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सरकार और किसानों में 4 में से 2 मुद्दों पर बनी सहमति: पराली जलाने पर दंड नहीं, बिजली सब्सिडी रहेगी जारी

तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों और सरकार के बीच छठे बैठक के बाद चार में से दो माँगों पर सहमति बनी है। बैठक के समापन के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि वार्ता बहुत अच्छे वातावरण में आयोजित की गई और यह एक सकारात्मक माहौल में संपन्न हुई।

किसानों और सरकार के बीच पराली जलाने और बिजली बिल संबंधी अध्यादेश पर सहमति बनी है। अब दिल्ली और आस-पास के इलाकों में बड़े पैमाने पर वायु प्रदूषण का कारण बने पराली जलाने के लिए किसानों को दंडित नहीं किया जाएगा। बता दें कि भारत सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों अध्यादेश 2020 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए आयोग की शुरुआत की थी। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएँ दायर करने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया था।

अध्यादेश के अनुसार, वायु प्रदूषण को लेकर हरियाणा, पंजाब, यूपी और राजस्थान के क्षेत्रों सहित एनसीआर पर आयोग का अधिकार क्षेत्र होगा। अध्यादेश आयोग को वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उसके द्वारा जारी किए गए किसी भी उपाय या निर्देशों के उल्लंघन के लिए पाँच साल की जेल की सजा या एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना या दोनों का अधिकार देता है। किसान आशंका जता रहे थे कि अगर उन्हें पराली जलाने का दोषी पाया जाता है तो उन्हें भी इस अध्यादेश के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

अब बैठक के बाद, केंद्र सरकार किसानों को इसके दायरे से बाहर रखने के लिए अध्यादेश में संशोधन करने पर सहमत हो गई है। इसका मतलब है कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक नया निकाय स्थापित किए जाने के बावजूद, सितंबर-दिसंबर की अवधि के दौरान एनसीआर में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

हल किया जाने वाला दूसरा मुद्दा इलेक्ट्रीसिटी अधिनियम में संशोधन है। किसानों को डर है कि अगर बिजली अधिनियम में सुधार लाया जाता है, तो उन्हें नुकसान होगा। किसान यूनियनों ने माँग की कि वर्तमान में किसानों को सिंचाई के लिए दी जाने वाली बिजली सब्सिडी जारी रहनी चाहिए। केंद्र ने इस माँग पर भी सहमति जताई है।

हालाँकि, किसानों की अन्य दो माँगों पर गतिरोध जारी है। वो दो माँगें हैं- तीन कृषि कानूनों को वापस लेना और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की गारंटी देने के लिए एक कानून बनाना। केंद्रीय सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि कानूनों को वापस नहीं लिया जाएगा, लेकिन यदि किसान कानूनों के किसी विशेष खामी के बारे में बताते हैं तो से संशोधित किया जा सकता है। मगर किसान यूनियन इसके लिए तैयार नहीं हैं, या फिर वो कानून में खामियाँ निकालने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए वो कानून को ही रद्द करने की माँग पर अड़े हुए हैं। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले तक किसान यूनियन और कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल नए कृषि कानूनों में किए गए प्रावधानों की माँग और वादा कर रहे थे।

एमएसपी दशकों से बिना किसी कानून के एक कार्यकारी निर्णय के रूप में जारी है, लेकिन अब किसान इसके लिए एक कानून चाहते हैं। सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि एमएसपी जारी रहेगा, हालाँकि, गारंटी देने के लिए एक कानून लाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है।

किसानों ने दावा किया है कि वे तब तक विरोध प्रदर्शन समाप्त नहीं करेंगे जब तक कि उनकी अन्य दो माँगें भी पूरी नहीं होती हैं। अगले दौर की वार्ता 4 जनवरी को होगी। मंत्री तोमर ने कहा कि बैठक न्यूनतम समर्थन मूल्य और तीन कृषि कानूनों पर केंद्रित होगी।

दो दिन से गायब नाबालिग बहनों को टेलर मास्टर ज़फर ने बनाया था बंधक: पटना से बाहर भेजने की थी तैयारी

पटना के कंकड़बाग थाना के चाँदमारी रोड से 2 नाबालिग बच्चियों की किडनैपिंग का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में एक टेलर मास्टर जफर को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उसने ही दोनों बच्चियों को अपने दुकान पर बंधक बना लिया था। लड़कियों के विरोध करने पर आरोपित जाफर उनके हाथ पैर बाँध कर उन्हें बेहरमी से पीटता और चिल्लाने पर दाेनाें काे बार-बार ठंडे पानी से नहला देता था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कंकड़बाग की रहने वाली दो बच्चियाँ सोमवार (28 दिसंबर, 2020) की शाम को टीपीएस कॉलेज के पास से अचानक से लापता हो गई थीं, इसके बाद इनके परिवार वाले इनकी तलाश कर रहे थे। इसी दौरान सड़क पर आने जाने वाले लोगों को एक टेलर की दुकान से कुछ आवाज आई, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने दुकान खोला तो उसमें से दोनों बच्चियों को बरामद किया गया।

बच्चियों की ऐसी हालत देख आक्रोशित लोगों ने दुकानदार जाफर की जमकर पिटाई कर दी। वहीं ठंड से ठिठुरती एक बच्ची की हालत काफी नाजुक लग रही थी। उसे बार-बार उल्टी हाे रही है, लोगों से तुरंत आग जला कर उसे ठीक करने की काेशिश की। इसके बावजूद उसकी तबियत गंभीर होती जा रही थी। जिसे बेहतर इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया गया है। इधर, स्थानीय लोगों की सूचना पर कंकड़बाग पुलिस मौके पर पहुँची और आरोपित को गिरफ्तार के थाना ले गई। पुलिस जाफर से पूछताछ करने में जुटी है। जाफर चाँदमारी राेड का रहने वाला है।

घटना के संबंध में नाबालिग लड़की ने बताया, “दाेनाें सामान खरीदने के लिए चाँदमारी राेड आई थीं। इसी बीच टेलर ने आवाज देकर बुलाया और कहा कि जरूरी काम है। दाेनाें उसके पास गईं तो उसके बाद उसने शटर बंद कर दिया। बीच-बीच में टेलर बाहर निकलता पर शटर काे बाहर से बंद कर देता था। हम दाेनाें का हाथ-पाँव बँधा था। टेलर जफ़र बार-बार हमें ठंडे पानी से नहला रहा था।” बच्चियों ने बताया कि उन्हें खाना तक नहीं दिया गया।

वहीं घटना के बाद लोगों का मानना है कि यह मानव तस्करी का मामला है। क्योंकि बच्चियों के बयान के मुताबिक जाफर ने उनका शारीरिक शोषण नहीं किया लेकिन उसकी उन्हें कहीं बाहर भेजने की योजना थी। फिलहाल पुलिस उससे पूछताछ करने में जुटी है। इसके अलावा उसके माेबाइल फोन को भी खंगाला जा रहा है।

कंकड़बाग थाना के प्रभारी थानेदार सुमन कुमार ने कहा कि दाेनाें में से किसी के साथ रेप नहीं हुआ है। दाेनाें काे हाथ-पाँव बाँधकर बंधक बनाए हुए था और ठंडे पानी से नहलाने से एक की तबीयत खराब है, उसे पीएमसीएच भेजा गया है। पुलिस जाफर से पूछताछ करने में जुटी है।

व्यंग्य: पिज़्ज़ा, डीजे, मसाजर, काम क्या-क्या है, अन्नदाता आ गया है, इंतजाम क्या-क्या है

अन्नदाता आंदोलन कई मायनों में एक अभिनव प्रयोग है। भारतभूमि तो अनादिकाल से अनूठे प्रयोगों को लिए विश्वगुरु की उपाधि प्राप्त कर चुका है, तो ऐसे में शाहीन बाग के पुष्पों के प्रस्फुटित होने के बाद, माओनंदनों की नई योजना किसान आंदोलन के रूप में आया ही चाहती थी। छात्र तो मैं अंग्रेजी साहित्य और पत्रकारिता का ही रहा हूँ, लेकिन इफैक्ट डालने के लिए यह कह देता हूँ कि ‘आंदोलन शास्त्र’ का एक गंभीर विद्यार्थी होने के नाते, मेरे लिए अन्नदाता आंदोलन वैश्विक पटल पर अपनी गहरी छाप छोड़ने वाला है।

भारत में किसानों ने कई रूप धरे हैं। खास कर मोदी सरकार के आने के बाद तथाकथित किसानों की प्रतिभा में अनायास ही वृद्धि होती रही है। उन्होंने देश को दिखाया है कि किसान चाहे तो कुछ भी हो सकता है। तमिलनाडु से आए किसानों को याद करें तो पता चलेगा कि कालांतर में समुद्रतट पर यो-यो करने वाला व्यक्ति, जंतर-मंतर पर खोपड़ी ले कर मरे चूहे भी खा सकता है, अगर उसे बारह वर्गमीटर की परिमिति में लाल माइक लिए हुए पत्रकारिता के मसीहा कहीं दिख गए।

मसीहा जी का तो ऐसा है कि किसान आंदोलन हो या फिर शाहीन बाग, टेंट-शामियाना में बैठे कुर्ता-सलवार वाले स्वयं को भीष्म और इस पौंड्रक को वासुदेव समझते हैं। फिर गीता न सही, ‘शामियाना के चोंप देबौ ढोढ़िए में घोंप’ नामक गीत पर नाच होता रहता है।

