जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन के बाद देश को दो नए केंद्र शासित प्रदेश मिले। जम्मू कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा भी नहीं रहा। ऐसा अनुछेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने से संभव हो सका। इसका सबसे बड़ा फायदा ये होने वाला है कि अब देश भर के लोग जम्मू कश्मीर में विभिन्न नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते हैं। राज्य में 33 नॉन-गजटेड पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। ख़ास बात ये है कि पहले की तरह अब सिर्फ़ जम्मू कश्मीर के ही लोग इसके पात्र नहीं हैं बल्कि पूरे भारत से कोई भी आवेदन कर सकता है।
अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद ये पहली बार है, जब जम्मू कश्मीर में वैकेंसी निकली है। पहले इन पदों पर पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य के ‘स्थायी निवासी’ ही बहाल किए जाते थे। स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट और ड्राइवर सहित कई पदों पर वैकेंसी निकली है। आवेदक विभिन्न पदों के लिए अलग-अलग आवेदन भी कर सकते हैं। वहीं जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए जो पद आरक्षित हैं, उन्हें ‘स्थायी निवासियों’ के लिए रखा गया है।
कुल 33 पदों में से 17 ‘ओपन मेरिट’ कैटेगरी में आते हैं। अर्थात, इन 17 पदों पर जम्मू कश्मीर के बाहर के लोग (भारत के अन्य हिस्सों के लोग) भी आवेदन कर सकते हैं। हालाँकि, भाजपा की स्थानीय यूनिट ने दिल्ली आलाकमान से कहा है कि स्थानीय लोगों को नौकरियों में कुछ ख़ास छूट दी जाए। जम्मू कश्मीर भाजपा का कहना है कि जिन लोगों ने राज्य में 15-20 वर्षों तक निवास किया हो, उन्हें ही ‘स्थायी निवासी’ की पात्रता दी जाए। पार्टी का कहना है केंद्र सरकार सिर्फ़ एससी, एसटी और ओबीसी के लिए ही नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर के सभी नागरिकों के लिए आरक्षण की घोषणा करे।
जम्मू कश्मीर और लद्दाख के लोगों को स्थानीय मुख्य डिस्ट्रिक्ट जज को आवेदन देना होगा। जबकि, दोनों केंद्र शासित प्रदेशों के बाहर के लोगों को इन आवेदनों को जम्मू हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को सबमिट करना होगा। आवेदन की आखिरी तारीख दिसंबर 31, 2019 है। भर्ती से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं। इस नोटिफिकेशन में भी आपको इसकी पूरी जानकारी मिल जाएगा।
सीमापुरी हिंसा मामले में ख़ुद को नाबालिग बता कर बच निकलने की कोशिश करने वाले व्यक्ति को कोर्ट से तगड़ा झटका मिला है। आरोपित के Ossification जाँच के बाद पता चला है कि वो नाबालिग नहीं है। इस प्रक्रिया के तहत हड्डियों के सेल्स की जाँच की जाती है, जिससे व्यक्ति की उम्र का अंदाज़ा लग जाता है। इस जाँच में पता चला है कि वो व्यक्ति नाबालिग नहीं है। इस जाँच रिपोर्ट को सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को अदालत में पेश किया गया। नाबालिग होने के आधार पर आरोपित ने जमानत की माँग की थी। फ़िलहाल 6 जनवरी तक सुनवाई स्थगित कर दी गई है।
अदालत ने आरोपित को नाबालिग नहीं माना है। अब उसकी जमानत याचिका पर अगली तारीख पर बालिग़ मान कर सुनवाई की जाएगी। इससे पहले उसे बाकि आरोपितों से अलग रखने का निर्देश दिया गया था क्योंकि उसने ख़ुद को नाबालिग बताया था। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के सीमापुरी में हुई हिंसा को लेकर अदालत ने 11 आरोपितों को पुलिस कस्टडी में भेजा था। इन सभी लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर आगजनी, हिंसा और दंगे किए थे।
