यही कि क्या इस बजट के पैसे से गरीब का पेट भर जाता है? कोई जवाब है… नहीं। हें.हें.हें…नमस्कार!

हैदराबाद एनकाउंटर पर रवीश कुमार के प्राइम टाइम की स्क्रिप्ट हुई लीक, NDTV में मचा हड़कम्प

परमादरणीय रवीश कुमार, भारत का दिल छोटा नहीं, आपकी नीयत में खोट है

बात रवीश कुमार के ‘सूत्रों’, ‘कई लोगों से मैंने बात की’, ‘मुझे कई मैसेज आते हैं’, वाली पत्रकारिता की

जब आप बजट देख रहे थे, दुनिया कामोत्तेजना बढ़ाने के मारक उपाय ढूँढ रही थी

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा बजट पेश कर चुकी हैं। सुनने में आ रहा है कि निर्मला सीतारमण जी ने इस बार के बजट में आज तक की सबसे लंबी स्पीच दे डाली। इसमें हैरान होने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि –

‘वो स्त्री है, वो कुछ भी कर सकती है’

माफ़ करना मैं जरा इधर-उधर हो जाता हूँ। तो हम बात कर रहे थे बजट की, जिसे पढ़ते-पढ़ते वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी की तबीयत ख़राब हो गई और बजट भाषण को रोकना पड़ा। लेकिन इस बीच दुनियादारी से एकदम हटकर कुछ लोग अपनी ही दुनिया में मस्त थे। जहाँ कुछ लोग इनकम टैक्स स्लैब में राहत मिलने की बात सुनकर खुश हुए, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे अभी उस इनकम टैक्स स्लैब तक पहुँचना बाकी है। खैर, उनकी समस्या भी अपनी जगह पर वाजिब है।

लेकिन आम दुनिया से अलग एक मेन्टोस दुनिया भी है, जिसे कहते हैं दी लल्लनटॉप! वही दी लल्लनटॉप जो आखिरी बार जर्मनी में नाज़ी सेनानायक और फासिस्ट बादशाह हिटलर के पीछे इंच-टेप और फीता लेकर घूमते देखे गए थे। दी लल्लनटॉप की चिन्ताएँ एकदम लल्लनटॉप हुआ करती हैं। महिलाओं के विषयों पर अन्य से अधिक चिंतित दी लल्लनटॉप जहाँ होली पर इस वजह से चिंतित होता है कि कहीं यह वीर्य का त्योहार तो नहीं, वही दी लल्लनटॉप बजट के दौरान इस बात को लेकर परेशान था कि आखिर प्रियंका चोपड़ा की ड्रेस खिसकती क्यों नहीं?

वही प्रियंका चोपड़ा जिन्हें दिवाली पर अस्थमा होता है, और क्रिसमस के समय जिनके पटाखे पर्यावरण में ऑक्सीजन छोड़ते हैं। प्रियंका चोपड़ा अपने पति निक जोनास के साथ 62वें ग्रैमी अवार्ड्स में एक ऐसी ड्रेस पहनकर गईं, जिसने दी लल्लनटॉप को परेशान कर दिया।

स्वयं विचार करें –

खैर, वो लल्लनटॉप है, वो कुछ भी कर सकता है। लेकिन ऊपरवाले को इस ज्ञानवर्धक वेबसाइट क्वोरा को हिंदी में उतारने की क्या सूझी थी? मेरा सवाल एकदम जायज है। Quora का वर्चस्व एक समय ऐसा हुआ करता था कि हर दूसरा व्यक्ति अमुक सूत्रों की पुष्टि के लिए विकिपीडिया छोड़कर Quora का रिफ्रेंस देता था और भोकाल काटता था। लेकिन ग्रहों की दशा पलटी और Quora ने अपना हिंदी वर्जन जारी कर दिया। Quora के इस हिंदी वर्जन में जो कुछ आता है उसे अपनी आँखों से देख सकते हैं तो जरूर देखिए। इसे देखकर आपको यह तय कर पाना मुश्किल हो जाएगा कि आप Quora पढ़ रहे हैं या ‘दी लल्लनटॉप’ पढ़ रहे हैं।

खुद देखिए मारक मजा-

एक और शख्सियत है जिसे बजट-वजट से कोई लेना-देना नहीं था। वो है सेक्रेड गेम्स जैसी ‘गोची’ बनाने वाले अनुराग कश्यप। अनुराग कश्यप आजकल CAA-विरोध और रोजगार की कमी के चलते एकदम ‘इधर-उधर’ नजर आ रहे हैं। अनुराग कश्यप का कहना है कि वो सामान्य ज्ञान के लिए ‘दी स्क्विंट‘ पढ़ते हैं। माफ़ कीजिए, ऐसा उन्होंने नहीं कहा लेकिन ट्विटर पर उनकी हरकतें कम से कम यही बताती हैं।

NDTV पर या तो सत्यान्वेषी पत्रकार चलते हैं या फिर सपना चौधरी। बजट-वजट बाद में देखा जाएगा, पहले NDTV चाहता है कि आप सपना चौधरी का डांस देखें।

लिबरल मीडिया का प्यार तैमूर के डायपर से, अनुराग कश्यप का गोची से और ‘दी लल्लनटॉप’ का हिटलर से कोई छुपी हुई बात नहीं है। लेकिन देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसकी हरकतें भी एकदम लल्लनटॉप हैं। उन पर भी बात कर लेनी चाहिए, क्योंकि गोदी मीडिया हमेशा उन्हें किनारे ही करता आया है। वह वर्ग है टिकटॉक बनाने वाले युवाओं का।

बजट में टिकटॉक वीडियो बनाने वालों पर कोई कर ना लगाने से टिकटॉक समाज में एक बार फिर ख़ुशी की लहर देखी गई है। फेसबुक पर ‘वर्क्स एट स्टूडेंट ऑफ़ दी ईयर’ वाले लोग अभी भी टैक्स के दायरे से बाहर रखे गए हैं। बजट भाषण के दौरान ‘हंस मत पगली प्यार हो जाएगा’ जैसी कविता करने वालों को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से वंचित रखे जाने के प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।

अभी युवाओं का एक ऐसा भी वर्ग है जिसे कम से कम कल सुबह तक भी इस बजट से कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि उसे जब तक न्यूज़ पेपर दो कॉलम बनाकर नहीं समझा देता कि कौन सी चीज महँगी हुई है और कौन सी सस्ती, तब तक वह इस बजट पर वह किसी भी प्रतिक्रिया देने से बचते हुए बस यही कह रहा है कि –

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