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पाकिस्तान से हिंदू लड़कियों के रेप-धर्मांतरण की खबरें देने वाले कार्यकर्ता पर अल्लाहू अकबर चिल्लाते हुए चाकू से हमला

जाने-माने ट्विटर यूजर और पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन पर चाकू से हमला किया गया। खुद ऑस्टिन ने मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को इसकी जानकारी दी। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “मुझ पर एक जिहादी ने चाकू से हमला किया। मुझे नहीं पता कि वह कौन था, मगर वह शायद मध्य-पूर्व या कहीं और से था।” राहत ने कहा कि वह घायल हो गए हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

ऑपइंडिया के साथ शेयर किए गए एक वीडियो मैसेज में राहत ऑस्टिन ने कहा, “अभी कुछ समय पहले मुझ पर एक इस्लामी जिहादी ने हमला किया था। उसके पास एक चाकू था और जिस तरह से उसने ‘अल्लाहू अकबर’ कहा था, मुझे लगता है कि वह मध्य-पूर्वी देश से है। ये लोग दुनिया में हर जगह ऐसी चीजें क्यों करते रहते हैं? हम कुछ भी गलत नहीं कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं सिर्फ सरकार, और मुस्लिम बहुल देशों में धार्मिक उत्पीड़न, रंगभेद, नरसंहार और जातीय हिंसा के मामलों की रिपोर्टिंग कर रहा हूँ। (वे) इसे ‘जिहाद’ के तहत करते हैं। जब  70 साल पहले 1947 में पाकिस्तान बना था, तब हम 23% थे और अब हम केवल 3% बचे हैं।”

जिहादी हमले में जख्मी राहत ऑस्टिन ने कहा, “यह एक व्यवस्थित नरसंहार है।” मानवाधिकार कार्यकर्ता ने कहा कि नियंत्रित मीडिया और सरकार की नीतियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐसे मामले कभी किसी की नजर में न आए और अब ऐसे अपराधों की रिपोर्ट करने के लिए भी उनके प्रयासों को रोकने की कोशिश की जा रही है। “ये पागल लोग हैं। मुझ पर हमला हुआ। अगर मैंने खुद को बचाया नहीं होता, तो वो मेरा भी सिर कलम कर देते, जैसा कि दूसरों के साथ करते हैं। ये पागल लोग हैं।”

राहत ऑस्टिन और पाकिस्तान में ‘समानता’ के लिए उनकी लड़ाई

राहत ऑस्टिन पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के मामलों को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रकाश में लाने में सबसे आगे रहे हैं, जिसे पाकिस्तानी सरकार छुपाने का प्रयास करती है। मुस्लिम बहुल देश में बराबरी का दर्जा पाने के लिए संघर्ष करते हुए वह पाकिस्तानी समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं। इमरान खान के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा ‘नया पाकिस्तान’ में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर किए गए दावों के बावजूद, मानवाधिकार कार्यकर्ता पर हमला उनके खोखले दावों की पोल खोलता है।

पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने 01 जनवरी, 2021 को हिन्दू उत्पीड़न की जानकारी अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर की। जिसमें उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के पंजाब के बहु भाटी गाँव में एक मुस्लिम व्यक्ति ने जबरन रतन लाल की बेटी मिजा कुमारी का अपहरण कर उसके साथ बलात्कार किया और निक़ाह करने के लिए बलपूर्वक उसका इस्लाम में धर्मांतरण कर दिया गया।

एक्टिविस्ट ने पीड़िता के माता-पिता की एक वीडियो शेयर की, जिसमें उन्होंने लोगों से मदद की गुहार लगाई। उन्होंने कहा, “यदि हमारी बेटी हमें वापस नहीं मिलती है तो हम आत्महत्या कर लेंगे। हम गरीब हैं, हम दोषियों से नहीं लड़ सकते, पाकिस्तान में कोई भी हमारी मदद नहीं कर रहा है। जो हमारी वीडियो देख रहा है, हम उनसे मदद का अनुरोध करते हैं।”

AMU का बैंक खाता सीज: ₹14.83 करोड़ संपत्ति कर न चुकाने पर अलीगढ़ नगर निगम ने की कार्रवाई

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के बैंक खाते सीज कर दिए गए हैं। 14 करोड़ रुपए से अधिक के प्रॉपर्टी टैक्स के भुगतान न करने पर अलीगढ़ नगर निगम ने यह कार्रवाई की है। अधिकारियों का कहना है कि अगर एक सप्ताह के भीतर बकाया भुगतान नहीं किया जाता है, तो एएमयू के खाते से पैसा नगर निगम को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि यदि एक सप्ताह के भीतर बकाया राशि नहीं दी जाती है तो संपत्तियों को बाधित करने के बारे में भी विचार किया जाएगा।

मुख्य कराधान अधिकारी विनय कुमार राय ने बताया, “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर अलीगढ़ नगर निगम के लगभग 14.83 करोड़ रुपए का प्रॉपर्टी टैक्स बकाया है। यह बकाया राशि पिछले 8 से 10 सालों से लंबित है। इसको लेकर 2019 में भी खातों को सीज किया गया था। बकाया भुगतान के लिए विश्वविद्यालय को पर्याप्त समय और मौका दिया गया, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए उन्‍हें विश्वविद्यालय के बैंक खाते को सीज करने का निर्णय लेना पड़ा।”

उन्‍होंने बताया कि बकाया भुगतान न करने के कारण उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 की धाराओं 507, 509 व 513 के अन्तर्गत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए अलीगढ़ नगर निगम द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संचालित खाता को तत्काल प्रभाव से सीज किया गया है।

राय ने बताया कि अगर एक सप्ताह के भीतर बकाया राशि जमा नहीं की जाती तो एएमयू के खाते से पैसा नगर निगम को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। संपत्तियों को बाधित करने के बारे में भी सोचेंगे। उन्‍होंने बताया कि एएमयू ने शासन को भी कर मुक्त करने के लिए लिखा था, लेकिन वहाँ से कोई राहत नहीं मिली और वसूली के आदेश प्राप्त हुए। 