सीमापुरी केस में आरोपितों पर धारा 307 (हत्या का प्रयास) का मामला भी लगाया गया है, इसीलिए इसे गंभीर मानते हुए कोर्ट ने आरोपितों को जमानत देने से इनकार कर दिया था। सीमापुरी में हुई हिंसा में एडिशनल डीसीपी रोहित राजबीर सिंह पर हमला किया गया था, जिसके बाद वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। ये वारदात शुक्रवार (दिसंबर 27, 2019) को हुई थी। हिंसा होने के बाद उस दिन शाम से ही क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया था। पुलिस ने फ्लैग मार्च कर के स्थिति को सम्भाला था।
Seemapuri violence case: After the bone ossification test of the accused, Delhi Court has found that the accused is not a minor. https://t.co/ZHT3hyFcA5
पूरे नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में विभिन्न शांति समितियों और दोनों समुदायों के प्रबुद्ध जनों से बातचीत कर स्थिति को सम्भाला गया था। सीएए विरोधियों ने न सिर्फ़ सीमापुरी, बल्कि दरियागंज में भी पुलिस पर हमला कर दिया था।
दरियागंज में भी काफ़ी हिंसा भड़क गई थी। वहाँ से पुलिस ने 15 आरोपितों को गिरफ़्तार किया था, जिन्होंने पुलिस पर पत्थरबाजी की थी और आगजनी की थी। इस मामले में 9 आरोपितों ने जमानत याचिका दाखिल की थी, जिसका दिल्ली पुलिस ने विरोध किया था। दिल्ली पुलिस ने बताया है कि उसके पास 19 गवाह हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी आरोपित पुलिस के ख़िलाफ़ हुई हिंसा में संलग्न थे और मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद थे। दिसंबर 23 को मजिस्ट्रेट द्वारा बेल दिए जाने से इनकार करने के बाद सभी आरोपित सेशन कोर्ट पहुँचे थे। एक आरोपित ने ख़ुद को कोर्ट में नाबालिग बताया था लेकिन पुलिस को उसने अपनी उम्र 23 साल बताई थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवासीय परिसर में आग लगने की ख़बर आई है। प्रधानमंत्री का आवास लोक कल्याण मार्ग में स्थित है। मौके पर 9 दमकल गाड़ियाँ मौजूद हैं। अभी तक आग लगने के पीछे के कारणों का पता नहीं चल सका है। सेंट्रल दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में स्थित लोक कल्याण मार्ग को पहले रेस कोर्स रोड के नाम से जाना जाता था। अभी तक किसी के फँसे होने ये कुछ नुक़सान होने की सूचना नहीं है।
ख़बर है कि जैसे ही आग लगी, तुरंत फायर अलार्म बज गया। इसके बाद अग्निशमन विभाग एक्टिव हो गया और दमकलकर्मियों के दस्ते वहाँ पहुँच गए। खबर आ रही है कि इलेक्ट्रिक यूनिट के कारण आग लगी।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जब धनाऊ, रामगढ़ और सांचौर के किसानों के साथ बातचीत की तो वो सभी रो पड़े। किसानों की आँखों में आँसू छलक गए। मुख्यमंत्री गहलोत के सामने ही किसानों ने सरकार की नाकामी बखान कर दी। पाकिस्तान से आए टिड्डियों ने इन किसानों की फ़सल को भारी क्षति पहुँचाई है। सरकार का ‘टिड्डी नियंत्रण दल’ भी पूरी तरह विफल साबित हुआ है। किसानों ने कहा कि टिड्डियों के हमले के कारण वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनके घर में खाने के लिए रोटी तक नहीं बचा है।
हालाँकि, मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि सरकार सहायता करेगी लेकिन टिड्डियों के नियंत्रण में विफल रहने वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अभी तक एक भी किसान को मुआवजा भी नहीं दिया है। किसानों ने बताया कि उन्होंने पिछले 5 सालों में जितनी कमाई थी, उससे ज्यादा मात्र 1 साल में बर्बाद हो गया। जैसलमेर, बाड़मेर और सिरोही में पाकिस्तान से आए टिड्डियों ने भारी तबाही मचाई है। कर्जमाफी का वादा पूरा न किए जाने से किसान पहले से ही बेहाल है। कॉन्ग्रेस ने चुनावों से पहले कर्जमाफी का वादा किया था लेकिन किसी भी राज्य में उसकी सरकार ने अब तक कर्जमाफी नहीं की है।