ये किसान आंदोलन भी हमारे किसानों के नए रूप सामने ले कर आ रहा है, जिसके लिए समस्त भारत इनका आभार प्रकट करता है। हमने इस आंदोलन में भी पाया कि किसान विद्युत अभियंता भी हो सकता है जो टावरों की बिजली काटता रहता है। एक और आयाम हमें यह भी दिखा कि किसान जेनरेटर चोर भी हो सकता है। लेकिन यह चोर और चोरों की तरह नहीं है, बल्कि चोरी का माल यह किसान गुरुद्वारे में दान कर देता है।

मैंने जानने की कोशिश की तो सॉल्ट न्यूज के संस्थापक, एवम् नासा से ताम्रपत्र पाए प्रतीक ने बताया, “जिसे दुनिया टावर का तार काटने वाला बता रही है, वो वस्तुतः भारत का टावर है ही नहीं। वो तो आइफिल टावर है जो आपको अलग एंगल से देखने पर पूरा दिखेगा। जो लोग तार काट रहे हैं वो भारतीय नहीं हैं। उन लोगों की आँखों पर ज़ूम करने से सच्चाई दिखती है कि वो कुछ संघी भजपैइए हैं जिसे मोदी ने ट्रक में बिठा कर पेरिस भेज दिया था।”

आगे उन्हीं के मित्र और पंचर विज्ञान के अग्रणी जुब्बू रंगरसिया ने कहा, “साथ ही, वीडियो को आप देखेंगे तो पाएँगे कि यह वीडियो जान-बूझ कर क्लोजअप में शूट की गई है ताकि यह पता न चले कि जगह कौन सी है। सर पर पगड़ी रखवा कर, भाजपा के लोगों ने पेरिस में आइफिल टावर के नीचे कटे हुए तार पकड़ा दिए हैं और वो वायरल करा दिया गया। वो जानते थे कि प्रतीक भाई उनकी करतूत भारत में होने से पहले ही पकड़ लेंगे, अतः उन्होंने राफेल देने वाले राष्ट्र को चुना।”

अन्नदाता आंदोलन ‘आत्मनिर्भर भारत’ का एक उदाहरण है

हमने यह भी देखा कि इस अनुपम प्रयोग में सिर्फ टेंट-शामियाना ही नहीं देखा। इसमें गरीब दिखने वाले लोग थे, इसमें परेशान दिखने वाले लोग थे, इसमें खून की प्यासी चाचियाँ थीं, ठोक देने वाले खालिस्तानी अंकल थे, मर्सीडीज वाले भैया थे, सिनेमा का प्रोजेक्टर था, थिन क्रस्ट पिज़्ज़ा था, गाने-बजाने वाले लोग थे, अख़बार था, समाचार था, गैस से चलने वाले गीजर थे… मतलब, आप सोचिए कि वहाँ क्या था, और वो वहाँ था।

आप सोचिए कि पाँच हजार लोग अपना घर-बार छोड़ कर कहीं से चलते हैं, ‘मुसाफिर हूँ यारों, न घर है, न ठिकाना’ गाते हुए पहुँचते हैं और अगली लाइन सुनने से पहले दिल्ली पुलिस उन्हें रोक देती है। दिल्ली पुलिस ने ही सबसे ज्यादा समस्या पैदा की है। किसान भाई तो बंगाल की खाड़ी की तरफ जा रहे थे क्योंकि अगली लाइन के हिसाब से ‘मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना’।

आप ही सोचिए कि जो किसान पंजाब से चार महीने का राशन ले कर चला होगा, वो क्या सोच कर चला होगा? आपको लगता है कि घर छोड़ कर कोई किसी यात्रा पर निकलता है तो सड़क पर बैठ कर चाय बनाने के लिए निकलता है? या फिर राशन इस हिसाब से लेता है कि सफर भर राशन चलता रहे।

मुझ पर विश्वास नहीं है तो ध्रुव टट्टी के गणित और ग्राफ पर विश्वास करेंगे या नहीं? गूगल मैप कहता है कि आदमी लगातार पैदल चलता रहे तो वो चौदह दिन और छः घंटे में पहुँच जाएगा। इस हिसाब से लोग लगातार चलते ही रहेंगे। लेकिन श्री ध्रुव राठी जी के गणित से चलें और दिन के छः घंटे ही चलें, तो लगभग 56 दिन लगेंगे। मतलब, दो महीने। बंगाल की खाड़ी जाने और वापस आने का मिला लें तो लगभग चार महीने हो ही जाते हैं।

अब दिल्ली पुलिस ने स्वयं ही आसमानी डर के चलते बैरिकेड लगा दिए और रोक दिया उन्हें। इसी में दिलजीत भाई गाने की अगली लाइन गा रहे थे तो उन्हें कंगना ने रंग-बिरंगी बातें कह कर चुप करा दिया। फिर किसान आखिर करते क्या? किसानों ने सोचा कि मोदी जी का इतना साथ दिया है, तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना में भी साथ दे दूँ।

इसी कारण कहीं से टेंट आया, कहीं से कालीनें आईं और तैयारी शुरु हो गई। मुझे, आंदोलनों का एक छात्र होने के बाद भी, नहीं लगा कि यहाँ कुछ प्रदर्शन टाइप का होगा। मुझे लगा कि टेंट लग गया है शरजील इमाम टाइप कोई प्रवचन देने वाला पीएचडी आएगा और कहेगा कि भैया, असम को काट नहीं सकते क्या? ऐसे में वामपंथियों ने यहाँ पर घुसपैठ कर ली और लोगों को बताने लगे कि अब बैठ ही गए हो तो पाँच महीने पुराने बिल पर आंदोलन ही कर लो।

वामपंथियों ने उकसाया और कहा: अब आ गए हो तो आंदोलन ही कर लो

फिर तय हुआ कि आंदोलन कृषि बिलों के ऊपर होगा। लोगों ने कहा कि उन्होंने तो बिल पढ़ा ही नहीं है। वामपंथियों ने समझाया कि पढ़ा तो उन्होंने भी नहीं है लेकिन आंदोलन का पढ़ाई-लिखाई से क्या लेना-देना। पौंड्रक भी वहीं पर था, उसने कहा, “देखिए, एक लोकतंत्र में आंदोलन होते रहने चाहिए, इससे लोकतंत्र मजबूत होता है।”

अपने सफर के बीच में रोक लिए गए यात्रियों ने सवाल उठाया कि कृषि बिलों में तो ऐसा कुछ है ही नहीं जो विरोध किया जाए। पौंड्रक कुमार ने कहा, “था तो नागरिकता वाले में भी नहीं, लेकिन हमने सौ दिन चलाया कि नहीं उसे? वो किसके लिए था? आपको लगता है कि मेरी पत्रकारिता चमक गई उससे? जहाँ जाता हूँ गाली सुनता हूँ। फिर भी राष्ट्रहित में मैंने उस आंदोलन को हवा दी। मैं जानता हूँ कि वहाँ शरजील, सफूरा, खालिद, ताहिर सब क्या कर रहे थे, लेकिन भीतर से घनघोर राष्ट्रवादी होने के कारण, मैंने लोकतंत्र में विरोध के स्वर को जीवित रखा।”

“लोकतंत्र में और है क्या? विरोध से ही लोकतंत्र चलता है, यहाँ विरोध है ही नहीं। ये आदमी हर काम सही करता जा रहा है, सारी योजनाएँ गरीबों के लिए बना रहा है, अल्पसंख्यकों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन ला रहा है, और चुनाव भी जीत रहा है। अतः, विरोध की सारी संभावनाएँ खत्म हो रही थीं। फिर मेरे सपने में एक दिन निर्भय दूबे और गुलाम मुस्तफा आए। उन्होंने कहा कि मेरे ही हाथों में भारत का भविष्य है। तब मैंने तय किया कि लोग मुझे गालियाँ दें, वो ठीक है लेकिन अपने कुकर्मों से मैं मोदी को जिताता रहूँगा क्योंकि लोग मुझे सारे वामपंथियों का प्रणेता मान कर गुस्से में वोट करेंगे।”

तब जा कर यात्री लोग माने। एक ने कहा कि कम से कम कानून में जो है वो तो बता दिया जाए। लेकिन किसी ने सुना ही नहीं। वामपंथियों की पूरी टीम फिर आंदोलन को आंदोलन जैसा बनाने में लग गई। उनके साथ समस्या यह है कि उनके अपने काडर अब बचे नहीं, संघी लोग अपना काडर कई बार मोदी को भी नहीं देते प्रचार के लिए, तो वहाँ से मिलने की संभावना है नहीं, इसलिए वो थ्योरी तो बहुत जानते हैं, लेकिन प्रैक्टिकल की कूट वाली कॉपी के लिए पैसा नहीं है।

ऐसे में वो भीड़ ढूँढते हैं, और उसमें आंदोलन कराते हैं। आप देखिए कि शाहीन बाग तो गैर-भारतीय मुस्लिमों के लिए भारतीय मुस्लिमों का आंदोलन था, उसमें हिन्दू क्या करने गए थे? वहाँ बिंद्रा बिरयानी और लंगर क्यों चला रहा था? वहाँ पोस्टर बनाने वाले कहाँ से आ गए? ये तो आंदोलनों के नव-अवयव हैं। समय बदलने के साथ-साथ आंदोलनों की प्रकृति भी बदली है।