मुख्य कराधान अधिकारी विनय कुमार राय ने बताया कि इस मामले में कुछ दिन पहले शिक्षा मंत्रालय के अवर सचिव को पत्र लिखा गया था। पत्र में एएमयू की ओर से 10 अप्रैल 1990 में जारी शासनादेश का हवाला दिया गया। यह आदेश उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1916 के तहत प्रदेश सरकार ने जारी किया था। शासनादेश से जो कर मुक्ति दी गई थी, वह नगर पालिका अधिनियम 1916 के तहत थी। वहीं, एएमयू पर जो टैक्‍स लगाया गया है, वह उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 की व्यवस्था के तहत है।

इस संबंध में एएमयू के जनसंपर्क विभाग के एमआईसी इंचार्ज प्रो. शाफे किदवई का कहना है कि नगर निगम द्वारा की गई कार्रवाई का पक्ष अभी देखा नहीं है। पक्ष देखने के बाद विधिक राय लेकर अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।

किसान आंदोलन के नाम पर मोबाइल टावर तोड़ने पर HC ने माँगा पंजाब सरकार से जवाब, रिलायंस ने दायर की थी याचिका

किसान आंदोलन के नाम पर पिछले दिनों रिलायंस जियो टावर (Reliance Jio Tower) पर हुए हमले की बाबत पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके जवाब माँगा है। रिलायंस ने इससे पहले कोर्ट में अपनी याचिका दायर करते हुए हस्तक्षेप की माँग की थी। साथ ही कहा था कि तोड़फोड़ की इन गैर कानूनी घटनाओं को पूरी तरह से रोका जाए।

इस मामले की सुनवाई पर सरकार ने कहा कि उन्होंने एक हजार से ज्यादा पेट्रोलिंग पार्टी व सभी जिलों में नोडल ऑफिसर नियुक्त किए हैंं, ताकि रिलायंस की संपत्ति को किसी तरह का कोई नुकसान न हो। पंजाब सरकार का कहना है कि वह इस मामले में गंभीर हैं और किसी भी तरह की संपत्ति को नुकसान न हो, इसका वह पूरा ध्यान रखेंगे व आरोपितों के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी होगी। जानकारी के अनुसार, अदालत ने गृह सचिव, केंद्रीय गृह सचिव, पंजाब के गृह सचिव, डीजीपी व दूरसंचार विभाग को नोटिस जारी किया है। अब इन्हें 8 फरवरी तक अपना जवाब देना होगा।

गौरतलब है कि पिछले दिनों राज्य में किसान आंदोलन के नाम पर कई उग्र घटनाएँ दर्ज की गईं। कहीं कुल्हाड़ी से टावरों को काटते हुए प्रदर्शनकारी नजर आए तो कहीं जियो जेनरेटर उखाड़ कर उसे दान देते हुए किसानों ने अपनी शेखी बघारी। ऐसे में लगातार हमले देख कर रिलायंस ने हाईकोर्ट के सामने मदद की गुहार लगाई और कहा कि देश में अभी जिन तीन कृषि कानूनों को लेकर बहस चल रही है, उनके साथ उसका (कंपनी का) कोई लेना-देना नहीं है।

कंपनी ने अपनी याचिका में कहा कि उसे इन कानूनों से किसी तरह का कोई फायदा नहीं हो रहा है। कंपनी ने कहा कि वह कॉरपोरेट या अनुबंध कृषि नहीं करती है। उसने कॉरपोरेट अथवा अनुबंध पर कृषि के लिए पंजाब या हरियाणा या देश के किसी भी हिस्से में प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर कृषि भूमि की खरीद नहीं की है। इसके अलावा रिलायंस ने भारती एयरटेल के ऊपर किसानों को उकसाने के आरोप लगाए। उनकी ओर कहा गया कि जियो के टावर तोड़े जाने की वजह से हजारों कर्मचारियों के जीवन पर असर पड़ रहा है, साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचने से कम्युनिकेशन में दिक्कतें आ रही हैं।

‘महिलाओं का भौंहें सँवारना इस्लाम में हराम’: मौलवी की धमकी पर बिकनी की तस्वीर भेज कर लिखा- ‘मेरे ? को किस कर लो’

ब्रिटेन में सायरा खान एक जाना-पहचाना नाम है, क्योंकि उन्होंने ITV पर आने वाले लंचटाइम टॉक शो ‘Loose Women’ का लम्बे समय तक संचालन किया है, जिसमें मनोरंजन व अन्य क्षेत्रों की महिलाएँ महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करती हैं। अब सायरा खान ने शो को अलविदा कह दिया है, उन्होंने अपने जीवन के कुछ बुरे अनुभवों को लेकर बात की है। 50 साल की मीडिया प्रेजेंटर अब अन्य प्रोजेक्ट्स पर फोकस करेंगी। कभी उन्होंने इस्लाम में भौहें सँवारने को हराम बताने वाले एक मौलवी को सबक सिखाने के लिए बिकनी में तस्वीर भेज दी थी।

उन्होंने खुलासा किया है कि जब वो मात्र 13 साल की ही थीं, तभी उनके ही परिवार के एक सदस्य ने उनका यौन शोषण किया था। उन्होंने बताया कि उस व्यक्ति ने उनके बेडरूम में आकर उनका यौन शोषण किया। फिलहाल वो मर चुका है। उन्होंने कहा कि अगर किसी महिला को कोई व्यक्ति बिना अनुमति छूता है या कोई गलत कार्य करता है, तो ये किसी भी धर्म या संस्कृति में स्वीकार्य नहीं है – इस बारे में बात की जानी चाहिए।

उन्होंने बताया कि वो कट्टरपंथियों से इतनी डर गई थीं कि उनके पति ने उनसे चुप करने की ‘भीख माँगी’ थी और वो काफी डरे हुए थे। इसी तरह उन्होंने शो के एक एपिसोड में बताया था कि उन्होंने एक बिकनी तस्वीर अपलोड कर के एक मौलवी को महिलाओं के अधिकार के बारे में संदेश दिया था, जिसके बाद उन्हें जान से मार डालने की धमकियाँ मिलीं। उक्त मौलवी ने फतवा जारी किया था कि इस्लाम में महिलाओं का भौंहों को सँवारना हराम है।