धनाऊ, बाड़मेर में टिड्डी नियंत्रण दल, सम्बन्धित विभागों के अधिकारियों एवं जिला प्रशासन के साथ मीटिंग ली। pic.twitter.com/3LQcXOdzKR
गहलोत सरकार अभी भी जाँच कराने और रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई किए जाने की बातें कर रही है। मुख्यमंत्री ने ‘टिड्डी नियंत्रण दल’ के साथ बैठक के बाद कहा कि जिन किसानों ने बीमा करा रखा है, उन्हें बीमा कम्पनी से मुआवजा दिलाया जाएगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी माना कि टिड्डियाँ पूरी की पूरी फसल चट कर गई हैं। हालाँकि, उन्होंने इसके लिए मोदी सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। सीएम गहलोत ने कहा कि अगर केंद्र पाकिस्तान से संवाद कर के टिड्डी नियंत्रण का उपाय करता तो ऐसी नौबत आती ही नहीं।
जालोर जिले में सांचोर विधानसभा क्षेत्र के गाँव डेडवा में टिड्डी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्थिति का जायजा लेने के पश्चात किसानों को संबोधित किया। pic.twitter.com/Orpi6i5aU5
राजस्थान के खेतों में इस साल सबसे पहले जुलाई में टिड्डियों ने हमला किया था। इसके बाद से लगातार टिड्डियों का हमला बढ़ गया और किसान बर्बाद होते चले गए। किसानों का कहना है कि अब तक सरकार ने उनकी मदद नहीं की है। उधर मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।
जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्क्रिय हो जाने के बाद सुरक्षा लिहाज से गिरफ्तार किए गए 5 और नेताओं को आज लगभग 5 महीने बाद रिहा कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिहा किए गए नेताओं में पीडीपी के 2 पूर्व विधायक जहूर मीर और यासिर रेशी, नेशनल कॉन्फ्रेंस के 2 पूर्व विधायक इश्फाक जब्बार, गुलाब नबी और 1 कॉन्ग्रेस विधायक बशीर मीर शामिल हैं।
बता दें इन पाँचों नेताओं को 370 हटाए जाने के बाद हिरासत में लिया गया था। इनसे पहले 25 नवंबर को पीडीपी के दिलावर मीर और डेमोक्रैटिक पार्टी नैशनलिस्ट के गुलाम हसन मीर को रिहा किया जा चुका है।
Ishfaq Jabbar, Ghulam Nabi Bhat (National Conference), Bashir Mir (Congress), Zahoor Mir & Yasir Reshi (PDP) are the 5 Kashmiri political leaders released after over 4 months of detention
उल्लेखनीय है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती अभी भी हिरासत में हैं। केंद्र ने उनकी रिहाई के लिए कोई निश्चित तारीख नहीं बताई।
Jammu and Kashmir: Two former Peoples’ Democratic Party (PDP) legislators, two former National Conference (NC) legislators and one former Independent legislator who were detained after abrogation of #Article370 in August, have been released. pic.twitter.com/JqHYT16Zoy
बता दें, जम्मू-कश्मीर में जैसे-जैसे स्थिति सामन्य हो रही है, प्रशासन भी ढिलाई बरतने लगा है। जिन नेताओं को संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया था कि वे मौक़े का फायदा उठाकर लोगों को भड़का सकते हैं, उन्हें अब राज्य में शांति देखकर छोड़ा जा रहा है।
इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होने पर कानून व्यवस्था के लिए तैनात अर्द्धसैनिक बलों की 52 और कंपनियाँ रविवार को कश्मीर घाटी से वापस भेज दी गईं। जिससे पहले 24 दिसंबर को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में 5 अगस्त के बाद बने हालात की समीक्षा की गई थी। बैठक में तत्काल प्रभाव से केंद्रीय सशस्त्र बलों की 72 कंपनियों को घाटी से हटाने का फैसला किया गया था। इसमें सीआरपीएफ की 24, बीएसएफ की 12, आईटीबीपी की 12, सीआईएसएफ की 12 और एसएसबी की 12 कंपनियां शामिल थीं।