ऐसे में वामपंथी तो बदल गए हैं लेकिन आंदोलन के लिए डफली पीट कर भीड़ जुटाने वाले झोलाछाप वामपंथी-वामपंथनों को लोग पैसा तो दे देते हैं, ध्यान नहीं देते। जियो के दौर में लोग सेक्स और रोमांच से भरपूर वैसे वेब सीरीज देख रहे हैं जो यूपी के बाहर का कोई व्यक्ति देख ले तो उस राज्य में बेटी न ब्याहे क्योंकि हर सीरीज में घर की बहू ससुर के साथ आलिंगन में पाई जाती है, और आदमी दिन भर गाली बकता है, गोली चलाता है।

ऐसे में डेढ़-दो सौ सालों के अनुभव और समय के साथ बदलने की प्रवृत्ति के कारण वामपंथी थिंकटैंक तो इवॉल्व होता गया, लेकिन उसे क्रियान्वित करने वाले कम होते चले गए। बाद बाकी कसर मोदी ने सैकड़ों NGO को बेद करवा कर पूरी कर दी। यही कारण है कि अब आंदोलन व्यवस्थित तरीके से होने लगे हैं। पहले आंदोलनों की तस्वीर में आपको लोगों की विवशता और सरकार के लिए गुस्सा दिखता था, ये चार दिन चलता था।

अब के आंदोलनों में आपको लोगों की बेहतर जीवनशैली दिखेगी, सरकार के लिए गुस्सा दिखाने का काम पौंड्रक कुमार जैसे लोग करने लगे। अब यहाँ आपको फुट मसाजर दिखेगा, सिनेमा देखने के लिए प्रोजक्टर दिखेगा, पिज़्ज़ा दिखेगा, वाई-फाई की व्यवस्था दिखेगी, गर्म पानी के लिए गीज़र दिखेगा और अपने प्रोपेगेंडा के लिए अपना अखबार और यूट्यूब चैनल दिखेगा।

भीड़ बनी किसानों की भीड़, आंदोलन होने लगा तैयार

आंदोलन पहले स्वतःस्फूर्त हुआ करते थे। यानी लोगों को कुछ सही नहीं लगा, इकट्ठा हुए और नारेबाजी हो गई, ज्ञापन दे दिया, मीडिया में कवरेज हो गई चले आए। अब आंदोलन योजना के साथ होते हैं, और वही होना भी चाहिए। एमबीए के दौर में इवेंट मैनेजमेंट एक विषय बन चुका है, और आंदोलन में ग्लैमर की कमी हमेशा रही। अगर आंदोलन आदि व्यवस्थित तरीके से नहीं होंगे, तो इस विषय को शादी की प्रीवेडिंग फोटोशूट और ‘राते दीया बुता के पीया क्या-क्या किया’ वाले नाच तक में ही समेट दिया जाएगा।

पब्लिसिटी के लिए तो पीआर वालों का मूलमंत्र है ही कि ‘एनी पब्लिसिटी इज़ गुड पब्लिसिटी’, तो भले ही वहाँ सिंघु बॉर्डर पर हर दिन पिज़्ज़ा न मिल रहा हो, लेकिन ये तस्वीर लीक की जाती है कि देखो क्या चल रहा है। इसी कारण तो ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ वाले गीत गवाए गए। और, पूरे आंदोलन को एक विस्फोटक कवरेज मिले, इसके लिए ‘इंदिरा को ठोका था, मोदी को भी ठोक देंगे’ वाली बात कही गई। नहीं तो आपको लगता है कि अपने कौमार्य वाले दौर के नाम को लिए जाने पर जो महिला एक एंकर को उठवा सकती है, वो इंदिरा को ठोकने की बात पर अपने गुंडे नहीं भेजेगी?

आंदोलन होना है तो बड़बोले लोग चाहिए जो माइक देखते ही फुल नेटवर्क में आ जाएँ और ऐसा टॉकटाइम करें कि सारा रिचार्ज खत्म हो जाए। इसके लिए वामपंथियों को खालिस्तानियों से बेहतर कौन मिलता। उधर खालिस्तानियों को पब्लिसिटी की दरकार थी, इधर वामपंथियों की हथेली में खुजली हो रही थी, काम बन गया। सूक्तियों में भी उद्धृत है कि ‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्, परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़णम्’।

आंदोलन को खड़ा करने के लिए पूरा फ्लो-चार्ट और सिचुएशन-रिएक्शन अनालिसिस होती है। जरूरतों को खड़ा किया गया, फिर उसे पूरा किया गया। फिर जब लोगों ने गरियाना शुरु किया तो ये कहा जाने लगा कि आंदोलन का मतलब ये नहीं होता कि आदमी परेशान हो कर रहे। सही बात है कि जब भारत डिजिटल इंडिया हो गया, तो आंदोलन थोड़ा आधुनिक हो जाए तो क्या समस्या है!

दुनिया बदल रही है, मौसम बदल रहा है तो ऐसे में वामपंथियों के आंदोलन कैसे पुराने रहेंगे? ये लोग अब अमेरिका के चुनाव तक को पलट दे रहे हैं, और आपको लगता है कि वहीं ‘हँसिया-बाली’ वाले गीत गाते रहें और झंडा ले कर मार्च करें? नहीं, एक आंदोलन शहर बसाया जाएगा।

आंदोलन शहर क्या है?

जैसे ‘इश्क में शहर होना’ होता है, वैसे ही दिल्ली ‘आंदोलन में शहर होना’ जैसी बात है। आंदोलन शहर एक टाउनशिप टाइप की आत्मनिर्भर व्यवस्था है। इसमें निकम्मे और नकारे लोगों की एक भीड़ को सड़क पर होने का एक जस्टिफिकेशन दिया जाता है। उनसे ऐसी बातें रखने को कही जाती हैं, जो वो भी जानते हैं कि नहीं मानी जाएगी। यही सही तरीका भी है कि अगर बात मान ही ली जाएगी तो फिर ये चार महीने के राशन का क्या करेंगे? वापस जाने पर बेइज्जती होगी कि नहीं?

जिन लोगों ने बिल पढ़ा ही नहीं है वो पहली डिमांड तो यही रखेंगे ही कि कानून वापस ले लो। पढ़ लेते तो कहते कि ये वाली बात सही नहीं है, नहीं पढ़े हैं तो कह रहे हैं सारे कानून ही वापस ले लो। वामपंथियों का भी दुख आपको समझना पड़ेगा कि आनन-फानन में क्रैश कोर्स भी तो नहीं दे पाते हैं। इन्होंने दो प्रयोजित आंदोलन ऐसे ही निकाल दिए जिसमें लोगों का कानून ही नहीं पता था।

एक भजन है ‘मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है’, आंदोलनकारियों के लिए भी यही गाना सूट करता है कि ‘मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, पीछे हैं वामपंथी, मेरा नाम हो रहा है’। अब इन किसानों का भी सोचिए कि रोक लिए गए, वरना पैदल चलते रहते बंगाल की खाड़ी पहुँचने तक पैर में कितना दर्द कर जाता। अब है कि सड़क पर चलना भी नहीं है, और फुट मसाज भी मिल जा रहा है। इसी को पहले ज़ी सिनेमा पर ‘डबल मज़ा’ कह के भुनाया जाता था।

आंदोलन शहर के निवासी

आंदोलन शहर है, तो निवासी भी उसी तरीके के होने चाहिए। आंटियों की तो बात मैंने कह ही दी जो पार्कों में ‘अरे बेटा शादी कब करोगे’ से शुरु करती हैं, और ‘तीसरा बच्चा भी कर ही लो… खेलने में बाकी दोनों का मन लगा रहेगा’ पर समापन करती है। और अगर आपने ये सारे महत्वपूर्ण समाजोपयोगी उत्पादक कार्य कर लिए हैं, तो आप चुगली हेतु या ‘काली कमली वाला मेरा यार है, मेरे मन का मोहन तो दिलदार है’ टाइप के स्वरचित गीत पर ढोलक और चम्मच बजाती हुई किसी ‘पारक’ में मिल ही जाएँगी। यहाँ भी, भजन की जगह ढोलक पर ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ का रैप बजा ही दिया गया। इसमें आँटियों का क्या दोष, आंटित्व के गुणों को लिखते हुए शुकदेव जी महाराज ने यही सारी बातें तो शास्त्रों में लिखी थीं। ये बात और है कि गरुड़ पुराण में चुगलखोर लोगों के लिए सजा का भी प्रावधान किया गया है।

दूसरे टाइप के निवासी वो हैं जिन्हें मैथिली में ‘बनचुहार’ कहा गया है। ‘बनचुहार’ शब्द ‘वन’ और ‘चुहार’ के संगम से बना है। ‘चुहार’ शब्द मैथिली में ‘चोर’ का सहचर है जैसे कि ‘ऊ सब त चोर-चुहार छै’। इसी टाइप के लोग अडानी-अम्बानी को गरियाते हुए जेनरेटर चुरा रहे थे, और मुर्खतावश ‘जियो’ के टावरों का तार काट रहे थे, जो कि अम्बानी ने कुछ समय पहले किसी और कनेडियन कम्पनी ब्रूकफील्ड को बेच दिया था। यहाँ पर यह भी कहा जा सकता है कि अम्बानी को पहले से पता था कि आंदोलन होगा और उसने पैसे बचा लिए क्योंकि मोदी आधा अम्बानी की जेब में, आधा अडानी की जेब में रहता है! है कि नहीं!