उक्त मौलवी का कहना था कि भौंहों के साथ कुछ भी छेड़छाड़ करना इस्लाम में महिलाओं के लिए हराम है। इसके बाद सायरा खान ने बिकनी में अपनी तस्वीर भेजी, जिसमें वो पेट के बल लेटी हुई थीं। उन्होंने ‘Peach’ नामक फल की इमोजी भेजी और मौलवी को लिखा – “ऐ पिछड़े प्रागैतिहासिक डायनासोर, मेरे ? (Peach Emoji) को किस कर लो।” इसके बाद एक इंस्टाग्राम यूजर ने उन्हें धमकाया था कि अगर वो अपने जीवन का महत्व समझती हैं तो इस्लाम को इन सबसे दूर रखें।

उन्होंने ऑन एयर इस बात को कहा था कि हत्या की धमकियाँ उन्हें न तो मुस्लिम होने से रोक सकती हैं और न ही बिकनी पहनने से। उनके पति भी डर गए थे और उनसे दो बच्चों की खातिर ये सब बंद करने को कहा था लेकिन सायरा खान ने कहा कि वो बिकनी भी पहनेंगी और भौंहों को भी सँवारेंगी। उनका कहना है कि मजहब के नाम पर लोगों की हत्या गलत है। क्रिसमस से पहले उन्होंने आँसुओं के साथ ‘Loose Women’ शो को अलविदा कहा।

इसी तरह शनिवार (जनवरी 2, 2021) को पेटलिंग जाया शहर में इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध के बावजूद ‘मिस प्लस वर्ल्ड मलेशिया 2020 (MPWM 2020)’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कट्टरपंथी संगठनों और यहाँ तक कि मलेशिया की सरकार ने भी प्लस साइज महिलाओं के कार्यक्रम में आने को इस्लाम के खिलाफ बताया था। इस्लामी संगठनों ने इस कार्यक्रम को ‘भोगवादी’ करार दिया था, लेकिन कार्यक्रम तय समयानुसार हुआ।

JNU का वो काला दिन, जब वामपंथियों के डर से मिटाने पड़े थे स्वास्तिक और शुभ दीपावली के निशान

मैं कलम का सिपाही नहीं हूँ। इसलिए लेखन में सिद्धहस्त भी नहीं हूँ। लेकिन आज जो मैं लिख रहा हूँ, वो लिखने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं बचा था। पिछले साल जनवरी की 5 तारीख को मैंने अपने भीतर कुछ टूटा हुआ महसूस किया। मुझे लगा कि मैं हार गया हूँ। मुझे लगा कि अब और मैं लड़ नहीं सकता। लेकिन एक जुनून था, जिसने मुझे उस हार को स्वीकारने नहीं दिया।

उस दिन मुझे नहीं पता था कि मुझे आगे क्या करना चाहिए। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं ये सब किसके साथ साझा करूँ, किस पर यकीन करूँ, किसको समझाऊँ, किससे सलाह लूँ और किससे मदद की गुहार लगाऊँ?

जब मुझे इनमें से किसी भी सवाल का जवाब ठीक से नहीं मिला तब मैंने सोचा कि अब लिखने के अलावा कोई चारा नहीं! मुझे नहीं पता कि कितने लोग इस लिखे हुए को पढ़ेंगे, या कितने लोग इसे पढ़ कर मेरी भावनाओं को समझ पाएँगे। पर मुझे इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता।

मैं अपने आप को अपने भीतर के डर से मुक्त करना चाहता हूँ। मैं असमर्थता के चंगुल से अब बाहर आ जाना चाहता हूँ। मैं जेएनयू की वादियों में बिना डरे दुबारा विचरण करना चाहता हूँ, कि लोग मेरा सामाजिक बहिष्कार न कर दें। और मेरी ये भावनाएँ न जाने कितने और जेएनयू वालों की भावनाएँ हैं, जिन्हें मैं इस लेख के माध्यम से शब्द देना चाहता हूँ।

उस दिन नए साल की पाँचवीं सुबह थी। उस दिन जो दंगे जेएनयू कैम्पस में हुए, उससे आप सब भली-भाँति परिचित हैं। जेएनयू के लोग भी भली भाँति परिचित हैं। जेएनयू का ‘कॉमन स्टूडेंट’ भी जानता है कि उस दिन जो हुआ, वो वामपंथी कुंठा का परिणाम और उनकी हिंसा की प्रवृत्ति की एक बानगी भर था।

पर आश्चर्य इस बात का है कि जेएनयू के एक बड़े वर्ग ने न सिर्फ उस घटना को स्वीकार कर लिया बल्कि हमारे खिलाफ नफरत फैलाने की जो साजिश रची गई, जो सोशल बॉयकॉट का ढोंग किया गया, उसमें भी शामिल हुए। तभी मेरे दिमाग में ये बात कौंधी कि जेएनयू को एक रंग में रंगने की जो साजिश एक लंबे समय से चलती आ रही है, उसका अपना प्रभाव दिखना तो लाजिमी है।

एक तरफ जेएनयू में भारत के हर कोने से विद्यार्थी आता है, हर भाषा, हर धर्म, हर वर्ग का विद्यार्थी जेएनयू में शिक्षा लेता है… एक तरह से देखें तो जेएनयू भारत का ही छोटा सा स्वरूप है। विविधता में एकता की खूबसूरती की जगह विविधता को समाप्त कर देने की कोशिश जब सफल होती दिखे तो दुख होता है।

मैं जब से जेएनयू में हूँ, तब से ही मुझे इस बात का एहसास है कि जेएनयू में एक ऐसा वर्ग है, जिसे ‘कॉमन स्टूडेंट्स’ कहा जाता है। जो राजनैतिक रूप से किसी एक पक्ष की ओर झुका हुआ नहीं है। जिसे गलत और सही में अंतर करना आता है। लेकिन 5 जनवरी की घटना के बाद ये भ्रम टूट सा गया और लगा जैसे जेएनयू में सच में बोलने की, सोचने की, सच कहने की, अपने अधिकारों के लिए लड़ने की, और समस्या से समाधान तक पहुँचने की कोशिश करने की कोई महता नहीं है।