पिछले कुछ समय में टिकटॉक के आ जाने के बाद से अलग-अलग तरह की वीडियो बनाने के लिए सड़कों पर लोग तरह-तरह के स्टंट करते नजर आते हैं। इसी कारण कई बार वो जोखिम उठा लेते हैं और पल भर की गलती से ही अपनी जान गवा बैठते हैं। इसी कड़ी में आज रेल मंत्रालय ने एक वीडियो शेयर की है। जिसमें मुंबई की एक लोकल ट्रेन में एक युवक को स्टंट करते दिखाया गया है और जिसमें देखते ही देखते उस युवक की एक खंभे से टकराकर मौत हो गई।
रेलवे मिनिस्ट्री द्वारा ट्वीट की गई वीडियो के साथ बताया गया कि इस वीडियो में दिलशान नाम का युवक मुंबई की लोकल ट्रेन (Mumbai Local Train) के बाहर लटक कर स्टंट कर रहा था। तभी रास्ते में आए खंभे से टकराया और उसकी मौके मृत्यु हो गई। रेल मंत्रालय के मुताबिक यह घटना 26 दिसंबर को घटी।
रेल मंत्रालय ने अपने ट्वीटर हैंडल से इस वीडियो को जारी करते हुए चेतावनी दी कि इस तरह के स्टंट (Stunt) करना गैरकानूनी हैं और ये जानलेवा साबित हो सकते हैं। रेलवे ने कहा है कि अपनी सुरक्षा की अवहेलना करके ट्रेन के बाहर लटकना, चलती ट्रेन में चढ़ना, हादसे को बुलावा हो सकता है।
ट्रेन में स्टंट ना करें ये गैरकानूनी है एवं जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है।
मुंबई में 26 दिसंबर को दिलशान नाम का युवक ट्रेन के बाहर लटक कर स्टंट करते हुए अपनी जान गंवा चुका है।
अपनी सुरक्षा की अवहेलना करके ट्रेन के बाहर लटकना,चलती ट्रेन में चढ़ना, हादसे का बुलावा हो सकता है। pic.twitter.com/oGEsqjoka6
गौरतलब है कि ये पहली घटना नहीं है, इससे पहले अक्टूबर में वडाला रेलवे पुलिस ने एक युवक को चलती ट्रेन में खतरनाक स्टंट दिखाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के कोरबा में जिले में भी एक शख्स और उसके दोस्त को टिक-टॉक वीडियो के चक्कर में सीआरपीएफ ने गिरफ्तार किया था। इनपर आरोप था कि ये लड़के चलती ट्रेन में स्टंट करते हुए वीडियो बना रहे थे।
वहीं, इसी वर्ष जुलाई में बिहार के 18 साल के इस युवक के लिए टिकटॉक वीडियो बनाना जानलेवा साबित हुआ था। जहाँ वीडियो बनाने में मशगूल युवक को यह तक पता नहीं चला कि ट्रेन एकदम करीब आ गई है और जब तक वह संभलता, तब तक ट्रेन के झटके से उसकी मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर दंगा करने उतरे दंगाइयों का समर्थन करते हुए कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने आज योगी सरकार पर निशाना साधा। लखनऊ के कॉन्ग्रेस मुख्यालय में सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को प्रियंका गाँधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार, प्रशासन और पुलिस द्वारा कई जगह अराजकता फैली है। जिसके मद्देनजर उन्होंने (कॉन्ग्रेस) राज्यपाल को पत्र भी लिखा है। प्रियंका का मानना है कि प्रदेश में कार्रवाई के नाम पर उठाए गए कदमों का कोई लीगल आधार नहीं है। उनका कहना है कि प्रदेश की इस वक्त पुलिस केवल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बदला’ लेने वाले बयान पर काम कर रही है।
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने आज राज्यपाल से मुलाकात की और प्रदेश में सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की बर्बरता की न्यायिक जांच कराने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा। pic.twitter.com/WUBOxcsCYA
कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इस मौक़े पर उपद्रवियों पर हो रही कार्रवाई के ख़िलाफ़ बोला, “हिंसा किसने शुरू की, इसकी जाँच होनी चाहिए, क्योंकि कौन जानता है कि आगजनी किसने शुरू की। आप बिना जाँच के कैसे कार्रवाई कर सकते हैं? पहले यह पता करें कि हिंसा किसने शुरू की?”