तीसरे टाइप के वो लोग हैं जो ‘आपदा में अवसर’ खोजने वाले हैं। ‘अन्नदाता’ जैसे शब्दों के बेजोड़ प्रयोग से जनता को गिल्ट ट्रिप पर ले जाने वाले नवयुवकों ने, कॉलेज में फर्जी डीएसएलआर लटकाने वालों को काम दिया और उभरते स्कोडा-लहसुन फोटोग्राफी फेसबुक पेज वालों को कहा कि फिल्ममेकर बनने की इंटर्नशिप दी जाएगी। काम था कि किसानों पर वीडियो बनाओ, यूट्यूब का चैनल खुलेगा। चार-पाँच दिन में यूट्यूब चैनल के दस लाख सब्सक्राइबर हो गए, बिजनेस झमाझम चल रहा है।

चौथे टाइप के वो लोग हैं जो गरीब जैसे दिखते हैं, जिनके चेहरे पर हमेशा परेशानी की आड़ी-तिरछी रेखाएँ होती हैं। ऐसे लोगों को वामपंथी डीप फोकस मोड, दुपहरी में भी अपर्चर साइज कम कर के, अँधेरे, गमगीन माहौल में रोने-गाने और उदासी भरे बयान देने के लिए तैयार रखते हैं। ये लोग आपको किसी भी टाइम ‘अरे यार, अन्नदाता का यह हाल है, शर्म आनी चाहिए हमें अपने आप पर’ वाले मोड में भेज देंगे।

पाँचवें टाइप के लोग वो हैं जिन्होंने नाम में क्रांतिकारी लगवा लिया है और खाँसते-छींकते स्वयं को भगत सिंह बताते फिरते हैं। ये लोग भावुक लोग हैं जिन्होंने भगत सिंह को पढ़ने का दावा वैसे ही किया होता है जैसे वामपंथी करते हैं। ये लोग भगत सिंह को उन टुटपुँजिया नक्सलियों के समकक्ष रख देते हैं जो अपने ही देश के गरीब सिपाहियों का नरसंहार करते हैं। ये वैसे ही करते हैं जैसे भगत सिंह को सारा ज्ञान इन्होंने ही दिया था, और आज की तारीख में वो उन्हें भारत के नीच वामपंथियों की तरह अपना बताते फिरते हैं।

छठे टाइप के लोग वे हैं जिन्होंने लोगों से ज्यादा संगठन बना रखे हैं। ये लोग मेन लोग हैं। इनका काम है कि पगड़ी का रंग फीका न पड़े और माइक देखते हैं, ‘आप कैसे हैं’ पूछने पर अपनी पत्नी को भी कह दें कि ‘तीनों बिल वापस लेने ही होंगे, उससे पहले बात नहीं होगी’। ये लोग हमेशा ‘काला कानून वापस लो’ मोड में रहते हैं। हर बातचीत में ये जाते हैं और काले कानून को वापस ले कर आ जाते हैं टेंट में। इनसे भी पूछेंगे कि काला कानून क्या है, तो वो बोलेंगे ‘काला है जी, वापस होना चाहिए।’ (पगड़ी से तात्पर्य किसी भी तरह के ‘सर के पहनावे’ से है, सिख समुदाय को अपमानित करना हमारा उद्देश्य नहीं है।)

सातवें टाइप के लोग वो हैं जो वामपंथियों द्वारा भी नकार दिए गए हैं, और अपनी मार्केटिंग करने किसी भी आंदोलन में पहुँच जाते हैं। ये बहुवचन तो छोड़िए, द्विवचन में भी नहीं आते लेकिन स्वयं को अमीता बच्चन से कम नहीं मानते। इसका नाम है योगेन्द्र यादव। ये व्यक्ति इच्छाधारी आंदोलनकारी है। ये संविधान के भी ज्ञाता हैं, किसान तो देखने से ही लगते हैं, शिक्षा तो इनके बायें हाथ की कानी उँगली का खेल है, पेट्रोल का दाम ओपेक इनसे फोन कर के ही घटाता या बढ़ाता है, रिसेशन तो लीमैन बंधुओं द्वारा अर्थशास्त्री यादव जी की बात न मानने के कारण विश्व को झेलना पड़ा। ‘अतिविनम्रता धूर्ताः लक्षणम्’ की तर्ज पर इच्छाधारी आंदोलनकर्मी योगेन्द्र भाई एम्पिलिफायर वालों के कई स्पीकर फुड़वा चुके हैं। क्योंकि इनके बाद जो भी बोलता है, आवाज इतनी ज्यादा रहती है कि स्पीकर फट ही जाता है।

आठवें टाइप के लोग हैं जो क्राउड को मैनेज कर रहे हैं। वो बताते हैं कि किस जिले से कितने ट्रैक्टर चले हैं और फिर मीडिया बताती है कि अब मोदी सरकार की चूलें हिल जाने वाली है। हिलती तो खैर कुछ भी नहीं है। ये लोग डिजिटल मीडिया पर छोटे वीडियो और गीत-संगीत शेयर कर के आंदोलन को बाइनरी जीवन दिए रहते हैं। ये लोग मूलतः खलिहर लौंडे हैं जो ‘अरे चल ना यार, अडवेंचर हो जाएगा’ के चक्कर में पड़ रहते हैं।

इसी आठवें का एक वैरिएशन उन लोगों का है जो मुफ्त का भोजन करने आए हैं। इन्हीं में से किसी के बारे में आप कुछ दिन बाद यह हेडलाइन पढ़ेंगे: “किसान आंदोलन के बीच खिला प्रेम पुष्प, कुलदीप ने किया धैर्यकांत से विवाह!” फिर कोई फॉलोअप के लिए ‘यूनीक आइडिया’ ढूँढता पत्रकार नौ महीने बाद एक नई हेडलाइन देगा: नौ महीने बाद भी केडी-डीके को नहीं मिला संतान सुख, कोशिश जारी है’।

दसवें तरह के लोग वो हैं जिनको लगने लगा है कि ये जीवनशैली सबसे सही है। खाना मिल रहा है, टीवी पर चर्चा हो रही है और काम कुछ नहीं करना है। ये लोग कैमरे में भीड़ की शक्ल में खड़े रहते हैं। यही वो होते हैं जो गंभीर मुद्दे पर ‘चौथे टाइप’ के गरीब लोगों के बयान देते वक्त आपस में मीम शेयर करते हुए दाँत निपोड़े पाए जाते हैं। ही वो लोग हैं जिन्हें टीवी पर आने का शौक तो होता है लेकिन पता नहीं होता कि माहौल क्या है। उनसे सवाल पूछोगे तो कह देंगे कि ‘इतने लोग आए हैं, कुछ तो बात होगी, हम इनके साथ खड़े हैं।’ यही लोग गैर-वामपंथी पोर्टलों और यूट्यूबर्स के बीच अतिलोकप्रिय होते हैं।

लोग तो खैर और भी तरह के होते हैं, लेकिन इतनी विविधता के बाद बताने की आवश्यकता नहीं है।

न्यू ईयर में क्या होगा?

अभी ही भूतपूर्व जानेमन ने लेख के बीच फोन कर के पूछ दिया कि मेरा नए साल का प्लान क्या है। मुझे लगा कि अपने प्लान में शामिल करेगी, लेकिन उसके जवाब पर अब क्या बात करना! मैं ठहरा घोर राष्ट्रवादी व्यक्ति, मैंने फोन काटा और कहा कि मैंने अपना जीवन राष्ट्रवाद को दे दिया है, पार्टी नहीं करता। बोलने में दर्द तो हुआ लेकिन क्या है, सह लेंगे थोड़ा।

मैंने सोचा कि किसान आंदोलन में जब सिनेमा चल ही रहा है, पिज़्ज़ा आ ही रहा है, छुहारे बँट ही रहे हैं, मसाज चल ही रहा है, डीजे बज ही रहा है, तो फिर पार्टी तो ‘यूँ ही चालेगी’ वाली बात होनी चाहिए। जब आंदोलन टिपिकल आंदोलन टाइप रहा नहीं, वामपंथी मीडिया ने भी बताया कि आंदोलनकर्मी थकेंगे तो फुट मसाज को ऐसे क्यों बताया जा रहा है जैसे वो कोई पाप हो, तो फिर माहौल घरेलू होना चाहिए।

ऐसे में ओपन टेरेस पार्टी न सही, ओपन रोड पार्टी तो बनती है यार। एक एंकर का भाई कई कारणों से चर्चा में रहता ही है तो उसका कॉन्टैक्ट यूज कर के कुछ नाचने वालों को भी तो बुलाया जा सकता है। माहौल तो होना चाहिए न, आंदोलन तो हो ही रहा है। आंदोलन के बारे में लिखा जा रहा है, कनाडा के पीएम तक ने बयान दे दिया है, अमेरिकी मीडिया वालों को भी स्थान विशेष में दर्द उठ ही रहा है, तो इसमें आंदोलनकर्मियों के लिए अब बचा ही क्या है कि वो एन्जॉय न करें!