यहाँ सिर्फ एक ही सत्ता है… वामपंथी तानाशाही सत्ता! जिस पर खतरा आते ही हिंसा का बर्बर रूप सामने आ जाता है। यह सब देख कर, सोच कर मुझे ऐसा लगने लगा जैसे हमारी ही गलती थी। ऐसा लगा जैसे एबीवीपी को गुंडा कहने वाले लोगों की बातें मान लेना ही अब एक चारा है। ऐसा लगा कि वामपंथ की ज़हरीली हवा को साफ करने की हमारी कोशिश ही गलत है।

जब कैम्पस में ये बात फैलाई गई कि एबीवीपी की प्लानिंग थी, ‘तुम लोग इसी लायक हो’, ‘और मिलेगा अभी प्रसाद’, जैसी बातें जब फैलाई जा रही थीं; और जब लोग अपनी जान बचाने के लिए अपने कमरों की बालकनियों से छलाँग लगा रहे थे, आधे नँगे दौड़ रहे थे, खून से लथपथ थे, लेकिन फिर भी इस बात का सुकून था कि जान बच गई। तब ये सब देख कर मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि जेएनयू समुदाय मानसिक रूप से इतना बेबस नहीं हो सकता कि वामपंथ की इस साजिश को अपनी आँखों के सामने देख कर भी न देख सके। लेकिन ऐसा हुआ, और ऐसा होने के बाद जो वातावरण जेएनयू में बना, उसने मुझे भीतर से सहम जाने को मजबूर कर दिया।

यहाँ जेएनयू में जो कुछ भी हो रहा था, उसे पूरा देश मीडिया के माध्यम से देख रहा था। हमारे घरवालों ने भी देखा। माँ-बाप बोले, “बेटा छोड़ दो एबीवीपी, ज़िंदगी रही तो आगे बहुत कुछ कर पाओगे”, लेकिन उन्हें कहाँ पता है कि ये वामपंथी लोग खुद बस्तियाँ जला कर खुद मातम भी मना लेने वाले लोग हैं। इन्हें उस कॉमन स्टूडेंट को भी मारने में एक सेकंड की हिचक नहीं होती, जो इनके हर षड्यंत्र का साथी हो जाया करता है। इस बात का अंदाज़ा लगाना बेहद कठिन है कि 5 जनवरी की घटना ने कितने लोगो की ज़िंदगियों को बदल कर रख दिया है।

मैं खुद अपने आपको बहुत से मामलों में तब से अलग पाता हूँ। मैं कभी उन लोगों को इसके लिए माफ नहीं कर पाऊँगा, जो मेरी या मेरे जैसे कितने ही और विद्यार्थियों की ज़िंदगियों को बदलने के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन साथ ही मैं कैम्पस के वामपंथी धड़े को यह भी याद दिलाना चाहता हूँ कि हम सब उस दिन बिखरे जरूर थे, लेकिन टूटे नहीं थे।

मैं अपने साथियों का आभार प्रकट करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे आशा की एक किरण दी, कि हार नहीं मानना है, हिम्मत नहीं टूटने देना है, हम लोग वापस उठेंगे और फिर से मेहनत करेंगे। मैं अपने साथियों के इस जज़्बे को सलाम करता हूँ। मैं खुद पर इस नाते से गर्व करता हूँ कि एक ऐसे संगठन का हिस्सा हूँ, जिसने व्यक्ति से ऊपर उठ कर संगठन का भाव सिखाया है।

दंगे-फसाद के बाद हमें अस्पताल ले जाया गया। वहाँ से जब मैं वापस अपने हॉस्टल लौटा तो मुझे बहुत अजीब महसूस हो रहा था। लोग मुझे देख कर मुँह मोड़ ले रहे थे। अजीब सा व्यवहार मुझे पहले तो समझ नहीं आया। तभी मुझे ध्यान आया कि ओह, मैं तो एबीवीपी से हूँ! मैं साफ-साफ सुन पा रहा था, लोग कह रहे थे – ‘ठीक से प्रसाद मिला नहीं लगता है!’

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दूँ? मेरे मन में कई भाव उत्पन्न हो रहे थे जैसे गुस्सा, निराशा, हताशा, और मैं पूरी तरह हतोत्साहित हो गया था। बस मुझे ऐसा लगा जैसे मैं पूरी तरह से टूट चुका हूँ। ये 2020 की शुरुआत भर थी, हममे से कितनों ने आँसू बहा कर खुद को समझाया। आज मैं फिर से बुलंदी के साथ कहना चाहता हूँ कि ‘मैं एबीवीपी से हूँ, और मैं गुंडा नहीं हूँ’।

मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे एक दिन इस कैंपस से भागना पड़ेगा, जिसे मैंने खुशी-खुशी अपना माना था। हमारी फोटो लगा कर पर्चे बाँट कर हमें मारने का खुला न्यौता दिया। मैं यहाँ जो असहिष्णुता फैली हुई थीं, उसको देख रहा था और महसूस कर रहा था। लोग हमारे साथ चलने से डरते थे, हमारे कार्यकर्ता मेस में पर्चा बाँटने के लिए घुसने से डरते थे, भय के माहौल की पराकाष्ठा थी। मैं स्तब्ध रह गया, जब मेरे रूममेट ने कहा – “सॉरी यार रूम के बाहर का स्वास्तिक मिटाना पड़ा, शुभ दीपावली का पट्टा निकालना पड़ा… वरना ये लोग इस रूम में भी तोड़ कर घुस जाते।”

मुझे इस पर विश्वास नहीं हो रहा था, लेकिन ये सच्चाई थी। अब मैंने ठान लिया था कि तब तक दीवाली नहीं मनाऊँगा, जब तक दीवाली वाली रौनक वापस ना आ जाए। मैं एक ऐसी जगह रहता हूँ, जहाँ मैंने कभी सोचा नहीं था कि स्वास्तिक का चिन्ह और शुभ दीपावली की झालर देख कर लोग हमला कर सकते हैं।