गौरतलब है कि बीते दिनों यूपी में हिंसा के दौरान सड़कों पर उतरे दंगाईयों के ख़िलाफ़ यूपी सरकार, प्रशासन और पुलिस ने सख्ती बरतते हुए एक्शन लेना शुरू किया था। इस प्रक्रिया के लिए प्रशासन ने पर्याप्त रूप से सबूत जुटाकर, दंगाइयों के घर नोटिस भेजकर अपना काम किया था।
लेकिन, फिर भी आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कॉन्ग्रेस महासचिव को सुनकर लगा कि वो भाजपा का विरोध करने की आड़ में भूल चुकी हैं कि कानूनी कार्रवाई प्रदर्शनकारियों पर नहीं हो रही, बल्कि दंगाईयों पर हो रही है। उन दंगाइयों पर जिन्होंने सड़कों पर पत्थरबाजी की, पुलिस पर गोली चलाई और सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट किया।
बता दें प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीजीपी ओपी सिंह इस मामले के संबंध में पहले ही कह चुके हैं कि वे इस हिंसा में किसी भी निर्दोष को हाथ नहीं लगाएँगे, लेकिन जिन्होंने हिंसा की है, उन्हें किसी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा। जिन्होंने प्रदेश में सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया है, उसकी भरपाई उनकी संपत्ति से की जाएगी। साथ ही कानूनी रूप से दंड भी मिलेगा।
महाराष्ट्र में कैबिनेट विस्तार हुआ और उद्धव ठाकरे सरकार में एनसीपी के अजित पवार उप-मुख्यमंत्री बने। वहीं उनके बेटे आदित्य ठाकरे को भी कैबिनेट में शामिल किया गया। कॉन्ग्रेस के कोटे से सिने अभिनेता रितेश देशमुख के भाई अमित देशमुख को मंत्री बनाया गया। वो दिवंगत मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी कॉन्ग्रेस कोटे से मंत्री बने। हालाँकि, इन सबके बीच शिवसेना के कई विधायकों की नाराज़गी भी सामने आई, जो अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री बनाए जाने और शिवसेना विधायकों को नज़रअंदाज़ किए जाने से नाराज़ हैं। लेकिन, इन सबके बीच कोई और भी निराश है।
सुनील राउत 2014 में मुंबई सब-अर्बन क्षेत्र के विखरोली विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में भी उन्हें जीत मिली। दोनों बार उन्होने शिवसेना के टिकट पर ही चुनाव लड़ा। अंदेशा जताया जा रहा था कि संजय राउत के भाई को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा लेकिन ऐन मौके पर उनका नाम हटाए जाने के आरोप लग रहे हैं। कई मीडिया रिपोर्ट्स में तो यहाँ तक दावा किया गया कि सुनील राउत शिवसेना से इस्तीफा भी दे सकते हैं। सुनील राउत, शिवसेना के प्रवक्ता और पार्टी मुखपत्र ‘सामना’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत के भाई हैं।
संजय राउत को ही शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस गठबंधन का सूत्रधार माना जाता है। उन्होंने ही भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ कर उद्धव को मुख्यमंत्री बनाए जाने की पहल की। उन्होंने बार-बार “अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा” बोल कर भाजपा गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद राजग से नाता तोड़ लिया। भाई को मंत्री न बनाए जाने वाले सवाल पर संजय राउत ने नाराज़गी की ख़बरों को नकार दिया लेकिन उनके बयान में थोड़ी झल्लाहट दिखी। संजय राउत ने कहा:
“हम माँगने वाले लोग नहीं हैं। हम देने वाले लोग है। हमने हमारे लिए या फिर हमारे परिवार के लिए कभी कुछ नही माँगा है। हम हमेशा हमारी पार्टी मे हमारा योगदान देने वाले लोग है। कुछ लोग मेरे परिवार को लेकर अफवाह फैला रहे हैं। हमलोग ठाकरे परिवार के प्रति हमेशा वफादार रहे हैं। मेरे परिवार ने महाराष्ट्र में सरकार गठन में योगदान दिया है। ये तीन दलों की सरकार है और सभी दलों में योग्य लोग हैं। कोटे के तहत जिसे जो मिला, स्वीकार्य है। मैं इसी बात से ख़ुश हूँ की हमारे नेता उद्धव राज्य के मुख्यमंत्री हैं। मेरे भाई सुनील ने कभी मंत्रीपद की माँग नहीं की।