अब काम तो सिर्फ ‘छठे टाइप’ के लोगों का बचा है, उनका भी पहले का भी रिकॉर्डेड वीडियो चला देंगे तो भी किसी को पता नहीं चलेगा। उन्होंने पूरे टाइम एक ही तो बात बोली है, “काला कानून वापस लो, उसके पहले कोई बातचीत संभव ही नहीं है।” तो वो भी पार्टी, प्री पार्टी और आफ्टर पार्टी में शरीक हो ही सकते हैं। आंदोलन सड़क पर बता हो या नहीं, मीडिया में तो हो ही रहा है। लोग हेडलाइन पढ़ रहे हैं, कोई देखने गया है कि दिन भर राशन खपाने के अलावा और क्या हो रहा है।

वैसे भी आम आदमी पार्टी वालों ने इन्टरनेट का इंतजाम कर ही दिया है। भले ही कुछ साइटें न खुलें लेकिन कॉलेज में डीएसएलआर ले कर घूमने वाले बंदे को ये तो पता है न कि वीपीएन कैसे काम करता है, व्हाट्सएप्प ग्रुप में ये जानकारी तीन मिनट में फैल जाएगी और युवा वर्ग बिना बफर किए हुए इंटरनेट का समुचित आनंद ले पाएगा।

न्यू इयर के बारे में प्राचीन संस्कृत में एक सूक्ति लिखी गई है कि ‘संगीतनृत्यभोजनम्, पेयपदार्थ तथैव च, न्यू इयर पार्टीस्य चतुर्राकर्षणम्’ अर्थात् संगीत, भोजन, नृत्य और पेय पदार्थों (वायव्य और द्रव, दोनों) को नववर्ष की पार्टी का प्रमुख आकर्षण माना गया है।

ऐसे में अब एक ही कार्य बचा है कि ऐसे व्यवस्थित और योजनाबद्ध आंदोलनकारियों को नमन किया जाए और नए साल की तरफ इस उम्मीद से देखा जाए कि फरवरी 2021 में कोई हिन्दू विरोधी दंगा न हो जाए। क्योंकि वामपंथी जब-जब दूसरों के आंदोलनों को हायजैक करते हैं, लोग मरते हैं। ये हमने बाबरी तोड़ने के बाद देखा, इसी साल शाहीन बाग के समय देखा, और उसी रास्ते पर जाते इस तथाकथित आंदोलन को भी देख रहे हैं।

ये बात और है कि कोरोना के कारण देश की पाँच-सात यूनिवर्सिटी के भाड़े के दस-दस लोग, बिना बिल पढ़े, मूर्खों की तरह पोस्टर ले कर वीडियो नहीं बनवा रहे जिसे बकैत कुमार यह कह कर चलाता कि देखिए आईआईटी खड़गपुर भी दे रहा है शाहीन बाग को समर्थन! ऑनलाइन होने से ये वैचारिक उत्पात तो अभी तक नदारद है।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेसी विधायकों ने जिन डिप्टी स्पीकर को ‘जलील’ किया, रेलवे ट्रैक पर उनका शव मिलने की हो उच्च स्तरीय जाँच: ओम बिरला

कर्नाटक विधान परिषद के उपाध्यक्ष एसएल धर्मे गौड़ा (SL Dharme Gowda) मंगलवार (दिसंबर 29, 2020) तड़के कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में एक रेल की पटरी पर मृत मिले। उनके दुर्भाग्यपूर्ण मौत पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) ने शोक व्यक्त किया है। बिरला ने ट्वीट कर माँग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जाँच हो। कथित तौर पर उन्होंने ट्रेन के आगे आकर आत्महत्या की

बिरला ने ट्वीट किया, “कर्नाटक विधानपरिषद उपाध्यक्ष एसएल धर्मे गौड़ा के निधन की दुखद खबर से व्यथित हूँ। उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएँ। पीठासीन अधिकारी के रूप में उनके साथ सदन में हुआ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम लोकतंत्र की गरिमा पर कठोर आघात है। उनकी मृत्यु की उच्च स्तरीय-निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।” उन्होंने लिखा, “संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा और पीठासीन अधिकारियों की गरिमा व स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखना हम सबका दायित्व है।”

मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने घटना पर स्तब्धता जाहिर करते हुए, इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया। उन्होंने विधान परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कुशलतापूर्वक संचालन के लिए एमएलसी की सराहना की। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने भी ट्वीट कर धर्मे गौड़ा के निधन पर स्तब्धता जाहिर की और उन्हें एक सभ्य राजनेता के तौर पर याद किया।

बता दें कि एसएल धर्मे गौड़ा के भाई एसएल भोजे गौड़ा भी एमएलसी हैं। गौड़ा अपनी निजी कार में सखारयापत्तना स्थित फार्महाउस से सोमवार शाम को घर के लिए निकले थे, लेकिन पहुँचे नहीं और इसके बाद उनके परिवार तथा स्टाफ ने उनकी तलाश शुरू की। उन्होंने अपने चालक से कहा था कि वह किसी से बात करने जा रहे हैं और वह थोड़ी दूर ही रुक जाए। शव के साथ एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था। धर्मेगौड़ा के शव को आगे की जाँच के लिए शिमोगा के सरकारी अस्पताल ले जाया गया।

गौरतलब है कि लगभग दो हफ्ते पहले, कर्नाटक विधान परिषद में तो हद ही हो गई थी। उपाध्यक्ष धर्मेगौड़ा को कॉन्ग्रेस के एमएलसी जबरन उठाकर सदन से बाहर ले गए और दरवाजा बंद कर दिया। इसपर भारतीय जनता पार्टी के एमएलसी लेहर सिंह सिरोया ने इस घटना की आलोचना की। उन्होंने कहा था, “कुछ MLC ने विधान परिषद के उपाध्यक्ष को जबरन कुर्सी से हटाकर गुंडों की तरह व्यवहार किया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया। हमने अपने परिषद के इतिहास में ऐसा शर्मनाक दिन कभी नहीं देखा। मुझे शर्म आ रही है कि जनता हमारे बारे में क्या सोच होगी।”

नर्स ने कोरोना संक्रमित मरीज के साथ हॉस्पिटल के बाथरूम में किया सेक्स: पोस्ट वायरल होने के बाद गिरफ्तार

कोरोना वायरस महामारी के दौरान लोगो से लगातार सोशल डिस्टेसिंग का पालन करने की अपील की जा रही है। ऐसे में इंडोनेशिया (Indonesia) से एक बेहद ही चौंकाने वाली खबर सामने आई है। जहाँ एक इंडोनेशियाई पुरुष नर्स को कोविड-19 मरीज के साथ अस्पताल के टॉयलेट में सेक्स (Sex) करने के बाद गिरफ्तार किया गया है।

अस्पताल के टॉयलेट में कोरोना संक्रमित मरीज से सेक्स करने के बाद आरोपित नर्स को पुलिस की जाँच का सामना करना पड़ रहा है। इंडोनेशिया एक्सपैट के मुताबिक, यह घटना जकार्ता के विस्मा एटलेट इमरजेंसी अस्पताल की है। नर्स को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

नेशनल नर्स एसोसिएशन के एसेप गुनवान ने कहा, “यह सच है कि विस्मा एटलेट इमरजेंसी अस्पताल में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और एक COVID-19 मरीज के बीच समान सेक्स रिलेसनशिप (same-sex relationship) की एक संदिग्ध घटना हुई है।” 

यह घटना तब सामने आई, जब मरीज ने 25 दिसंबर को ट्विटर पर पुरुष नर्स के साथ बनाए गए संबंध की घटना को शेयर किया। इस विवरण में नर्स के साथ एक वॉट्सऐप चैट का स्क्रीनशॉट शेयर किया गया था, जिसमें उन्होंने प्राइवेट पार्ट के साइज के बारे में बात की थी। इसके अलावा बाथरूम के फर्श पर नर्स के पीपीई किट की एक तस्वीर भी शामिल थी। 

पोस्ट के वायरल होने के बाद मरीज और नर्स से पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान दोनों ने स्वीकार किया कि वे जकार्ता के विस्मा एटलेट आइसोलेशन फैसिलिटी में एक टॉयलेट में सेक्स के लिए मिले थे। क्षेत्रीय सैन्य कमान में सूचना के प्रमुख लेफ्टिनेंट कर्नल अरह हरविन बीएस ने खुलासा किया कि दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

हरविन ने स्थानीय मीडिया को बताया, “यह मामला केंद्रीय जकार्ता पुलिस को स्थानांतरित कर दिया गया है। हमने स्वास्थ्य कार्यकर्ता को गवाह बनने और आगे की जानकारी माँगने के लिए सुरक्षित कर लिया है।”

सेंट्रल जकार्ता पुलिस को सौंपे जाने से पहले कोविड-19 के लिए पुरुषों का परीक्षण किया गया था। नर्स का कोविड-19 रिपोर्ट नेगेटिव आया, जिसके बाद उसे हिरासत में ले लिया गया, जबकि मरीज का कोविड-19 टेस्ट पॉजिटिव आया उसे आइसोलेशन के लिए फिर से अस्पताल में भेजा गया। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि वे आपराधिक मुकदमे का सामना कर सकते हैं। अगर उन्हें दोषी ठहराया जाता है तो 10 साल तक की सजा हो सकती है।

शादीशुदा जावेद ने अवैध संबंध के शक में अपनी गर्लफ्रेंड को गला रेत कर मार डाला: यूपी पुलिस ने किया गिरफ्तार