मैं मेरे ईश्वर से माफी चाहता हूँ कि मैं कुछ नहीं कर सका, खुद को सुरक्षित रखने के लिए मुझे मेरे आराध्य का अनादर करना पड़ा। मैं एक ऐसी जगह पर था, जहाँ एक बड़ी संख्या में लोगों ने हमें सामाजिक रूप से बॉयकॉट कर दिया। लेकिन मुझे इस बॉयकॉट से कोई फर्क नही पड़ता, क्यूँकि अब मुझे पता चल गया कि ये लोग कभी मेरे साथ थे ही नहीं। और जो लोग मेरे साथ थे, आज भी मेरे साथ हैं।

मैं लोगों को आशाएँ खोते हुए देख रहा था, बोल रहे थे छोड़ ना, रहने दे ना भाई, बेकार में इन सब में पड़ रहा है, चुपचाप एक साल और निकाल ले और पढ़ कर निकल जा, अकेले कुछ नहीं कर पाएँगे इनका, ये लोग नहीं छोड़ेंगे नहीं तो। लेकिन मैं चैन की साँस ले सकता था क्यूँकि मैं जानता हूँ, जेएनयू के बाहर भी एक दुनिया है, मेरा पूरा जीवन बर्बाद नहीं हुआ है और कोई भी जेएनयू के बाहर मुझे गुंडे के रूप में नहीं देखेगा। कुछ समय बाद जब मैं यहाँ से चला जाऊँगा और मैं सुना जाऊँगा, मैं समझा जाऊँगा, और लोग मेरा सम्मान करेंगे।

जेएनयू के बाहर एक दुनिया है, जहाँ सच का सम्मान होता है, जहाँ लोग तथ्यों को समझने के बाद निर्णय लेते हैं, जहाँ कॉमन लोग सिर्फ कॉमन लोग होते हैं, जहाँ मुझे घुटन नहीं होगी, जहाँ मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ कि मैं जेएनयू में एबीवीपी के कार्यकर्ता के रूप में रहा और लोग तालियों से मेरी सराहना करेंगे। मैं चेन से साँस ले सकता हूँ क्यूँकि ये समय चला जाएगा और अच्छा समय लौट कर आएगा।

संघियों से ज्यादा सावधान ऋचा, तापसी, स्वरा से रहो: ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ के ‘जातिवादी पोस्टर’ पर लोगों में नाराजगी

ऋचा चड्ढा की एक नई फिल्म का पोस्टर सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया है। यह फिल्म है- ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’। पोस्टर में ऋचा चड्ढा (Richa Chadda) सबसे आगे नजर आ रही हैं। सुभाष कपूर द्वारा लिखित और निर्देशित यह फिल्म ‘Madam Chief Minister’ एक पॉलिटिकल ड्रामा है, जो कि आने वाली 22 जनवरी को रिलीज़ के लिए तैयार है।

टी-सीरीज फिल्म्स और काँगड़ा टॉकीज़ द्वारा निर्मित इस फिल्म के पोस्टर में ऋचा चड्ढा अपने हाथ में झाड़ू लिए देखी जा सकती हैं और उनके साथ मानव कौल और सौरभ शुक्ला नजर आ रहे हैं। साथ ही एक टैगलाइन है, ‘Untouchable, Unstoppable’ यानी, ‘अछूत, अजेय’। ऋचा चड्ढा ने इस पोस्टर को अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया है।

बताया जा रहा है कि यह फिल्म बसपा प्रमुख मायावती के राजनीतिक जीवन से प्रभावित है। लेकिन ‘दलित राजनीति’ पर बनी यह फिल्म सोशल मीडिया पर लिबरल्स और ‘अम्बेडकरवादियों’ के निशाने पर आ गई है।

इस फिल्म के पोस्टर पर जातिवादी होने के आरोप तो लग ही रहे थे लेकिन यह हंगामा तब बड़ा बन गया जब ‘मिर्जापुर’ और ‘फुकरे’ फिल्म से चर्चा में आए अली फजल ने ऋचा चड्ढा के इस पोस्टर को अपने ट्विटर अकाउंट पर प्रोमोट करना शुरू किया। दिल्ली दंगों के बाद इंटरनेट लिबरल्स के प्रिय बनक्र उभरे अली फजल ने जब यह पोस्टर शेयर किया तो लोगों ने इस पर अपनी आपत्ति दर्ज की, जिसे अली फजल सहन नहीं कर पाए।

अली फजल ने एक ट्वीट के जरिए बेहद सावधानी से और अस्पष्ट तरीके से रखते हुए अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा, “लिबरल्स कभी भी खुश नहीं होंगे। फर्जी नैतिकता, जो सब कुछ तोड़-मरोड़ती है। हर बढ़ते कदम का गला घोंटने को तत्पर। मैं उन्हें तमाशबीन कहता हूँ। वो बस देखते हैं और उन्हें लगता है कि वो जी रहे हैं और सीख रहे हैं। लेकिन जब असलियत में उन्हें जाँच लिया तो वो सब निराश करते हैं।”

अली फ़जल के इस ट्वीट ने उनके समर्थकों को और भड़का दिया और उन्हें समझाया कि यह एक जातिवादी फिल्म है और बेचने के लिए दलितों के प्रतिनिधित्व को इस्तेमाल किया जा रहा है। अली फजल से कुछ लोगों ने आपत्ति जताते हुए लिखा है कि दलितों की पहचान को और उनके शोषण का अपमान आपको ‘सिनेमा लाइसेंस’ नहीं देता।

कुछ लोगों का कहना है कि अली फजल जिन लोगों को लिबरल्स कह रहे हैं वो लोग वास्तव में अंबेडकरवादी हैं। लोगों ने अली फजल को अपने किसी दलित मित्र से सलाह लेने तक की भी राय दे डाली है।