हम मांगने वाले नही हम देने वाले है | हमने हमारे लिए या फिर हमारे परिवार के लिए कभी कुछ नही मांगा है | हम हमेशा हमारी पार्टी मे हमारा योगदान देने वाले लोग है | कुछ लोग इसप्रकार की बाते फेला रहे है | – @rautsanjay61https://t.co/avgnUFJeW0pic.twitter.com/MmPFUfv1X6
संजय राउत ने कहा कि उनका परिवार मंत्री बनने के लिए राजनीति में नहीं आया है बल्कि संगठन को मजबूत करने के लिए आया है। उन्होंने कहा कि उनके भाई सुनील लम्बे समय से विधायक रहे हैं लेकिन उन्होंने कभी भी मंत्री बनने की इच्छा नहीं जाहिर की। उन्हों कहा कि सुनील व उनके जैसे हज़ारों लोग लगातार पार्टी व महाराष्ट्र की जनता के लिए काम करने में लगे हुए हैं।
36 नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण के बाद अब महाराष्ट्र सरकार में कुल 43 मंत्री हो गए हैं। 33 कैबिनेट मंत्रियों में से 10 शिवसेना के हैं, 12 एनसीपी के और 10 कॉन्ग्रेस के हैं। एक मंत्री ‘क्रन्तिकारी शेतकरी पक्ष’ का है। 10 राज्यमंत्रियों में से 1 शिवसेना का, 5 एनसीपी के और 2 कॉन्ग्रेस के हैं। शिवसेना कोटे से एक निर्दलीय को राज्यमंत्री बनाया गया है। वहीं ‘प्रहार जनशक्ति पक्ष’ के विधायक को राज्यमंत्री का पद दिया गया है।
सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत को देश का पहला ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ नामित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ के गठन की सौगात दी थी। इससे न सिर्फ़ तीनों सेनाओं के आपसी सामंजस्य को बढ़ावा मिलेगा बल्कि उनकी समस्याओं पर ग़ौर करने के लिए भी रक्षा मंत्री का एक सलाहकार होगा। अब तक ये मामले केंद्रीय रक्षा सचिव ही देखते आ रहे थे, जिनके पास कोई सैन्य अनुभव नहीं होता। केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल सिंह गुर्जर ने विपिन रावत को ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS)’ बनाए जाने की पुष्टि की है।
सरकार ने बताया है कि सीडीएस 65 वर्ष की उम्र तक सेवा देने के योग्य रहेगा। हालाँकि, अभी तक सीडीएस का कात्याकाल निश्चित निर्धारित नहीं किया गया है। जनरल विपिन रावत इस वर्ष 31 दिसंबर को रिटायर होने वाले हैं। सीडीएस एक फोर स्टार जनरल होगा, जो रक्षा मंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार के रूप में काम करेगा। वो ‘चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी’ का स्थायी अध्यक्ष भी होगा। परम विशिष्ट सेवा मैडल, उत्तम युद्ध सेवा मैडल, अति विशिष्ट सेवा मैडल, युद्ध सेवा मैडल, सेना मैडल और विशिष्ट सेवा मैडल से सम्मानित जनरल रावत को सीडीएस बनाए जाने पर सोशल मीडिया में उन्हें बधाइयाँ दी गईं।
केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री कृष्णा पाल सिंह गुर्जर ने कहा कि भारत सरकार के इस बड़े रणनीतिक निर्णय से देश की चुस्त रक्षा व्यवस्था और सुरक्षा को और मजबूती मिलेगी। जनरल विपिन रावत की उम्र 61 वर्ष है। मीडिया रिपोर्ट्स में सम्भावना जताई गई है कि वो अगले 4 वर्षों तक इस पद पर बने रह सकते हैं।
The big strategic decision by Government towards the country’s robust defence and safety- Gen Bipin Rawat named as the country’s first Chief of Defence Staff! pic.twitter.com/ShJ3lBHUR7
युद्ध या बड़े आपदा के समय सीडीएस की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि तीनों सेनाओं को मिल कर कैसे काम करना है और उनकी समस्याओं व बातों को रक्षा मंत्री तक कैसे पहुँचाना है, ये सीडीएस ही देखता है। दुनिया भर के कई देशों में सीडीएस या इसके जैसा पद है। कारगिल युद्ध के बाद बनाई गई कमिटी ने सीडीएस के गठन की सिफारिश की थी। अब तक ये सब ‘डिफेंस प्लानिंग कमिटी’ के माध्यम से किया जा रहा था, जो प्रधानमंत्री को सलाह देती है। एनएसए अजित डोभाल इसके अध्यक्ष हैं और इसमें तीनों सेनाओं के अध्यक्ष शामिल हैं। इसमें रक्षा, विदेश और एक्सपेंडिचर के मुख्य सचिव भी शामिल हैं।