मेरठ से हत्या का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। जहाँ जावेद ने अपनी गर्लफ्रैंड नाजरीन को किसी और से अफ़ेयर के शक में मौत के घाट उतार दिया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित जावेद और मृतका नाजरीन पहले से शादीशुदा है। जावेद के दो बच्चे है और नाजरीन के 3 बच्चे है। दोनों कई सालों से अवैध संबंध में थे। पुलिस ने मौके पर आकर हत्यारोपित को हिरासत में ले लिया। मृतक महिला का पति दिल्ली में काम करता है। उसे इस घटना के बारे में सूचना दे दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित ब्रह्मपुरी के हरिनगर का है। जावेद पिछले कई सालों से नाजरीन के साथ अवैध संबंध में था। वहीं कुछ दिनों पहले उसे पता चला कि नाजरीन किसी और शख्स से मिलने जुलने लगी है, जोकि उसे नागवार गुजरी और वह गुस्से में अपनी गर्लफ्रैंड के घर निकल पड़ा।

नाजरीन काम मे जुटी थी, इसी दौरान अचानक जावेद खंती लेकर उसके घर में दाखिल हुआ। इससे पहले वह कुछ समझ पाती, जावेद ने उसके सर पर खंती से ताबड़तोड़ वार करते हुए फिर बाद में गला रेत कर हत्या कर उसे मौत के घाट उतार डाला। उसी वक्त घर में मौजूद बच्चों ने जब खून से लतपथ माँ को देखा तो चीखने चिल्लाने लगे। उनकी चीख-पुकार सुनकर इकट्ठे हुए क्षेत्र के लोगों ने हिम्मत दिखाकर आरोपित जावेद को धर दबोचा।

हत्या के बाद इलाके में कोहराम मच गया और पुलिस को सूचना दी गई। घटना की जानकारी के बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने आरोपित को हिरासत में ले लिया। इसी के साथ महिला के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया।

ब्रह्मपुरी सीओ अमित राय ने जानकारी दी है कि मृतिका नाजरीन का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस अब इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने में जुटी है। मृतिका का पति दिल्ली में रह कर काम करता है उसे सूचना देने के बाद आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

‘अल्लाह हू अकबर’ चिल्लाती मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदू मंदिर को किया आग के हवाले: देखें हमले और तोड़फोड़ का Video

पाकिस्तान से हिंदू धर्म के प्रति घृणा की भयावह तस्वीर सामने आई है। वहाँ सैंकड़ों की तादाद में इकट्ठा होकर बहुसंख्यक आतताइयों ने हिंदू मंदिर को तहस-नहस कर दिया है। मंदिर में रखी मूर्तिया खंडित कर दी गई हैं। वहाँ आग लगाई गई है। 

सोशल मीडिया पर वॉयस ऑफ पाकिस्तानी माइनॉरिटी ने पूरी घटना की वीडियो शेयर की है। उनके ट्वीट के मुताबिक ये खैबर पख्तूनख्वा की घटना है। जहाँ कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ करक में हिंदू मंदिर को आग के हवाले करके उसे तोड़ने पर आमादा है। 

वीडियो में देख सकते हैं कि सैंकड़ों मुस्लिमों की भीड़ वहाँ मौजूद है। आस-पास अल्लाह-हू-अकबर के नारे लग रहे हैं। इस्लामी झंडा लहरा कर मंदिर को तोड़ा जा रहा है। जगह जगह से धुआँ उठ रहा है। गोले दागने की आवाजें भी वीडियो साफ सुनाई पड़ रही हैं।

ट्वीट के अनुसार, एक छोटी सी बहस पर भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की जिंदगी बर्बाद कर देना कोई नई बात नहीं हैं। वहाँ के सामाजिक कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन भी इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखते हैं कि इस वीडियो में घृणा, क्रोध और नारे को चेक करें, यह हर साल दर्जनों बार गैर-मुस्लिमों के घरों और पूजा स्थलों के साथ होता है लेकिन किसी को भी इस तरह के कार्य के लिए दंडित नहीं किया जाता।

बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान के भीमपुरा कराची में हिंदुओं के प्राचीन मंदिर पर हमला किया गया था। नवंबर की उस घटना में मंदिर के हिंदू देवी-देवताओं को निकाल कर बाहर फेंक दिया गया था। इसके साथ ही देवी-देवता से संबंधित सामानों को भी फेंक दिया गया था। हालाँकि, उस दौरान आरोपित घटना को अंजाम देकर फरार हो गए थे, लेकिन आज सैंकड़ों की भीड़ घटनास्थल पर बेखौफ मजहबी नारे बुलंद करके हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर रही है।

‘पूरा भारत मेरे बाप की मिल्कियत’ और ‘जब तक इस्लाम कबूल नहीं, शादी नहीं’ – वो जो रहे पूरे साल कुख्यात

देश और दुनिया में ऐसे लोग कम ही मिलेंगे जो कह सकें कि 2020 उनके लिए बेहतर था। इस बीच कुछ लोग ऐसे थे, जिन्होंने जटिल वर्ष को जटिलतम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे लोग जो सुर्ख़ियों में बने रहे लेकिन अच्छी वजहों से नहीं बल्कि नकारात्मक वजहों से। जिनकी बातें-हरकतें ‘क्या देखना है’ से ज़्यादा इसका सबूत थीं कि ‘क्या नहीं देखना है’। 2020 की सूची में ऐसे तमाम नाम हैं, जिन्हें भूला नहीं जाना चाहिए, अगर आप भूले हैं तो हम उनका ज़िक्र एक बार फिर कर देते हैं। 

‘नॉटी’ बयानवीर संजय राउत 

महाराष्ट्र की राजनीति का एक ऐसा नाम जो अपने ‘नॉटी’ बयानों की वजह से पूरे देश की चर्चा का कारण बन गया। संजय राउत और बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के बीच जुबानी जंग छिड़ी, जिसके बाद शिवसेना के वरिष्ठ नेता ने अभिनेत्री को ‘हरामखोर’ कह दिया था। हालाँकि इसके ठीक बाद उन्होंने विचित्र स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि हरामखोर का मतलब नॉटी होता है। 

इतना ही नहीं, शिवाजी की दुहाई देकर कहने लगे कि वह महिलाओं का सम्मान करते हैं। इसके अलावा भी संजय राउत ने साल भर में ऐसे कई बयान दिए जो सुर्खियाँ बने, चाहे वह महाराष्ट्र में घुसने की धमकी देना हो या कंगना रनौत के दफ्तर पर हुई बीएमसी की तोड़फोड़ के बाद बयानबाजी। शिवसेना नेता ने ख़बरों में रहने का सिलसिला जारी रखा। हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने उनकी पत्नी को 4355 करोड़ के घोटाला मामले में समन भेजा है, इसके बाद से ही ‘नॉटी’ टिप्पणीकार की बयानबाजी जारी है। 

असदुद्दीन ओवैसी मतलब अल्पसंख्यकों का मसीहा (वामपंथी मीडिया का हीरो)

यह ऐसा नाम है, जो पिछले कई सालों से इस सूची (जहरीलों की) में था और आने वाले कई सालों तक इस सूची में बना रहने वाला है। ऐसा चेहरा जिसे वामपंथी मीडिया अल्पसंख्यकों का परम हितैषी साबित करने में जुटा हुआ है, बिना ये समझे कि असदुद्दीन ओवैसी के बयानों का भारतीय राजनीति और आम जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ता है। कुछ समय पहले ही ओवैसी ने भाजपा की सत्ता में मौजूदगी का श्रेय कॉन्ग्रेस को देते हुए, कॉन्ग्रेस के नेतृत्व को नपुंसक घोषित किया था। 

इसी तरह बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के वक्त ओवैसी ने कहा था, “असदुद्दीन ओवैसी बिहार का तो नहीं है, मगर ये पूरा भारत असदुद्ददीन ओवैसी के बाप की मिल्कियत है।” राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन के दौरान भी ओवैसी ने बराबर जहर उगला था। ट्वीट करते हुए ओवैसी ने लिखा था, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। इशांअल्लाह।” ओवैसी की पार्टी के नेता भी उनके ही नक़्शे कदम पर चलते हैं, बिहार विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम के टिकट पर चुनाव जीत कर आने वाले विधायक अख्तरुल इमान ने कहा था कि वह हिन्दुस्तान की शपथ नहीं लेंगे। 

हमेशा की तरह ‘रवीश कुमार’  

इस नाम के इर्द गिर्द जितना लिखा जाए, उतना कम। मीडिया जगत का ऐसा नाम, जिसने पिछले कई सालों की तरह इस साल भी भ्रमित ख़बरों के कई हवाई फ़ायर किए। कुछ समय पहले ही ‘अप्रिय’ रवीश कुमार ने कृषि सुधार क़ानूनों के विरोध में जारी किसान आंदोलन को शांतिपूर्ण बताया था, जबकि इस आंदोलन के कारण न जाने कितने JIO टावर अपनी ‘जान गँवा’ चुके हैं। हाल ही में वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल द कारवाँ’ और कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के बेटे विवेक डोभाल के बेटे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के मामले में माफ़ी माँगी थी। मिथ्या प्रचार में कुशल कथित पत्रकार रवीश कुमार ने भी इस मामले में द कारवाँ के कंधे पर बंदूक रख दावों की गोलियाँ दागते हुए बड़े शब्दों में डी कंपनी लिखा था। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रपंची पत्रकार रवीश कुमार अपनी इस बात के लिए कब माफ़ी माँगने वाले हैं। 

बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम वाले दिन भी प्रोपेगेंडा परस्त रवीश कुमार का दोहरा चरित्र सामने आया था। जब रुझानों में महागठबंधन को बढ़त मिलती हुई नज़र आ रही थी तब रवीश कुमार जम कर ‘हें हें हें हें’ कर रहे थे। कुछ समय बीतने के बाद जैसे ही रुझान भाजपा के पक्ष में आए तब रवीश कुमार के चेहरे पर नाचती पनौती देखने लायक थी। ऐसे ही रवीश कुमार की बातों में दोहरानापन नज़र आया था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की मतगणना जारी थी। कोरोना के केरल मॉडल पर भी रवीश कुमार ने शुरुआत में पूरी क्षमता से महिमामंडन किया था लेकिन उनकी तारीफ़ केरल के लिए इतनी ‘लकी’ साबित हुई कि कोरोना की वजह से वहाँ पर धारा 144 लगानी पड़ गई। इसी साल ‘सेक्युलर’ पत्रकारिता के शिरोमणि ने फ़र्ज़ी ख़बरों की हैट्रिक भी लगाई थी।   

अपने ही शो पर ज़लील होने वाले ‘पत्रकार’ राजदीप 

मीडिया के झूठ और फ़रेब की बात हो और राजदीप देसाई की बात न हो… तो पूरा विमर्श अधूरा ही लगेगा। कुछ दिनों पहले ही केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राजदीप को नेशनल टीवी पर फटकार लगाई थी। किसान आंदोलन से जुड़े राजदीप के सवाल (जो आठवीं बार अलग तरीके से पूछा गया था) का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा, “क्या आप झूठों के प्रवक्ता हैं।” राजदीप सरदेसाई द्वारा किए जाने वाले साक्षात्कार भी ऐसे ही होते हैं (आदत से मजबूर श्रेणी)।

इनके एक साक्षात्कार में प्रशांत भूषण और शांति भूषण ने कश्मीर के मुद्दे पर कहा था कि वहाँ जनमत संग्रह होना चाहिए और अन्ना हजारे RSS की साज़िश का परिणाम हैं। अक्सर दोषियों और अपराधियों के हित में झंडा बुलंद करने वाले राजदीप ने डॉ कफील को निर्दोष साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भी राजदीप सरदेसाई को उनके ही कार्यक्रम में ज़लील किया था। इसके अलावा भी इस साल कई मुद्दों पर उनका मीडिया ट्रायल और सर्टिफिकेट वितरण धड़ल्ले से जारी था

तिरंगे और देश का अपमान करने वाली महबूबा 

इस साल पीडीपी मुखिया ने ऐसे कई बयान दिए, जो उन्हें सुर्ख़ियों में बनाए रखने के लिए पर्याप्त थे। जम्मू कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लिए जाने यानी अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद महबूबा मुफ़्ती समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया गया था। जिन्हें पूरे 14 महीने और 1 हफ़्ते बाद रिहा किया गया। रिहाई के ठीक बाद मुफ़्ती ने बयान दिया, “जो हमसे छीन लिया गया, उसे वापस लेना होगा।”

महबूबा मुफ़्ती ने भारतीय झंडे का अपमान करते हुए कहा था कि जब तक उन्हें पुराना झंडा (कश्मीर का झंडा) नहीं मिल जाता है, तब तक वह दूसरा झंडा (तिरंगा) नहीं उठाएँगी। मज़े की बात है कि उनकी जहरीली बयानबाजी के ठीक बाद उनकी पार्टी के 3 नेताओं से इस्तीफ़ा दे दिया था। हाल ही में उनका नाम रोशनी ज़मीन घोटाले में भी सामने आया है, जिसे तत्कालीन राज्य (जम्मू कश्मीर) का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है।      

परमादरणीय जाकिर नाइक 

कुछ लोगों ने इस कदर जहर बो रखा है कि वह आने वाले कई सालों तक काटा जाए, फिर भी ख़त्म नहीं होगा। क्रिसमस के मौके पर जाकिर नाइक का एक पुराना वीडियो खूब चर्चा में रहा, जिसमें वह क्रिसमस त्यौहार मनाने पर जहर उगल रहा था। वीडियो में जाकिर नाइक एक मुस्लिम नौजवान से कहता है, “मैरी क्रिसमस मनाना हराम है और ऐसा करने पर तुम जहन्नुम में जाओगे। जाकिर नाइक ने कथित तौर पर इस्लाम में परिवर्तित हिन्दू युवती को ज्ञान दिया था। ज्ञान देते हुए जाकिर नाइक ने कहा कि उसे गैर मुस्लिम से शादी करने की कोई ज़रूरत नहीं है जब तक वह इस्लाम कबूल नहीं कर लेता है (बाकी 72 हूरों वाला दिव्य तर्क है ही)।

कुछ समय पहले एक पाकिस्तानी ने इस्लामाबाद में श्रीकृष्ण मंदिर बनाने का ऐलान किया था, इस मुद्दे पर भी इस्लामपरस्त जाकिर नाइक ने जहर उगला था। उसका कहना था, “अगर कोई इस्लामी देश मंदिर या चर्च बनाने के लिए रुपए देता है, तो वह हराम माना जाएगा।” हाल ही में पता चला था कि भारत में आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए मलेशिया से 2 लाख डॉलर (1.47 करोड़ रुपए) की फंडिंग की गई थी। इन आतंकी हमलों के लेनदेन के तार जाकिर नाइक सहित कई आतंकी संगठनों से भी जुड़े हुए थे।

के के छी छी, का का छी छी

देश का एक राज्य जो पिछले कुछ समय से राजनीतिक हत्याओं और राजनीतिक हिंसा गढ़ बन चुका है और इस राज्य का मुखिया कौन? ममता बनर्जी! इसका एक मतलब साफ़ है, जितनी बार इन घटनाओं का ज़िक्र होगा, उतनी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम सामने आएगा। हैरानी की बात है कि प्रदेश की मुख्यमंत्री होने के नाते वह ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई तो दूर बल्कि निंदा करती तक नहीं नज़र आती हैं

यह साल ममता बनर्जी और उनकी पार्टी दोनों के लिए ही सही नहीं था क्योंकि अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके पहले ही पार्टी के कई नेता बग़ावत पर उतरे और कुछ ने पार्टी का दामन छोड़ दिया। केंद्र सरकार की योजनाओं को प्रदेश में लागू नहीं करने से लेकर योजनाओं के लाभ से आम जनता को वंचित रखने तक, ममता बनर्जी का साल ऐसी ही राजनीतिक गलतियों के बीच बीता है।

बुजुर्ग (गहलोत) बनाम नौजवान (पायलट) 

राजस्थान कॉन्ग्रेस के इन दो बड़े चेहरों के बीच लंबे समय तक चली राजनीतिक कलह ने जम कर सुर्खियाँ बटोरी थीं। अनुशासनात्मक कार्रवाई की दलील देकर जैसे ही सचिन पायलट को बर्खास्त किया गया, वैसे ही प्रदेश कॉन्ग्रेस दो हिस्सों में बँट गई। फिर शुरू हुआ राजनीतिक बयानबाजी का दौर। अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को साजिशकर्ता घोषित करते हुए कहा था, “अंग्रेज़ी बोलने और हैंडसम होने से कुछ नहीं होता है।” 

गहलोत कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, इतने से मन कैसे भरता तो उन्होंने दूसरे बयान में कहा, “मैं बैगन और सब्जी बेचने नहीं आया हूँ, सीएम हूँ, अपना काम करने आया हूँ।” सचिन पायलट भले इस बीच बयानबाजी का हिस्सा नहीं बने हों पर उनके गुट के विधायकों ने गहलोत सरकार की परेशानियाँ बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। हालाँकि एक मौक़ा ऐसा भी आया था, जब सचिन पायलट ने अपने ट्विटर बायो से ‘कॉन्ग्रेस’ हटा लिया था। दो दिग्गज नेताओं के बीच लंबे समय तक चले इस विवाद ने राजस्थान में कॉन्ग्रेस की जड़ें हिला कर रख दी थीं। खैर क्या पता अभी तक हिली हुई ही हों!          