एक ट्विटर यूजर, जिसकी प्रोफाइल पिक्चर पर पेरियार की तस्वीर लगी है, ने ऋचा चड्ढा के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए वामपंथी प्रोपेगेंडा मैगजीन ‘कारवाँ’ का एक पोस्टर, जिसमें मायावती नजर आ रही हैं, को शेयर करते हुए लिखा है कि ‘बहन जी (मायावती) के संघर्ष को इस तरह से सामने रखा जाता है। उन्होंने लिखा है कि जब आप एक जातिवादी इन्सान नहीं होते तब आप इस तरह से उन्हें सामने रखते हैं।

‘फ्रंटियर इंडिका’ नाम के एक ट्विटर यूजर ने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा है, “गोरा चेहरा, पंजाबी खत्री महिला मायावती के जीवन पर आधारित एक चरित्र निभा रही है और उसने हाथों में झाड़ू पकड़ी हुई है। जबकि मायावती एक कॉलेज से शिक्षित महिला हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन से पहले एक शिक्षक के रूप में काम किया।”

इस फिल्म के पोस्टर को दलित विरोधी बताते हुए ‘बहुजन कनेक्ट’ नाम के एक और ट्विटर यूजर ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “ऋचा चड्डा, तापसी, स्वरा आदि.. हमेशा ध्यान रखो कि ये नाम संघियों से भी ज्यादा खतरनाक हैं।”

‘अंबेडकर कारवाँ’ ने इस पोस्टर को शेयर करते हुए लिखा है कि सवर्णों के लिए एक दलित को बिना झाड़ू के देखना कितना मुश्किल है?

NDTV पत्रकार के लिए हिन्दुओं की यात्रा पर पत्थरबाजी संवैधानिक अधिकार है, उस पर कानून न बने

NDTV पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने भाजपा से घृणा जाहिर करने के लिए 5 जनवरी 2021 को एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने भाजपा शासित प्रदेशों में लाए गए नए कानूनों या फिर सत्ताधारी पार्टी द्वारा लिए गए फैसलों को लेकर अपने तर्क दिए।

श्रीनिवासन जैन ने सरकारी दस्तावेजों से हलाल शब्द हटाए जाने के फैसले को सरकार की स्ट्राइक कहा और उत्तर प्रदेश में ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) के ख़िलाफ़ बनाए गए कानून के लिए लिखा कि एक राज्य सरकार ने अंतरधार्मिक विवाह को आपराधिक घोषित करने के लिए कानून पास किया है। इसके बाद उन्होंने मध्यप्रदेश की ओर इशारा करते हुए उज्जैन में हुई हिंसा का सारा ठीकरा राम मंदिर डोनेशन यात्रा पर फोड़ा और कहा कि उसी से हिंसा भड़की, लेकिन सरकार ने पत्थरबाजों के ख़िलाफ़ कानून बना दिया।

श्रीनिवासन ने आगे मुन्नवर फारूकी का बचाव करते हुए उस एंगल को बिलकुल खारिज कर दिया कि उसने हिंदू देवी देवताओं के लिए अभद्र टिप्पणी की और ये दावा किया कि फारूकी इसलिए गिरफ्तार हुआ है क्योंकि उसने गृहमंत्री का मजाक उड़ा दिया था। आगे श्रीनिवासन ने कोरोना वैक्सीन पर उपजे विवाद पर ये गौर करवाया कि कैसे जो ‘बुद्धिजीवी’ इस वैक्सीन पर संदेह कर रहे हैं उन्हें सरकार राष्ट्र विरोधी घोषित कर रही है। 

अब प्रश्न यह है कि एनडीटीवी पत्रकार श्रीनिवासन जैन ये गहन विश्लेषण किस आधार पर करने चले हैं। क्योंकि, भाजपा के पास तो नए कानूनों को बनाने के पीछे पर्याप्त घटनाएँ हैं जिनकी गंभीरता साबित करती है कि लव जिहाद के ख़िलाफ़ बना कानून या फिर मध्यप्रदेश में बनने जा रहा पत्थरबाजों के ख़िलाफ़ कानून कितना अनिवार्य है। मगर, शायद श्रीनिवासन जैन जैसों की आपत्ति देख कर लगता है कि उनके लिए हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और हिंदुओं की यात्रा पर पत्थरबाजी करना, संवैधानिक अधिकारों की श्रेणी में आता है।

इसी प्रकार मुनव्वर फारूकी के घटिया ह्यूमर के ख़िलाफ़ हिंदूवादी संगठनों की नाराजगी भी जैन के लिए मुद्दा इसलिए है क्योंकि हिंदू अपने देवी देवताओं के लिए आवाज उठा रहे हैं। वरना खुद अंदाजा लगाइए आखिर इस पूरे टॉपिक को गृहमंत्री से जोड़ने का क्या मतलब? हकीकत यही है कि फारूकी ने भगवान श्रीराम और माता सीता को लेकर अभद्र टिप्पणी की, इसलिए उसके ख़िलाफ़ हिंदूवादी संगठनों ने आवाज उठाई। न कि इसलिए क्योंकि उसने 2002 के दंगों में गृहमंत्री अमित शाह का नाम घुसा कर अपनी कुंठा को व्यक्त किया।

सोशल मीडिया से लेकर फारूकी के ख़िलाफ़ दर्ज हो रही शिकायतों तक में हर जगह उन्हीं वीडियो क्लिप की बात है जिसमें मुनव्वर ने कहा था, “मेरा पिया घर आया ओ राम जी। राम जी डोंट गिव अ फ़*** अबाउट पिया। यह सुन राम जी कहते हैं मैं खुद चौदह साल से घर नहीं गया। अगर सीता ने सुन लिया, वो तो शक करेगी। सीता को तो माधुरी पे पहले से ही शक है। वो गाना है तेरा करूँ गिन-गिन इंतजार। उसे लग रहा है वनवास गिन रही है 14 पर आकर रुक गई।”

इसी प्रकार भारतीय वैज्ञानिकों को नीचा दिखाने की कोशिश भी श्रीनिवासन अब उसे प्रीमेच्योर वैक्सीन बताकर कर रहे हैं। वैक्सीन पर संदेह से आखिर तात्पर्य क्या है? क्या वामपंथियों के लिए वैक्सीन पर शक करने का मतलब बस यही है कि उसे भारतीय वैज्ञानिकों ने तैयार किया है, तो वो उसपर शक करेंगे ही, जैसे उन्होंने ये मान रखा हो कि भाजपा शासन काल में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा तैयार वैक्सीन में गोबार ही होगा, इसलिए इस पर शक करना, इसका उपहास उड़ाना अनिवार्य है। क्या वे ये नहीं जानते कि वैक्सीन को अनुमति तब तक नहीं दी जाती जब तक सारे टेस्ट और प्रक्रिया पूरी न हो जाए?