सीडीएस का कोई ऑपरेशनल रोल नहीं होगा। ये मिलिट्री कमांड में ऑपरेशन को संचालित नहीं करेगा। सीडीएस के पद को लेकर एक और बात ये होगी कि इससे रिटायर होने वाला व्यक्ति आगे किसी भी सरकारी पद पर बहाल नहीं किया जा सकेगा। मोदी सरकार के फ़ैसले के बाद अब दशकों पुरानी माँग पूरी हो गई है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में अभियान चला कर उपद्रवियों व दंगाइयों को करारा जवाब दिया। ख़बर लिखे जाने तक ‘आई सपोर्ट सीएए’ को लेकर 7 लाख ट्वीट्स किए जा चुके थे जबकि इसका विपक्ष में 50 हज़ार ट्वीट्स भी नहीं हुए थे। आम लोगों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर सड़क पर उत्तर कर गुंडई करने वालों को जवाब दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अभियान में भाग लेते हुए सद्गुरु का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने सीएए को लेकर बातें की हैं। पीएम मोदी ने लिखा कि सद्गुरु ने सीएए के सभी पहलुओं के बारे में स्पष्टता से बात की है।
इस वीडियो में सद्गुरु ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से जिस तरह की हिंसा देखने को मिली है, उस हिसाब से इसे स्पष्ट करना आवश्यक है। उन्होंने विभाजन की त्रासदी की चर्चा करते हुए बताया कि किस तरह दोनों तरफ के लोगों ने बड़े पैमाने पर माइग्रेट होना पड़ा। सद्गुरु ने कहा कि पकिस्तान और बांग्लादेश का गठन मजहबी आधार पर हुआ लेकिन भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश रहा। उन्होंने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि और संपत्ति को छोड़ कर जाना उचित नहीं समझा। सद्गुरु ने बताया कि 1971 में बांग्लादेश गठन के समय 19-20% लोग प्रताड़ना से तंग आकर भारत में आ गए थे।
उन्होंने पाकिस्तान की चर्चा करते हुए कहा कि वहाँ का क़ानून ही भेदभाव वाला है। उन्होंने कहा कि भारत में भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं लेकिन यहाँ एक व्यक्तिगत स्तर पर हो सकता है, क़ानून में नहीं है। उन्होंने कहा कि जाति-धर्म, लिंग इत्यादि के आधार पर दुनिया में हर जगह भेदभाव होते हैं। उन्होंने कहा कि क़ानून के अनुसार, भारत के सभी लोग समान हैं। सद्गुरु ने आगे कहा:
“पाकिस्तान में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है, सभी अल्पसंख्यकों को प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। एक प्रोफेसर पर ईशनिंदा का आरोप लगा कर सज़ा-ए-मौत दी गई। ऐसी चीजें भारत में संभव नहीं हैं। मैं अज़रबैजान के बाकू में था, जहाँ फायर टेम्पल है। वहाँ 164 पाकिस्तानी हिन्दू पहुँचे थे। वो फायर टेम्पल 6000 साल पुराना है। प्राचीनकाल में साधना के लिए भारत के लोग वहाँ जाया करते थे, ऐसा प्रमाण मिला है। भारत के लोग बाकू के बारे में भूल गए हैं। लेकिन, पाकिस्तानी वहाँ भी जाते हैं। मैंने 164 लोगों के साथ अलग-अलग फोटोज लिए, कुल 200 से भी ज्यादा फोटोज। एक पाकिस्तानी हिन्दू युवक ने मुझे बताया कि 10-12 लोग आए और उसके साथ मारपीट की, इसके बाद वो उसकी पत्नी को उठा कर ले गए।”
सद्गुरु ने बताया कि उक्त युवक की पत्नी की शादी किसी और से कर दी गई। वो क़ानून के पास भी नहीं जा सकता था, वो अदालत में केस भी नहीं दायर कर सकता था क्योंकि पाकिस्तान में हिन्दू शादी को वैध माना ही नहीं जाता है। सद्गुरु ने बताया कि पाकिस्तान में ऐसी कई वारदातें होती हैं और उत्पीड़ित लोग दशकों से यहाँ आते रहते हैं। बकौल सद्गुरु, सीएए तो उनके लिए बहुत कम राहत है, जो काफ़ी देर से मिला। उन्होंने पाकिस्तान में मंदिरों की संख्या कम होने और तोड़े जाने की भी चर्चा की। वहीं भारत के बारे में उन्होंने कहा कि यहाँ सभी धर्मों के लोग अपनी आस्था की प्रैक्टिस करते हुए रह सकते हैं।
Do hear this lucid explanation of aspects relating to CAA and more by @SadhguruJV.