‘हिन्दू-विरोधी’ तनिष्क

किसी के लिए भी कल्पना करना मुश्किल होता कि चेहरों के बीच एक ब्रांड भी सुर्ख़ियों की वजह बन सकता है। 2020 में एक नहीं बल्कि दो-दो मौके आए, जब तनिष्क समूह के बनाए विज्ञापनों ने जम कर विवाद खड़ा किया। एक विज्ञापन दीवाली पर था लेकिन अफ़सोस दीवाली के विज्ञापन में उससे जुड़ी कोई चीज़ नज़र नहीं आ रही थी। मोमबत्ती, रंगोली, मिठाई, पूजा की थाली… ऐसा कुछ भी विज्ञापन में नहीं दिखा था, जो दिखा वह पटाखे नहीं जलाने पर दिया गया ज्ञान था। कुछ ही देर में विज्ञापन का विरोध शुरू हो गया और नतीजा यह निकला कि तनिष्क ने विज्ञापन हटा लिया। इसके पहले तनिष्क ने जो ‘सेक्युलर’ विज्ञापन बनाया, उससे शायद ही कोई अपरिचित हो। 

इसमें गर्भवती हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में गोदभराई की रस्म दिखाई गई थी। वीडियो में दिखाया गया था कि गहनों से लदी हुई एक महिला गोदभराई की रस्म के लिए तैयार हो रही है। ‘तनिष्क ज्वेलरी’ के इस वीडियो में जिस जोड़े को दिखाया गया था, वो इंटरफेथ कपल होता है, अर्थात पति-पत्नी अलग-अलग धर्म के होते हैं। मुस्लिम परिवार को एकदम ‘सहिष्णु’ दिखाने का प्रयास किया गया था (बाकी सच्चाई आप जानते ही हैं)। इस वीडियो का भी इतना विरोध हुआ कि तनिष्क को अच्छी भली फजीहत के बाद विज्ञापन हटाना पड़ा। इससे बड़ी दलील और क्या सकती है कि कि अगर विज्ञापन सही होता या सही मंशा से बनाई गई होती तो उसे हटाने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती।   

लिबरल्स की नई ख़ुराक ‘दिलजीत दोसांझ’ 

लिबरल्स के पास अक्सर चेहरों का अकाल होता है, यही वजह है कि जो भी एक्शन में नज़र आया, उसे लिबरल गैंग झट से लपक लेता है। किसान आंदोलन की आड़ लेकर किसानों को भड़काने वाले लोगों की सूची में दिलजीत का नाम नया था या यूँ कहें प्रोपेगेंडा प्रचार जारी रखने की उम्मीद की किरण। इतनी महीन और उन्मादी ज़िम्मेदारी को दिलजीत ने पूरी ज़िम्मेदारी के साथ निभाया भी।

पहले कंगना रनौत के साथ ट्विटर पर दो-दो हाथ करके (गाली खाकर) ट्रैफिक कमाया। इसके बाद प्रदर्शन करने वालों किसानों के साथ मज़बूती से खड़े होने का दिखावा किया। आखिर इसे दिखावा ही क्यों कहा जाना चाहिए? तो पूछिए कि कुछ दिन प्रदर्शन स्थल पर बैठने के बाद कहाँ गए पिंड के मशहूर गायक। अंत में कुछ ऐसी ख़बरें भी सामने आई थीं, जिसमें दिलजीत और किसान आंदोलन के तार खालिस्तानियों से जुड़े होने का दावा किया गया था।      

अतीक अहमद के करीबी हार्ड कोर क्रिमिनल आशिफ उर्फ ‘मल्ली’ के अवैध निर्माण पर चला योगी सरकार का बुलडोजर

ऑपरेशन माफिया के तहत गैंगस्टर्स और माफिया के अवैध साम्राज्य के खिलाफ प्रयागराज विकास प्राधिकरण की कार्रवाई लगातार चालू है। इसी क्रम में अब अहमदाबाद जेल में बंद माफिया अतीक अहमद के गुर्गे आशिफ उर्फ मल्ली के अवैध निर्माण पर पीडीए का बुलडोजर चल गया है। दरअसल, धूमनगंज के उमरी गाँव में मल्ली ने पीडीए से बगैर नक्शा पास कराए निर्माण कराया था। इसके चलते यह बिल्डिंग अवैध निर्माण की श्रेणी में आती है। 

बता दें कि मल्ली के ऊपर दो दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं और मौजूदा समय में वह जौनपुर जेल में बंद है। धूमनगंज का रहने वाला आशिक उर्फ मल्‍ली हार्ड कोर क्रिमिनल है। इसके अलावा उसके खिलाफ हत्‍या, लूट, रंगदारी के कई मुकदमे दर्ज हैं। वह अतीक अहमद गैंग के लिए काम करता है। कुछ दिन पहले पुलिस ने सिविल लाइंस स्थित एक अपार्टमेंट से घेरेबंदी कर दबोचा था। इसके बाद उसे जेल भेजा गया था। 

अतीक अहमद के रिश्तेदारों के खिलाफ कई एक्शन

17 नवंबर को अतीक अहमद के साढ़ू इमरान जई के अवैध निर्माण पर योगी सरकार का बुलडोजर चलाया गया। अतीक अहमद के साढ़ू इमरान जई के जिस अवैध निर्माण को बुलडोजर से ध्वस्त किया गया, वो 2500 वर्ग गज का था और खुल्दाबाद के चकिया क्षेत्र में बनाया गया था। पीडीए से नक्शा स्वीकृत कराए बिना ही यहाँ अवैध रूप से निर्माण कर दिया गया। इमरान जई ही अतीक अहमद के सारे अवैध कारोबार को सँभालता है और उसके धंधों और सम्पत्तियों का प्रबंधन करता है। उस पर कई गंभीर आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं। इसके अलावा, अतीक के साले जकी अहमद, उसके शार्प शूटर मुबारक खान समेत कइयों पर एक्शन लिया जा चुका है।

अतीक की पत्नी की जमीन भी हुई थी कुर्क

इसके पहले 12 दिसंबर को अतीक के साले जकी अहमद का अवैध निर्माण ध्वस्त किया गया था। 5 दिसंबर को अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन के नाम पर दर्ज करोड़ों की 3 संपत्तियों को भी प्रशासन ने जब्त किया था। अतीक अहमद पर आरोप है कि उसने दबंगई और सियासी रसूख के दम पर अवैध तरीके से ये संपत्तियाँ अर्जित की थीं।

इससे पहले प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीडीए) ने फरार चल रहे ग्राम प्रधान मुबारक खान की दो अवैध इमारतों को जेसीबी मशीनों का इस्तेमाल करते हुए जमींदोज कर दिया था। पीडीए से नक्शा पास कराए बिना ही ये अवैध निर्माण कराया गया था।

मुबारक खान ने 400- 400 वर्ग मीटर में दो अवैध इमारतों का निर्माण कराया था। एक ईमारत तो कब्रिस्तान की जमीन पर ही बना डाली गई थी। वहीं, दूसरी जमीन किसी अन्य व्यक्ति की जमीन पर कब्जा करके बनाया गया था।

शाहीनबाग के शूटर और पूर्व AAP नेता कपिल गुर्जर को BJP ने दिखाया बाहर का रास्ता

शाहीन बाग़ में गोली चलाने वाले पूर्व AAP नेता कपिल गुर्जर के भाजपा ज्वाइन करने की खबरों को लेकर लिबरल्स और विपक्षी दल सोशल मीडिया पर माहौल बना ही रहे थे कि कुछ ही देर बाद एक अन्य खबर में खुलासा हुआ कि भाजपा ने कपिल गुर्जर को पार्टी से निकाल दिया है और उसे पार्टी में जोड़ने के खिलाफ है।

भाजपा की ओर से इस खबर के सम्बन्ध में आधिकारिक बयान भी शेयर कर दिया गया है। जिसमें लिखा है कि कपिल गुर्जर को पार्टी निकाल दिया गया है। वह बसपा से भाजपा में शामिल होने आए कुछ लोगों में से एक था और उन सभी को पार्टी ने लेने से इनकार कर दिया है।

‘टाइम्स नाउ’ ने बताया कि भाजपा ने कपिल गुर्जर को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया है। पार्टी द्वारा बुधवार (दिसंबर 30, 2020) यह फैसला ऐसे समय में लिया गया, जब तमाम विरोधी दल कपिल गुर्जर को लेकर भाजपा को घेरने का प्रयास कर रहे थे।

गौरतलब है कि कपिल गुर्जर इस साल की शुरुआत में तब चर्चा में आया था जब दिल्ली के शाहीन बाग में चल रहे नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध प्रदर्शन के दौरान कपिल गुर्जर ने फायरिंग कर दी थी।

आज शाम ही यह चर्चा सामने आई कि कपिल गुर्जर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं और गाजियाबाद के भाजपा अधिकारियों द्वारा पार्टी में उनका स्वागत किया गया।

शाहीन बाग़ से चर्चा में आया था AAP नेता कपिल गुर्जर

दरअसल 1 फरवरी, 2020 को कपिल गुर्जर नाम के एक व्यक्ति ने शाहीन बाग में सीएए के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के करीब पहुँचकर तीन हवाई फायर किए थे। इसके बाद वहाँ तैनात पुलिस कर्मियों ने आरोपित को तत्काल हिरासत में ले लिया था। पुलिस हिरासत में लिए जाने के बाद आरोपित ने कहा था कि हमारे देश में केवल हिंदुओं की चलेगी और किसी की नहीं। इस घटना पर शीघ्र ही प्रतिक्रिया देते हुए आप नेता संजय सिंह ने केन्द्र की बीजेपी सरकार को इसके लिए दोषी ठहराया था।

अब इसके बाद खुलासे में साफ़ हो गया था कि कपिल गुर्जर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है बल्कि आम आदमी पार्टी का ही एक नेता है और शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन की साजिश के पीछे आम आदमी पार्टी की ही एक महत्वपूर्ण भूमिका भी नजर आ रही है।

दरअसल, इसके बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच को जाँच के दौरान कपिल गुर्जर के मोबाइल फोन से कुछ तस्वीरें मिलीं। जिनको दिल्ली पुलिस ने साझा किया। इन तस्वीरों में कपिल गुर्जर को आप नेता आतिशी और संजय सिंह के साथ देखा गया। वहीं, तस्वीरों में आप नेता आतिशी, संजय सिंह और दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया कपिल गुर्जर और उनके पिता का स्वागत करते नजर आए। कपिल ने पुलिस पूछताछ में स्वीकार किया था कि उसने और उसके पिता ने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पिछले वर्ष 2019 के शुरुआत में ही आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए थे।