केरल में 14 साल के बेटे का माँ ने ही किया यौन उत्पीड़न: पिता की शिकायत पर पॉक्सो के तहत गिरफ्तार

केरल के तिरुवनंतपुरम जिले के कडकवूर (Kadakkavoor) में एक महिला को अपने ही बच्चे का यौन उत्पीड़न करने के मामले में गिरफ्तार किया गया है। महिला के ख़िलाफ़ पॉक्सो एक्ट (POCSO एक्ट) में मामला दर्ज हुआ है। 

न्यूज 18 की खबर के अनुसार,  महिला पर अपने 14 साल के लड़के का यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगा है। पूरे राज्य में इस तरह का ये पहला मामला आया है। बच्चे के पिता ने इस बाबत पुलिस में शिकायत दी थी। उन्होंने कहा था कि उनके बेटे की माँ पिछले कुछ समय से उसका उत्पीड़न कर रही है।

कडकवूर थाने के अधिकारी ने सोमवार (जनवरी 4, 2020) को IANS को बताया कि उन्हें एक पिता की शिकायत आई थी, जिसे उन्होंने बाल कल्याण आयोग को फॉर्वर्ड कर दिया। जाँच में पाया गया कि 35 साल की महिला अपने बच्चे को उत्पीड़ित कर रही थी। जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत के समक्ष पेशी के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेेज दिया गया है। महिला फिलहाल तिरुवनंतपुरम की महिला जेल में है।

गौरतलब है कि अभी हाल में केरल से ही दो आदिवासी लड़कियों के यौन उत्पीड़न का मामला आया था। इस केस में पुलिस ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया था। आदिवासी लड़कियाँ इन दोनों युवकों की दोस्त थीं और फोन के जरिए बात करते हुए इनके साथ रिलेशन में आई थीं। ये दोनों युवक इसी दोस्ती का फायदा उठा कर उन्हें नए साल की पूर्व संध्या पर अपने साथ ले गए और उनका यौन उत्पीड़न किया।

इससे पूर्व केरल में ही सुमदाय विशेष के दो अन्य युवकों पर 2 नाबालिग बच्चियों से रेप करने का आरोप लगा था। कथित तौर पर दोनों जुड़वाँ भाई थे और इनके नाम नौशाद व नवास थे। दोनों ने 10 साल और 5 साल की बच्चियों का कई बार रेप किया था। बच्चियों के माता-पिता ने इस मामले में दोनों भाइयों नौशाद और नवास के ख़िलाफ़ शिकायत करवाई थी और आरोप लगाया था कि दोनों बच्चियों का कई बार रेप किया गया।

‘सेना में बगावत, जवान मोदी के खिलाफ’: स्वरा भास्कर का ‘फौजी’ निकला फर्जी, वर्दी पहन बनाया था वीडियो

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा था, जिसमें एक व्यक्ति किसानों को लेकर भारतीय सेना के जवानों को भड़काता हुआ नज़र आ रहा है। बता दें कि पिछले एक महीने से ज्यादा समय से किसान संगठनों का मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहा है। बार-बार बातचीत के बावजूद किसान संगठन अपने रुख पर अड़े हुए हैं। इस बीच वायरल हुए इस वीडियो को स्वरा भास्कर सरीखों ने भी आगे बढ़ाया।

वीडियो में भारतीय सेना की वर्दी पहने उक्त शख्स खुद को भारत का फौजी बताता है और दावा करता है कि वो किसानों के आंदोलन में हिस्सा ले रहा है। उस वीडियो में वो कहता है, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ। मैंने अभी जो यूनिफॉर्म पहनी है, इसी वेशभूषा में मैं कुछ दिन पहले चीन की सीमा पर तैनात था। तब तो मैं बड़ा देशभक्त था। अब जब इस वर्दी को उतार कर मैं दिल्ली बॉर्डर पर किसान आंदोलन में हिस्सा लेने पहुँचा, तो मैं बहुत बड़ा देशद्रोही हो गया, आतंकवादी हो गया, खालिस्तानी हो गया?”

इस वीडियो में उसने दावा किया कि उसे अब इन्हीं नामों से नवाजा जा रहा है। इसके बाद वो पीएम मोदी को ‘सलाह’ देते हुए बताता है कि सिख और जाट रेजिमेंट के जवानों के दिल में क्या चल रहा है। फिर वो कहता है कि अगर किसी के घर में कोई परेशानी आ जाती है तो उसका ड्यूटी में मन नहीं लगता। साथ ही वो कहता है कि ‘पीएम मोदी ने तो जवानों के घरों में ही आग लगा दी है तो क्या ख़ाक ड्यूटी करेंगे वो!’