He provides historical context, brilliantly highlights our culture of brotherhood. He also calls out the misinformation by vested interest groups. #IndiaSupportsCAAhttps://t.co/97CW4EQZ7Z
सद्गुरु ने समझाया कि सीएए उनलोगों के लिए नहीं है, जो दूसरे देशों से भारत में आएँगे। ये उन धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए है, जो तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों में हुई प्रताड़ना से तंग आकर दिसंबर 2014 तक भारत में आ चुके हैं। उन्होंने समझाया कि इससे नए लोग नहीं आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश को आज़ाद किए जाने के समय 30 लाख हिन्दुओं को मार डाला गया था। उन्होंने बताया कि असम में शरणार्थियों की संख्या ज्यादा हो गई थी, जिसके बाद असम एकॉर्ड बना और घुसपैठियों को बाहर निकाले की व्यवस्था की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन्होंने ये एकॉर्ड बनाया, उन्होंने ही इसे अमल में नहीं लाया।
सद्गुरु ने सीएए के ख़िलाफ़ हो रहे उपद्रव पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि इसका विरोध कैसे किया जा सकता है? उन्होंने बताया कि भारतीय नागरिकता के लिए कोई भी आवेदन कर सकता है, किसी के लिए दरवाजे बंद नहीं किए गए हैं। उन्होंने बताया कि जिन्हें भी नागरिकता मिलेगी, वो सालों से यहाँ रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका विरोध किया जाना अजीब है। उन्होंने कहा कि सीएए के ख़िलाफ़ विरोध करने वाले अब कह रहे हैं कि वो पुलिस की बर्बरता के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। सद्गुरु ने कहा:
“केंद्र सरकार को भी अंदाज़ा नहीं था कि इतने अच्छे क़ानून का इतने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन होगा और इसे मुद्दा बना दिया जाएगा। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा हुई और पुलिस के साथ काफ़ी बर्बर तरीके से व्यवहार किया गया। हज़ारों लोगों ने पुलिस को पीटा, जिसके बाद बड़ी संख्या में सुरक्षा बल लगाना पड़ा। सीएए विरोधी कह रहे हैं कि वो जामिया में पुलिस कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। जामिया वालों ने पत्थरबाजी की, जिसके बाद पुलिस को कैम्पस में घुसना पड़ा। हो सकता है उन्हें भी पीटा गया हो, जिन्होंने पत्थर नहीं चलाए लेकिन वो पत्थरबाजों के साथ बस बैठे हुए थे। भीड़ में ऐसा होता है। लेकिन, फिर भी पुलिस ने धैर्य दिखाते हुए गोली नहीं चलाई। लखनऊ में 56 पुलिसकर्मियों को गोली लगी। तब गोलियाँ कहाँ से आई? पुलिस पर गोली किन लोगों ने चलाई? कई लोगों ने खतरनाक खेल खेला।”
सद्गुरु ने कहा कि कुछ अनपढ़ मजहबी उन्मादियों ने हिंसा की वारदातों को अंजाम दिया। अफवाह फैलाया गया कि भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी और उन्हें निकाल बाहर किया जाएगा। सद्गुरु ने आश्चर्य जताया कि इतने बड़े स्तर पर अफवाह फैलाया गया। सद्गुरु ने कहा कि बड़े यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों ने भी क़ानून को पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाई और अफवाहों पर ध्यान दिया। उन्होंने पूछा कि क्या ये छात्र व्हाट्सप्प पर पीएचडी कर रहे हैं? सद्गुरु ने सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाए जाने की भी निंदा की।
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सद्गुरु ने कहा कि अल्पसंख्यकों के बीच काफ़ी सुनियोजित तरीके से अफवाहें फैलाई गई। उन्होंने कहा कि अब जब उपद्रवियों की पोल खुल गई है, वो कह रहे हैं कि वो फलाँ कारण से प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान सद्गुरु ने एनआरसी को लेकर भी बातें की। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से लोगों को डेटाबेस में रजिस्टर किया जाना है। उन्होंने कहा कि ये पता होना चाहिए कि देश में कितने लोग हैं और वो कहाँ से आए हैं। उन्होंने पूछा कि जब ये नियम सबके लिए है, फिर भी इसे भेदभाव वाला क्यों बताया जा रहा है? उन्होंने कहा कि जो बोल रहे हैं कि उनके पास कोई कागज़ात नहीं हैं, फिर वो आख़िर हैं कौन?