वायरल वीडियो में उक्त व्यक्ति दावा करता है कि भारतीय सेना के जो जवान आज सीमा पर खड़े हैं, दिल्ली में उनके ही परिजन अपना हक़ माँगने के लिए विरोध प्रदर्शन में बैठे हुए हैं। उसने दावा किया कि पीएम मोदी को ये सब दिखाई नहीं दे रहा है और सिर्फ उन्हें बड़े बिजनेसमैन ही दिखते हैं। फिर वो सवाल दागता है कि कौन से बिजनेसमैन का बेटा सेना में है? उसने केंद्र सरकार को सीधी धमकी देते हुए सेना में भी बगावत की बात कही।

उक्त व्यक्ति वीडियो में पूछता है कि आज जो किसान धरने पर बैठे हुए हैं अगर उनके बेटे सीमा से वापस लौट आएँ और उनके लिए लड़ने लगें तो क्या पीएम मोदी पाकिस्तान और चीन की फ़ौज लाकर उनका मुकाबला करेंगे? अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इसे वीडियो को आगे बढ़ाते हुए लिखा – ‘कुछ सीधी बातें!’ इसी तरह ‘किसान आंदोलन’ का समर्थन कर रहे अन्य लोगों ने भी इसे लेकर दावा किया कि भारतीय सेना अब मोदी सरकार के खिलाफ हो गई है।

अब आपको बताते हैं कि इस वीडियो की सच्चाई क्या है। असल में ये व्यक्ति न तो भारतीय सेना का जवान है, न ही किन्हीं सशस्त्र बलों से इसका कोई सम्बन्ध है। ये असल में पंजाब का एक गायक और अभिनेता है, जिसका नाम गोल्डी मनेपुरिया है। न तो ये किसान है, न ही जवान। ये एक पंजाबी कलाकार है। वो इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर खासा सक्रिय रहता है और अपने गाने अपलोड करता रहता है।

स्वरा भास्कर 2020 में भी पूरे साल विवादों में ही रही हैं। उन्होंने बाबरी मस्जिद और राम मंदिर को लेकर भी अपने प्रपंच का खेल खेला। स्वरा भास्कर ने दिसंबर 6, 2020 के अवसर पर अपने ट्वीट में लिखा था, “चाहे जितनी लीपा पोती कर लो, भगवान का घर… किसी के भी भगवान का घर तोड़ना पाप होता है।” उन्होंने ये सब इसके बावजूद लिखा, जब सदियों से हिन्दुओं के ही मंदिर तोड़े जाते रहे हैं।

अल्लाह-हू-अकबर चिल्लाते हुए भीड़ ने ईसाई महिला को नंगा कर सड़क पर घसीटा, कोर्ट ने रिहा कर दिया

साल 2016 में मिस्र (Egypt) की एक ईसाई वृद्धा के साथ बदसलूकी का मामला फिर तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। खबर है कि मिस्र में हमदा अल सवा नाम की एक पब्लिक प्रॉजिक्यूटर ने दोबारा इस केस पर गौर करने का निर्णय लिया है, जिसमें तीन मुस्लिम आरोपितों को 10 साल की सजा दिए जाने के बावजूद उन्हें आरोपों से रिहा कर दिया गया।

पूरी घटना काहिरा से 250 किमी दक्षिण में मिन्या प्रांत के अल करम सड़क की है। साल 2016 में 70 वर्षीय सुआद थबेट (Suad Thabet) और उनके पति अब्दु अयाद के घर पर 300 से ज्यादा कट्टरपंथियों ने हमला किया था। भीड़ को संदेह था कि एक मुस्लिम महिला के साथ वृद्ध दंपत्ति के बेटे का प्रेम प्रसंग है। 

इस दौरान आतताई भीड़ ने सुआद को न केवल मारा-पीटा था बल्कि उन्हें नंगा करके सड़कों पर घसीटा भी था। इसी भीड़ ने कथित तौर पर अल्लाह हू अकबर चिल्लाते हुए उनके घर को लूटने के साथ-साथ 5 अन्य ईसाइयों के घरों को लूट कर आग के हवाले झोंक दिया था। बाद में इस केस में कार्रवाई हुई। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया।

लेकिन, साल 2017 में यह पूरा केस ड्रॉप कर दिया गया। फिर पता चला कि साल 2020 के जनवरी माह में 3 आरोपितों को उनकी अनुपस्थिति में 10 साल की सजा सुनाई गई। लेकिन, हाल में खबर आई कि उन्हें भी रिहा कर दिया गया है।

विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना के बाद सुआद इतना टूट गईं कि जब तीनों आरोपितों को साल 2020 में रिहा किया गया तो वह कोर्ट के फैसले पर फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने पूछा, “आखिर उन लोगों को कैसे छोड़ा जा सकता है… प्रेसीडेंट अल सिसी ने मुझे न्याय दिलाने का वादा किया था, फिर कोर्ट ने कैसे कह दिया कि वो लोग निर्दोष हैं। मुझे लग रहा है मैं अब भी नग्न हूँ। अगर कुछ भी करके मुझे धरती पर न्याय नहीं मिलता तो मैं स्वर्ग में न्याय की प्रतीक्षा करूँगी।”

साल 2017 की एक विदेशी रिपोर्ट में महिला ने आपबीती साझा करते हुए कहा था, “हम लोग मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण वापसी घर नहीं जा पा रहे… सरकार ऐसे दमनकारियों को खुली सड़कों पर घूमने की छूट दे रही है। वह हमारा गाँव है। हम वहाँ पैदा हुए, बड़े हुए। आखिर हम पीड़ित कैसे हो सकते हैं कि अपने गाँव और घर न लौट पाएँ।”

आरोपितों की रिहाई के बाद सोशल मीडिया पर इस मामले के ख़िलाफ़ कई लोगों ने अपनी आवाज उठाई। एक हैशटैग चलाकर पीड़ित महिला के लिए न्याय की गुहार लगाई जाने लगी। मॉनिका गेबरिल ने सुवाद को न्याय दिलाने के लिए लोगों से कहा कि वह उन्हें अपनी माँ की तरह समझें।

रमी ने भी मिस्र में आरोपितों की रिहाई के लिए पीड़ित वृद्धा से क्षमा माँगी और, “Egypt was naked” नाम से एक नया हैशटैग चालू किया।

बता दें कि मिस्र में ईसाइयों के साथ भेदभाव नई बात नहीं है। काहिरा और अलेक्जेंड्रिया जैसे बड़े शहरों में फिर भी यह सब कम है, लेकिन मिनिया जैसे प्रांतों में यह बहुत अधिक होता है, जहाँ ईसाई चारों ओर से बहुसंख्यक आबादी से घिरे हुए हैं।